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तु त. ट प – वतनी क ु टयाँ संभा वत ह चंू क पाठ को वचा लत फ़ॉ ट प रवतक के ज रए पां त रत

कया गया है

न दलाल भारती के सम-साम यक आलेख

न दलाल भारती
ामीण भारत एवं शहर भारत के बीच दरू कम करने म लेखक एवं काशक क भू मका

ामीण भारत अथात गांव,गांव का नाम आते ह हमारे सामने कई तरह के य उभर आते ह
िजन य म शा मल होते है गोबर से लपे संवरे सजे घर आंगन,माट का सोधापन,हरे -भरे खेत
ख लहान,खेत म काम करते,बोझ ढोते गर ब मजदरू,मैदान म केट/ ग ल ड डा खेलते ब चे,
साइ कल क रम अथवा लोहे क गडार पगडि डय पर दौडाते ब े◌ा,महाजनी
यव था,गर बी,भू मह नता,अंध व वास एवं अनेक बराईया
ु । दसर
ू तरफ शहर का नाम आते ह
मायानगर का बोध होता है -गगनचु बी इमारत, धआं
ु उगलते कल कारखाने आ लशान को ठयां /
ससि
ु जत दफ् तर चकाच ध और भ व य संवारने क उ मीद अथात स प नता के हर इ तजाम ।
सच मायने म यह य ामीण भारत एवं शहर भारत के बीच दरू न मत करते आ रहे ह
।इस दरू को कम करने के लये लेखक एवं काशक सदा से यासरत ् है । उनक को शशे भी
कामयाब हई ु है । सामािजक याय के े म दये गये योगदान को ेमच द को सदा याद कया
जाता रहे गा । सामािजक कर ु तय और नार शोपण पर आधा रत उनक रचनाय कत यबोध,
समाज को जोडने एवं सदभावनापण
ू वातावरण न मत करने म अहम ् भू मका नभायी ह चाहs
वह ामीण भारत रहा हो या शहर ।
ामीण भारत एवं शहर भारत के बीच दरू का मु य कारण रोजगार एवं वकास कहा जा सकता
है । यह कारण है क ामीण भारत शहर क ओर आक पत हआ ु है । गारमीण
् भारत आज भी
कई सु वधाओं से वं चत है । इस बारे म च तन का मु दा लेखक ने अपनी रचनाओं के मा यम
से शीप से लेकर आमजन तक को दया है । प रणाम व प द ू रयां कम हई
ु है । आजाद के
दन म जन जागरण के लये लेखक ने खब
ू लखा और काशक ने आतंक के साये म रहते हएु
भी का शत कया । िजसके सख
ु प रणाम आये । जातीय े ठता- न नता, गर बी -अमीर से
उपजी सामािजक पीडा के आ ोश को कम करने के लये भी खब
ू लखा गया है प रणाम व प

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वकास का रथ ामीण भारत क ओर भी ख कया है ,िजससे ामीण भारत और शहर भारत
के बीच दरू ज र कम हई◌्
ु र है । ामीण भारत और शहर भारत के बीच क दरू कम करने के
लये बहत
ु कछु लखा जा चका
ु है और बहत
ु कछ
ु लखा जा रहा है बहतु कछु शेप है। आशा है
क लेखक/नवो दत लेखक लेखन का के ब द,ु -नै तकता एवं रोजगारो मख ु ी श ा / ामीण
तर सचना
ू एवं ादय◌ौ
् गक के ो क थापना/कल कारखान क थापना को ो साहन
।-सामािजक एवं आ थक याय /सामािजक बराईय
ु एवं जा तवाद पर कठराघात
ु /भू मह न मजदरू
को रोजगार/ वा थ- णह
ू या एवं बा लका वकास /नार अ धकार/गारमीण
् भारत म रोजगार के
अवसर / वकास रथ गांव क ओर कैसे बढे एवं ामीण भारत और शहर भारत के भेद क
मान सकता म बदy◌ाव आ द वपय को बनाये तथा काशक ाथ मकता के आधार पर का शत
कर।
उपरो त मु दो पर लेखन ामीण भारत और शहर भारत के बीच क दरू को कम कर सकता है
। पर तु सम या यह है क ये सा ह य ामीण भारत और शहर भारत के शीप से आमजन तक
पहंु चे कैसे । इसके लये सरकार को आगे आना होगा । सा ह यकार के संघप को वीकार कर
उ चत मू यांकन और उ चत सहयोग भी करना होगा । पाठको को भी इस महाय म पणा

आहु त भी डालनी होगी तभी यह य परा
ू हो सकता है । प रवतन तो वैचा रक ाि त से आता
है। वतमान दौर म अ य साधन क घसपै
ु ठ क वजह से जनमानस कताब से दरू होता जा रहा
है । ऐसे दौर म आव यक हो गया है क लेखको के वचार उनक रचनाय गांव गांव एवं शहर
शहर तक के पाठको तक पहंु चे और आवाम के बीच चचा हो। कृ तय के◌े य व य क
िज मेदार सरकार सं थाओं को उठानी होगी । तभी लेखक एंव काशक का प र म फल भत
ू हो
सकता है ।
यथाथ के धरातल पर भारतीय अि मता जो हमारे दे श के धम आ या म,योग व ान और
सा ह य के प म वराजमान है उस पर अफसोस करने क बजाय गव करना चा हये । अभी भी
उ मीद का सोता सखा
ू नह है । आव यकता इस बात क है क हम श ा प द त म
बदलाव,सामािजक समानता,गर बी उ मल
ू न आ द मु द पर कलम चलाये तो यक नन दे श और
समाज को लाभ पहंु चेगा । अं धयारा चाहे िजतना भी गहरा य न हो वह सबह
ु ज र आयेगी ।
द ू रयां चाहे जैसी भी इन द ू रय को जन जागरण के मा यम से समा त कया जा सकता है । यह
काय लेखक बखबी
ू करते आ रहे है । लेखक समय का पु ह ,सजनकार
ृ ह , काशक मू त कार है
और पाठक ाण त ठा करने वाला।
लेखक और काशक ामीण भारत और शहर भारत के बीच सेतु का काम करते आ रहे है और
भ व य म करते रहगे । बदलते समय म लेखको एवं काशको क भू मका को और अ धक मह व
दया जाना चा हये।
दरू आदमी आदमी के बीच हो, ा त और ा त के बीच हो या दे श -दे श के बीच है फलदायी तो
नह हो सकती ।दरू क अ तरा मा म कु ठा है। बाधा है। कावट है सामािजक उ थान क राह
मे◌े◌ं आ थक उ थान क राह मे◌े◌ं और नै तक उ थान क भी । वत ता प रपण
ू बोध है ।
यह तभी स भव हो सकता है जब बा य एवं आ त रक एक पता हो, समानता हो। वत ता क
अनेक सस कयां आज भी जी वत है । यह दा तान हमार वत ता को मजबती
ू दान कर रह
2
है । कछ
ु ऐसी ह ह ामीण भारत और शहर भारत के बीच क द ू रय क दा तान है। इस
दा तान को भले ह कोई नह सन
ु रहा है पर तु लेखक सन
ु रहा है । उन एहसास म जी रहा है ,
तभी तो रचनाओं का संसार खडा कर रहा है । यक नन वह अपने रचना संसार से दे श समाज का
भला कर रहा है। द ू रयां वैचा रक ाि त से कम क जा सकती है । इस वैचा रक ाि त म
सामािजक याय और आ थक उ थान क स भावना समा हत हो तो नि चत प से ामीण
भारत और शहर भारत के बीच द ू रयां मटे गी ।
लेखक एवं काशक सदा से दे श -समाज क द ू रयां कम करने का यास करते रहे है । वतमान
म ामीण भारत और शहर भारत के बीच न मत हो रह द वारो को लेखक अपने लेखक य धम
और काशक अपने कम से मटाने म कामयाब होगे । पाठको◌े को भी अपने फज से वमख

नह होना चा हये ।

न दलाल भारती

॥ गर बी के लये िज मेदार कौन॥

ध नखाह क आमदनी म दन दनी


ु रात चौगनी
ु बढोतर और गर ब क उसी ग त से बढती द नता
को दे खकर सवाल उठने लगा है क आ खरकार गर ब के पतन के लये िज मेदार कौन है सरकार
समािजक असमानता ,खेत अथवा उ योग धंध के मा लक ।गर ब के घर पैदा होने वाले ब चे को
दो जन
ु क खी सखी
ू रोट मययसर
् नह होती ।गर ब का ब चा जैसे ह चलने फरने क ि थ त
म आता है तो वह भी मां बाप के साथ रोट के लये संघपरत् हो जाता है ।दसर
ू तरफ अमीर का
ब चा ऐश आराम म पलता है।पढ लखकर ग द स भाल लेता है । गर ब और गर ब का प रवार
दन भर क हाडफोड मेहनत के बाद रोट का इ तजाम बडी मिु कल से कर पाता है वह दसर
ू ओर
अमीर का बेटा दौलत का पहाड जोड लेता ह। सफेदपोश तो और भी ती ग त से रकाड बनाने लगे
है ।ऐसी कौन सी मशीन इन पहाड खडा करने वाल के हाथ लग जाता है क वे दौलत के पहाड
पर खडा होकर मु कराते ह । गर ब आमजन रोट के लये हाडफाड मेहनत के बाद तंगहाल बसर
करने को मजबरू है । आज हमारे सामने च तन एवं शोध का वपय हो गया है गर ब और भख

आज के इस यग
ु म समाज सेवा का भाव लु त हो रहा है । समाज सेवा का भाव वा तव म
महा मा गांधी और डां अ बेडकर म था । वे ह समाज सेवा के लये जीये । बाबा साहे ब ने तो
सामािजक अ प ृ यता का जहर पीकर भी गर ब द न वं चत के लये ह जीये । उनका जीवन ह

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द न वं चत को सम पत रहा । दभा
ु यबस दे श और जनता क सेवा क कसम खाने वाले ह
टाचार,घोटाला,कबरबाजी
ू जैसे घनौने काय म ल त पाये जा रहे ह , े वाद फैला रहे है । एक
रा य से दसरे
ू रा य म रोट रोजी क तलाश पर रोक लगाने को उ सक
ु है जब क दे श के नवासी
को दे श के कसी भभाग
ू पर बसने और रोट रोजी कमाने का अ धकार होना चा हये दसर
ू ओर
यापार मलावट ,नफाखोर म लगा हआु है उ योगप त भी पीछे नह नजर आते ।द र क बढती
द र ता और अमीर का खडा होता धन दौलत का खडा पहाड दे खकर सवाल उठता है सह मायने
म गर बी के लये िज मेदार कौन ह और दे श के गर ब का उ दार कैसे हो । या लोकत के
पहरे दार ऐसे ह सफेद को काला करते रहे गे ।उ योगप त, यापार धन दौलत पहाड खडा करते
रहे गे । सफेदपोश वदे शी बको म धन भरते रहे गे । या गर बी को सरकार काबू म कर पायेगी
। या गर बो का उ दार जात के यग
ु म हो पायेगा । या लालफ ताशाह गर ब का साधन
स प न बनाने म समथ होगी । या बेरोजगार भ ता और वजीफा भर से दे श का यवा
ु जीवन
यापन कर पायेगा । सह मायने म गर बी उ मूलन म सामािजक असमानता और आ थक/उ योग/
यापार/धंधे का के करण गर बी को हवा दे ने म सहायक सा बत हो रहा है । इस हवा का ख
सरकार बदल सकती है पर सरकार चलाने वाले अपने दा य व का नवहन ईमानदार d◌े साथ दे श
और समाज के हत म कर ।

इन नो पर गौर कया जाये तो उ तर नकारा मक मलता है ।सच तो ये है क गर बी के लये


िज मेदार नी त ,नी त नधारक और सामािजक कु यव था का मजबत
ू हाथ भी ह ।गर बी के
च यूह को सरकार तो तोड सकती है पर इस सरकार म शा मल लोग सबसे पहले अपना वाथ
दे खते है ।जनता का याल तो उ हे सफ चनाव
ु के व त आता है । सु म च तन कया जाये
तो गर बी के लये हमार सरकार काफ हद तक िज मेदार है य क वह
टाचार,घोटाला,नफाखोर मलावट महंगाई को रोक नह पा रह है और ये आ थक अपराध
गर बी से उबरने नह दे रहे है । गर ब ह नह दे श भी गर बी कज के दलदल म

फसता जा रहा है । सरकार को इस तरह के अपराधो पर शकंजा कसना चा हये । हर हाथ को


रोजगार मले ऐसे ावधान हो◌ेने चा हये । मा लको उ योगप तय को भी चा हये क वे गर ब
मजदरू क मदद कर । इस मदद से गर ब मजदरू का ह भला नह होगा, उ योगप त और दे श
को भी लाभ होगा । मा लक लोग मजदरो
ू को च क सा सु वधा दे ,बीमा सु वधा दे । जो मजदरू
अश त और खेत मा लक के खेतो म काम कर रहे है उ हे भी मलभत
ू ू सु वधाये मले और
मा लक मजदरू के बीच खडी द वार को तोडे । मजदरू से सीधे संवाद था पत करे । इससे
मानवीय र ते को मजबती
ू मलेगी और यह मजबती
ू उ योग और उ योगप त के लये फायदे मंद
सा बत होगी और मजदरू अपने को अलग नह समझेगा ।वह लाभ /हा न के मु दो पर भी च तन
करे गा ।
सरकार भू मह न खे तहर मजदरू को खेती करने क जमीन उपल ध कराये ।पढे लखे बेरोजगार
को छोटे बडे उ योग धंध क थापना करने एवं उनके संचालन के लायक श ा द जाये।
कमजोर वग के छा ो को छा विृ त क रा श म बढोतर क जाये ता क वे पढ लख कर रोजगार

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धंधा म लग सके और दे श क तर क म सहभागी बने । छा विृ त खासकर गर ब तबके
श ा थय के लये वरदान सा बत होती है । रोजगारो मुखी श ा द जाये । ामीण तर तक
ोफेशन स इजक ु े शन क पहंु च हो िजससे गांव के होनहार श ा ा त कर वकास क धारा से
जडु सके ।य द यवा ु शि त नव न◌ामण एवं रोट /रोजी से जड ु गयी तो गर बी का उ मल
ू न
सु नि चत है ।

समाज भम
ू डल यकरण के यग
ु म सामािजक प रवतन म आगे आये। सामािजक सोच म बदलाव
भी गर बी उ मल
ू न म काफ हद तक मददगार सा बत हो सकता है । वतमान यग
ु म भी
सामािजक प रवतन क अ य त आव यकता ह । धा मक जातीय फंसाद भी गर बी के लये
िज मेदार है,इस लये सामािजक समानता था पत हो ।चीन जैसे दे श के लये जनसं या अ भशाप
नह है तो हमारे दे श के लये य दे श म हर े म स भावनाये व यमान है चाहे वे कृ प का
े हो या उ योग का या अ य कोई े ।दे श के धना य चाहे तो गर बी का उ मूलन हो सकता
है।इस स भावना पर सरकार को बार क से वचार करना होगा । य द दे श से गर बी मट गयी
और सामािजक समानता का सा ा य था पत हो गया तो आतंकवाद जैसी महामार का खतरा भी
टल सकता है ।रोजगार चरु मा ा म उपल ध होने क दशा म ब दक
ू थामने वाले हाथ
असामािजक त व से हाथ मलाने वाले हाथ रोजगार अपनायेगे । ब दक
ू नह थामेगे ।
असामािजक त व के कच
ु के शकार नह होगे । सामािजक बराईया
ु बार बार सर नह उठायेगी
। सरकार को ठोस कदम उठाने होगे । सामािजक एवं आ थक पहलओं
ू पर वचार मंथन के साथ
राजनै त ढ इ छा शि त का भी प रचय दे ना होगा । य द सरकार सामािजक आ थक एवं
राजनै त कारको म सम वय था पत कर गर बी उ मूलन का महासमर नह जीत पायी तो इस
आरोप से नह बच पायेगी क सह मायने मे सरकार ह गर बी के लये िज मेदार है ।

न दलाल भारती

॥उपभोगवाद आद मयत पर हार ॥

भारतीय सं कृ त व व क ाचीनतम ् सं कृ त है । स भाव एवं समभाव क संवाहक है । यह से


तो ी कृ ण ने गीता का उपदे श दया । महा मा बु द ने समता एवं मानवतावाद सा ा य क
थापना कया । महावीर ने जीओ और जीने दो का संदेश दया ।सचना
ू ाि त के यग
ु म
द ु नया के अ य दे श एक दसरे
ू के नकट आ चक
ु े । आज क द ु नया उपभो ता बाजार का प
धारण कर चक
ु है । हर व तु य- व य यो य बन गयी है ।आज का मनु य उपभोगवाद हो
गया है कबरत
ू बाजी करने लगा है ।बेचारे गर ब मजदरू म हलाये अ याचार बला कार के शकार
हो रह है।बहजन
ु हताय बहजन
ु सखाय
ु तथा य नारे तु पजं
ू ते,रम ते त दे वताः का भाव वलु त
होता नजर आ रहा है । आज आदमी बस मतलब के पीछे सरपट भाग रहा है । उपभोगवाद आज
आद मयत पर हार करने लगा है ।

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ै ाि वकरण भम
ू डल यकरण एवं सचना
ू ाि त के यग
ु म आदमी सफ यापार एवं भोग के पीछे
भाग रहा है । वैि वकरण के के म अब आद मयत रह ह नह मानवीय संवेदनाये भी पंगु हो
चक
ु है। भोग वलास एवं अपसं कृ त का आतंक जार है ।पद क बाते सावज नक दशन क हो
ग रह है ।समाज म हसां एवं अनाचार का घनौना प हंु कारे भरने लगा है ।इससे यवा
ु पीढ
कु ाभा वत हई
ु है । स धम,स भाव,सं कार,आचार वचार और सं कृ त का अवमू यन दन पर
दन होता जा रहा है । ऐसे म मानवीय मू ये◌ा◌ं को बचाये रखना हर यि त का नै तक कत य
हो गया है । जातीय/धा मक संक णता से उपर उठकर मानवता के लये जीने का व त आ चका

है । य द अपसं कृ त का शकार हमार पीढ होती रह तो सं कार का सोधापन ख म हो जायेगा
।हम स सं कार को बचाये रखने के लये हर यास करना होगा िजससे आद मयत क आ मा
आदमी म बसी रहे ।
अपसं कृ त क आंधी ने हमार पा रवा रक यव था को भी तोडा है । हमार पा रवा रक यव था
हमार धरोहर रह है ,पहचान रह है हमारे परख
ु क वरासत रह है जो स य और सं कारवान
बनाती ह ।वतमान यगु म हमार पा रवा रक यव था पर भी हमला हआ
ु ह । अनाथालय एवं
व ृ दाआ म खल
ु रहे है । िजसक छावं म अनाथ ब चे और मौत से जझते
ू बढेू लोग जीवनयापन
कर रहे है । आजकल महानगर म ह नह छोटे छोटे िजल मे भी ओ ड एज होम क पर परा
वक सत होने लगी है । िजनम बहत ु सं थाय पैसा लेकर सेवाये दे रह ह ओर कछ
ु सं थाय
मफ
ु ् त म भी सेवाये दे रह है ◌ं। आज माडन यग ु क औलाद अपने बढेू मां बाप को अपने साथ
रखना पस द नह कर रह है ।यह पि चमी स यता क ह दे न है ।यह नह कहा जा सकता ह
पि चम के हर सं कार बरेु ह । हम नकल करनी ह तो अ छाई क करनी चा हये जो दे श समाज
और पा रवा रक यव था के अनकल
ु ू हो ।
हमार सं कृ त और पा रवा रक यव था अ य मू क क तलना
ु म हम अ य धक गौरव दान
करती ह । आज उसी पर खतरा मडराने लगा है ।पार व◌ा रक यव था हमार पहचान है जो हमे
अ धक स य एंव सं कारवान बनाता है ।टटती
ू हई
ु पा रवा रक यव था को ठोस बु नयाद पर
ति ठत कया जा सकता है । इस वैि वकरण के यग ु म समानता और मानवीय सरोकारो का
था पत करना होगा । तभी हम मानवता को बचाये रख सकते ह । व वब धु व के भाव को
पोपण कर सकते है । यापार और भोग के पीछे भागते रहना मानवीय संवेदनाओं से छ न भ न
कर दे गी ।हमार सदा से यह पहचान रह है क हम अपनी जड से जडे
ु रहना जानते है पर आज
उसी जड पर हार पा रवा रक यव था और सं कृ त से अलग करने क सािजश लगता है ।हम
अपनी बु नयाद से जडे
ु रह कर अपने सपनो को साकार कर सकते है । हमार पा रवा रक
यव था सं कृ त और भापा हम एक दसरे
ू से जोडे रखने का महाम ह । हम अपनी सं कृ त
को बचाये रखने के लये अपसं कृ त का ब ह कार करना होगा । सामािजक असमानता के म
को तोडना होगा। वतमान यग
ु म यह आव यक हो गया है क हम अपने ब च को
मातभापा
ृ ,सामािजक समानता, पा रवा रक यव था के त आ था एवं सं कृ त का बोध कराये ।
सच यह तो हमार क धरोहर है। इसे बचाये रखना हमारा नै तक कत य है ।
न दलाल भारती

6
॥ अहंकार क कांट समाज क फांस ॥
आचरण और आ त रक च तन य कत व का काशपंुज होता है। यह यि त को नभ क
शि तशाल मानवतावाद और परमाथ बनाता है तथा मन वचन और कम को उ चता दान कर
दे व व के कर ब ला खडा कर दे ता है । स भाव से आद मयत गौराि वत होती है ।दसर
ू ओर
अहंकार का भाव जीवन को अ भशा पत कर दे ता है । म ह बडा हंू । म ह े ठ हंू । मेरे बना
दे श और द नह न समाज का उ दार नह हो सकता ।आदमी घम ड के बशीभत ू होकर शोपण
उ पीडन पर उता हो जाता है । अपने लोगो का हत अपना हतएअपने इद गद घमने
ु वालो
और अपने सगे स बि धय को वशेप रयायत । दसर
ू लोगो और कमजोर के शोपण,जु म और
दमन आ द यवहार आदमी के यि त व के पतन का पतन का प रचायक होता है ।अहंकार से
यवहार और आ मा क प व ता का भी वनाश हो जाता है ।अ भमान क कांट समानता क फांस
दे श और समाज दोनो के लये हा नकारक है । वपर त समय आने पर अ भमान काम नह आता
है ।चाहे यि त कतने ह बडे ओहदे पर य ना आसीन हो अथवा कतनो ह बडी जातीय
े ठता न हो ।वह अपने लोगो का कतना ह भला य न कया हो शो पतो उपे तो के साथ
अ याय कर । वा तव म द नह न गर ब के साथ अ याय और अपना अथवा अपन का भला
अपराध है । िजस अपराध से यि त कभी भी नह बच सकता । इ तहास गवाह है अ भमान
वनाश का सचक
ू सा बत हआ
ु है । आज के व ान के यग
ु म भी अ भमान क वजह से
कमजोर गर ब, सामािजक पछडो,कमजोर वग के उ च श ◌ात का शोपण,जु म और अपने लोगो
को वशेप सु वधा वशेप रयायत तक द जा रह है । पद त ठा के अहंकार क वजह से
यि त अपन को आबाद और द नह न को तबाह कर चैन कभी नह पा सकता । उसे अहंकार के
शोले से जलाकर राख कर दे गे । जब हटलर जैसा यि त नह बच सका तो पद दौलत और
जातीय े ठता का अ भमान कहां बचा सकता है ।पौरा णक कथाओं के अनसार
ु रावण ,कंस और
भी बहत
ु अ भमानी अंहकार के शकार हए
ु िजसक वजह से उनका नाम इ तहास के काले अ र
म लखा गया ह । िजनके नाम पर आज भी द ु नया थकती
ू है ।

कछ
ु े ठता ा त अहंकार लोग अपनी तर क के रा ते म आने वाले श स को उखाड फकना
चाह रहे ह और वाथबस अपने से बडे अ भमानी क चरणव दना करने से भी नह चकते
ू । इसके
लये वे हर हथक डे अपनाते है और अपने मतलब क पू त के लये कछ
ु भी करने को तैयार
रहते है । यि त यह जानता है क अहंकार,छल, पंच,शोपण,जु म आ द अमानवीय यवहार
जीवन या ा के आधार नह है । इसके बाद भी वह द नह न स जन उ च कद वाले यि तओं
का दमन कर खद
ु को े ठता के सं हासन पर ति ठत करने क अंधी दौड म है ।

बरेु व त म जब अहंकार क धप
ू हट जाती है तब उसे भान होता है क जो उसने दमन कया है
वह फलदायी नह है । वनाश होने अथवा वनाश क कंगार पर पहंु चने पर अहंकार यि त को
भान होता है क उसका अहंकार भाव िजसक बदौलत वह द नह न का शोपण कया वह वा तव
म उसका द ु मन है ।हम गर ब द नह न के क याण का काय करना चा हये था पर तु जब वह

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क याण के काय करने का साम य रखता था तब तक तो वह वाथ के लये दमन पर उतरा
हआ
ु था ।उसके वचार से अहंकार द भी पाख डी और े ठता के नाम पर कमजोर के अरमान
का दहन और उनके हको पर क जा उसके जीवन का आधार था । समय के करवट बदलते ह
लाचार हो जाता है । आद मयत वरोधी भाव ता य हो जाता है । वे मखौटा
ु बदलने म जट
ु तो
जाता है पर उनके घनौना पव
ू के मखौटे
ु के छ व धू मल नह होती ।वतमान समय म कछ
ु लोग
सफल शासक बनने के लये ू रता का सहारा ले रहे है । वैभवशाल ढं ग से जीवन के लये
लटखसोट
ू , ारचार, अहंकार द भ पाख ड, दखावा और े ठता के नंगे दशन को ज र मानने
लगे है । वा तव म ऐसे लोग े ठता के पा नह घणा
ृ के पा बनने क इबारते लखते ह भले
ह वे पद पर रहते कतनो क झठ
ू त ठा का द भ भर ल ।

वातावरण कतना ह जहर ला य न हो । वपर त


य न हो । बहजन
ु हताय बहजन
ु सखाय

का भाव रखने वाला उ च यि त व का धनी यि त हर प रि थ तय को सहज पार कर जाता
है । वा य जीवन क चकाचौध परोपकार मनु य का रा ता नह रोक सकती । आ मबल उ च
यि त व के बल पर यि त सामािजक दबलता
ु का शकार बचने से बच जाता है । अहंकार
वभाव का यि त समाज के लये फांस सा बत होता है । अहंकार वाथ और अपन का भला
करने वाले यि त य द काल के गाल पर अपना सनहरे
ु अ र म नाम अं कत करने का वाब
पर कभी परा
ू नह होता । अ भमानी यि त समाज के लये कांट सा बत हआ
ु है । परोपकार
समानता का पजार
ु यि त ह महानता का महारथ हा सल कया है और उसी महानता को ह
जगत ने वीकार कया है ।
न दलाल भारती

॥ असमानता-सामािजक समरसता पर कठराघात


ु ॥
समतावाद एवं रा वाद मनु य के लये सभी बराबर होते ह ।उनके लये जातीय अथवा
धा मकबं दश मह वह न होती है ।उनका जीवन मानव मा के क याण के लये होता है । समता
चेतना के◌ा एक कत
ृ करती है और सां कु◌ृ तक समता जीवन के वा या गण
ु को सामंज य दान
करती है । धा मक समता स ह णुता और उदारता को बल दान करती है । सामािजक समता
सा दा यकता पर कठराघात
ु कर सि म लत सामािजक यव था का अमतपान
ृ कराती है ।
राजनी तक समता रा य एवं अ तरा य दोनो तरो पर शाि त क थापना म मददगार
सा बत होती है । आ थक समता क भावना से अमीर गर ब के बीच उभर रह खाई वतः पट
जाती है । समता का भाव मानवता को अलकत
ृ करता है और असमानता का भाव कलं कत करता
है । असमानता के भाव क वजह से ह आज द ु नया आतंक के साये म जी रह है । आतंकवाद
सा दा यकता का जहर फेलाकर आवाम को एक दसरे
ू से लडाने का खेल खेल रहे है ।

8
सा दा यकता एकता और तर क क द ु मन है । िजसक अ तरा मा म भी बदले का भाव है
मानवता का वनाश है । बंटवारे क आग है । सा दा यकता कभी भी दे श और आवाम के लये
लाभकार नह हो सकती । सा दा यकता का ब ह कार ह समता के भाव क अ भविृ द है ।

दभा
ु य यह है क व ान के यग
ु म भी आदमी मानवीय समानता के भाव को वीकार नह कर
पाया है । आज आदमी कपाय-राग े प मद, ोध उ◌ु◌ंच नीच के जहर ले सम दर म डब
ू रहा है ।
प रणाम व प े वाद,जा तवाद, वरोध हं सक व ृ त पैदा हो रह है । दसर
ू क बराई
ु अपना
गणगान
ु आज के आदमी ल य हो गया है । इस वपैले वातावरण म हमारा कत य होना चा हये
क हम समता के भाव म अ भविृ द करने के लये साथक पहल करे । वपमता के घोर अ धयारे
म जगने
ु बने और सदै व सामािजक समता के लये काय करे । िजस दन सामािजक समता का
सा ा य हो जायेगा सा दा यकता ऐसे पशाच का सवनाश वतः ह स भव है । समता के लये
हर यि त को यास करना होगा याग करना होगा। पर तु स चाई तो यह है क यावहा रक
जीवन म लोग कसी को धन से बडा मानते है कसी को पद से कसी को वैभव से कसी को
जा त से तो कसी को भय से ।

जगजा हर है क क वपमता के सभी कारण अ थाई है । इनका अि त व समय वशेप काल के


लये होता है । जब क समतावाद ि टकोण कालजयी होता है आदमी को भगवान बना दे ता है
।इसके उदाहरण जगत म उपल ध है भगवान बु द महावीर,साई बाबा,ईसा मसीह के प म
।वतमान यग
ु म ज रत ह समता क अलख जगाने क । इसी समतावाद ि टकोण के सहारे
व वब धु व का सपना परा
ू हो सकता है ।मानव मानव को एकता के सू म बांधा जा सकता है
।एकता के बल पर व व म शाि त क थापना क जा सकती है ।जैसा क व दत ह है क
शाि त यि त को सा◌ामंज य का वरदान दे ती है ,बल दे ती है, अ या म क ओर केि त करती है
। शाि त को सव प र थान
ा त है उ◌ु◌ं शाि त का जाप शाि त के शखर पर पहंु चाने का
शंखनाद है ।शाि त के बल पर सा◌ामािजक समता था पत क जा सकती है और सा दा यकता
को ब ह कृत कया जा सकता है। समता मानव मानव को जोडने म सहायक है और मानतवा क
गहना है। सा दा यकता का भाव वनाश को पो पत करता है ।सा दा यतकता मानवता रा य
एकता का वरोध है । भेद भावना का मल
ू कारण आड बर है ,उ माद है, म या है इस लये
सा दा यकता के वपधर को समा त करने के लये सामािजक समता का अचक
ू ह थयार मील
का प थर सा बत हो सकता है ।

न दलाल भारती

॥ लोभ दग
ु त का मायावी रा ता ॥

लोभ का नाम आते ह राजाओ महाराजाओं ह नह साधु स या सय के पतन के दा तान जी वत


हो उठते ह । इसके बाद कसी ने कसी प म यि त माया के शकार हो ह रहे है ।माया है

9
ह ऐसी कसी को नह छोडती अपने चंगुल म जब फंसा लेती है ।आदमी को दग
ु त के लभावने

रा ते पर ला खडा कर दे ती है ।लोभ म या ि ट दान करता है ,िजसके च यूह म फंसकर
यि त वतमान के साथ भ व य तक तबाह कर लेता है । लोभ यि त और समाज दोन को
पतन क राह पर ले जाता है । लोभ के वशीभत
ू लोगो म वासना और झठ
ू लालसा क बाढ आ
जाती है । लोभी यि त क अ तरा मा मर जाती ह । वह चौबीस घ ट माया बटारे ने म लगा
रहता ह । इसके लये वह अनै तक काय करने से भी नह चकता
ू ।लोभी व ृ त के कारण सारा
जीवन वकत
ृ हो जात ह ।धन बटोरने का पागलपन सवार हो जाता ह ।वह स प त बढाने के
सनक म वकत
ृ जीवन जीता है ।लोभी यि त क वचारधारा भी कलु पत हो जाती है । वह सफ
धन वैभव को सब कछ
ु समझता है । र त के स धेपन को भी भल
ू जाता है । वह अपने से
अ धक स प त,शि त वाल से भी जलन करने लगता है ।वह अपने अधीन थ का शोपण करने
से भी जरा भी नह हचकता । लोभ का वशीभत
ू यि त द ु नया के वैभव को हडपने का वाब
दे खने लगता है ।स तोप तो उसक च तन प र ध से कोसो दरू हो जाता है। वह तो बस द ु नया
भर क स प त जोडने क हाय हाय म लगा रहता है यह जानते हए
ु क वह स प त के पहाड पर
बैठकर भी त नक भी आि मक सखानभ
ु ु ू त नह ा त कर सकता । जब क उससे कह अ धक
सखानभ
ु ु ू त एक गर ब अपनी झोपडी म खी सखी
ू खाकर ठ डा पानी पीकर ा त कर लेता है ।

ले◌ाभ क वजह से यि त घणा


ृ द एवं न दनीय हो जाता है। लोक परलोक म दग
ु त का भागी
बन जाता है ।सामािजक सां कृ त एवं धा मक तर पर भी वह अ य त गर जाता है , इसके बाद
भी माया के पीछे भागता रहता है । यि त यह जानता है क लोभ का भत
ू कभी आि मक
शाि त का सख
ु नह दे सकता। लोभ के मायावी रा ते पर चलकर यि त अपना पनज
ु म तक
भी बगाड लेता है ।लोभ के वशीभत
ू होकर आदमी आि मक पतन कर लेता है ।वह दन रात यह
सोचता रहता है क वह कैसे और अ धक स प त इ ठा करे । कैसे वह स ता था पत करे ।
कैसे वह उ च पद पर आसीन हो जाये क वह द ु नया भर के वैभव का मा लक बन जाये ।कैसे
वह गर ब का शोपण करे । कैसे वह भख
ू से तडपते बीमार से जझते
ू असहाय को लटेू ।यह
लोभ क दग
ु त का मायावी रा ता तो डां․अमीत जैसे यि त को हैवान बना दया ।वह आदमी के
अवैध अंगो का सौदारगर बन गया। लोभ क व ृ त क आंधी इस कदर चल पडी है क आदमी
माया क गगनचु बी इमारत खडी करने म द ु नया भर के र त तक क ब ल चढा दे ता है।लोभ
का ह कु भाव है क दे श और जनसेवा क कसम खाने वाले भी सार कसम तोड दे रहे ह ।
ऐसा नह क वह नह जानता है क जड पदथ का लोभ अनेक वपमताओं और अ यव थाओं को
ज म दे ता है ।

लोभ ववेक को बरु तरह तहस नहस कर दे ता है ।उसक च तन/चेतना शि त समा त हो जाती
है । लोभ उसे दग
ु त के मायावी राह पर खींचकर ले जाता है । लोभ ऐसी दग
ु त क राह पर ले
जाकर पटक दे ता है क यि त क दशा अंधेरे म द पक के बझने
ु सर खे हो जाती है जहां उसे
कछ
ु भी नह दखाई पडता ।वह इस बात से अन भ भी नह होता क द ु नया क सार दौलते
भी यि त पा लेने पर भी स तु ट नह हो सकता । कतना क ठन है लोभ ज नत इ छाओं क

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पू त । इसके बाद भी यि त लोभ का वशीभत
ू होकर मायावी रा ता पर नकल पडता है फर
कभी मडकर
ु नह दे खता जब तक वह सामािजक वैयि तक,पा रवा र,आ त रक,धा मक सां कृ तक
एवं अ य तरो पर दग
ु त को नह ा त कर लेता ।य द जीवन को सफल बनाना है तो लोभ के
भाव को याग कर मानवीय क याण क राह चलना हतकर होगा वरना लोभ का भत
ू दग
ु त के
ऐसे मायावी राह पर छोड दे गा क जहां से फर स ग त के कसी पगड डी क उ मीद भी नह
क जा सकती। आइये मानवता के लये लोभ से दरू बनाये रखने क शपथ ले ले िजससे
सामािजक वैयि तक,पा रवा र,आ त रक,धा मक सां कृ तक एवं अ य rरो पर आदश था पत
कया जा सके ।
न दलाल भारती

॥ जनतां क चेतना सामािजक प रवतन का योतक ॥

ले◌ाकताि क यव था का द ु पयोग कर कछ
ु सफेदपोश भले ह अपना हत साधने म कामयाब
हो रहे हो पर तु इस यव था म समाज एवं समाज के नीचले तबके अथात शो पत/पी डत वग
और दे श क सेवा का भाव केि त ह । जननायक चाहे वह कसी भी पाट का त न ध व करता
हो पर उसक अ तरा मा म दे श और जन सेवा का भाव होता ह। यह भाव जनताि क चेतना का
ह जीव त उदाहरण है ,कछ
ु अपवाद हो सकते ह ।जननायक के मा यम से समाज के उ च वग से
लेकर अ त न न वग जनताि क चेतना का संचार होता ह और इसी जनताि क चेतना के
सोधेपन क छांव म दे श और समाज तर क के सोपान चढता है । जनताि क चेतना के कारण
आवाम म आ म व वास बढा है ।जनताि क चेतना का असर आज हर े म दखाई पड रहा
है चाहे सामािजक हो ,आ थक हो या रा◌ाजनी तक।जातीय भेद क द वारे गराकर मानवीय
स ब ध म जो अपनापन का भाव जागा है वहह जनत क दे न है । जनताि क चेतना से
होकर ह द ु नया क सार तरि कय का रा ता गजरता
ु है । जात -पात क मजदरू द वार म टटन

,साम तवाद यव था का नाश बहजन
ु हताय बहजन
ु सखाय
ु के भाव का ेय जनतां क चेतना
को ह जाता है ।
वतमान म राजनै त वाथवस यह भावना आहत हई ु है।इसके बाद भी जनताि क चेतना
सामािजक प रवतन का कारण बन रह है ।जातीय वोट बक म टटनू ,सवण और अवणे◌ार् के बीच
रोट - बेट का र ता जनताि क चेतना का◌ी महान उपलि धय म गना जाना चा हये । िजस
जा तवाद के अमानवीय भेद के कारण अ प ृ यता जैसा यवहार होता था । आज नकटता आ रह
है । सवसमानता एवं मानवता क बात होने लगी है ।जनताि क चेतना सामािजकं प रवतन के
े म मील का प थर सा बत हो रह है । जनताि क चेतना का शंखनाद ट,इले ा नक
मी डया एवं सा ह य बखबी
ू कर रहे है पर तु अभी बहतु कछु करना शेप है । जनताि क चेतना
का भाव गांव से लेकर शहर तक दे खे जा सकते है । बांस और अधीन थ के बीच नकटता,
मा लक मजदरो
ू के बीच सौहाद पण
ू वातावरण एवं सामािजक बराईय
ु पर कठराघात
ु जनताि क
चेतना का ह तफल है । कछ
ु समय पव
ू जो लोग आपस म बैर भाव रखते थे वे अपने को

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बांटने का सख
ु भोग रहे ह । मानवता को ह धम मानने लगे है । आ म व वास और समझदार
से हर े म छोटे बडे साथ साथ चल रहे है ।
गांव म आधु नक सु वधाय ा त हो रह है ।अ पताल,कालेज/ ा यौ गक कालेज तक खलने
ु लगे
है ।गांव गांव म सामदा
ु यक के का नमाण आधु नक कृ प य का उपयोग, छोटे बडे का एक
साथ बैठना,छोटा प रवार सखी
ु पर व◌ार के भाव का उदय ,गर बी उ मल
ू न,बेरोजगार को काम
एवं बेरोजगार भ ता जनताि क चेतना के कारण स भव हआ ु है । जनताि क चेतना का े
बहत
ु व तुत हो गया है ।ज रत है खले
ु एवं न प भाव से काम करने क तभी जनत को
मजबतू बनाया जा सकता है ।दे श समाज के वकास को दे खते हए
ु जन त न धय क िज मेदार
और बढ जाती है । दे श और समाज को तर क के राह पर बहतु दरू तक जाना है अभी तो
शु आती दौर है ।कई े ो म हम बहत
ु पीछे है ।ज रत है वाथ से उपर उठकर काम करने क ।
िजन मनु य का लोग मनु य नह समझते आज उ हे समानता का एहसास होने लगा है पर अभी
भी वे बहत
ु दरू है ।सच है जनतां क चेतना प रवतन का योतक है।जनताि क चेतना से हर
उ थान स भव है पर तु हम ढ त वान होना होगा ।
न दलाल भारती

॥ वणभेद उ थान क राह मे अंगद का पांव ॥

दे श म आय का आगमन मल
ू आ दवा सय क सामािजक एवं आ थक पतन का कारण बना और
मल
ू आ दवासी हे य होते गये पर तु मल
ू आ दवासी दे श के त समपण भाव एवं म शि त
क वजह से◌े समाज से पण
ू प से न का सत नह कये जा सके । शनै -शनै वे व ह कृत होते
गये अ ततः एक वण का न◌ामण हआ ु िजसे शू का नाम दया गया । माना जाता है क
ार भ म परेू व व म तीन वग ह थे । भारत म चार अि तव म आ गये और ये सार
यव थाय मौ खक थी । ई वर य स ता के मजबती
ू के साथ ा मण नामक वण े ठता क
शखर चढता रहा और ा मण वण क े ठता को अ ु य रखने को लये शा ो का
नमाण ती ग त से हआ
ु । ीय दसरे
ू और यापार तीसरे म पर थे ।माना जाता है क वण
यव था ार भ म कम के आधा◌ार पर थी । धीरे धीरे यह कम आधा रत यव था ज म
आ ध◌ा रत होने लगी और चौथे वण अथात शू क ददशा
ु ार भ हो गयी और
अहम,् दरा
ु ह,कमका ड,चातय
ु और भेदभाव क आग भयावह प धरने लगी । यह आग मल

आ दवा सय को अि त व को जलाने म जट
ु गयी । भारत के मल
ू आ दवासी गलाम
ु के पयावाची
होकर रह गये ।मल
ू आ दवा सयो के दमन म वण यव था आधा रत धा मक स ता ने आग मे
घी डालने का काय कया ।वण यव था धीरे धीरे वग यव था का प अि तयार करने लगी ।
शू के दमन और अ य वग क सरु ा के लये नये नये शा का अ यद
ु य होने लगा ।राजा
ईवर य स ता ह,बारहमण
् दे वता है। छोटा -बडा,अमीर गर ब,राजा-रं क ई वर क इ छा है ।स तोप
और धम से काम लो । कमपजा
ू है ।तकद र का लखा है ।शू नीच अछत
ू है । शू ो को
भगवान ने सेवा करने के लए बनाया है ।शू उ पादन करने के लये है बाक अ य वग उपभोग
के लये है अथात शू के शोपण, जु म का ई वर य वधान तैयार हो गया । िजसका भरपरू
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फायदा तीनो वग ने उठाया । आदमी को पशता
ु क ेणी म लाकर खडा कर दया ।उसे अछत

बना दया ।आ थक तर क के भी उसके रा ते ब द कर दये गये ।उसका धन सं हण पाप क
ेणी म आ गया ।

भारतीय समाज म अ य तीनो वण ने ई वर य स ता,धम शा ,दशन और पराने


ु शा क
आड म बहसं
ु यक शू वण का भरपरू दोहन शोपण जु म कया, आतं कत कर राज कया ।
कसी के◌ा ह मत थी नह क वह शा पर अंगुल उठाये ।शू के शोपण को अपना ज म
स द अ धकार मान लया ।धम शा के आगे सारे च तन थम गये । शू ो क सार तर क
क गयी ।वे उ पादक होकर भी रोट के मोहताज हो गये ।दे श क गलामी
ु भी इसी वण यव था
क दे न है ।जब दे श पर चहंु ओर से आ मण हो रहा था तब ताकत ीण हो चक
ु थी ।र ा करने
वाला व र्◌ा आ ा ताओं का मकाबला
ु नह कर रहा था और न ह अ य वण साथ दे रहे थे
।कोई नप
ृ होय हम का हा न का पालन करते हए
ु ज म आधा रत वण यव था के पोपको ने
अपनी धरती सौप द ।शू गंवार ढोल पशु नार ये ताडन के अ धकार के हे य वा य ने और
अ धक यौवन पा लया ।शू ो का शोपण अब मकसद हो चका
ु था ।
ाहमणवाद,राजाओ,महाराजाओ जमींदार क अययाशी
् के कारण कसी भी वण क सहानभ
ु ू त शू ो
के साथ न थी । दे श गलामी
ु ं
क जंजीर म जकडता चला गया और शू ो पर अ याचार का शकजा
कसता ।राजा संर क थे यह मा खशफहमी
ु थी बाक कछ
ु भी नह ं । इसके लये ज म आधा रत
वण यव था ह िज मदे ◌ार थी ।
ऐसा नह क वण यव था के वरोध म आवाजे नह उठ -र वदास,कबीर , वामी दयान द
सर वती एवं अ य स तो ने भी वण यव था के खलाफ आवाज उठाया था ।भगवान बु द का
जीवन ह समता के लये सम पत रहा ।भगवान महावीर ने भी वण यव था के खलाफ शंखनाद
कया ।डां․अ बेकर भी आजीवन वण यव था के खलाफ संघपरत् रहे ।महा मा गांधी क अगवाई

मे◌े◌ं पहल बार भररतीय बखि डत समाज एक होकर आजाद क लडाई लडा और सफल भी
हआ
ु । अपना दे श अपना सं वधान का सपना साकार हआ
ु पर जा तवाद पी अंगद का पांव नह
सरका ।

वतमान यग
ु म आव यक हो गया है क वण भेद के पशाच को ने तानाबूत कया जाये । कम
अधा रत यव था को आधार बनाकर ह दे श और समाज क उ न त स भव है । ज म आधा रत
यव था ने दे श समाज और भारतीय दशन को भी छला है । पराने
ु वण भेद आधा रत शा क
दहाईय
ु ने च तन और तर क को बा धत कया है । जात के हर भी इससे अछते
ू नह है
। वतमान म भी वण भेद क आड म दोहन शोपण और जु म हो रहा है ।जब तक वण -भेद
समा त नह होगा उ थान क राह मे अंगद का पांव द वार बना ठहाके मारता रहे गा । वण भेद
क आग को काबू म करने के लये ज रत है नये दशन के पौध रोपने क िजससे कम आधा रत
नये यग
ु का नमण हो सके । वण-भेद एक ऐसी यव था है जो सामािजक आ थक और
रा य एकता के लये बाधक बनी हईु है। दे श -समाज का भला चाहने वालो आओ अंगद पी
भेदभाव के पांव को उखाड फकने लये ढ त होवे।

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न दलाल भारती

। धम नप ता-जा त नप ता य नह ं॥

वतमान यग
ु संचार ाि त भम
ू डल यकरण और व ान का अथात द ु नया के समट कर एक होने
का यग
ु हो गया है। द ु नया के लोग आपस म समरसता का यवहार कर,यह ज र है व व
ब धु व और व व शाि त के लये , पर तु धम नप ता के चार सार क राजनै त होड ने
दे श क जातीय नप ता को जैसे बसरा दया है । सव व दत है क भारतीय सामािजक यव था
वण/वग भेद आधा रत है । इस यव था म छआछत
ु ू ,भेदभाव कू है । िजससे दे श और भारतीय
और कर
ु तय का जंजाल समा हत है,जो दे श और समाज क त ठा पर बदनमा
ु दाग है । बार
बार जातीय वैमन ता पर कोहराम उठने के बाद भी जा त नप ता का ईमानदार पवक
ू शंखनाद
नह हो रहा ह । जहां दे खो वह धम नप ता के राग अलापे जा रहे है । इसके बाद भी धम के
नाम पर जो कछ
ु हो रहा है ,सभी जान सन
ु रहे है । आ खर धमर् नप ता के खोखले राग से या
भला होगा । धम नप ता का यवहार दै नक यवहार म लाने क ज रत है न क ढोल पीटने
क । इसके पहले भारतीय समाज म ज रत है जा त नप ता क । समानता क । आपसी भाईचारे
क । सामािजक एक पता क ।जा त वह नता क । धम नप ता क राग अलापने वाले जब तक
जा त नप ता का परचम नह फहराते है तब तक धम नप ता क बात करना हवा म तीर
चलाने जैसा ह होगा ।कब तक म e◌े◌ं जीते रहे गे । म कब टटे
ू गा ।

हमारे पास सं कृ त,स यता,स भाव,ब धु वभाव,सवधम समभाव,अनेकता म एकता आ द कहने


को बहत
ु क मती श द तो है पर वा त वकता के पटल पर प थर सा बत होते ह। इन क मती
श द क ाण त ठा करने वाले लोग ह नह सामने आते । कसी न कसी वाथ क वजह
से बस ह ला कर रहे ह चा र क से अमल ् नह हो रहा है । ऐसा ढढोरा पीटने से या भला
होगा दे श समाज का ।यहां कथनी और करनी म साफ साफ अ तर नजर आ रहा है । य द श द
क ाण त ठा हई
ु होती तो आदमी के बीच लक र खींचने वाला श द जा तवाद यौवन मे न
होता । सवसम समभाव एवं जा त वह नता का उ गार होता । ज म आधा रत जां तपां त वाल
यव था का ता डव न होता । इसक जगह कम आधा रत यव था क मधरु वा न अव य
गंज
ू ती । दभा
ु यबस आज मतलब क द ु नया मे सरु म सरु मलाया जा रहा है वा त वकता से
कोस दरू बैठकर । अभी भी व त है स ताधीश के◌े पास जो धम नप ता क बात च ला
च लाकर कर तो रहे है पर कर कछ
ु नह रहे है । कर भी रहे है तो सफ स ता ह थयाने के
लये।इसका माण दे श का जा तवाद है। जा तवाद का दं श झेल रह जनता के साथ याय तो नह
कहा जा सकता । दे श के सामािजक बख डन को एकता के सू म जोडने म असफल हो जाने
के बाद धम नप ता का दामन थाम लया है ।
धम नप ता का वरोध मकसद नह है । सवाल ये है क जो लोग आज धम नप ता क बात
कर रहे है वे जा त नप ता/सामािजक समानता था पत करने के लये कतने खरे उतरे है
जा त बरादर से उपर कर । अपने दे श म जा त नप ता धम नप ता से पहले आव यक है ।
जा त नप ता के बना धम नप ता कैसे स भव है जो लोग जा त नप ता के धरातल पर
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खरे नह उतर रहे है । या वे धम नप ता के साथ याय कर पायेगे जो लोग जा त के नाम
पर भेदभाव करते है । या वे धम नप ता के साथ या करे ग , या अपने घर म अंधेरे◌ा के
सा ा य क थापना कर दसर
ू के घर रोशन कया जा सकता है या खद
ु दद से कराहते हए

दसर
ू का दद हरा जा सकता है कहने को तो हां कहा जा सकता है पर स चाई इससे कोस दरू
होती है । य द स चाई भ न न होती तो भkरतीय समाज सामािजक असमानता का जहर न
पीता ।

धम नप ता व व धु व भाव क थापना के लये बहत


ु ज र है । धम नप ता अ तरा य
एकता क थापना के लये मील का प थर सा बत हो सकती है ।इसके पहले रा य एकता और
सामािजक समानता को भी समझना होगा ।जातीय भेदभाव के च यूह को तोडना होगा ।जो
स ता इंसान को तोडती है वह अंधेरे क स ता होती ह और ऐसी ह है हमार जातीय स ता ।जा त
नप ता और धम नप ता जैसे क मती श द क ाण त ठा करनी होगी । इस ाण
त ठा के बीच जा तवाद क लक र खींचना फलदायी नह होगा । मानवता के साथ याय और
मानव को मानव होने का हक दे ने का संक प य द स ◌
े ा मन से लया है तो भारतीय समाज
म धम नप ता के पहले जा त- नप ता क थापना करना ह होगी तभी धम नप ता के साथ
याय होगा और जा तवाद का दं श झेल रहे भारतीय समाज के साथ भी ।
॥ न दलाल भारती ॥

॥ सच तो ये है क आज भी आदमी अछत
ू है॥

भारतीय समाज क नींव जातीयता के आधार त भ पर खडी है,िजसक चल


ू तो हल चक
ु है पर
सामािजक कु यव था का आतंक आज भी वराजमान है समाज म ।दफ् तर के कोने म भी ।
सा◌ामािजक बख डन क धप
ू म तपता आदमी जा त-भेद ,वग-भेद, पंथ-भेद छआछत
ू ू जैसी
सामािजक बीमा रय का शकार है । अमानवीय भेदभाव क सामािजक बराई
ु के खलाफ भगवान
बु द,महावीर,गु नानक एवं अ य महापु प ने भी शंखनाद कया था पर तु जातीय भेदभाव क
बीमार के वपाणु भारतीय समाज से परू तरह समा त नह हो पाये । आज भी यह बीमार
अि त व म है पर तु वतमान प रवेश म स ता ा त करने क सीढ बन चक
ु है। प रणाम व प
इस सामािजक कु यव था के पोपक उ माद क उवरक समय समय पर दे ते रहते है । िजस
कारणबस भारतीय समाज जातीय भेद और छआछत
ू ू का जहर आज भी पी रहा है ।द ु नया म यह
जातीय भेद और छआछत
ू ू नमसी
ू का कारण बन रह है । इसके बाद भी जातीय भेद और
छआछत
ू ू के अि त व का पोपण हो रहा है । सामािजक ग लयार म ह नह राजनै तक ग लयार
म भी धम
ू ह जातीय आधार पर जन त न धय का स मान या यह सामािजक वपमता का
प रचायक नह तकर रे दे ने वाले अपने च र म कतना उतारते है यह तो जग जा हर ह हो
चका
ु है ।भारतीय समाज का कौन जन त न ध कोई उदाहरण पेश कया है अपनी से छोट अथवा
तथाक थत अछत
ू जा त के साथ र ता जोडकर शायद कोई नह । सामािजक और आ थक

15
समानता क बाते तो लोकलभावन
ु के लये होती है ।वोट बटोरने के लये होती ह । असल चेहरा
तो जा तवाद के रं ग म रं गा होता है ।

वतमान यग
ु म दभा
ु य क बात है क कछ
ु अ छे पढे लखे उ◌ूचे ओहदो पर वराजमान लोग भी
जातीय वैमन ता क आड म छोट बरादर के लोग का भ व य चौपट करने से बाज नह आ रहे
है । अव न त के दलदल म ध कयाते जा रहे है।कछ
ु े ो म ते◌ा तथाक थत अछत
ू जा त का
वेश ह जैसे विजत है।कह ं -कह तो यो य,उ च श त वं चत समाज के यि त क तर क
सफ उसक जातीय अयो यता के कारण नह हो पाती है।उसक अिजयां तक आगे नह बढ पाती
है । बेचारा यो यता के बाद भी जातीय जहर पीने को मजबरू हो जाता है यो क वरोध म उतरने
पर उसके प रवार का भ व य और भख
ू मरने क नौबत जो आने वाल है ।इसी दह त म वह
मौन साधे रहता है क शायद कल अ छा हो ।दभा
ु यबस वह कल नह आता ।अ त म वह हारे
हये
ु सै नक क भां त अपने ब च म ह अपना भ व य दे खने लगता है । गर ब न न जा त का
अनपढ ह नह पढा लखा ट गारा हाडफोड मेहनत क रोट से पेट क भख ू तो मटा ले रहा है
पर स मान क भख
ू नह मटा पा रहा है ।इस सब के लये हमार सामािजक कु यव था
िज ेदार है । लाख यो य आदमी को जातीय यो यता के आधार पर अछत
ू घो पत कये हए
ु है
।अछतपन
ू के कोढ पर कछ
ु तब ध तो लगा है पर यह कोढ ख म नह हआु है ।
आज भी आदमी के छने
ू से पानी अप व हो जाता है । न न जा त के कुये का पानी अप व
होता है ।कैसी वड बना है ।वं चत समाज क म हला का चीर हरण होता है ।जू ता च पल हाथ
मे लेकर चलना होता है ।द ू हा घोडी पर नह चढ पाता है । त नक त नक बात पर न न जा त
के यि त का क ल हो जाता है । जातीय वैमान ता का भत
ू सर से नह उतरा तो दे श और
समाज को नगल जायेगा। जा तवाद के च यूह को तोडना होगा। यह कैसा च यूह है क आज
के यग
ु म भी नह टट
ू रहा है जा तवाद का कै◌ेसा मोह है यह कैसी मान सकता है कैसा
धम है जा तवाद पी पशाच का तांडव व ान के यगु म भी शोध का मु दा बना हआु है ,ये
कैसा अहंकार है ये कैसी द वार है क टट
ू ह नह रह है ।वा त वकता तो ये है क समानता
का शंखनाद करने वाले अपनी ईमानदार पर खरे ह नह उतर रहे है ।कथनी करनी म अ तर का
उदाहरण पेश कर रहे ह ।

ु◌ाकरात ने कहा है क द ु नया म कछ


ु बेहतर हे तो वह ान है कछ
ु बरा
ु है तो वह है अ ान ।
व ान के यग
ु म भी बखि डत समाज अ छाई और बराइ◌्
ु रर ् म भेद नह कर पा रहा है । या
भारतीय समाज म उ च थान ा त लोग जातीय े ठता के वाथ के वशीभत
ू होकर अ ानी
नह बने हये
ु है यह कैसी सोच है या इस सोच को दमनकार सोच नह कहा जा सकता
सच जा तवाद दमन का ह बगडै ल प है जो दे श और समाज क उ न त म बाधक है। जा तवाद
के च यूह को तोडे बना द ु नया के सामने गौराि वत महसस
ू करना बीमार क हंसी के समान
होगा । जातीय भेदभाव अहंकार है दसरे
ू श द म या अहंकार से उपजी मखता
ू भी कहा जा
सकता है आज के यग
ु म समानता क बात करने वाले तो बहत
ु है पर वा त वकता के धरातल
पर उतरने वाला कोई नह दखाई पडता है ।यह बात ठ क इस कहावत सी लगती है -हाथ मलाने
16
वाले तो बहत
ु है हौले से कंधे पर हाथ रखने वाला कोई नह । अपनेपन का एहसास कराने वाला
कोई नह । य द ऐसा हआ ु होता तो आज भी आदमी अछत ू ना होता । य द वा तव म बखि डत
समाज के हर जा त वह न समतावाद समाज के प घर है तो उ हे जातीय े ठता एवं न नता
के वचार को याग कर भारतीय सामािजक एकता के लये सै नक बनना होगा । य द ऐसा न
हआ
ु तो समानता क सफ बात करना बेईमानी होगी । छआछत
ू ू का दं श झेल रहा आदमी
बे झझक कहे गा क ये कैसा समाज है क आदमी को अछत ू बना दया है कैद बना दया है
सामािजक समानता और तर क से बि हकत
ृ कर दया है और धम प रवतन क भी इजाजत
नह दे ता । या वह ऐसे आदमी वरोधी समाज का कैद बनकर नारक य जीवन जीना पस द
करे गा । आज का आदमी समानता चाहता है । यह उसका नैस गक अ धकार ह । मलना भी
चा हये पर तु सच तो ये है क आज भी आदमी अछूत है ।

आव यकता है सामािजक वचार म प रवतन लाने क । जातीय े ठता के अ भमान को यागने


क । सामािजक समानता सामािजक समरसता था पत क । समाज के स तधीश के साथ
राजनै तक स ताधीश को भी अपने नै तक/ मानवीय फज पर खरा उतरना होगा । तभी वं चत
/बि हकत
ृ यि त सामािजक समानता का अमत
ृ चख सकेगा और आजाद दे श म खद
ु को
आ◌ाजाद एवं सरु त समझ सकेगा । बदलते यग
ु म हर उ च थान ा त यि त का नै तक
कत य हो जाना चा हये क वह सामािजक रा य एकता के लये जातीय द भ का याग करे ।
सच तो ये है क आज भी आदमी अछत
ू है के वैचा रक प रवतन हे तु उदाहरण बनने क शपथ
खाये । यह वैचा रक ाि त रा ट य एवं सामािजक उ थान क राह म मील का प थर सा बत हो
सकती है॥। न दलाल भारती ॥

॥ रसते ज म का दद ॥

आ मीयता,समानता और स यवहार मानव मन को कतना सकन


ू दे ते ह श द म बयान कर
पाना मिु कल है। इस यक न को पु ता करता है यह गीत- ना ह द ू बनेगा ना मसलमान
ु बनेगा
इंसान क औलाद है इंसान बनेगा ।आजकल फ म से तो ऐसे सामािजक एकता और स भावना
के गीत तो गायब ह हो गये है । फ म फहड
ू दशन और ह के फलक
ु े मनोरं जन का साधन
बनकर रह गयी है। फ म का काम सफ मनोरंजन करना ह नह होता समाज का दशा
नदशन भी होता है । आज क फ म अपने नै तक दा य व को भलकर
ू बस पैसा बनाने क
मशीन बन रह हैचाहे इसके लये नंगा दशन ह य ना करना पडे । ढवाद समाज भी
सामािजक बखराव क दशा म आग म घी डालने का काम कर रहा है । प रणाम व प
सामािजक- वपमता के रसते ज म का दद शो पत,पी डत,वं चत समाज को चैन से जीने भी नह
दे ता । 21वीं शद म भी जातीय भेद का आतंक सामािजक व ोह को उ े रत कर रहा है पर तु
दे श क माट से जडा
ु हआु दे श भि त से ओत ोत बु द,गु नानक और महावीर के त
आ थावानवं चत-पी डत समाज लाख अ याचार झेलकर भी व ोह पर नह उतर रहा है । दसर

तरफ सामािजक असमानता के समथक हार करने से बाज नह आ रहे है । जा त एवं धम क

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चौपाल हो अथवा दफ् तर जातीय-भेद के अजगर क फफकार
ु सनाई
ु पड ह जाती है । दे श के
पछ तर से अ सी फ सद लोग भेदभाव के शकार है। आज के कई दशक पहले समाज म
छआछत
ु ू काफ घनौने यौवन मे तो था ह दफ् तर भी अछते
ू न थे । खैर कछ
ु कमी तो आयी है
पर तु समा त तो नह हई ु है । कछ
ु रसते ज म का दद मझे ु भी असहनीय दद दे ता है । वो
वा या हमेशा याद रहता है जब उ◌ू◌च
ं ी पहंु च का अ पतम ् श त रईस नाम का एक चपरासी
खले
ु आम भेदभाव करता था । जब दो चार लोग इ टठा होते थे तो छोट जा त के नाम पर
अशोभनीय श दो का योग करता था । जातीय े ठ लोग चटखारे लगाकर आनि दत होते थे ।
दफ् तर और शौचालय क साफ सफाई करने वाल यादोबाई से पछता
ू य बाई तु हारे धम म
सबसे नीच जा त कौन होती है । बाई कहती धोबी । तब वह बोलता नह बाई चमार सबसे नीच
जा त होती है । तु हे अपने ह धम के बारे म कछ
ु पता नह है । कभी कभी बडे लोगो से सनने

म आता जातीय छोटे लोगो को दबाकर रखना चा हये जरा सी मोह लत दये तो समझो खैर नह
।ऐसी बाते छाती म क ल ठोकंने सर ख लगती थी,खैर आज भी वैसी ह लगती है। पढे लखे लोगो
का वचार ऐसा घनौना हो सकता है तो ामीण और यग
ु से जा त के जहर ले द रया म
हचकोले खाने वालो का कैसा बरा
ु बताव होगा । आज भी सहरन पैदा हो जाती है छआछत
ु ू के
आतंक को दे खकर। वतमान समय म भी अ याचार,उ पीडन,बला कार ,चीर हरण,ह याये तक हो
रह है सफ सामािजक वपमता के कारण । ना जाने कब तथाक थत सामािजक े ठ लोग भेद
का जहर पी रहे समाज को बराबर का समझेगे ।

इस अमानवीय भेदभाव क कडी म आलोट िजला रतलाम के सवण न एक और काला प ना


जोडकर सामािजक भेदभाव के घनौने चलन को पु ता कर दया है। द लत द ू हे को घोडी पर
सवार होना सवण को इस कदर नागवार गजरा
ु क उ होने बखेडा कर दया । भला हो शासन
का पु लस बल का िज होने सरु ा दान कर वर नकासी ह नह फेरे तक पडवाये और
अ भयु त के खलाफ नामजद करण भी दज कये । ये कस धम के मानने वाले लोग है ।
कस अमानवीय पर परा को ढोने वाले लोग है जो तथाक थत छोट जा त क सख
ु क घडी मे
गमगीन और दख
ु क घडी म ज न मनाते ह। त नक त नक बाते◌ा◌ं पर वं चत का खन
ू पीने से
भी बाज नह आते। सह अथा◌े म मानव होने के नाते मानवीय कत य का पालन ह धम होना
चा हये । सामािजक बराई
ु के नाम पर मानव का वरोध करना ,शोपण करना, अ याचार करना
अपराध ह नह स य समाज और दे श क अि मता के साथ खलवाड है । कहने को सभी
समानता क बाते कर नह थकते । य द कोई सव ण हो तो शायद ह कोई मले जो अपने को
जातीय भेदभाव का पोपक माने । इतना ह नह वह बे हचक अपने आपको◌े सवसमानता का
खर हर कहे गा पर तु यवहार इससे एकदम भ न होता है , तभी तो मं दर वेश को लेकर
आतंक,द ू हे को घोडी पर चढने को लेकर आतंक,शोपण,उ पीडन अ यचार बला कार तक क
घनौनी बारदात हो रह है ।

सामािजक समानता क जबानी बात करने मा से समानता कभी नह आ सकती च र म


उतारना होगा । सफ समानता क बाते करने और च र से◌े◌ं वपर त करना दे श और समाज

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दोन के लये अ हतकर होगा । सामािजक असमानता क पोपक ताकतो का सबसे बडा गण
ु है क
वे समझौतावाद वं चतो शो पतो पी डत को सदै व अपनी गरफ् त म लपेटे रहती है और मौका पाते
ह हार कर बैठती है । इस दो मह
ु बात को समाज और दे श के नी त नधारको को समझना
होगा ।

दे श म मु य प से भेदभाव के लये िज मेदार है वण-भेद । िजसक वजह से चौथा वण अथात


शू छआछत
ु ू का शकार है ,खैर रं ग भेद तो भेदभाव का कारण बना ह नह पर तु जा तवाद ने
वं चत का जीना ह मिु कल कर दया है । आज के जमाने म भी आलोट जैसी घटनाय हो रह है
। दे श मे जातीय संघप का कारण वणभेद है । य द वण भेद मट जाये तो छआछत
ु ू अि त वह न
हो जायेगी । भारतीय समाज म सवण-अवण के भेद क व न नह सनाई
ु पडेगी । आज सबसे
बडी आव यकता है क समाज और दे श के शभ
ु च तक धा मक और राजनै तक स ता से उपर
उठकर सामािजक बदलाव के लये जातीय द भ का याग करे । समाज म नफरत,भेदभाव क
खाई को पाटने म आगे आये तभी सामािजक समानता था पत हो सकती है ,तभी श दय से
भेदभाव का जहर पीकर बसर करने वाला वं चत समाज रसते ज म के दद से राहत पा सकेगा ।
सामािजक-समानता के वा भमान के साथ गजर
ु कर सकेगा वरना आजाद दे श म भी उसे
गलामी
ु का एहसास होता रहे गा । य द ऐसा हआ
ु तो पव
ू रा प त व․के․आर․नारायण साहब का
कथन- अगर भेदभाव पी नर पशाच को शी ा तशी ्रा ख म नह कया गया तो यह परेू रा
को नगल जायेगा । उ त आशंका को◌े पर लगे उसके पहले◌े समाज के मठाधीशो और
राजनै त स ताधीश को मलकर समता क ाि त का ऐलान करना होगा। हर दे शवासी को
स चे सपाह क भां त अपने फज पर खरा उतरना होगा। तभी जातीय भेद का ध बा दे श के माथे
से मट सकेगा और श दय से शे◌ा पत पी डत वं चत समाज रसते ज म के दद से उबर पायेगा

न दलाल भारती

॥ आदमी होने का सख॥



सन ् 1936 म ेमच द ने अपने एक लेख महाजनी स यता म लखा था क मनु य दो भाग म
बंट गया है। एक बडा ह सा मरने खपने वालो का है और बहत
ु छोटा ह सा उन लोगो◌े◌ं है जो
अपनी शि त और भाव से बडे समदायु को वश म कये हयेु है ।इ हे इस बडे भाग के साथ
कसी तरह क हमदद नह ,जरा भी रयायत नह ं । उसका अि त व केवल इस लये है क वह
अपने मा लक के लये पसीना बहाये,खन
ू गराये ओर चपचाप
ु द ु नया से वदा हो जाये । आज
21वीं सद म भी शो पत समाज क सम याय य क
य बनी हई
ु है । सामािजक
कर
ु तयां,नार शोपण अपने यौवन म ह । सामािजक कर
ु तय के उ मल
ू न और आ थक अ धकार
के लये कोई आ दोलन नह हो रहा । शो पत के मसीहा डां․अ बेडकर ने कहा था श त बनो
सघप करो, क गंज
ू नह सनाई
ु दे ती । डां․ अ बेडकर के दे हावसान के बाद से तो सामािजक
उ थान का प हया ह जैसे थम गया । सामािजक उ थान के नाम पर राजनी त ज र होने लगी

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।इस राजनी त से समाज के उपे
तो का तो उतना भला नह हआु िजतना होना चा हये था पर
राजनी त के खला डय को ज र भला हआ
ु है । य द उपे त समाज का भला हआु होता तो
वं चत समद
ु ाय पर अ याचार होते, मं दर वेश पर जु म होता ,द ू हे को घोडी पर चढने से रोका
जाता । बात बात पर क ल होता। नह ․․․․․ ब कुल नह ․․․․․ । इससे तीत होता है क
कह ना कह साम तवाद क जडे आज भी मजबत
ू है । कस
ु ा त करने के लये तो अलग
अलग अ दाज म धरने दशन होते है पर वं चत के हताथ जु म शोपण,अ याचार बला कार और
सामािजक कर
ु तय के खलाफ कोई धरना दशन नह होता । समाज म या त
अंध व वास, पंच,साम ती शोपण,वग भेद-वण भेद के वीभ स और कि
ु सत प पर मठाधीश
और स ताधीशे◌ा◌ं क नजर य नह जाती । शो पत समाज क उपे ा को दे खते हए
ु लगने लगा
है क राजनै तक पा टया शो पत समाज के नेताओ का उपयोग सफ स ता ह थयाने के लये
करती है हनमान
ु क भां त ।

आज वत तता ाि त के दशको बाद ◌ंभी दयनीय ि थ त म शो पत बसर कर रहा है ।


भू मह नता का अ भशाप ढो रहा है। भारतीय जनजीवन म स दय से या त अमानवीय जा त था
और सामािजक वसंग तयां आज भी चलन म है या ये हमार सरकार क मान सकता क
प रचायक नह है ।दे श क नीचला तबका सामािजक और आ थक अ धकार से वं चत है
।सामािजक स मान को तरस रहा है ।रोट आंसू से गील कर रहा है । ये कैसी आजाद है जहां
ना सामािजक समानता है ना आ थक । या यह गलामी
ु बनाये रखने का पणय नह । आ खर
कब तक छोटा सा ह सा बहत ु बडे ह से को सामािजक और आ थक अ धकार से दरू रखने क
सािजश म कामयाब होता रहे गा । या कभी पी डतो का आ ोश नह जागेगा । कब तक जु म को
ढोते रहे गे । िजस दन वं चत के स का बांध टटा
ू उस दन सामािजक आ थक असमानता का
कच
ु टटे
ू ◌ेगा ।वं चत के स के बांध टटे
ू ,इसके पहले सरकार को भी चेतना होगा सामािजक
समानता और आ थक स प नता के कानन
ू का कडाई से पालन करवाना होगा ता क सामािजक
समानता के साथ वं चता समाज को आ थक स प नता भी नसीब हो सके ।

वामी ववेकान द ने कहा है-हमारे जातीय शो णत म एक ाकर के भयानक रोग का बीज समा
रहा है ओर वह है येक वपय को हंस कर उडा दे ना-गा भीय का अभाव । इस दोप का स पूण
प से याग करो वीर होओ, दा स प न होअ◌े◌ा,दसर
ू बाते उनके पीछे आप ह आयेगी-उ हे
उनका अनसरण
ु करना होगा । अपने से न न ेणी वाले◌ा◌ं के त हमारा कत य है -उनको
श ा दे ना,उनके खाये हए
ु यि त व के वकास के लये सहायता करना । उनम वचार पैदा कर
दो - बस उ हे उसी एक सहायता का योजन है और शेप सब कछ ु इसके फल व प आप ह आ
जायेगा । आज व ान के यग
ु म भी जातीय द भ भरने वाले लोगो म जरा न न ेणी वाल
के त नरमी का

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भाव दे खने को नह मल रहा है ।जातीय द भ के वशीभत
ू होकर जु म तो हो रहा है । इसके बात
के आंकडे भी गवाह दे रहे है । कब मलेगा वं चत समाज को सामािजक आ थक समानता का
अ धकार । कब वं चत समाज भोग सकेगे आदमी होने का सख
ु ।

जातीय बखराव अथवा बखि डत समाज सच मायने म आदमी को आद मयत का बैर बना दे ता
है । आदमी जातीय उ माद /धा मक उ माद म द न ह न वं चत पर अ याचार करे ,शोपण
करे ,भेदभाव जैसा अमानवीय यवहार कर, आदमी आदमी के अ धकार का हनन करे । ऐसे
कृ त व इंसा नयत के वरोधी ह। इंसा नयत आबाद रहे , आदमी आदमी म कोई भेद न हो
चहंु ओर समानता का सा ा य हो । इसके लये आदमी को जातीय द भ का याग करना होगा
।भेद क द वार को ढहाना होगा ।

भम
ू डल यकरण के इस यग
ु म ज रत है क समाज म या त अंध व वास जा तपां त के भेद क
खले
ु आम खलाफत करने क सामािजक समानता और आ थक समानता के लये आगे आने क
।अभीश त समाज क अंतवदना को स दयता एवं संवेदनशीलात के साथ समझने क । गर ब
वं चत का प धर बनने क ।तभी सामािजक वसंग त और आ थक खा या भर जा सकती है ।
दे श हत और समाज हत क बात करने वालो को वं चत समाज के क याण के लये कथनी
करनी म भेद करना त नक भी लाभकर न होगा । व त आ गया है दे श एवं समाज हत म
जातीय े ठता के मखौटे
ु को नोच फेकने का । वं चत के स मान के लये , उनके साथ होने
वाले अ याय के वरोध और सामािजक आ थक अ धकार के समथन मे उठ खडे होने क ,तभी
वं चत समाज को सामािजक-आ थक समानता का आ धकार मल सकेगा । सामािजक समानता
एवं आ थक स प ता के सोपान चढे बना वं चत समाज पण
ू आजाद का अनभव
ु नह कर
सकता । वं चत समाज तर क के वाह के साथ चले इसके लये आव यक है क स व ृ द एवं
स प न समाज खाईय को पाटकर समरसता का नया इ तहास रचे । समरसता से व चत समाज
का ह नह रा का भी वकास स भव है तो यो न रा हत म वग/वण भेद अथवा अ य भेद
क द वारे ढहाकर सामािजक समरसता के महाय म कद
ू पड तभी नीचले तबके का आदमी]
आदमी होने का सख
ु भे◌ाग सकेगा ।

॥ नै तक दा य व- वकास क राह म मील के प थर॥


श ा अथात वह संयम िजसके ारा इ छाशि त के वाह और वकास को वश म लाया जाता है
। जो इ छाशि त और वकास दे श और समाज के लये फलदायी हो वा तव म यह श ा
कहलाने यो य है◌ै । सार प म श ा मन क एका ता है न क त य का संकलन । जो श ा
यि त को पैर पर खडा करने◌े लायक बनाये और समाज को एकता के धागे म पीरोये । यि त

21
जीवन नमाण कर सके। मनु य बन सके। च र न◌ामण कर सके और समाज का दशा दे सके
।ऐसी श ा यि त ,दे श और समाज का वकास कर सकती है ।आज का आदमी हु म जताना
चाहता है ,हु म पालन नह करना चाहता जब क यि त को पहले आदे शो का पालन करना सीखना
चा हये आदे श दे ना तो वयं ह आ जाता है । समानता का लोप होता जा रहा है । ददशा
ु का
कारण यह है ,िजससे समाज भी अछता
ू नह है । आज यि त अपने नै तक दा य व का◌ो
भलता
ू जा रहा है ।उसका नै तक दा य व यह भी है क वह अपने से नीचे वाल को श त
कर,उनके यि त व वकास के लये सहायता करे । दे श और समाज के हत को दे खते हए
ु आज
ऐसी श ा क ज रत है िजससे च र नमाण हो,बिु द का वकास हो,परमा र्◌ा का भाव पैदा
हो, जातीय द भ क द वार तोडकर यि त अपने पैर पर खडा हो ।सच आज के यग
ु मे ज रत
है नै तक एवं वाल बी श ा क । ऐसी श ा ह आ म च तन का सह माग दखा सकती है

स य ाचीन अथव आधु नक समाज का स मान नह करता । समाज को ह स य का स मान
करना पडता है । स य ह सारे ा णय और समाज का मल
ू आधार है ।स य कभी भी समाज के
अनसार
ु अपना गठन नह करे गे । समाज को ह स य के अनसार
ु अपना गठन करना होता है ।
वह समाज े ठ है जहां सव य स य का काय म प रणत कया जा सकता है । यह प रण त
श ा से ह स भव हो सकती है । जब यि त समय के स य को समझ लेगा तो यक नन उसे
कोई भेद क खाई डरा नह सकेगी । समाज को स य क कसौट पर खरा उतरना होगा । श ा
का उपयोग मानवता क भावनाओ म अ भविृ द के लये करना होगा तभी श ा समाज के लये
वरदान हो सकती है ।
छोटे बडे म भेद, जातीय न नता अथवा े ठता क बात इंसा नयत का अपमान है,कम के आधार
पर आदमी क पहचान होनी चा हये ।अपने से न न म बराई
ु म नह अ छाई ढढनी
ू चा हये
।प रवतन समय का च है ,होगा पर श ा के मा यम से समाजोपयोगी बनाया जा सकता है
।आदमी और आदमी के बीच क द ू रयां ख म क जा सकती है । इसके लये आव यक है
स े,अकपटता एवं धैय क । जैसा क कहा गया है जीवन का अथ ह विृ द है अथात व तार
या न ेम है ।इस लये पेर् म जीवन है और वाथपरता म ृ यु । मनु य हो अथवा रा बडा बनने
के लये ढ व वास,ई या और स दे ह का अभाव और जो यि त स माग पर चलने म और
स कम करने म संल न हो उसक सहायता करना आव यक होता है ।मनु य का आदध परमा मा
होना चा हये य क वह एक अ वनाशी है और हम उसके अंश है ।अतः हम ज म आधा रत
यव था क जगह कम आधा रत यव था का सजन
ृ करना होगा ।इस यव था से मानव धम क
उ पि त होगी जो समाज,रा ट और व व के लये हतकर होगी । मानव धम ह स य क कसौट
पर खरा उतर सकता है । द ु नया को जोड सकता है । इस कार के बोध हम नै तक श ा ह
करवा सकती है , इसके लये हमे आने दा य व के त तब दता का होना होगा ।
ान मनु य म अ त न हत होता है । वा य जगत तो सहायक मा होता है । वा य जगत तो
अ त न हत ान को पणता
ू अथवा अपणता
ू दान करता है । वा तव म श ा का अथ पणता

हे ◌ाता है और नै तक श ा इसे जीव तता दान करती है। सच श ा तो वह है जो साधारण
यि त के जीवन सं ाम को समथ बनाये, च र बल का नमाण कर। पर हत भावना म
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अ भविृ द कर । यि त को सं ह क भां त साहसी बनाकर अपने पैरो पर खडा होने लायक
बनाये। वह श ा/नै तक श ा रा एवं समाजोपयोगी हो सकती है । नै तक श ा, उ थान क
राह म मील का प थर सा बत हो सकती है बशत यि त अपने नै तक दा य वो एवं संक प के
त ईमानदार बरते◌े ।
न दलाल भारती

॥ द लत क स विृ द के बना रा का वकास संभव नह ॥

लोकसभा म नेता तप व भाजपा के व र ठ नेता लालकृ ण आडवाणी ने 14 अ ैल 2008


को महू म सं वधान नमाता बाबा साहब डां․आ बेडकर मारक एवं तमा के लोकापण के बाद
कहा क आजाद के बाद से अब तक दे श म द लत कमजोर आ दवासी और गर ब वग स विृ द
क धारा से वं चत है । द लत क स विृ द के बना रा का वकास स भव नह है । उ त
कथन पर स चे मन से वचार कया जाये तो स चाई से बहआ
ु जा सकता है। राजनै तक
मंथन से ह नह सामािजक वचार मंथन से भी यह वप नकलने क स भावना बलव ती है
।सच तो यह है द लत ने चहंु मुखी वकास पी अमत
ृ का वाद ह नह चख पाया है,आज भी परू
आबाद क 19․59 तशत अनस
ु ू चत जा त जातीय भेदभाव क शकार है। वकास क बयार
से वं चत है । सामािजक आ थक असमानता का जहर पीने को बेबस है ।अ याचार,जु म,शोपण
क शकार है ◌ै और 8․63 तशत अनु․ज․जा त पछडेपन का दं श झेल रह है। सवाल उठता
है इसके लये िज मेदार कौन है -राजनी त या समाज या दोन । उ तर दोन ह िज मेदार है ।
राजनी त लोग जब स ता से बाहर रहते है तब उ हे द लतो थान याद आता है । जब स ता म
होते है तो उ हे अपने हत के अलावा कछ
ु और नह दखाई पडता । सह मायने म सामािजक
असमानता ह द लत के पछडेपन का कारण है । वा त वकता का आंकलन माननीय ी
आडवाणी ने कर द लत के मसीहा बाबा साहब क ज म थल से द लत क स विृ द का ऐलान
कर दया। इस वैचा रक ाि त के लये माननीय ी आडवाणी जी को सलाम।

वतमान प रवेश म वकास का हर रा ता राजनी त से होकर नकल रहा है । ऐसे समय म


माननीय ी आडवाणी के ीमख
ु से द लत के वकास क तब दता ि टगोचर होती है तो

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यक नन द लत के वकास म उपयु त कथन मील का प थर सा बत हो सकता है ।माननीय ी
आडवाणी जी ने वा त वकता के धरातल से अ य राजनै तक पा टय को वचार मंथन का मु दा
दया है। राजनै तक पा टया चाहे कां ेस हो बसपा हो सपा हो या अ य कोई सभी को द लतो थान
के े म कये गये अपने अपने काय का मू यांकन कर भ व य म काय करने का आ वाहन
है। कथनी करनी म अ तर न करने क तब दता है । य द राजनै त पा टयां सामािजक और
आ थक वकास क शपथ ले ले तो कोई ऐसी शि त नह है जो उ थान क राह म कांटा बनेगी
। काश सभी राजनी त पा टयां सामािजक और आ थक असमानता को रा हत म मु दा
बनाकर द लतो थान के लये कमर कस लेती । च ता का वपय है सभी राजनै त पा टय
द लत क ददशा
ु पर घ डयाल आसंू बहाती तो है पर स चे मन से उनके क याण के लये आगे
नह आता वोट बक ज र समझती है । य द सामािजक उ थान हआ
ु होता तो 14 अ ैल के दन
महू के पास समरौल इलाके म ाम दतोदा म द लत क बारात पर सवण का हमला होता ।
ब कुल नह राजनी त म इतनी शि त है क वह कसी भी कु यव था को समा त कर सकती है
पर तु यहां तो सामािजक कु यव था भी तो राजनी त को स बल दान करती है ।
सह मायने म राजनै तक पा टया द लत का भला चाहती ह तो वे सव थम सामािजक कु यव था
केआर ण को ख म करने के लये तब द हो और गर ब द लत को खेती क जमीन अथवा
रोजगार महै
ु या कराय । उनके श ा द ा का पु ता इ तजाम हो । वा थ के े म काम हो ।
सामािजक एवं आ थक समर ता के लये जातीय भेदभाव क सीमा टटे
ू । जब तक द लत
सामािजक कु यव था क कैद से मु त नह होगा तब तक चहमखी
ु ु वकास स भव नह है । दे श
म अरबप तय क सं या कतनी भी य न हो जाये नै तक प से यह वकास नह होगा। रा
पण
ू प से वक सत तभी कहा जा सकता है जब द लत का वकास होगा ।द लतो थन को रा
के वकास से जोडने वाले माननीय ी लालकृ ण आडवाणी का कथन स चे मे से हो या झठा
ू पर
एक बात तो स य है क द लत के वकास के लये राजनै त ो को अभी बहत
ु कछ
ु करना बाक
है तभी द लतो का वकास स भव है।द लत क स विृ द के बना रा का वकास संभव नह
माननीय ी लालकृ ण आडवाणी के उ त कथन क स यता को राजनै त पा टयां कतनी गहराई
से वीकार कर द लतो थान को रा के वकास का मु दा बनाती है यह तो वह जाने पर एक
बात साफ हो गयी है क आजाद के इतने दशको बाद भी द लत वकास क राह से अभी बहत ु
दरू है। माननीय ी लालकृ ण आडवाणी ने द लतो थान को रा के वकास के साथ जोडकर दे खा
। ी आडवाणी के कथन द लत क स विृ द के बना रा का वकास संभव नह क स चाई
को वीकार कर सामािजक एवं आ थक तर पर द लतो थान का शंखनाद कर,ऐसी उ मीद तो क
जानी चा हये-स ताधीश से। ी आडवाणी जी को साधवाद
ु ․ ․․․․․․․․․․․․․․․․․․
न दलाल भारती

॥ खद
ु के लये जी रहा है आदमी ॥
आज समाज म म क ि थ त पैदा हो गयी है । आदमी के यवहार म नै तक नजर नह आ
रह है । कथनी करनी म साफ साफ फक नजर आने लगा है । आद मयत, मत यता और

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नै तकता क बात करने वाले वाथ का का म का तलाशने लगे ह । िज हे खद
ु को आदश प म
समाज के सामने तुत करना चा हये,वे मखौटा
ु बदलने लगे ह । इंसा नयत और नै तक मू य
वह है जो पहले थे पर तु जमाना बदल गया है क दोहाई दे कर दोपारोपण और खद
ु का मतलब
साधने म कछ
ु लोग य त हो गये है। तबे क बदौलत कमजोर के दमन को उता है । मौका
पाते ह ग द क भां त कमजोर का हक ल ल रहे है । यह लोग नै तक मू य को कचल
ु रहे
है।अपने मतलब के लये दसरे
ू के मौत क दआ
ु करने लगे है । ऐसे वाथ के वशीभत
ू लोग के
मंह
ु से नै तकता क बात बेईमानी लगती है ।

संवेदनह न और खद
ु के लये जीने वाले लोगो ने द ु नया को मतलबी बना दया है। आज का
आदमी लाश को सीढ बनाकर यश और वैभव क शखर तक पहंु चने म कोतहाई नह बरत रहा है
।ऐसे वाथ और संवेदनह न लोग स य और संवेदनशील समाज के लये चनौती
ु बने हये
ु है ।
समाज म मू यह नता बढ है, आदमी महज सौदागर/जालसाज बनकर रह गया है ।चोर
डकैती,ह या,बला कार,अ याचार जैसे घनौने अपराधो से जरा भी परहे ज नह कर रहा है ।यह
व ृ त समाज के आइने को ब सरत
ू कर रह है ।यह वृ त म क म डी म भी जडे जमाने
लगी है । पद के तबे का उपभोग व हत म होने लगा है । पदा धकार अपने से बडे
और तबेदार पदा धकार के दखसख
ु ु म पहले हािजर लगाने क दौड म जट
ु रहा है ,पीछे उसक
क खोदने और सािजश रचने से भी बाज नह आ रहा है । मातहत कमचार का उपयोग
बधआ
ु मजदरू क तरह करने लगा है । पद क ग रमा के वपर त काम होने लगा है सु वधाभोगी
हो गया है॥समता,स भावना, याय सं था का वकास येय न होकर व हत हो गया है ।
जोडतोड,छल पंच से हा सल कामयाबी के ज न म डबा
ू हआ ु है आज आदमी अपने दा य व को
भलकर।
ू यह व हत टाचार को उवरा दान कर रहा है । व हत और संवेदनह नता क वजह
से चीखे दबती जा रह है। यापार जगत भी अछता
ू नह है । यापार व हत म जनता के वा थ
से खलवाड कर रहा ह , मलावट कर रहा है ,कम तौल रहा है सामान महंगा बेचा रहा है।जनता
महंगाई के बोझ से दबी जा रह है ।सरकार बौनी सा बत हो रह है ।स ता के भखे
ू आ वासन क
आ सीजन परोसे जा रहे रहे है ।

आज का आदमी दौलत का भखा


ू हो गया है िजसक वजह से वह र ते तक क परवाह नह कर
रहा है । वकराल भख
ू और आपाधापी के जीवन म नै तकता क सध
ु नह बची है । आज आदमी
मशीन के हावभाव म जीने लगा है तभी तो जीवन नीरस होने लगा है और व हत सर चढकर
बोलने लगा है ।जीवन मू यो को नजरअंदाज कर अंधी दौड का घे◌ाडा हो गया है । िजसके सफ
एक ह उदे य बचा है बस दौलता का पहाड खडा करना चाहे उसे इसे हा सल करने के लये िजस
हद तक गरना पडे । इसी अंधी दौड ने उसे नै तक मू य से दरू कर दया है । इस तफान
ू का
कु भाव हर े म दे खा जा सकता है । यह कु भाव अनै तकता और समािजक वकृ त के लये
िज मेदार है ।स य समाज के लोग अफसोस जा हर करने के अलावा कछ
ु नह कर पा रहे है
।कारि
् तकार प रवतन लाने वाला सनेमा फहड
ू हो गया है । व हत वहां भी साफ दखाइ◌्र पडने
लगा है। समाज और सामािजक प रवतन उनके लये अब मु दे नह रहे ।

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आज आदमी सफ बात से नै तक नै तकता का एहसास करा रहा है ।खद
ु के च र म नह उतार
रहा है। अपनी िज े◌ादार को भल
ू रह है। दोपारोपण कर रहा है । दसरे
ू म कमी नकाल रहा है
।पर हत का तो कह नाम नशान नह छोड रहा है। नायक के वेप म खलनायक बना हआु है
सफ वा हत के लये।आज समाज नै तक और अनै तक दो खेमे म बंट गया है । अब तो बस
इ तजार है ऐसे महानायक के अ यद
ु य क जो व हत के भाव को पर हत के भाव म बदल दे
। कमजोर आदमी के मंह
ु से फट
ू पडे-आज का आदमी खद
ु के लये नह आमजन ,समाज और
दे श के लये जी रहा है ।
न दलाल भारती

॥ थम लोकनायक भगवान बु द ॥
बा यकाल से ह स दाथ के मन म क णा भर थी । उनसे कसी ाणी का दख
ु नह दे खा जाता
था। स दाथ अथात भगवान बु द के दया क णा के बारे मे अनेक कथाय सनने
ु को मलती है -
उसमे म से यह कथा - स दाथ को जंगल म कसी शकार क तीर से घायल हंस मला । वे
हंस को उठाकर तीर नकाले,सहलाये ,पानी पलाये । उसी समय दे वद त वहां आ गये और कहने
लगे यह शकार मेरा है ,मझे
ु दे दो । स दाथ ने दे ने से मना कर दया और बोले तम
ु इस हंस
को मार रहे थे । मैने इसे बचाया है । अब तु ह बताओं इस हंस पर कसका हक है मारने वाले
का या बचाने वाले का । अ ततः राजा शु दोधन को भी स दाथ क बात माननी पडी और हंस
को बचाने वाले स दाथ बडे सा बत हए ु ।स भवतः तभी से यह कहावत कह जाने लगी क मारने
वाले से बचाने वाला बडा होता है ।शा य वंश म ज मे स दाथ का ववाह यशोधरा से सोलह साल
क उ म ह हो गया ।राजा शु दोधन ने स दाथ के लये द ु नया क हर भोग वलास क व तु
का ब ध कया पर ये सब चीज स दाथ को सांसा रक मोह माया म नह बांध सक । शनै
शनै वे सांसा रक मोह माया से बहत
ु दरू चले गये और यह स दाथ बौ द धम क थापना कर
नर से नारायण अथात भगवान बु द हो गये ।भगवान बु द व व के सबसे बडे और महान
धम दे शके के म माने जाते है । आजीवन अ हं सा,समता एवं स ेम मलक
ू धम का चार
कये । जीवन के व भ न प ो के बीच सम वय था पत करने के कारण भगवान बु द को थम
लोकनायक कहा जाता है । स दाथ को बैसाख क पणमासी
ू को बु द व क ाि त हुई थी ।

एक समय भगवान बु द राजगह


ृ वेणुवन म वहार कर रहे थे ,उ होने दे खा क ंग
ृ ाल नाम का
एक वै य का लडका भीगे व ,भगे केश,पव
ू ,पि चम,उ तर,द ण, उपर नीचे सभी दशाओं को
हाथ जोडका नम कार कर रहा है । भगवान बु द उससे पछे
ू -तम
ु य सबेरे उठकर दशाओं को
नम कार कर रहा है ।तब वह बोला मरते समय पताजी ने कहा था क दशाओं को नम कार
करना वह कर रहा हंू ।
भगवान बु द बोले आय धम म छः दशाओं को इस तरह नम कार नह कया जाता ।
वै य बालक बोला-तब कैसे कया जाता है भ ते ।भगवान बु द बताये क आय ावक के जब
चार कम- लेश- ाणा तपात । ा णय को मारना। अद तादान । चोर करना। परदागमन।काम

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संबंधी दराचार
ु करना,और मपावाद
ृ अथात झठ
ू बोलना मट जाते है,चार थान अथात
वे छाचार के रा ते म जाकर पाप कम करना, े प के रा ते जाकर पाप कम करना,मोह के रा ते
जाकर पाकम करना और भय के रा ते जाकर पापकम करने से जब वह पाप नह करता और जब
हा न के छः मख
ु का वह सेवन नह करता अथात म यपान,सं या म चौर त क सैर,नाच तमाशे
का यसन,जआ
ु , द ु ट मनु य से म ता और आल य-इस तरह 14 पाप से वह मु त हो जाता
है,तब वह छह दशाओं अथात मांता पता क सेवा,गु क सेवा,प नी क सेवा, बंधु बांधव क
सेवा सेवक क सेवा और साधु स तो क सेवा, को आ छा दत कर लोक, परलोक दो◌ेनो पर
वजय ा त कर लेता है और मरने पर वग जाता है ।
िजस गह
ृ थ को छः‘ दशाओं क पजा
ू करनी हो,वह चारो लेशो से मु त हो जाये । िजन चार
कारणो के वश म होकर मढ
ू मनु य पाप कम करने म वत
ृ होता है उनमे से उसे कसी भी
कारण के वश म नह होना चा हये और स प त नाश के छहो दरवाजे ब द कर दे ना चा हये ।
दान, य वचन,अथचया और समाना मकता अथात दसर
ू को अपने समान समझना,ये लोक सं ह
के सार साधन है। बिु दमान मनु य इन साधनो का उपयोग करके जगत म उ च पद ा त कर
सकता है ।
भगवान बु द कश ाय बहजन
ु हताय बहजन
ु सखाय
ु वाल है जैस-े न दा न करना, हं सा न
करना,आचार नयम ारा अपने को संयत रखना, समानता का यवहार , वाथ का याग कर
आदमी के लये जीना आ द भगवान बु द क श ाये सदै व सव क याणकार एवं मंगलकार बनी
रहे गी य क उनम त नक भी भेदभाव क गंध नह आती । भगवान बु द के अनयायी
ु भारत म
ह नह द ु नया के अनेक दे श म पाये जाते है ।द ण पव
ू ए शया के लगभग सभी दे श बौ द
धम के अनयायी
ु है । भारत के स द स ाट अशोक महान भगवान बु द का श ाओ ◌ं को
अंगीकार कर शलालेख के मा यम से तथा धम चारक को दे श वदे श म भेजकर बो द धम
का चार सार कये । एकमा बु द ह ऐसे महापु प थे जो कहते थे -म ई वर के बारे मत-
मस तर को जानने क परवाह नह ।आ मा के बारे म व भ न सू म मत पर बहस करने से
या लाभ । भला करो और भले बनो । बस यह नवाण क ओर अथवा स य क ओर ले जायेगा
। केवल वह यि त सब क अपे ा उ तम से काय करता है जो पणता
ू नः वाथ है, िजसे न
तो धन क लालसा है न क त क और न कसी अ य व तु क ह । मनु य जब ऐसा करने म
समथ हो जायेगा तो उसके भीतर से काययाि त गट होगी जो संसार क अव था को स पूण
प से प रव त त कर सकती है । ऐसा आ वाहन थम लोकनायक भगवान बु द ने कया है कम
के मा यम से और बौ द धम क थापना कर। बौ द धम मानवीय एकता के लये आज भी मील
का प थर है । ज रत है बौ दमय होने क य क इसी म सव क याण और सव मंगल का भाव
है । भगवान बु द के उपदे श को च र एवं कम म उतारकर असमानतावाद जहर को
समानतावाद अमत
ृ से त ृ त कया जा सकता है । ठ क उसी तरह जैसे उ टे को सीधा कर
दे ,भले
ू को माग बता दे , अंधकार म द या दखा दे । -बु दं शरणं ग छा म । ध मं शरणं
ग छा म । संघं शरणं ग छा म ॥

न दलाल भारती

27
॥ नः वाथता -काल के गाल पर अमरता ॥
परमाथ के भाव को याग कर वयं के हताथ काय करना बडे पाप के समान है ,जो मनु य यह
सोचता हे क म पहले अपना अ धकार जमा लंू अथवा उपभोग कर लंू । म ह अ धक से अ धक
धन का सं हण कर लंू ।सव व का अ धकार बन जाउ◌ू◌ं ।म और मेरे ह प रवार के लोग सखी

रहे , स प न रहे । म उ◌ू◌ंची जा त का हंू तो मझे
ु छोट जा त के लोगो के दमन का परा

अ धकार है । बडे पद पर हंू तो मातहत को अगंुल पर नचाना मेरा ज म स द अ धकार हो
गया है । छोटे लोगो क छाती पर चढे रहना ।उनके हत को अनदे खा कर खन
ू के आंसू दे ना
ब धक य गण
ु मान लेना अपराध है, पाप है । अपने हत को नजरअंदाज कर दसर
ू के हताथ
काय करना यि त के बड पन म चार चांद लगा दे ता है । यह यि त अपने कम से दे व व को
ा त कर लेता है । कहा जाता है क कोई कसी क सहायता नह करता । सेवा का अ धकार है
भु के स तान क । भा यवान यि त को चा हये क वह अपने को छोटा समझकर मानव क
सेवा भगवान क पजा
ू मान कर करे । य द यि त ऐसा करता है तो वह नि चत ह भु के
काफ नचद क होगा ।उपासनाओ का यह मम है क यि त न छल मन से दसरे
ू के भला के
लये सदै व त पर रहे ।जो यि त नधनएदबल
ु और बीमार क सेवा करता है वह सह माने म
दर नारायाण क सेवा करता है । अपने म मभाव को अ भ य त करने का एकमा उपाय है
क दन दर ो बीमार क सेवा क जाये ।च मचागीर चकनी चपडी
ु बाते करना तो वा थय
का काम है ।भा यवान और हमभाव रखने वालो का काम तो सय
ू क तरह काश दे ना है । ऐसे
लोग अपने वाथ कयाग कर बहजन ु हताय बहजन
ु सखाय
ु के लये जीते है । परमा थय का
जीवन परोपकार के लये होता है ।
द ु कम के ारा अपना ह नह दसर
ू का भी बरा
ु होता है ।स कम के मा यम से यि त दसर
ू का
ह भला ह नह अपना भी भला करता ह । कहा जाता है क बना फल उ प न कये कोई भी
कम न ट नह होता ।य द कम बरा
ु होगा तो उसका फल भी बरा
ु ह होगा । य द यि त स कम
करता ह तो नि चत प से शभ
ु फल ा त होगा ।मनु य होने का दा य व नभाना है तो अपने
म परमाथ के भाव क अ भविृ द करनी होगी । श बुक ऋ प ने सामािजक समानता के लये
याग कया ।उनका बध राम के हाथो हो गया पर तु श बुक ऋ प का सामािजक समानता के
लये कया गया ाि तकार काय वपमता क आधीं म द ये क भां त काश दे रहा है और
जातीय द भ क द ू रयां नर तर कम हो रह है ।श बुक ऋ प का याग यथ नह गया ।
भगवान बु द के याग को कभी द ु नया भल
ू सकती है ․․․․․कभी नह ․․․․․․ परमाथ के
न छल भाव और याग क वजह से स दाथ नामक राजकमार
ु भगवान बु द बन गये । परमाथ
म ऐसी शि त तो ह जो साधारण से मनु य को भी पजनीय
ू बना दे ती है ।र वदास, कबीर आ द
अनेक उदाहरण है ।
आदमी होने के नाते हमारा दसरो
ू के त भी कत य है क हम उनक सहायता करे । उनका भला
कर जा त धम, उ◌ू◌ंच-नीच गर ब अमीर के भेद क खाईय को दर कनार कर। इस वपय म
ववेकान द के वचार है क दसर
ू के त हमारे कत य का अथ है -दसर
ू क सहायता
करना,संसार का भला करना । अब न उठता है क हम संसार का भला य करे । वा तवम म

28
बात यह है क उ◌ूपर से तो हम संसार का उपकार करते है ,पर तु असल म हम अपना उपकार
करते है । एक दाता उ◌ू◌ंचे आसन पर खडे होकर और अपने हाथ म दो पैसे लेकर यह मत कहे -
ये भीखर ,ले यह म तझे
ु दे ता हंू । पर तु तम
ु वयं इस बात के लये कत
ृ होओ क तु ह वह
नधन यि त मला िजसे दान दे कर तम ु वयं अपना उपकार कया । ध यपाने वाला नह होता
दे ने वाला होता है। इस बत के लये कत
ृ होओ क इस संसार म तु हे अपनी दयालता
ु का
योग करने और इस कार प व और पण
ू होने का अवसर ा त हआु । वाथपरता यि त को
नरक क ओर ढकेलती है । नः वाथता का भाव यि त को भु तु य बना दे ती है । य द
यि त तन मन और धन से स प न होने का सौभा य ा त कर चका
ु है तो ऐसे मनु य को
मनु य क सेवा ई वर भाव से करने का संक प लेना चा हये य क ऐसे संक प काल के गाल
पर अमरता दान करते ह । न दलाल भारती

॥ मनु य को सखी
ु बनाना-धम का उ दे य ॥
धम के पथ पर अ सर होने का थम ल ण फि
ु लत होना है। ववादयु त होना क टरवाद,
अनाव यक पाखा ड यु त वातावरण न मत करना अथवा वैचा रक भेद पैदा करना नह । सच ह
तो कहा गया है धम का रह य आचरण से जाना जाता है । यथ के मतवाद से ब कुल नह ह।
भला बनना भलाई के काम करना इसी म धम न हत है । मनु य म जो वाभा वक बल ह है
उसक अ भ यि त ह धम है। धम का उ दे य मनु य को सखी
ु बनाये रखना होता है न क उसे
बखि डत कर अपना उ ू◌ा सीधा करना,स ता हा सल करना । मनु य मे◌े◌ं पाश वक,मानवीय
और दै वी गण
ु होते है। वह गण
ु जो यि त म पशता
ु के भाव का संचार करता है वह पाप है , जो
गण
ु यि त म दै वी गण
ु बढाता है वह पु य है । यि त को पाश वक गण
ु पर वजय ा त कर
मनु य बनना ह मनु यता के त याय है । धम तो वह है िजसके सा न य म पशु आदमी
और आदमी परमा मा तक उठ सकता है ।

िजस कसी व तु से आ याि मक,मान सक अथवा शार रक दबलता


ु उ प न हो उसे पैर से भी
नह छना
ु चा हये । मनु य म जो वाभाव क बल है उसक अ भ यि त ह धम है । भगवान
महावीर ने द ु नया को कई उपदे श,बहत
ु अ छे संदेश दये उनका सबसे य उपदे श था अ हं सा के
माग पर चलने का । आज के यग
ु म जहां चार ओर चोर डकैती,लटपाट
ू ,आतंकवाद जा तवाद
फैला हआ
ु ह । ऐसे वातावरण म बात चाहे िजतनी बडी बडी यो न क जाये पर चाहत तो
ऐशोआराम क चीज इ ठा करने ओर ज द से ज द अमीर बनने क चाह ने आम आदमी को
झकझोर कर रख दया है । कोई भी मनु य आराम से या यंू कहे क पैसा कमाना नह
चाहता,सभी इसी भागमभाग म लगे हए
ु है । या आदमी के सं कार इतने छ ेटे हो गये है क
आदमी चाहे कह भी कछु कर सकता है मानव धम को भलकर
ू अ हं सा परमो धम को भलकर
ू ।
आज के आदमी को धम क अफ म क खराक
ु को तलांज ल दे कर भगवान महावीर और भगवान
बु द के बताये रा ते पर चलना होगा । इसी माग पर आदमी,आदमी होने का सख
ु भोग कर
परमा मा तक उठ सकता है ।तभी धम के उ ◌े य पर खरा उतरा जा सकता है ।धम का उ ◌े य

29
तो जीवन को उ सव बनाना होता है ।सखी
ु बनाना होता है । जो धम आदमी आदमी के बीच
द वार खीचे , बखि डत समाज क थापना को बल दे । असमानता को मह व दे । धमावलि बय
म आपस म नाते◌ेदार क मनाह करे । ऐसे धम को धम कहना धम का उपहास है ।जो धम
जीवन को उ सव बनाने क सीख दे ता हो सह मायने म वह स चा धम है ।

हर यि त क आ मा परमातम का अंश है य द कसी क आ मा को धम क वजह से अथवा


अ य कारणो से दख
ु पहंु चता है तो नि चत प से इसका एहसास परमा मा को होगा । परमा मा
को यह वीकार नह होगा क उसके ब दे आपस मे बैर भाव से जीये। मनु य एक असीम व ृ त है
िजसक प र ध कह नह है,ले कन िजसका के एक थान म नि चत है,और परमे वर एक
ऐसा असीम व ृ त है,िजसक प र ध कह ं नह है पर तु िजसका के सव है ।परमा मा के
सवाय दसरा
ू कछ
ु भी नह ह । जी वत ई वर यि त यि त/जीव के भीतर है ,इसके बाद भी
यि त का प नक झठ
ू चाज म व वास करता है ।मनु यदे ह म मानवा मा ह एकमा उपा य
ई वर है । धम का रह य आचरण से जाना जा सकता है, यथ के मतवादो अथवा
आड बरो, ढय से नह ।

धम के नाम पर या या हो रहा है जगजा हर है ।अ याधु नकता क होड म अि मता के साथ


खलवाड हो रहा है ।मां बाप गु का अपमान हो रहा है ,जा त के नाम पर आदम का दमन हो
रहा है या धम यह सीख दे गा । कभी नह आदमी अपने मतलब के लये धम का यापार करने
लगा है । कला और गला के भरोसे पजनीय
ू बनने लगे है । सबसे बडा धम आद मयत आज
लहलहान
ू ु है । स य के भी आतं कत आंसू बह रहा है । याय ववा दत होने लगा है। अनाचार
जा तवाद, य भचार सा दा यकता का आतंक बढने लगा है । गु और श य का स ब ध
गारहक
् और दकानदार
ु जैसा हो गया है ।आदमी आद मयत को भलता
ू जा रहा है । या कोई धम
ऐसी श ा कभी दे सकती है । कभी नह ․․․․․ या ऐसी सीख दे ने वाला धम हो सकता
है․․․․․कभी नह ।

धा मक मतभेद को लेकर दं गा फंसाद करना, जा तवाद का पोपण करना ,राजनी त करना,गर ब


का शोपण ,तथाक थत उ◌ूची जा त के नाम पर तथाक थत छोट जा त का दमन करना आ द
पापाचरण ह । आदमी होकर द न द लत का शोपण करना,जु म करना,अ याचार करना तो
कदा प धम हो ह नह सकता। जो द न है द लत है,उसक मदद करना, उसे आ मबल दान
करना,उसके हताथ काय करना ह धम है । धम तो स भावना,समानता का पोपक होता है।
सवक याणकार और मंगलकार होता है । धम क छावं आदमी को सखी
ु बनाने एवं नर से
नारायण बनने का मा यम है । वतमान समय म आव यकता इस बात क है क हम मानवीय
एकता, समानता ,स भावना और स विृ द के लये अथक यास कर। आद मयत का धम

30
नभाये। आज के आदमी को आद मयत के धम पर खरा उतरना होगा यह व त क मांग है।
इसी मे समाज और दे श क सख
ु शाि त न हत है ।

न दलाल भारती

॥ आम जनता से दरू है आजाद आज भी ।

वत ता के ज न का औपचा रक आयोजन 15 अग त या 26 जनवर को दखायी तो पड


जाता है पर वा त वक आयोजन क धम
ू नह होती । स ची अनभ
ु ू त तो वह होती ह जो सव
ण त ण महसस
ू क जा सके। वत ा का ऐसा अनभव
ु आजाद के इतने साल के बाद भी
आम गर ब जनता शो पत पी डत वं चत जनता को तो नह हआ
ु है । उ हे हो भी कैसे सकता ह
वे तो आज भी रोट रोजी क तलाश म दर दर भटक रहे ह
।जा तवाद,धमवाद,महंगाई,बेरोजगार ,,भखमर
ू ,अ श ा,सामािजक ,आ थक कु यव था ऐसी
मिु कल से जझ
ू रहे ह । आम गर ब जनता/शो पत पी डत वं चत जनता भू मह न खे तहर मजदरू
,सामािजक ,आ थक कु यव था से जब तक जझते
ू रहे गे तब तक सै दाि तक प से ये खद
ु को
कैसे वत मान लेगे ।आजाद का ज न अलग अनभ
ु ू त ह और सामािजक, आ थक कु यव था
का ण त ण रसता ज म अलग अनभ
ु ू त है ।इन दोन के बीच म पनपे भेद को सामािजक
आ थक और राजनै तक प से समझना होगा ।जब तक शो पत पी डत वं चत जनता भू मह न
खे तहर मजदरू आजाद क असल अनभ
ु ू त को महसस
ू नह करता है आजाद का मतलब उसके
लये कोरा सपना होगा ।आज के यग
ु म भी सामािजक बराइयां
ु शो पत पी डत वं चत जनता के
जीवन म काफ दखदायी
ु है ।सच मायने म यह बराइयां
ु ह असल आजाद का एहसास नह होने
दे ती है ।आमजन क आंख म चमक दे खनी है तो नीिज वाथ से उपर उठना होगा । दा य व
एवं दे श धम पर खरा उतरना होगा ।समानता के भाव को वक सत करना होगा । जा तवाद ख म
करना होगा ।गर बो को रोजगार के साधन उपल ध कराना होगा। श ा एवं समु चत रोजगार के
31
ब दोब त करने होगे । भू मह न े◌ा तहर मजदरो
ू को खेती क जमीन दे ना होगा । स ताधा रय
को बना कसी भेदभाव के आमजनो क सम य का नराकरण करना होगा । तभी आमजनो क
आंख म चमक आ सकेगी ।
जैसा क व दत है क रा झोप डय म बसता ह कसान,जते
ू बनाने वाले मेहतर और भारत के
ऐसे ह नचले वग म यादा काम करने और वावल बन क मता है ।वे लोग यग
ु यग
ु से
चपचाप
ु काम करते आ रहे ह जो इस दे श क सम त संपदा के उ पादक है । दभा
ु य बस आजाद
दे श म यह लोग शोपण उ पीडन के शकार है ।सच तो यह है क ये लोग वत ता से बहत

दरू पडे हए
ु ह। इनक चौखट पर आज भी भख ू लाचार का ताडंव है ।
कतनी बडीं हा यपद ि थ त ह िजस दे श के पढे लखे यवक
ु द ु नया को अपने ान का लोहा
मनवा रहे ह । िजस दे श म उ च पदो से लेकर अ त न न पद के लये शै णक यो यता
नधा रत ह और उनके रटायरमे ट क अव ध तक नधा रत वह दसर
ू ओर अ प श त लोग
दे श के सव च पदो तक पहंु च जा रहे ह । सासंद वधायक बन रहे है कब म पैर लटकाये हए
ु भी
म ी तक के पदो पर बैठे रहते ह । या यह श त तभाओ के साथ छल नह । इस
अ याय को याय का प कौन दे गा ।शायद कोई नह य क इस प र या म बदलाव स तासख

से वमख
ु कर सकता है और मरने के बाद राजक य स मान से दाह सं कार क सु वधा म भी
अडचने खडी हो सकती है।यह तो डर है जो श त एवं यवा
ु शि त क राह का कांटा बना हआु
है । या अ तरा मा क दहाई
ु दे ने वालो म भी अ तरा मा का संचार है सच मा नये तभी हमार
आजाद अपने म त य को पा सकेगी िजस दन आजाद का म त य परा
ू होगा गया उस दन
भारत वकासशील दे शे◌ा क थम पंि त म खडा होगा । समथ लोग आमजनो क पीडा को
समझे और नराकरण भी कर ।

आज भी दे श के करोडो तर क से दरू पडे,पेट म भख


ू लए, े वाद,जा तवाद गर बी का दं श
झेलते हएु लोगो का उ मीद है क उ हे वा त वक आजाद मलेगी और याय उनके दरवाजे तक
भी पहचगा
ु । या घ डयाल आंसू ंओ,कोरे वादो, नारो या झठ
ू शपथ लेने भर से यह स भव ह ◌ं
कदा प नह । इसके लये कथनी और कथनी के◌े◌ं अ तर को दरू करना होगा । वाथ से उपर
उठना होगा । जा तधम के द भ को याग कर सफ भारतीय बनना होगा ।आज दे शवा सय को
भारतीय बनना नता त आव यक हो गया है।वं चत गर ब को तर क क राह ले चलना होगा
।इसके लये भले ह खद
ु के हतो का याग करना पड । याग करने का ज बा दखाना होगा ।
वं चतो पछड गर ब सबको साथ लेकर चलना होगा तभी दे श क आजाद साथक हो सकती है
वरना यो हं समथ लोग स तासख
ु क भख
ू म जोडतोड कर सहांसन पर वराजमान होते रहे गे और
त णाई तडपती रहे गी ।

हम दे श क अथ यव था पर नजर डाले तो ि टगोचर होता ह क कछ


ु नेताओ नौकरशाह
अथवा उदयोगप तय क मटठ
ु म कैद होकर रह गयी ह । आम आदमी आ वसन क खराक
ु पर
जीने को मजबरू हो गया है । आजाद के अमर शह द के सपने टट
ू गये ह ।स ता अपरा धय के
क जे म होकर रह गयी है । वधा यका एवं कायपा लका पर अंकु श कसने के लये याय पा लका

32
तो ह पर याय आज इतना महंगा हो गया है क आमजन को उपल ध ह ह ।नतीजन शोपण
अ याचार सहने को मजबरू ह आमजन ।प का रता से उ मीद थी अभी ह और रहे गी भी पर रह
रहकर उठते सवाल और अ धक भय पैदा कर दे ते ह भरार
् टाचार,अनाचार ,अ याचार के सम दर
से समाजवाद पी गंगा के नकलने क उ मीद थी पर वह भी उ मीद रौद जा चक
ु है य क
समाजवाद वोट बटोरने स ता सख
ु भोगने एवं वाथ क भटट म आमजन को झोकने का ज रया
बनता नजर आ रहा है । तभी तो आज आजाद के इतने बरस बाद भी समानता का द प नह
जल सका ।
उ च वण क मान सकता के इ तहासकारो ने भी पछडे एवं द लत वग के अमर शह द के
ब लदान को इ तहास के प नो से नकाल अलग कर दया ।उदरया चमार ,न थू धोबी वीरांगना
उदादे वी वाि मक अमर सं ह चमार,चेतराम जाटव,ब ू◌ा मेहतर बांके चमार,वीरा पासी मठाई
चमार,क ◌
ू ा धोबी,सीताराम,जौधा चमार रामजैसवार रमई कर
ु ल रमा दलारे
ु कोर परनमाल

जाटव,बलदे व संह,आय श पाकार,दगा
ु धानक
ु ,ह रालाल धानक
ु ,सकता जाटव, शवप त पासी
गोपीदास,सरखट
ु क,कंधई धु सया,पंचान द धु सया,भोलानाथ खट क,रामसेवक राउत,मेवाराम
धानक
ु ,क हैयालालवाि मक ,ह र सं ह जाटव, व वनाथ साद कजड,लालजी महार,रामसेवक राउत
महावीर हैला आ द अनेक अनजान अमर शह द अपने जीवन का ब लदान कर दये आजाद के
लये पर तु इ तहासकारो ने इनके साथ दोयम दज का यवहार कर अपनी मान सकता का प रचय
दे दया ।

आजाद के साठ साल के बाद भी द लत वं चत समाज आज भी तर क से बहत


ु दरू है ।सचमच

यह च तन का वपय है एवं दोयम दज का यवहार तथाक थत उ च समाज क घ ृ णत
मान सकता का प रचायक भी है ।
आमजन क आंख म चमक दे खनी है । आजाद के असल सपने को परा
ू करना ह तो नीिज
वाथ से उपर उठना होगा । दा य व एवं दे श धम पर खरा उतरना होगा ।समानता के भाव को
वक सत करना होगा । जा तवाद ख म करना होगा ।गर बो को रोजगार के साधन उपल ध कराना
होगा। श ा एवं समु चत रोजगार के ब दोब त करने होगे ।द लत वं चतो श तो को सरकार
एंव गैर सरकार सं थान म ाथ मकता के आधार पर रोजगार उपल ध कराना होगा । भू मह न
े◌ा तहर मजदरो
ू को खेती क जमीन दे ना होगा । सामािजक बराईय
ु को एकदम से ख म करना
होगा।सीमा ववाद को ख म करना होगा ।स ताधा रय को बना कसी भेदभाव के आमजनो क
सम य का नराकरण करना हो । तभी आमजनो क आंख म चमक आ सकेगी और अमर
शह द क आ माय वहस पडेगी । अगर ऐसा नह हआ
ु तो वं चत द लत शो पत पी डत समाज
मलभत
ू ू ज रतो एवं तर क से अलग थलग पडा बार बार सवाल कहता रहे गा आजाद के बते
साठ साल हम द लत वं चत कब तक रहे गे बेहाल ․अं ेजो के खनी
ू जबडे◌ा◌ं से हा सल वत ता
का हर आमजन गर ब शो पत वं चत स मान करता ह । वत ता क र ा के लये अपना
सव व यौछावर करने को तैयार है ।साथ ह वह याचना भर ि ट से सामािजक एवं आ थक
वत ता क राह ताक रहा है ।य द सामािजक एवं आ थक परत ता से वं चत खे तहर भू मह न
मजदरो
ू को वत ता मल जाती ह तो सचमच
ु भारतीय इ तहास म ह नह हर आमजन के
33
दल यह वत ता अं कत हो जायेगी । वत ता के इतने बरस के बाद भी दे श म सामािजक
कु यव था,अंध व वास, पंच,साम ती शोपण वग और वण भेद का भयावह प अठखे लयां कर
रहा है ।इन बराइय
ु के दमन के लये कोई आगे नह आ रहा है ।सामािजक कु यव था से वं चत
समाज आज भी झलस
ु रहा है ।अ भश त समाज और आम संघपरत् आदमी क अ तवेदना को
कोई सनने
ु वाला नह ह वत ता ाि त के इतने बरस के बाद भी ।काश वं चत समाज
आमजन /गर बजन सामािजक-आ थक अ धकार के समथन म कोई मसीहा अरब क भीड से उठ
खडा हो जाता ।

वामी ववेकान द ने भी आमजन क ददशा


ु दे खकर पीडा का एहसास कया था उ ह के श द
म-जब म गर ब के बारे म सोचता हंू तो मेरा दय पीडा से कराह उठता है ।बचने या उ◌ुपर
उठने का उनके पास कोई अवसर नह है। वे लोग हर दन नीचे और नीचे धंसते जाते ह । वे
नद ी समाज के वार को नर तर झेलते जाते ह । वे यह भी नह जानते क उन पर कौन वार
कर रहा ह,कहां से कर रहा ह । वे यह भी भल
ू चक
ु े ह क वे वयं भी मनु य ह । इन सबका
प रणम ह गलामी
ु ।दभा
ु यबस वत ता के इतने बरस के बाद भी गर ब वं चत खे तहर
भू मह न मजदरो
ू वह जहर आज भी पीने को मजबरू है ।

हमारा दभा
ु य ह है क आज भी दे श मे रा या है एक दशाह न मु दा बना हआ
ु है । यहां के
लोग जा त धम के नाम से जाने पहचाने जाते ह ।रा तो दोयम दज का होकर रह जाता ह ।दे श
बनता ह सं कृ त ,पर परा◌ाओं और दे श के नवा सय क असं द ध न ठा से पर दे श के
नवा सय म सव थम न ठा तो जा त धम के त तीत होती है इसके बाद रा र का म
आता है । इस मनोदशा को बदलना होगा सम ृ दशाल और साम यवान भारत क रचना करनी
होगी । वत भारत,आ म नभर के इतने बरस के गौरवमयी इ तहास पर खन
ू के छ ंटे आज भी
वराजमान है, कछ
ु कराहे ह,शो पत वं चत आमजन आज भी जीवनयापन के साथ आ म स मान
के लये संघपरत ह, िजनक कराह दे श क नींद म आज भी दा खल है । भ ाचार, वाथ,
महंगाई,गर बी जा तवाद धमवाद, ,संघपरत् आमजनो भू मह न खे तहर मजदरो
ू क दयनीय दशा
को दे खकर जबान पर बरबस ह आ जाता है - जा तवाद से अ भशा पत शो पत पी डत वं चत
जनता से बहत
ु दरू है आजाद आज भी ।
न दलाल भारती

34
॥ धम प रवतन पाप है ․․․․․ या․․․․․ ?॥

धमा तरण पाप है , म म डालकर कनारा कर लेना या पाप नह धम के नाम पर अ याचार


सहना या अपराध नह मान स मान क अपे ा करना पाप है । धमा तरण पाप है का नारा दे ने
वाल क नजर म सचमच
ु पाप है तो वे या कर रहे ह बखि डत समाज को एकता के सू म
बांधने के लये । या वे सामािजक समरसता था पत करने के लये चौथे दज को सामािजक
समानता का हक दये है- नह ं न․․․ चौथा दजा आज भी सामािजक समानता के लये संघपरत्◌ं
आ थक तंगी से भी जझ
ू रहा है । या चौथे दजा मानवीय समानता का हकदार नह है या उसक
ह क मत म ह आंसू से रोट गील करना ह लखा है कब तक आबाद के इस बडे ह से को
अंधेरे म रखा जायेगा , कब तक वकास से दरू रखा जायेगा । धम प रवतन पाप है कहकर हाथ उपर
उठा लेना अथवा इसके खलाफ कानन
ू बना दे ना समाधान नह है ।धम प रवतन आजाद के पहले भी
हआ
ु है , आजाद के बाद भी हो रहा है । धम प रवतन अ य धमा◌े क बजाया ह द ू धम म अ धक
हआ ु है । धम प रवतन से धमाधीश त नक वच लत हए ु ह । धमा तरण य हो रहा ह । सम या
के समाधान के लये आगे नह आ रह है । नतीजन सामािजक असमानता, भेदभाव, ढवा दता एवं
कर
ु तयां क जडे आज भी गहराती जा रह ह और धमा तरण भी हो रहा है◌ै । धमाधीश/ स ताधीश
स ता सख
ु का उपभोग करते हए
ु आरोप यारोप लगाने के सवायकछ
ु भी नह कर रहे है । धम
प रवतन के लये वे मशन रय को कसरवार
ू ठहराकर अपने फज क इ त ी मान लेते है । कछ

35
कसरू धमप रवतन करने वालो के सर भी मढ दया जाता है क वे वदे शो खैरात के लये धम
प रवतन कर रहे है। जब क धम प रवतन का धन क लालच से त नक भी स ब ध नह है ।
धमप रवतन तो सामािजक समानता क यास है ।

कहा जाता है क धम प रवतन ह द ू सं कृ त और दे श के लये घातक है । धमप रवतन क च ता


करने वाले धमाधीश स ता सख
ु के उपभोग के अलावा और या कये है धम प रवतन करने वाले
आ दवा सय और द लत के लये । या धम के इ तहास म कोई फेर बदल कर पाये है । दे श के
सं वधान म बार बार संशोधन हो जाता है तो या धम के सं वधान म सामािजक एवं रा य एकता
के लये संशोधन नह कया जा सकता धमाधीश/ स ताधीश धमा तरण के कारण पर गहन
च तन मनन य नह करते धमानतरण पर रोक लगाने क बजाय जा तवाद,अ याचार,शोपण, एवं
सामािजक बखि डता के खलाफ धा मक कानन
ू य नह लाते । या चौथे दज को दास बनाये
रखना ह धा मक कानन
ू बना रहे गा । या इसम संशोधन क कोई गंज
ु ाईश नह मानवा धकार पर
अ त मण आद मयत के खलाफ है,कानन
ू भी इजाजत नह दे ता । धमा तरण पर तब ध
मानवा धकार के व द है। या स दय से सामािजक पछडेपन ,भेदभाव का जहर पीने के लये
चौथा दजा तब द रहे गा व ान के यग
ु म भी सचमच
ु धमाधीश धमप रवतन से चि तत है तो
उ हे सामािजक असमानता के खलाफ जंग झेडना होगा । धमावलि बय के बीच जब तक अ य धम
क तरह सामािजक समानता था पत नह हो जाती तब तक धम प रवतन पर रोक लग ह नह
सकती । चाहे कतने ह कडे काननी
ू शकंजे म कसने क को शश क जाये, पी डत मान स मान और
आि मक सख
ु के

लये असमानतावाद धम क मोट द वार फांदकर समानतवाद धम क छांव तलाशता रहे गा । गव से


कहो हम ह द ू है अथवा धमप रवतन पाप है के नारे का चौथे दज के लये तब तक कोई औ च य
नह है जब तक धमाधीश उसे समािजक समानता का परा
ू अ धकार नह दे दे ते । यह व त क मांग
भी है ।
न छल मन से पडताल क जाये तो यह पाया जा सकता है क चौथे दज को ह द ू माना ह नह
गया उसे तो बस सेवक दास या गलाम
ु के अ त र त और कछ
ु नह समझा गया ।उसके साथ अ याय
सदा ह हआु है । अ धकार ◌ंवं चत रखा गया यहां तक क धा मक अनु ठान से भी दरू रखा गया
।उसे ह न ि ट से दे खा गया ।इसी वजह ने समाज को बखि डत कर दया है। समाज सवण अवण
, ज अ ज म बखि डत हो चका
ु है । धमा तरण चौथे दज के लोग ह कर रहे है । ना जाने कस
यग
ु से िजनके परख
ु क ह ड◌ृडयां दे श क माट म मलती आ रह है ,वह दोयम दज के होकर रह
गये है। ज रत है जातीय एक करण क एवं जा त वह नता क ।जा त वह नता ह धम को मजबती

दान कर सकती है बशत धमाधीश इस स चाई को समझे◌े।

36
धमा तरण पाप है या धम क आड म होने वाले अ याचार,शोपण,जु म,आदमी को बांटने का
पणय जा तवाद,भेदभाव है । दे खना ये है क धमा तरण को पाप कहने वाले धमाधीश/स ताधीश
सवसमानता का धा मक अ यादे श कब जार करते है और कतनी ईमानदार से पालन करते ह।
न दलाल भारती

॥ टटता
ू प रवार बखरती आस ॥
इ तहास गवाह है क आदमी आ दम यग
ु से समहो
ू म रहता आ रहा है चाहे वे गफाओं
ु मे रहा हो
,जंगल म रहा हो या झोप डय म। स यता के वकास के साथ आदमी झोप डय से नकलकर घर
बडे बडे महलनमा
ु वातानक
ु ु लत घर म रहने लगा है । समह
ू म रहने क व ृ त प रवार क जननी है
। भम
ू डल यकरण एवं सचना
ू ाि त के इस यग
ु म दे शो के बीच क द ू रयां तो कम हई
ु है पर तु
र त के बीच द ू रयां बढ रह है ,िजसक वजह से संयु त प रवार टटने
ू लगा ह और बढेू मां बाप क
आंशाय बखरने लगी है ।वे खद
ु को असरु त महसस
ू करने लगे है ।वतमान यग
ु म एकल प रवार
का चलन तेजी से बढ रहा ह । पैतक
ृ यवसाय का जमाना नह रहा । ब चे अपनी मज के
अनसार
ु रोजगार अपना रहे है । इस लये वे पैतक
ृ घर से दरू वे अपना संसार बसाने लगे है,िजससे वे
र त स बि धय ,इ ट म ो पा रवा रक आ मीय जन से दरू होते जा रहे ह और संयु त प रवार टटने

लगा है । संयु त प रवार टटने
ू का खा मयाजा बढेू मां बाप और ब च को भगतना
ु पड रहा है । मां
बाप तो बेसहारा हो ह रहे है ब चे भी मानवीय र त क उ मा और नेह से दरू होते जा रहे है
जब क सयंु त प रवार म सहज ह मानवीय गण
ु और नै तक दा य व का वकास हो जाता था ।
आज इ ह मानवीय एवं नै तक गणो
ु के लये श ण के क मदद ल जा रह है । श ण भी
उतना असरकारक नह सा बत हो पा रहा है िजतना असरकारक संयु त प रवार का माहौल होता था ।
आज का ब चा दादा-दाद काका-काक ,फआ
ु -फफा
ु ,नाना-नानी,मामा-मामी आ द र त के सोधेपन से
अप र चत हो रहा है । उसके कंधे पर भी िज मेदा रय का बोझ डाल दया गया है। कूल क छु टयां
होते ह श ण या समर लासेस के लये भेज दया जाता है ता क ब चा गनीज बक
ु आफ व ड
रकाड म नाम दज करा ले । संयु त प रवार क टटन
ू क वजह से ब च का बचपन खोता जा रहा
है जो कसी न कसी अनहोनी का योतक है ।संयु त प रवार क टटन
ू से◌े यवाओं
ु क जीवन शैल
म अनेक बराईय
ु ने जगह बना लया है । धू पान म दरापान अनै तक स ब ध जैसी बराईयो
ु के
चंगुल म वे फंसने लगे है,आचरण वह न एवं अमया दत रहने लगे है । सां कृ तक एवं नै तक मू य ,
पर पराओं आदश आ द को भला
ू रहे है ,िजससे प रवार जैसी प व एवं ति ठत सं था का दम
घटने
ू लगा है ।आज बजग
ु ु हा शये पर आ चक
ु े है। मांता पता का ह त ेत बदा त नह । पा चा य
जीवन शैल एवं भौ तकता क चकाचौध ने इस कदर अंधा बना दया है क मांता पता का ह त ेप
और मया दत जीवन पस द नह । उपे ा के शकार मजबरू मां बाप व ृ दाआ म/अनाथ आ म तक
के दरवाजे खटखटाने को मजबरू हो रहे है ।

भारतीय सामािजक संरचना के अ तगत ् प रवार /संयु त प रवार का मह वपण


ू थान रहा है ।
भारतीय समाज प रवार पत ृ स ता मक एक प व सं था ह जो संयु त प रवार क नींव पर टका
37
है । जहां जीवन के हर े म प रवार क नणायक भू मका होती है । प रवार म सभी एक के लये
और एक सभी के लये होता होता ह । प रवार के लोग संग ठत प से रहते ह । हरे क दख
ु सख
ु म
काम आते है । प रवार के बीच आपसी सहयोग,सहानभ
ु ू त समपण का भाव होता है पर तु आज वह
संयु त प रवार टटन
ू का शकार है । ना जाने कसक इस व थ पर परा को नजर लग गयी है ।
संयु त प रवार क टटन
ू के लये यवाओं
ु को ह दोपी कहना उ चत न होगा । अ भभावको का भी
नै तक कत य बनता है क वे अपने ब चो से म वत ् यवहार कर,नै तक मू य पा रवा रक
मू य ,संयु त प रवार के मह व/उपयो गता ,◌ं र त के
सोधेपन एवं मठास का अमतपान
ृ कराते रहे । यह अमतपान
ृ मानवीय र त को गाढता दान
करता है । धन स पदा का संचय ह जीवन नह है । स चा सख
ु तो सां कृ तक मू य का
संर ण,सदाचार,स भाव, मयादाओं का पालन एवं समानता का भाव और प रवार म मल बांटकर
खाने म है ।सह जीवन मू य से अवगत कराना आज हर मां बाप का परम ् कत य हो गया है ।
सामािजक वकास म बाधक प रि थ तय टाचार, अपराध, झल झठ
ू , वाथ, उपभे तावाद
सं कृ त,जा तवाद और धमा धता से दरू बनाते हए
ु य द बा यकाल से ह नै तक, समतावाद ,
सदाचार एवं सं कृ त के मू य ने ब च के दय म थान पा लया तो प रवार पी प व एवं
मया दत सं था को संकट के बादल नह ढं क सकते । आज का आदमी संवेदना वह न होता जा रहा
है । मां बाप क सेवा से औलादे कतराने लगी है । भाई -भाई म झगडा, नेह-सेवाभाव का अभाव
प रवार के बीच दरार पड रह है । इसका मु य कारण है व हत के पशाच का भयावह प धरना
है।

हमारे दे श म संयु त प रवार क था बहत


ु परानी
ु है । वह प व और स व ृ द था टट
ू रह
है।िजसके प रणाम अ छे नह आ रहे है । हं सक व ृ त, लालच, े प, वाथ, र त म दरारे आ द
प रवार वरोधी मान सकता म अ भविृ द प रवार,समाज एवं दे श को सखी
ु नह बना सकती । संयु त
प रवार का व ामीण भारत म तो आज भी दे खने को मल जाता है पर तु शहर भारत म तो
जैसे नामो नशान नह बचा है । रा क पहचान व थ एवं सस
ु ु कृत प रवार से होती है । िजस
प रवार म नेह,सेवा,स भावना,आदर स मान एवं सहयोग क भावना होती है नि चत प से वह
उपर उठता है ।संयु त प रवार सामािजक स ब ध और सस त याय क इकाई के प म तथा
बढापे
ु और बेरोजगार के वपर त बीमा का भी काम करता है। ज रत है इस प व सं था को बचाने
क तभी भारतीयता के सोधेपन क र ा क जा सकती है । जीवन का चतथ
ु काल गजार
ु रहे बजग
ु ु
भी असरु त नह महसस
ू करगे । वे प रवार के अतमह वपण
ू अंग है । मां बाप को बेसहारा अथवा
अनाथ आ म मे पटक कर क गयी तर क कभी भी सखदायी
ु एवं फलदायी नह हो सकती ।
संयु त प रवार के मह व को समझ कर पव
ू मुखी बने रहने◌े क आव यकता है न क
पा चा यमखी।
ु पव
ू मुखी भाव से ह ं प रवार,समाज और दे श सखी
ु हो सकता है । दे श एवं समाज
को सखी
ु एवं सु ढ बनाये रखने के लये आव यक है क मौ लक,सावभौ मक एवं प व सं था
संयु त प रवार को बचाने का अटल यास कया जाये । यक नन यह यास टटते
ू प रवार और
बजग
ु ु मां बाप क बखरती आस के लये ाणवायु सा बत होगा ।
38
न दलाल भारती

॥ रा य एकता म जन एवं समाज हत न हत ॥

भारतीय समाज स व ृ द एवं अ त ाचीन समाज है पर तु दन पर दन छोट होती द ु नयां के यग


ु म
भी सामािजक बीमा रय से घरा हआ
ु है ।सामािजक कु थाओं को बेअसर करने के लये जन श ा एवं
जनजाग ृ त अ भयान क आव यकता है िजससे तथाक थत बडे एवं छोटे के भेद के जहर को दल से
नकाल कर, आद मयत पी गंगाजल से दल को साफ कर, समता एंव स भावना को हर दल म
ति ठत कया जाये ।िजससे हर आदमी आदमी होने का सख
ु भोग सके ।
यह तो मा णत ह है क जा त का वग करण पवू काल म पेशे के अनसार
ु हआ
ु है।पेशे म भ नता
का होना भी ज र है ता क ेणीब द और तर के से काय का संचालन होता रहे ।वतमान म पव ू काल
का वग करण जा त बन चका
ु है और इस जा त ने भयावह प धर लया है । आदमी आदमी म
भेदभाव क द वार खडी हो गयी है । कोई तो इस कदर जा तवाद से अ भशा पत हो गया है क आज
भी उसके छने
ू से आदमी को अप व होने का खतरा है। जातीय ववाद तो वशेपा धकार क वजह से
हो रहा है । कछ
ु वशेपा धकार ा त जा त के लोग न न कम के वावजद
ू बडे माने जा रहे है।
वशेपा धकर से वं चत लोग े ठ कम करने के वावजद
ू न न ेणी के ह माने जाते है । ाहमण के
घर पैदा अ श त यि त ाहमण कैसे हो जाता है । ीय के घर पैदा ीय कम से दरू रहकर
ीय कैसे बना रहता है अथवा वै य के घर पैदा वै य का कम न कर वै य कैसे बना रहता है ।शू
के घर पैदा यि त को ाहमण, ीय अथवा वै य का कम करने के बाद भी उसे श◌ू
ू को बनाये
रखा जाता है ।वतमान यग
ु म ज रत है अ त ाचीन ज म आधा रत बंटवारे को जो अब जातीय भेद
का ढ प अि तयार कर चका
ु है उस जा तगत ् व प को ढहाकर एक व थ और समतावाद
समाज बनाने क । भले ह पेशागत बंटवारा हो पर यह बंटवारा ज म आधा रत अथात जा त का प
ने धरे हर यि त को नया पेशा चनने
ु का अ धकार हो जैसा क आज चलन म भी है । अब तो बस
ज रत ह जा तवाद के अभे य कले को ढहाने क िजससे व थ,स प न और समतावाद समाज क
थापना हो सके । भम
ू ल यकरण के इस यग
ु म जा तयता अथह न हो चका
ु है जा त के नाम पर
कछ
ु बचा है तो वह है अहंकार । हमारा कत य हो गया है क समटती द ु नया के साथ कंधा से कंधा
मलाकर चले,इंसान के साथ इंसा नयत का फज नभाये और झठेू अंहकार के मखौटा
ु न चकर फक दे

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oतमान समय म वाथ क व ृ त ने नेताओ को इस कदर घेर लया है क उ हे ◌े अपने भला के
अलावा दे श और समाज क जरा भी च ता नह है ।वे राजनै तक और सामािजक मखौटे
ु का भरपरू
दोहन कर रहे है । मखौटा
ु न चकर फकने क वजाय वे घडी घडी बदलने लगे है। इस बदलाव से तो
दे श और समाज का भला तो हो ह नह सकता ।सामािजक स ताधीश भी पीछे नह है । सामािजक
नेता हो या राजनै तक,नेता का अ भ ाय तो ये होता है क वे दे श और समाज के क याण के लये
जीये और मरे ।समाज को बराईयो
ु से बचाये,मानवीय समानता रा य एकता कायम करे और
आमजन के हताथ काम करे ।

समाज और दे श के उ थान के लये ऐसे ह नेताओ क ज रत है । अवसरवाद अगवाई


ु चाहे
सामािजक हो या राजनै तक कभी भी फायदे मंद नह सा बत हो सकती ।दे श और समाज के उ थान म
अडचने ह खडी कर सकती है ।नै तक नींव पर राजनी त सफल और हतकर सा बत हो सकती है
।जा त भेद या वण भेद उ न त म बाधक है । बंटवारे ,दं गे फंसाद एवं अ य वकृ तय क जननी है
जा त भेद ,वण भेद और धा मक उ माद। सरकार के साथ समाज का भी कत य बनता है क वह
जनसाधारण के उ थान के लये आगे आये ,िजससे गर ब वं चत तर क कर सके ।अपने पांव पर
खडा हो सके तथा उनके अ त न हत स भावनाओ का सु म अ ययन कर उ हे यापार,वा ण य,कृ प
तथा अ य रोजगारो मुखी श ा द जाये ता क वे आ म नभर बन सके। गर ब वं चत लोग भी
वकास क मु य धारा से जड
ु सके ।सहानभ
ु ू त,क णा और मै ी के वातावरण म समाज और दे श
तर क कर सकता है , आशानकल
ु ू भारत क क पना नह क जा सकती ।समय क मांग है सभी
को एक साथ नकल पडने क -चाहे वह मजदरू हो मा लक हो अमीर हो गर ब हो सव एकता म ह
भारत का भ व य सरु त है । रा य एकता म ह जन एवं समाज हत न हत है । ज रत है
समानता,समाज एवं दे श हताथ तब द होने क ,तभी समाज और रा सबल एवं उ न त कर
सकता है।
न दलाल भारती

॥ आतंकवाद क जड पर हार॥
इंसा नयत के द ु मन अपने घनौने मनसब
ू को इंजाम दे ने म कोई कोर कसर नह छोड रहे है ।
दे श आतंकवाद का दं श झेलने को मजबरू है । एक घाव सखता
ू ह नह तब तक दसरा
ू हो जाता
है । इंसा नयत के द ु मन के हौशले बढ जाते है । वे कसी नई दघटना
ु को इंजाम दे ने म जट

जाते है । न ये उठता है क या खु फया त और सरु ा यव था के लये िज े◌ादार
सं थाये चौकस यो नह होती है , इंसान और इंसा नयत का खन
ू बहने के बाद ।कब तक
इंसा नयत के द ु मन लहू से नहाते रहे गे ।स य मानव समाज को कब तक भय के आतंक मे
रखकर खनीू कारनाम को इंजाम दे ते रहे गे । वनाश का पयाय आतंकवाद कब तक धरती को लाल
करता रहे गा ये अब सवाल हल क ओर अ सर होने लगा है य क धमगु ओ ने भी आतंकवाद
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ग त व धय के खलाफ जाग कता अ भयान छे ड दया है ।अ प सं यक समदाय
ु के बु द लोग
पर आरा◌ोप लगता रहा है क वे आतंकवाद ग त व धय का वरोध करने म पीछे रहते है ।
उ तर दे श के इमाम व धमगु ओं ने आतंकवा दय के खलाफ जाग कता अ भयान क शु वात
कर द ु नया को संदेश दे दया है क वे भी आतंकवा दय के खलाफ है ।धम के नाम पर
आतंकवाद को प रभा पत करने वाल क जबान पर ताले जड दये है । वैसे यह काम उ हे बहत

पहले ार भ कर दे ना था खैर यह पहल वागतो य है ।

उ तर दे श के इमाम व धमगु ओं ने आतंकवा दय को यह बता दया है क वे धम के नाम पर


दे श वरोधी आतंकवाद ग त व धय का समथन नह करते। धम को आतंक के साथ जोडकर दे खने
वालो के लये धमगु ओ बु दजन का आतंकवाद के खलाफ यह शंखनाद आतंकवाद क जड पर
हार माना जाना चा हये । उ तर दे श के इमाम व धमगु ओं का यह संदेश आंतकवाद
ग त व धय के खलाफ यक नन मील का प थर सा बत होगा । बु द जन के आतंकवाद
ग त व धय के खलाफत से आद मयत वरोधी बौखला तो गये होगे पर लगता नह क उनक
बौखलाहट अब इमाम व धमगु ओं को पीछे ढकेल सकती है यो क इमाम व धमगु ओं ने अपनी
मु हम तेज कर द है ।उधर सरु ा बल के सहयोग से ल कर-ए-तोएबा, हजबल
ु मजा
ु हद न एवं
जैश के कछ
ु शीप कमा डरो के सफाया म सफलता पाने वाल ज मू क मीर पु लस आतं कय क
लाइफ लाइन ख म करने क रणनी त बना रह है । इस रणनी त के तहत ् आतं कय को उनके
सहयो गय से मलने वाल मदद को ब द करने का यास कया जायेगा । यक नन सरु ा बल
क यह रणनी त आतंकवाद से उबरने म मददगार सा बत होगी ।
आतं कय के मददगारो पर काबू पाकर आतंकवाद से नपटा जा सकता है । सरु ा बल का
शाि त क दशा म यह काय सकन
ू तो दान करता है और आतंकवाद क बढती ग त व धय पर

शकजा भी कसता है । इस रणनी त से छपकर आतं कय का मदद करने वाले ह तो सा हत होगे
और वे आतं कय को दे श और समाज क तर क से जोडने का यास करे गे । जब छपकर
आतं कय का सहयोग करने वालो पर लगाम कस जायेगी तो आतंकवाद सरे डर कर दे गे या
सरु ा बल के शकार बनेगे ।

आंतकवाद ग त व धयां दे श के वकास म सबसे बडी बांधक ह । इन ग त व धय पर रोक लगाने


के लये जन जागरण क आव यकता है । द ु नया का हर अमन पस द आदमी आज खौफ म जी
रहा है । उसे मौत से डर नह है । मौत का आना तो नि चत है पर मौत और बबाद के तर क
से वह खौफ मे है । इस खौफ से उबारने के लये त र है क द ु नया भर के लोग लामब द हो
और आतंकवा दय के मकाबले
ु के लये आगे आये । धम गु बु द जन आमजनो के साथ खडे
हो जनसभाओं के मा यम से आतंकवाद के व द मु हम जार करे । आतंकवा दय को मदद करने
वालो के दोगलेपन पर चोट कर । आतंकवा दय को मु यधारा म लौटाने हे तु धा मक एवं मा मक
अपील जार करे ।इससे आतंकवा दय का दय प रव त त होगा और वे ह थयार से तौबा कर दे श
एवं समाज क तर क के लये काम करे ◌े◌ंगे । आमजन,धमगु ओ, बु द जनो, सरकार एवं

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सरु ा बल क संयु त मु हम से आतंक ग त व धय क जड पर जबद त हार कर आतंक के
पशाच का दमन कया जा सकता है बशत सभी अपने फज पर खरे उतरे तब ना।
न दलाल भारती

A। रा -धम वकास के लये आव यक ॥


जा त धम के नाम बखि डत समाज या रा धम को धम क भां त नह अपना सकता रा य
एकता के नाम पर बडे बडे भाषण और बडे बडे काय म तक आयोिजत होते रहते है और लोग कसम
भी खाया जाती है पर तु जहां जा त धम क बात आयी सार कसम भल
ू जाती है ।लोग एक दसरे

को अपना द ु मन समझ बैठते है । खंजर पर धार दे ने लगते है या कोई जा त या कोई धम
रा धम से बडा हो सकता है । गौर करने वाल बात है क रा य एकता म ह धम क आ मा
वरािजत है,इसके बाद भी दे श क अख डता तोडने के यास होते है । रा य स प त क होल
जलाई जा रह है । े ने रोक जा ररह है पट रयां खोद द जा रह है या यह रा के त दा य व
का नवहन है । ब कुल नह ․․․ पहले हर नाग रक को रा धम को आ मसात ् करना चा हये ।य द
दे श के उ थान म व हत, धा मक मा यताये अथवा धम द वार खडी करता है तो ऐसी द वारे ढहा कर
रा य एकता क द वार खडी करनी चा हये । धम दसरे
ू थान पर होना चा हये थम थान पर
रा धम होना चा हये ।इसी भावना म जनक याण न हत है।दे श का उ थान न हत है ।
दे खने म आता है◌े है त नक अनजाने भी कसी धमावल बी क आ था को ठस पहंु ची तो खंजरे खींच
जाती है । दे श धम एक दे श का वासी होने के नाते दसरे
ू के त अपने कत य भल
ू जाते है बस याद
रह जाता है अपना धम अपनी जा त और नकल पडते है दे श क स प त जन-स प त के वनाश क
राह पर सफ अपने को बडा सा बत करने के लये । या इसे धम के साथ जोडना उ चत है । धम के
त आ था बनाये रखना अ छ बात है पर अंध भि त तो बरु है ना․․․हम रा य एकता को धम
मानकर चलना चा हये । जनक याण को धम मानकर अपने फज पर खरा उतरना चा ह◌ेये । य द
हम दे श और जनक याण क स भावनाओं पर खरे उतरते है तो सचमच
ु रा के उ थान म सहभागी
बन रहे है । हमारे त भी लोग आ थावान बनेगे ।खद
ु को द न द ु खय और दे श का स चा सपत

बनने के लये वाथ से उपर उठना होगा । ववेकान द ने कहा है-परोपकार ह धम है परपीडन पाप
।शि त और पौ ष पु य है ,कमजोर और कायरता पाप । वत ता पु य है पराधीनता पाप । दसर

से ेम करना पु य ह दसर
ू से घणा
ृ करना पाप ।परमातम म और अपने आप म व वास पु य
है,संदेह ह पाप है। एकता का यान पु य है ,अनेकता दे खना ह पाप है ।
आजाद दे श म रहकर य द जा त धम के मु दे पर बखि डत रहे एक दसरे
ू को अपनी राह का कांटा
समझे तो यह न तो अपनी धा मक आ था के त समपण है और ना ह दे श के त । यह
बख डन का भाव रा य एकता क गांठे ढ ल करता है । हम एकता क राह से भटक कर पाप के
भागी बनते है । रा धम को भलना
ू बडा पाप है रा वा सय के त अ याय भी ।रा य एकता
द शत करने के लये हम रा धम के त आ थावान बनना होगा । रा के त आ थावान बने
42
बना न तो धम क सरु त रह सकता है और ना आवाम । इस बात का इ तहास भी गवाह है । दे श
को कतने आतंक झेलने पडे है । दे श गलामी
ु का भी दं श झेला है । धम मानवता का पाठ पढता है ।
बहजन
ु हताय बहजन
ु सखाय
ु क भावना से ओत ोत होता है । य द ध मक आ था के साथ रा य
आ था को स मान दया जाये तो इससे नाग रक एक दसरे
ू के त वफादार होगे और रा धम क
नींव भी मजबत
ू होगी । मनु य और रा एक दसरे
ू से अलग रहकर अपना अि त व कायम नह रख
सकते। वतमान बढते आतंकवाद को दे खते हए
ु आव यक हो गया है क हम रा के त आ थावान
बने । रा धम को अपनाना दे शवा शय के लये हतकार होगा। धा मक आ था के नवहन से पहले
ज र हो गया है क हर नाग रक सव थम रा धम के त आ थावान बने धम और रा य एकता
जैसे अ य धक मू यवान श द का खजाना जबानी लटाते
ु रहे तो कछ
ु नह होगा । इन श द क ाण
त ठा सबसे◌े पहले हम अपनी अ तरा मा म करनी होगी । रा य एकता के लये रा धम को
अपनी आ था से सींचना होगा। ऐसा मनोभाव रा य एकता म मील का प थर सा बत हो सकता है
तो य न हम धा मक मं दर मि जद और ग रजाघर क आ था के साथ बंधे रहकर भी रा धम
के स भावना क ाण त ठा कर जो रा य एकता के लये ज र है रा धम। अमन शाि त और
चहमखी
ु ु वकास रा धम म समा हत है तो या रा य एकता के लये धा मक द भ और ढय
का प र याग करने के लये तैयार है
न दलाल भारती
10․0608

॥सा ह य मानवता के वकास या ा क गवाह ॥

सा ह यकार क दशा से भले ह सरकार बेखबर हो, पाठक दरू भाग रहा हो पर सा ह यकार
सम या त रहते हए
ु भी सजन
ृ कम से बमखु नह हआु है । सा ह य जगत मिु कल के दौर से
गजर
ु रहा है और सा ह यकार पेट पर प ट बांधकर अपना धम नभा रहा है ।ट वी इ टरनेट आ द
आधु नक संसाधन ने सा ह य क जमीन पर क जा जमा लये है ।उ बोधन और बोधन के थान
पर फहड
ु और स ता मनोरं जन परोसा जा रहा है ।इन मनोरं जन के साधनो ने जनमानस म इतनी
गहर घसपै
ु ठ बना लये है क वे ता का लकता पर भरोसा कर बैठे है क क पना और सजन
ृ का कोई
मोल ह नह रहा । आज का आदमी सा ह य से दरू जाता नजर आ रहा है । ट ․वी और इ टरनेट के
मोह म फंसे लोग अ छ तरह से जानते है क इनका भाव अ थायी होता है ।कछ
ु मामल
हा नकारक भी हो जाता है जब क सा ह य पर पराओ का संवाहक है । रचनाशीलता का उ गम है।
दरू ि ट है साथ ह व थ मनोरं जन का भी साधन है ।स यता का प रचायक है ।इ तहास का
ह ता तरण है । सा ह य भावा मक जडाव
ु पैदा करती है । सा ह य म यथाथ होता है । छलावे और
भलावे
ु का संसार सा ह य नह होता ।सा ह य थकान च ता णाव था म दवा का काम करता है
।सा ह य दल और दमाग पर क जा तो करता है पर तु वक प और चयन के या त अवसर भी
सलभ
ु करवाता है ।वह ट वी पर सा रत होने वाले धारावा हक बेचैनी दे रहे है । घर पर व◌ार को

43
तोडने का काम कर रहे है । जब क इले ा नक मा यम से भु व और दासता क गंध आता है वह
दसर
ू ओर सा ह य साहचय और मै ी भाव म अ भविृ द करती है ।

सा ह य संघष अ छे बरेु अनभव


ु का द तावेज है जो यि त को सदकम पथ पर चलने को उ े रत
करता है ।सा ह य एक च क सा णाल है जो याि त को व थ मान सक शि त दान करती है
शार रक वा थ के ि ट से भी बहत
ु उपयोगी है ।आज सा ह य और सा ह यकार संकट के दौर से
गजर
ु रहे है , इसके बाद भी कताबे छप रह है कताबे बकता है या नह बकती है इस बात क फ
से परे सा ह यकार अपना धम नभा रहा है भले ह पाठक न नभाये इले ार नक मा यम के मोह
म फंसकर । इले ा नक मा यम को उपयोग करे पर उसक लत न पडे इस फ से सा ह यकार
जझ
ू रहा है ।उसे अपनी च ता नह है उसे तो च ता है व थ समाज क । जो कल को व थ रख
सके । इले ार नक मा यमो से जो अ ल लता परोसी जा रह है यक नन हमारे व थ समाज को
बीमार बना दे गी । कताबो बस दे ती जाती है ।इसके बाद भी पाठक दरू जा रहा है । है। सा ह य
मानवता क वकास या ा का गवाह होता है पाठक का कताबो से दरू जाना और सा ह य जगत पर
संकट के बादल छाना समाज के लये शभ
ु संकेत तो नह कहा जा सकता ।
ान व ान,सामािजक, आि◌◌ाथक और नै तक वकास म सा ह य मील का प थर सा बत हआ ु है
आज उपे ा का शकार है । यह उपे ा ब च म सं कार वह नता का बीजारोपण कर रह है ।इसके
लये इले ा नक मा यम क तडक भडक को ठहराया जा सकता है ।मेरा मकसद इले ा नक
मा यम का ब ह कार नह है बि क ता का लक उपयोग करने भर से है य क इले ा नक मा यम
जो चमक मानव मन पर छोड रहे है । वे लाभकार तो नह

हा नकारक बहत
ु अ धक सा बत हो रह है । ब च का ब दक
ू लेकर कूल जाना । क ल तक कर
दे ना ू र हं सक होते लोग ।दे ह का खला
ु दशन,अ ल ल प रधान एवं अ य असामािजक कृ त व।
या यह इले ा नक मा यम क सीख नह है । स सा ह य कभी भी ऐसा स ता मनोरं जन नह
उपल ध करवाता । सा ह यकार अपने नै तक दा य व से बंधा होता है ।जब वह सा ह य सजन
ृ करता
है तब वह अपना आ थक प मजबत
ू करने क नह सोचता वह व थ समाज का प धर होता है
।उसक क पना शि त, उसका लेखन कम समाज के हताथ सम पत होता है ।याद रखने वाल बात
है इले ा नक मा यम सफ अपनी तजोर भरने के लये अ ल लता पर चांद पर चांद का क
लगाकर परोस रहे है जो आ थक और सामािजक प से घातक सा बत हो रहा है ।
समय आ गया है क इले ा नक मा यम से परोसे जा रहे मनोरं जन को स यता ,पर परा ब च
क हं सक होती वृ त
व थ समाज के न◌ामण हे तु और सामािजक आव यकताओ को दे खते हए
, ु
व थ मान सकता के तराजू पर तौला जाये । सा ह य जगत भले ह मिु कल से गजर
ु रहा है उसे
उ मीद है संकट के बादल छटे गे । सा ह य से दरू जा इले ा नका मा यम क धप
ू म जा बैठा
दशक/पाठक सा ह य क छांव म ज र आयेगा। सा ह यकार अपनी ज रत को वाहा करते हए
ु दन
रात व थ समाज और व थ कल के लये सजनरत
ृ ् है । भले ह वह पेट म भख
ू लये हए
ु सा ह य
सजन
ृ कर रहा है पर तु वह नराश नह है य क मानवता क वकास या ा आशा और योग पर

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टक है। इस या ा को सफल और गौरवशाल बनाने के लये सा ह यकार ढसंकि पत है या आप
है․․․․․․․․

न दलाल भाररती
॥ आधी आबाद का दद ॥
भम
ू डल यकरण एवं दरसं
ू चार ाि त के यग
ु म भरणह
ू् या आधी आबाद के अि त व पर खतरा खडा
कर चक
ु है । पु मोह म बा लका ण
ू क ह या मां क कोख म क जा रह है । भरणह
ू् या ने
लं गानपात
ु म असं तुलन पैदा कर दया है। दे श म त हजार पु ष पर 927 म हलाये है।इस
ह या को बढावा दे रह है अ ासोनो ाफ तकनीक और ए सपट।सरकार लं ग पर ण को काननन

अपराध घो षत कर चक
ु है इसके बाद भी धडले से लं ग पर ण कर णह
ू याये हो रह है ।
भरणह
ू् या को लेकर बडी बडी चचाय-प रचचाय होती रह है ,अखबार म बडी बडी खबरे छपती है ।
भरणह
ू् या क च ताओ मे◌े◌ं समाज और सरकार दबी जा रहा है इसके बाद भी लं ग पर ण हो रहा
है। णह
ू या हो रह है ।य द भरणह
ू् या न होती तो लं गानपात
ु म अस तल
ु न कैसे होता । काननी

ावधान होने के बाद भी पर ण करने अथवा कराने वाल को सजा नह हो पा रह है । आधी
आबाद के साथ ऐसा अ याय होता रहा तो या पु ष समाज द ु नया को आबाद बनाये रख सकेगा ।
जनसं या का भय क या ण
ू को उकसा◌ाता है ऐसा कदा प नह है। इस ह या के पीछे पु मोह बंश-
पर पराओं एवं कु थाओं का हाथ है । वतमान म दहे ज था पी सामािजक बराई
ु भी क याभरणह
ू् या
के लये िज मेदार है । एक शोध के अनसार
ु सफ भारत म ह पछले 20 वषा◌े के दौरान एक
करोड क याभरण
ू् का क ल म क कोख म कर दया गया है । आ चय क बात है क पढे लखे लोग
ह इस तरह क ह या करवा रहे है और लालची जीवन दे ने वाले अज मे क या भरण
ू् का बध मां क
कोख म कर रहे है । ना जाने कस मजबरू मे मांताये◌◌
े ं वरोध म नह खडी हो रह है । स भवतः
यह वजह भी भरण
ू् ह या क खामोशी वीकृ त कह जा सकती है । आधी आबाद क अि त व क
र ा के लये आधी आबाद को आगे आना ह होगा बना आगे आये भरण
ू् ह या जैसे अपराध पर
रोक लगना क ठन काय होगा ।
सरकार जनसं या◌ा नय ण को ो सा हत कर रह है फर भी जनसं या विृ द म वशेष गरावट
नह आ रह है । आज बढती जनसं या सम या नह लग रह है । लगता है सम या आधी आबाद
बन रह है तभी तो भरणह
ू् या अपराध घो षत होने के बाद भी क याभरण
ू् ह या हो रह है और ी-
पु ष लं ग अनपात
ु के बीच अस तुलन पैदा हो रहा है । य द ऐसा अस तुल बरकारा रहा तो वह
दन दरू नह जब लडके के याह नह हो पायेगे अथवा बहप
ु त था का चलन हो जायेगा । यक नन
यह था मनु य जा त के वनाश का कारण होगी । ऐसे वनाश को रोकने के लये जनसं या
नय ण के अ य साधन का उपयोग करते हएु भरण
ू् ह या को रोकना होगा ।नार -पु ष अ धकार
समानता के लये काम करना ज र होगा ।य द क या णू ह या नह क तो पु ष समाज भी धीरे
धीरे अपना अि त व खो दे गा । लं गानपात
ु के स तुलन को बनाये रखने के लये ज र है क
भरणह
ू् या के अपराध पर वराम लगे । मां बाप पु मोह से उपर उठकर स तान मोह क लालसा रखे
चाहे वह स तान पु हो या पु ी पर भरण
ू् ह या जैसा अपराध न करने क कसम खाये◌े ।िजस घर
म बेट न हो उस घर म बेट के याह से परहे ज करना भी क या णह
ू या रोकने मे मददगार
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सा बत हो सकता है । स भवतः काननी
ू ावधान इस लये कामयाब नह हो रहे है क भरण
ू् ह या
एकतरफा नह हो रहा है इसम मां बाप दोनो शा मल है ।य द मां बाप म से एक भी इस ह या के
वरोध म उतर जाता तो ण
ू ह या क सकती है । इस ह या क रोक पर सामािजक समानता मील
का प थर सा बत हो सकती है य द समाज आधी आबाद को पु ष के बराबर का दजा दान करे दे ।
मनु य जा त को अपना अि त व कायम रखना है तो आधी आबाद के दद को हरना ह होगा और
भरण
ू् ह या पर पण
ू वराम लगाना हो होगा । इसके बना मनु य जा त के अि त व पर संकट के
बादल छाये रहे गे। यो․․․․ अि त व क र ा और भरण
ू् ह या जैसे जघ य अपराध को रोकने के
लये हमार कोई िज मेदार नह बनती न दलाल भारती

॥ बे टयां वा मभान क अ भविृ द है ॥


दसवीं के रज ट रहे बारहवीं के या अ य क ाओं के लड कय ने बाजी मार है । यक नन मां बाप
का अपनी बे टय क अ छ परव रश के संकेत है ।लड कयां अपने कठोर प र म ,प के इरादे और
मां बाप के ढ संक प क वजह से उ◌ू◌ंची उडाने भर रह है ।मकसद म कामयाब हो रह है ।बे टय
क यह कामयाबी मां बाप के वा भमान म अ भविृ द करती है ।
कभी कभी मां बाप बेट को बेटा सर खे कहते नह थकते ।हष का वषय है क मां बाप बेट बेटा म
समानता था पत कर रहे है पर तु इसम से छनकर एक बात और आती है क कह लडक को न न
तो नह माना जा रहा है । लडक को लडके सर खे मानना कसी न कसी प म लडक के त
अ याय तो ज र है ।आज लड कया अपने साहस और बिु द के बल पर उ च से उ च पदो पर पहंु च
रह है । व व समाज को भा वत कर रह है लडक को लडके जैसा संबोधन न नता तो ज र
दशाता है।ऐसा वचार तकह नता का प रचायक अव य लगता है । लडके लडक क परव रश श ा -
द ा,सामािजक और आ थक मु द पर वरोधाभास नह होना शभ
ु संकेत है । लडक को लडका
मानने का म तो टटना
ू है । उसे एक न एक दन यक न हो जायेगा क उसके मां बाप के मि त क
म वह मा क पनामा लडका थी।हमारा फज बनता है क हम अपनी बेट का मनोबल बढाये और
उसे एहसास कराये क वह का प नक प कां नह असल प अथात लडक होने का सख
ु भोग सके
गौराि वत हो सके ।पांवरवमन
ु बन सके ।

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गौरतलब बात यह है क बेट का लालन पालन बेटा मानकर करना उसके कल के लये खतरा बन
सकता है य क इसी बेट को आगे और भू मका नभानी है । बदलते समय के साथ उसक भू मका
भी बदलने वाल है- प नी क भू मका नभानी है मां क भू मका नभानी है ।यह सब तो वह लडका
के प म नह नभा सकती । लडका लडक के त समानता का रवैया अपनाना अ छ बात है पर
उनम म पैदा करना कदा प नह ․․․․․․․․हमारा फज बनता है क हम उनमे स गण
ु के भाव
भरे और उनके अि त व को वा मभान के साथ नखारे , नणय लेने क ताकत वक सत करे ।ज रत
पडने पर नह कहने का भी ज बा भरे ता क उनक पहचान लडका लडक के प म नह उनके गण

से हो ।यह पहचान हम मां बाप के वा भमान म अ भविृ द करे गी ।
इ तहास गवाह है ि य ने ी क भू मका म इ तहास रचा है चाहे महारानी ल मी बाई रह हो या
झलकार बाई,इि दरा गांधी रहो हो या क पना चावला । उ च थान हा सल करने वाल ना रय ने
नार पन के अि त व क र ा करते हए
ु ह इ तहास रचा है । य द वे दोहर मान सकता क शकार
होती तो े ठता के शखर पर नह पहंु च पाती । कतना अ छा होगा क हम अपनी बे टय को
अ छ परव रश के साथ उ◌ू◌ंच श ा-द ा दान कर, वाल बन,आ म नभरता, एवं नणय लेने के
का बल बनाते िजससे वह खद
ु लडक होने पर गौराि वत होती । य द हमार बेट अपने अि त व पर
गौरव का एहसास करती है तो यक नन हमारे वा भमान म अ भविृ द होगी और ी -पु ष के भेद
पर हार भी । पु य के त मां बाप अपनी नै तक िज मेदार अ छ तरह नभाने लगे है, पु मोह
के त झान कम हआ ु है।वह जामना गया जब लडके लड कय के खानपान तक म भेद होता था ।
इसके बाद भी हम मां बाप का नै तक दा य व बनता है क हम अपनी बे टय को वा त वकता से
ब कराये ता क बे टये◌ा◌ं वा त वकता को वीकारने क ताकत पैदा ह । समय के साथ आगे बढने
को ो सा हत कर ।बे टय के हनर
ु और गण ु को तराशने के लये ढ त ावान बने रहे य क
बे टयां हमारे वा भमान क अ भविृ द है ।
न दलाल भारती

॥ सा ह य सामािजक प रवतन म स म ॥

सा ह य ढय एवं वरोधाभास के मु द को उभारकर और उस पर कठराघात


ु कर सामािजक
प रवतन म अहम ् भू मका नभा सकता है पर तु सा ह य को सामािजक सरोकार से ओत ात होना
चा हये ।सा ह य को शो षत पी डत वग का प धर होना चा हये । बराई
ु पर हार करने का साम य
होना चा हये और सामािजक समानता था पत करने का मा दा होना चा हये । आज कछ
ु सा ह यकार
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म ऐसी च ता झलकने लगी है और समाज क नासरू बन रह कु थाओं को के ब द ु म रखकर
सा ह य सजन
ृ होने लगा है । कछ
ु समाचार प और प काय भी भागीदार नभाने लगे है िजससे
बखि डत समाज म नकटता आने लगी है । न उठता है या ाचीन के सा ह यकार को
त काल न समािजक बराईया
ु नह दखाई दे ती थी जो आज भी समाज म या त है । समाज को
बखि डत कये हए ु है।समाज म भेदभाव या त है । दखाई दे ती थी पर तु उनमे बखि डत
सामािजक ताने-बाने को समता के सू म परोने का सं कार नह था, था पत सामािजक कु थाओं एव
पर पराओं के व ोह का संक प नह ले पाते थे य क हजारो साल से भारत म व वास जताया
जाता रहा है क कये का फल भोगना पडता है चाहे इस ज म म या अगले ज म म ।अमीर गर ब
होना सब भा य का खेल है ।अ छे बरेु कल
ु म ज म होना अ छे बरेु कम का फल है । इस बात के
भाव से सा ह य भी नह बच सका । ाचीन क व मनगढ त और था पत मा यताओं को भेदने से
बचते रहे और समदाय
ु वशेष का यातनाओं को सश त भाव से गट नह कर सके पर तु ाचीन म
भी था पत मा यताओं के त अस तोष फटा
ू है उदाहरणाथ- व वा म का राज ष पद के लये
आजीवन संघष,एक य का धनु व या म राजकमार
ु जैसा महारथ हा सल करना और शंबू क ऋ ष का
तप साधना और शो षत पी डत समाज को श त करना । स ख बौ द और जैन धम का अ युदय
ाचीन थाप त कपथाओ
ु मा यताओ के वरोध म और मानतवता क पन ु थापना हे तु तो हआ
ु ।
ाचीन मा यताओ का याग और समानतावाद व ृ त का अंगीकरण भाषा और सा ह य क मह वपण ू
उपलि ध कह जा सकती है ।

ाचीन काल म चावाक ने परलोक , वग क अवधारणा और त काल न धा मक मा यताओं को


खा रज कर एक नये यग
ु का सू पात कया था । चावाक व ान दाश नक थे पर तु आधु नक काल के
महान सा ह यकार क कहानी कफन के पा घीसू और माधो अ श त, गंवार थे । लोक-परलोक,
वग-नरक क थाप त मा यताओ ढओं के स ब ध म दोनो के वचार कतने मेल खाते है ।घीसू
कहता है कफन लगाने से या मलता है आ खर जल ह जाता है । माधो कहता है द ु नया का द तूर
है। दाश नक चावक कहते है जब तक जीना है सखपवक
ु ू मान स मान के साथ जीना चा हये ।
मशान म शर र जल जाने के बाद कसी ने लौटते हए
ु दे खा है । यह चावाक क सामािजक
कु यव था के खलाफ ती त या थी ,जब क इसके पहले आ मा,पनज ु म,लोक परलोक आ द का
भय दखाकर सु वधा ा त वग समाज अ धसं य शो षत पी डत वग को द नता अ याय और
भेदभाव को चपचाप
ु सहने को मजबरू करता था । चावाक के इस व ोह ने सामािजक प रवतन क
आंका ा को ज म दया िजसे त काल न स तो ने भी अपने सा ह य के मा यम से गट कया
है।प रणाम व प वतमान म सा ह य दो धड म बटने के बावजद
ू भी सामािजक प रवतन के े म
काय कर रहा है ।

म यकाल म स द ने जातीय भेदभाव धा मक ढय / अंध व वासो पर ती त याय य त क


थी । समाज के शो षत पी डत अछत
ू जा तय के लये सामािजक स मान और समता क मांग कर
स द के इस काय ने दबे कचले
ु और घट
ू घट
ु कर जी रहे समाज को धा मक-सामािजक कैद क
द वारे तोडने का ह शला भर दया । नगण
ु स त

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कबीर,नामदे व,दाद,ू र वदास,सैण,नाभादाससधना,ध ना आ द छोट समझी जाने वाल जा तय के लोग
भि त के े म मख

थान बना लये और जातीय भेदभाव धा मक ढय अंध व वासो धा मक-सामािजक कैद के अि त व


को नकारते हए
ु अपने अि त व का परचम फहरा दया िजसका तफल आज है क सामािजक
समता ाि त के वर गंजू ने लगे ह । शो षत पी डत वं चत समाज के सा ह यकार के साथ ह अ य
समाज के सा ह यकार सामािजक स मान , समता और मानवीय नै तक मू य क थापना के
उ दे य से सा ह य सजन
ृ कर रहे है। इस सा ह य का भाव व ान के यग
ु म हो भी रहा है ।
द लत के लये खले
ु गे प तबाल जी के ार िजसम द लत को पजापाठ
ू करवाने स बि धत श ण
शा मल है ।सामािजक स मान और समता क दशा म प तबालाजी धा मक यास ारा उठाया गया
यह कदम ऐ तहा सक है । इस ऐ तहा सक कदम का ेय ाचीन और वतमान म सा ह य को अव य
दया जाना चा हये।

सा ह य ारा सामािजक प रवतन दरगामी


ू और भावशाल हो सकता है । कछ
ु लोग इस धारण पर
असमंजस जा हर कर सकते है पर तु इतना तो न ववाद प से कहा जा सकता है क समाज म चाहे
िजस भी कारण से प रवतन हो रहा है उसे श द वर दशा और प रवतन के वर को दरू दरू तक
पहंु चाने का काय सा ह य ह कर रहा है । सा ह य ह आने वाल पी ढय के लये सामािजक
प रवतन के लये कये गये यास और वर को जी वत रखता है । यह जी वत यास और वर
सामाज क प रवतन म अहम ् भू मका नभाते है । अंध व वासो,कु थाओ और जातीय भेद मटा कर
सामािजक प रवतन के लये यास और आवाज बल
ु द करने वाले लोग काल के गाल पर अमरता
ा त कर जाते है। है।सा ह य ारा सामािजक प रवतन के लये कये गये यास भावशाल होते है ।
सा ह य सामािजक कु थाओं, ढओ, अंध व वास क मजबत
ू द वारे ढहाकर सामािजक प रवतन
लाने म स म है।
न दलाल भारती

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॥ मानवता-अमरता का ोत ॥

मनु य सव कृ ठ ाणी है,इसके बाद भी उसका जीवन कभी आसान नह


रहा । कृ त क चनौ
ु तयां हमेशा द ु सा य बनी रह है । मनु य से
मनु य के अि त व पर खतरा भी मडराता रहा है । अि त व के लये
संघषरत् मनु य शि त सं ह कर आगे बढता रहा । अि त व क लडाई
म मानव मन म दया,क णा, याग, ेम और मानवता के त लगाव का
न दलाल भारती बोध हआ
ु । मानव प रवार जा त और समाज के वकास के साथ अ य
क व/कहानीकार/उप यासकार तरि कय के सोपान चढा जो कभी व न मा थे ।

इस तर क ने मानव को ववेकवान के चरम पर पहंु चा दया । ववेक क शखरता ने मानव जीवन म


व के थान पर पर क भावना को ि ठ◌ा पत कर साधारण मनु य के मन म भी दे व व का भाव
जागत
ृ कर दया था दभा
ु यबस वतमान म पर पर व भार होने लगा है ,अहंकार और आतंक बढने
लगा है िजससे रा य चरपर कठराघात
ु हआु है और मानवता आहत हई
ु है ।
व क अ त का भाव महाठ गनी का भाव है । महाठ गनी क कैद म आज का आदमी फंसता चला
जा रहा है । प रणाम व प र त म दरारे आने लगी है, ाचार,वैमन ता,मानव अंगो क त कर
जातीय /धा मक उ माद आ द सर उठाने लगे है । बाजारवाद का वकास ती ग त से होने लगा है ।
बाजारवाद का शैतान मानवता को नकारने और नै तक मू य का दमन कर रहा है। बाजारवाद लालच
और त ृ णा को बढावा दे रहा है । बाजारवाद का मकसद सफ दोहन होकर रह गया है । आदमी के
उपर बाजारवाद इताना हावी हो गया है क वह इंसान को मौत दे कर मानव अंग तक बेचने लगा
है।कथनी और करनी म जमीन आंसमान सा फक दखने लगा है ।हर े म बाजारवाद क घसपै
ु ठ बढ
50
गयी है । सा ह य जगत म दसरे
ू अ य साधने◌ा◌ं ने क जा कर लया है ।उ बोधन और बोधन क
जगह घ टया मनोरं जन परोसा जा रहा है । यह मनोरं जन घर प रवार म बखराव पैदा कर रहा है ।
न हे न हे ब चे ब दक
ू से खेलने लगे है ।आधु नकता क प रचायक अ ल लता क आंधी चल पडी है
।आज क पना और व न को थान नह मल रहा है । सा ह य का काम उस व न संसार क रचना
करना है जो बडे बडे से दखो
ु के हरण करे । स ते और घ टये ट ․वी․ आ द मनोरं जन के साधन
यथाथ से दरू ले जाते है । छल और भलावे
ू के दलदल म ले जाकर पटक दे ते है। इस छल और भलावे

का वशीभत
ू आदमी मानवता से दरू चला जा रहा है । भावना मक शि त से अलग थलग पडता जा रहा
है । सा ह य दल और दमाग को भा वत करता है । वक प और चयन हे तु सअवसर
ु दान करता है
। भावा मक तर पर मानव मन पर जमीं धल
ू को भी छांटता है । सा ह य समाज के लये च क सा
प द त है । स ते और घ टया मनोरं जन के साधन सामािजक जीवन के खलनायक है ।चांद क थाल
म बुराईयां परोसने के साधन है। मानव को मानवता से दरू करने के मख
ु साधन भी ।

कहा जाता है क धरती पर वग वह बसता है जहां मानवता और समता बसती है । जहां


शाि त,स भाव और ेम क गंगा बहती है। स ची मानवता से अनशासन
ु और आदश का नमाण
होता है । मानवता से व थ समाज म सख
ु शाि त और स विृ द का वातावरण न मत होता है ।
नै तकता के भाव म अ भविृ द होती है । मानवता के धम से मानव म परमाथ के भाव का जागरण
हे ◌ाता है । पर पीडा का बोध होता है पर तु व हत ने पर हत के भाव का दमन करने लगा है ।
मानवता तार तार होने लगी है । आदमी पर पीडा पर ठहाके लगाने लगा है । मानव जीवन म
परमाथ का अ या धक मह व है । परमाथ के पथ पर चलकर आदमी आदमी से दे वता बन सकता है
। यह जानते हए
ु भी आज का आदमी व हत म जीने लगा है। जातीय/धा मक उ माद का दशन
करने लगा है । व क महाठ गनी व ृ त मानव को समता,ममता और दया से दरू करती है । उ दार
के भाव से वमख
ु कर पतन के राह ले जा रह है िजसके कु भाव से जीवन क ठन होता जा रहा है ।

हमारे दे श के नै तक मू य क वरासत पव
ू काल से द ु नया सहे ज रह है िजस मानवता और मू य
को भगवान बु द ने अपने नै तकदा य व के नवहन से अजर अमर बनाया था । द ु नया के
समाजशा ी और दाश नक आज भी भगवान बु द ारा था पत मानवता एवं नै तकता के मू य पर
सहमत है । द ु नया अनसरण
ु कर रह है । उ ह मू य को ठे स पहंु चायी जा रह है व हत के भाव
के वशीभत
ू होकर । मानव होने के नाते मानवता के महाय म स कम के आहु त दे ने क
आव यकता है । य द मानवता पर कठराघात
ु होता रहा है तो मानव और पशु म शायद ह कोई
अ तर शेष बचे । मानवता के पोषण के लये व हत का याग करना आज के मानव का थम
दा य व हो गया है ।जीवन थोडे समय का है जब तक जीये दसर
ू के काम आये और नेक उ दे य को
ो सा हत कर ।परमाथ के भाव म मानव क याण न हत है । जब तक मानव म मानवता के भाव
क अ भविृ द नह होगी तब तक मानव मानव धम और मानवता के फज से दरू ह भागता रहे गा ।
स य समाज को स य मानव ह जीव तता दान कर सकते है।पशओ
ु म भी ेम के भाव दख जाते
है । एक पशु दसरे
ू पशु को चाटकर अपने नेह को द शत करता है तो सिृ ट के सरमौर मानव म
वैमन ता य कहा जाता है संगठन म शि त है । संगठन म मानवता का भाव पो षत है ।
51
संगठन म उ थान है वभाजन म पतन तो य न हम जीवन के चार दन सख
ु शाि त से जीये और
दसर
ू को भी जीने द । मानवता कम को अमरता एवं जीवन को आदशवान बनाने का ोत है तो
य ना हम मानव धम और मानवता के फज को आ मसात ् करने का ढ संक प करे ◌े◌ं ।

न दलाल भारती

॥ लेखक मानवता के त तब द होता है ॥


च तन मनन वचारशीलता एवं सामािजक उ थान के मनोयोग के बस त म ह रचना के अंकु र
फटते
ू है । यह ढ अंकु र कभी कभी कालजयी कृ त बन जाते है। सा ह यकार आ था
व वास,सामािजक याय एवं दशन को श दय से ह ताना त रत करते आया है। समय के संवाद को
श द का अमतपान
ृ कराकर मानव क याण हे तु ल पब द करते आया है , जो सा ह यकार क
वचनब दता है । सा ह यकार सामािजक मू य क थापना के लये तब द होता है य क
सा ह यकार/लेखक के मा यम से वचार आगे बढता है। पाठक तक पहंु चते है । रचनाकार के मा यम
से आगे बढे वचार वाद से मु त होते ह । रा य एकता सामािजक समरसता एवं मानवीय समानता
को सम पत रचनाध मता ह लेखक को लोक परयता
् के शखर पहंु चा सकती है ।
लेखक वैचा रक प से तब द होता है । वैचा रक तब दता लेखक य वत ता को बा धत नह
करती है । हां य द वचार क टरवा दता के शकार हो जाते है लेखक य वत ता पर तघात होता
है । यह तघात ढवा दता को योतक होता है । वचार ढवा दता,धमा धता अथवा जातीयता से
ओत ोत हो जाते है तो वा तव म ये वचार वचार नह रह जाते । लेखक भी ववाद के घेरे म आ
जाता है । य द रचनाकर अपने दा य व के त तब द है तो कबीर क भां त उसके वचार को मत

प अव य मलेगा ।उसके पाठको/समथको/शभ
ु च तको का ल बी जमात खडी हो जायेगी पर तु
रचनाकार ारा दया गया वचार क याणकार हो,बहजन
ु हताय बहजन
ु सखाय
ु का म त य रखता हो
। य द रचनाकार वषयव तु के साथ याय करता है तो ऐसे वचार स य समाज के बीच ज र जगह
बना लेते है ।
लेखक/सा ह यकार को सव य थान ा त है । रचनाकार महज रचनाकार ह नह होता इसके
अ त र त भी वह और भी बहत
ु कछ
ु होता है । राजनेता सफ राजनेता होता है।राजनेता से कह
अ धक लेखक का उ तरदा य व समाज के त बनाता है ।इस उ तरदा य व का नवहन रचनाकार

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अपनी रचनाओं के मा यम से परा
ू करता है । लेखक जनसमा य के लये भी आदश होता है ।
जनसामा य लेखक के यि त व को उसक रचनाओं म ढढता
ू है । इ ह जनसामा य के मा यम से
लेखक य वचार आगे बढते है । सवमंगलकार मानवमा को वचार इ तहास रचते है ।
स चा रचनाकार यि त वशेष को खश
ु करने अथवा परु कार पाने के लये नह लखता । वह तो
दे श और समाज के हताथ लखता है । चमक दमक से दरू आंका ाओं को खद
ु के वशीभत
ू कये हए

सवक याणाथ लेखन कम म जटाु रहता है । वह अपने वचार को समय क कसौट पर तराशकर
समाज को दे ता है ।ऐसे वचार जनमानस को काफ सीमा तक भा वत करते है ।लेखक का वचार
गंगाजल क तरह होता है । उसके वचार समाज दे श के भले के लये होते है । भले ह
रचनाकार/सा ह यकार समाज दे श के भले क अ भलाषा म
गणाव था म पहंु च जाये । लेखक अपनी
तब दता से वच लत नह होता । उसे तो बस समाज को कछ
ु दे ने क ललक रहती है । यह
ललक उसे एक अyग पहचान दे ती है।समय का पु बना दे ती है ।
लेखक के वचार के हए
ु नह होते समय के साथ आगे बढते रहते है। लेखक का उ दे य होता है क
लेखनकम के त उसका समपण समाज को ऐसा वचार दे िजससे समाज का हत सध सके
,सामािजक बराईया
ु के खलाफ लामब द ि थ त बने जो सामािजक स भावना एवं समरसता था पत
कर सके । लेखक क तब ता ह उसके वचार क ग तशीलता का प रचायक है । बहजनु हताय
को के ब द ु म रखकर लेखन करने वाले लेखक के वचार तो थमे नह । य द वचार कता है तो
वह कसी ना कसी वाद अथवा ढवा दता का शकार होता है । ऐसे वचार के हए
ु पानी क तरह
होते है जो समाज को व थ नह कर पाते हां बीमा रयां ज र परोसते है ।स चा रचनाकार ऐसे
वचार को कभी भी पर नह लगाता य क ऐसे वचार के आघात क न ज को वह पहचानता है।
स चे वचार समाज को दशा दे ते है। लेखक पहले एक यि त होता है जो लेखक/सा ह यकार यि त
बने रहकर रचनाध मता का नवहन कर रहे ◌े है। ऐसे मानवतावाद कलमकार को को टशः नमन ् ।
न दलाल भारती

प रचय․․․․․․․․․․․․

स पक:

न दलाल भारती

श ा - एम.ए. । समाजशा । एल.एल.बी. । आनस ।

पो ट ेजुएट ड लोमा इन यमन


ू रस स डेवलपमे ट;

ज म थान- - राम चौक । खैरा। तह.लालगंज िजला-आजमगढ ।उ. ।

थायी पता- आजाद द प, 15-एम-वीणानगर ,इंदौर ।म. .!452010


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प्ारका षत पु तक उप यास-अमानत , नमाड क माट मालवा क छाव। त न ध का य सं ह।

त न ध लघकथा
ु सं ह- काल मांट एवं अ य क वता, लघु कथा एवं कहानी सं ह ।

अ का शत पु तके उप यास-दमन,चांद क हंसुल एवं अ भशाप, कहानी सं ह- 2

का य सं ह-2 लघकथा
ु सं ह- उखड़े पांव एवं अ य

स मान भारती पु प मानद उपा ध,इलाहाबाद, भाषा र न, पानीपत ।

डां.अ बेडकर फेलो शप स मान, द ल ,का य साधना,भसावल


ु , महारा ,

यो तबा फले
ु श ा व ,इंदौर ।म. .।

डां.बाबा साहे ब अ बेडकर वशेष समाज सेवा,इंदौर

कलम कलाधर मानद उपा ध ,उदयपरु ।राज.।

सा ह यकला र न ।मानद उपा ध। कशीनगर


ु ।उ. .।

सा ह य तभा,इंदौर।म. .।सफ
ू स त महाक व जायसी,रायबरे ल ।उ. .।

व यावाच प त,प रयावां।उ. .।एवं अ य

आकाशवाणी से का यपाठ का सारण ।कहानी, लघु कहानी,क वता

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रचनाय का शत ।

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