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दगा
ु साद अ वाल. पीड एफ़ ई-बुक
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पूव- कािशत. पठन-पाठन हे तु मु त उपयोग व वतरण के
िलए जार .

आंखन दे खी (अमर का मेर िनगाह से)

या ा वृ ांत

- डॉ. दगा
ु साद अ वाल
[न या,

आ था,

आरोह

और उनक पूर पीढ़ को]

अनु म

1 परदे स म िनकला चांद


2 है पी बथ डे टू यू
3 ज दगी, मेरे घर आना, ज दगी
4 खूबसूरती का कारोबार
5 कहो जी तुम या या खर दोगे
6 माइकल मूर: असहमित म उठा हाथ
7 पूंजीवाद के दे श म समाजवाद क घुसपैठ
8 अमर का म अखबार
9 एक शह द दवस अमर का म भी
10 वाधीनता का उ लास
11 एक पु तकालय के भीतर
12 रोगी क दशा उ म है
13 ज दगी के साथ भी...
14 जन वेगस नह ं वे या
15 ज दगी एक सफर है सुहाना
16 यह सच है
17 पढ़ोगे िलखोगे तो...
18 उ च िश ा: यहाँ और वहाँ
19 जोड़ने वाला पुल
20 सोन मछली
21 या ा के बाद

*****

सुप रिचत सा ह यकार डॉ दगा


ु साद अ वाल क यह कृ ित "आंखन दे खी" महज़ एक
या ा वृ ांत नह ं है .

य प इस पु तक म डॉ अ वाल ने अपनी अमर का या ा के व वध अनुभव को


श दब कया है , पर यह कई कारण से एक अनूठ सा ह यक कृ ित बन गई है . डॉ
अ वाल ने व के अ णी पूंजीवाद दे श अमर का को खुली आंख और बना पूवा ह के
तो दे खा ह है और उसक उ मु सराहना भी क है , कंतु इसे उनक अित र
स वेदनशीलता और वैचा रक ितब ता का सुफल ह माना जाना चा हए क वे इस
समृ , सफल समाज क वसंगितय को भी दे खने और बताने से नह ं चूके ह.

इस कृ ित म अमर का के भौितक प क अपे ा उसके मानवीय प को अिधक मुखता


द गई है . और इसी के साथ, जो बात इस पु तक को इस तरह के अ य रचनाकम से
अलग तथा बेहतर िस करती है वह है रचनाकार क सा ह यकता. अपने सामा य
वणन म भी डॉ अ वाल का सा ह यक पश, और थान- थान पर सा ह यकार और
सा ह य के स दभ इस पु तक को एक दलभ
ु ग रमा दान करते ह.

डॉ अ वाल के पास जो सहज वाहमयी भाषा है वह इस पु तक को ऐसी पठनीयता


दान करती है जो इधर के बो झल सा ह यक लेखन के घटाटोप म वरल हो चली है .
आंखन दे खी
(अमर का मेर िनगाह से)

दगा
ु साद अ वाल

भूिमका

यार ! सच तो यह है ....

ह द म जो वधाएं अपे ाकृ त कम समृ ह उनम से एक है या ा-वृ ांत. बावज़ूद इस


बात के क पछले कुछ वष म अनेक कारण से लोग का दे श- वदे श मण बढ़ा है ,
ह द म इस वधा म उतना नह ं िलखा गया. कम से कम मुझे तो इस तीित से खुशी
नह ं होती क चालीसेक साल पहले क ‘चीड़ पर चांदनी’ (िनमल वमा), ‘अरे यायावर
रहे गा याद’, ‘एक बूंद सहसा उछली’ (दोन - अ ेय), 'आ खर च टान तक' (मोहन राकेश)
और ‘हर घाट ’ (रघुवंश) ह अब तक भी इस वधा क शीष थ कृ ितयां ह. ऐसा नह ं है
क इस बीच कुछ भी नह ं िलखा गया है . लोग ने पा रवा रक अथवा म हला प काओं
के उपयु या ा-वृ ांत खूब िलखे, जनक अपनी उपादे यता है . कृ णनाथ के या ा वृ ांत
का अपना एक अलग वाद रहा, तो अमृतलाल वेगड़ ने अपने लेख से अपने प रवेश को
अमर व दान कया. मंगलेश डबराल ने आयोवा के सं मरण (एक बार आयोवा) िलख
कर बु जीवी पाठक को तृ कया. इस सूची म और भी बहत
ु कुछ जोड़ा जा सकता है .
बावज़ूद इसके, दखद
ु थित यह है क ह द म या ा वृ ांत वधा समृ नह ं है . बकौल
लिलत सुरजन (समय क साखी पु तक म) "एक दजन पु तक ह. उनका ह नाम बार-
बार लेते र हये." इन दजन भर पु तक म दे शी और वदे शी दोन या ाओं के वृ ांत
शर क ह. मुझे लगता है क संचार मा यम के त
ु वकास के कारण परदे स भी अब
उतना परदे स नह ं रह गया है . हर दसर
ू फ म और चौथे सी रयल क लोकेशन कोई न
कोई परदे स ह है . प रणाम यह क आप चाहे बंगलूर म रहने वाले अमीर ह या
िछ दवाड़ा म रहने वाले कसान, परदे स अब आपके िलए बहत
ु अनजाना नह ं रह गया है .
शायद यह भी एक कारण है क लोग अब पहले क तरह उ साह से या ा-वृ ांत नह ं
िलखते. परदे स क चकाच ध म दे श तो वैसे ह नेप य म धकेला जा रहा है - खास तौर
पर संचार मा यम म.

ले कन या या ा वृ ांत महज़ यह बखान होता है क अमर का म ऊंची-ऊंची इमारते ह,


या लंदन म एक ज है , या चीन क द वार बहत
ु वशाल है या.. ये सार जानका रयां
और इनसे भी बहत
ु अिधक तो आसानी से वैसे ह सुलभ ह. जब पहली बार अमर का आ
रहा था और िम ने कहा क आप भी कुछ अव य िलखना, तो मेरे मन म भी यह था
क एक-डे ढ़ मह ना अमर का म रह कर तो म भी ऐसा ह कुछ िलख सकूंगा. और यह
िलखने से तो बेहतर है क नह ं ह िलखा जाए. सो नह ं िलखा.

फर दसर
ू बार अमर का आने का संयोग बना. कारण शु िनजी-पा रवा रक था. बेट
चा का सव. इसी के साथ खूब घूम-े फरे , मौज़-मज़ा कया. और या? चल खुसरो घर
आपने..

ले कन ऐसा हो नह ं पाया. यहां रहते-रहते, घूमते- फरते, बेट -दामाद के िम -प रवार से


िमलते-जुलते कुछ चीज़ अनायास ह मन म आकार लेने लगीं. इस तरह जस अमर का
को हम दे ख रहे थे वह खूब दे ख-पढ़-िलख कर भी मेरे िलए अब तक अनजाना ह था.
शायद और के िलए भी होगा. और, बना कसी योजना तथा इरादे के एक दन एक लेख
कागज़ पर उतर आया. तट थ होकर पढ़ा तो लगा क या हज़ है अगर ऐसी ह कुछ
बात और िलख ली जाएं! इसी बीच एक िम दं पती घर आए, चा ने उनसे मेरे िलखे क
चचा क , उ ह ने आ ह कया तो मुझे पढ़कर सुनाना भी पड़ा. उनक ित या ने मेरा
उ साह काफ बढ़ाया. उ ह ने कहा क यहां जो भी आता है , अमर का क बुराई ह दे खता-
करता है , जब क आपने इसका उजला तथा सकारा मक प दे खा-िलखा है . इससे मुझे
एक बात याद आ गई. अपनी पहली या ा के बाद जब भारत लौटा था तो एक पुराने
व ाथ से प ाचार म बहस-सी हो गई थी. उसने यं य म िलखा था क म भौितकता,
वलािसता, न नता, अ ीलता वगैरह के दे श क सैर कर आया हंू , और मने उसे जवाब म
िलखा क यहां सरे -आम कोई न नता, अ ीलता वगैरह नह ं है . जो है वह भारत से तो
कम ह है . इस बात से वह उखड़ गया और उसने बहत
ु नाराज़ होकर िलखा क “आप तो
हर चीज़ का सकारा मक प ह दे खते ह”. हो सकता है , वाकई ऐसा ह हो. और या फर
यह हो क कुछ चीज़ क एक छ व हम मन म बना लेते ह, उससे िभ न कुछ भी हम
वीकार नह ं होता, जब क सच केवल वह नह ं होता है . कई स दभ म मुझे ऐसा ह
लगा. एक दन यहां टनी पीयस का एक एलबम सुन रहा था. टनी नई पीढ़ क
रोल मॉडल है और कु यात से स िस बल है . एलबम म एक गीत था – ‘लक ’ (Lucky).
गीत या था, क ण-कथा ह थी. कम से कम मेर जानकार म तो नह ं है क ह द के
लोक य (पॉप?) गीत म ऐसा सू म मािमक गीत कोई हो. टनी का दे ह प तो सब
दे खते ह (और दे ख कर, आन दत होकर, उसक आलोचना भी करते ह) पर यह
शंसनीय, मह वपूण, स वेदनपूण प तो अनदे खा ह रह जाता है . मुझे यह भी याद
आया क अपने गितशील झान और ऐसी ह संगत क वजह से म भी अमर का
वरोध और िन दा को ह ओढ़ता- बछाता रहा हंू , ले कन यहां आकर मुझे उससे अलग
लग रहा है . यह भी याद आया क मेरे एक घनघोर गितशील लेखक िम भी मेर ह
तरह पा रवा रक कारण से दो-एक मह ने के िलए अमर का आए थे और एक दन मुझसे
कह रहे थे क “यार दगा
ु बाबू, हम लोग इनक चाहे जतनी िन दा-आलोचना कर, सच
तो यह है क.... " और वह हाल मेरा भी हो रहा था.

यािन जो छ व मन म बना रखी थी, जो पढ़ते रहे थे वह एक तरफ और जो दे ख रहे थे


वह उससे काफ अलग. इसी से याद आ गए अपने कबीर दास. वो या कहा था उ ह ने
– “तू कहता कागद क लेखी, म कहता आंखन दे खी”. तो या हज़ है , आंखन दे खी को
िलख ह दया जाए?

और इसीिलए यह कताब.

ले कन यह कताब पार प रक अथ म या ा वृ ांत नह ं है . सं मरण भी नह ं है . कुल


िमलाकर तो यह 'अमर का जैसा मने दे खा' टाइप कुछ है . वैसे भी पाठक तो कताब पढ़ता
है , वधा नह ं. वधा का सवाल तो सा ह य के पेशव
े र आलोचक का है . कताब म
य गत चचा काफ है . उसे िनकाल भी सकता था. पर तब जो कताब बनती वह नीरस
और िनवय क होती. मुझे लगा क भले ह मेरे प रवार और मेरे जीवन म आपक कोई
दलच पी न हो, उसके ज़ के साथ अमर का के बारे म पढ़ना आपको यादा अ छा
लगेगा.

यह कताब अमर का क राजनीित का समथन नह ं है . पूंजीवाद से मेर असहमित अब भी


बरकरार है . इस कताब म बड़े और सै ांितक सवाल को उठाने का कोई यास नह ं है .
सोचा समझा यास अमर का क शंसा या उसके बचाव का भी नह ं है . ब क, इस
कताब को तैयार करते हए
ु , जसम क अमर का के नाग रक जीवन और वहां के आम
नाग रक क उ मु शंसा है , मेरे मन को यह कुछ यादा ह बेचैन करता रहा है
क जस दे श के नाग रक इतने अ छे ह उस दे श का िनज़ाम इतना ू र, मानवता वरोधी
य है ? या जनता और शासन म कोई अंत:स बंध नह ं होता? सार दिनया
ु म
चौधरा ट, हं सा, र पात, शोषण - यह तो करता रहा है अमर क शासन! बहत
ु कम
अवसर आते ह जब कोई अमर का क भूिमका क सराहना कर पाता है . तो, अमर का का
यह प मेर मृित म बराबर रहा है , ले कन इसके बावज़ूद वहां का आम जीवन, वहां का
आम नाग रक मुझे अ छा लगा. और यह मने िलख दया. म कोई िन त लाइन लेकर
नह ं चला हंू . इसिलए इस कताब म कई जगह वरोधाभास भी महसूस होगा. ले कन
राजनीितक प से जस अमर का क सव आलोचना क जाती है , उसी अमर का के आम
लोग के इस वृ ांत से हो सकता है कुछ लोग को चीज़ को दसरे
ू पहलू से दे खने म मदद
िमले. अगर ज़रा भी ऐसा हो सका, म अपने यास को सफल मानूंगा.

इस कताब के सारे अ याय अमर का म रहते हए


ु ह िलखे गए ह. इसीिलए अमर का के
िलए 'यहां' और भारत के िलए 'वहां' का योग है . अब जब भारत पहंु चकर यह कताब
अपने पाठक को स पने क तैयार कर रहा हंू , मुझे अमर का के उन सारे िम प रवार
क याद आ रह है जनके कारण वे सारे अनुभव जुट सके जो इस कताब म ह. सबका
तो नामो लेख भी स भव नह ं है , पर कुछ का ज़ करने से खुद को रोक नह ं पा रहा
हंू . रजनीश (उफ राज) और द पका हमारे बहत
ु नज़द क रहे ह. राज क ब हन नयनतारा
भी. द पका के माता- पता उषाजी व राकेश जी भी. राज क चाचीजी, निलनी व सुिमत
भी. इनसे खूब िमलना-जुलना तथा वमश होता रहा. अपने डॉ टर िम दं पती पंकज
और आरती क चचा एकािधक थान पर क है . इनसे मुझे यहां के जीवन और सवाल
को समझने म बहत
ु मदद िमली. पंकज वेल इं फॉ ड ह और चीज़ को बहत
ु गहन,
व ेषणा मक तथा सुलझे-सकारा मक नज़ रए से दे खते ह. चा -मुकेश के असं य िम
- नरे श-अंश,ु अिभ जत-द पाली, मनोज-आिशता, सुनील-राधू, अजय-मोना, सुधा-सूरज, मुकेश
शाह से हई
ु अनिगनत चचाओं ने इस कताब के िलए खाद-पानी का काम कया है .

और जस बात को टालता रहा हंू , अब वह.

चा -मुकेश. कहना भी चाह रहा हंू , संकोच भी है . अपने ब च के बारे म बात करना
आसान नह ं होता. चा तो शु से ह मेरे िलखे क पाठक और बेबाक समी क रह है .
अब चा -मुकेश कहना उिचत लग रहा है . इन दोन क ह ित याओं, सुझाव और
सूचनाओं ने मुझे इस कताब को पूरा करने म बहत
ु मदद द है . मुकेश मेरे क यूटर
गु भी बन गये. इनके मागदशन म ह म क यूटर पर इस कताब क पा डु िल प
तैयार कर सका. इन दोन क सहायता से म इ टरनेट का खूब उपयोग कर सका. इन
दोन के ह कारण मेरे िलए अमर का क लाइ ेर का उपयोग भी स भव हआ
ु (लाइ ेर
क व तृत चचा एक लेख म है .) अमर का क दोन या ाएं तो इनके कारण हई
ु ह.
इसिलए इस पु तक के मूल म तो ये ह ह. अपने ब च के बारे म इससे यादा नह ं
कहा जाना चा हये न?

प ी वमला दोन ह या ाओं म साथ थीं. पूर जीवन या ा क ह सािथन ह वे. इस


पु तक म जो कुछ िलखा है उस सबक चचा उनसे िनरं तर होती रह है . एक तरह से तो
यह कताब हम दोन का समवेत सृजन है . इसिलए यह कहना गैर-ज़ र है क इस
कताब के िलखने म भी उनका भरपूर सहयोग रहा है . पु व ास और पु वधु सीमा ने
भी इस पु तक के अनेक अ याय को पढ़कर अपने सुझाव दये ह. उनका आभार तो
या मानूं?

वाभा वक ह था क भारत लौटकर अपनी यह पा डु िल प अपने िम को दखाता.


पछले कई वष से यह हो रहा है क जब भी कुछ िलखता हंू, सबसे पहले उसक चचा
अपने िम , ह द के ितभाशाली आलोचक डॉ माधव हाड़ा से अव य करता हंू . वे भी
ायः ऐसा ह करते ह. इतनी समझ हमम पर पर वकिसत हो गई है क खुल कर
अपनी ित या य कर दे ते ह. बना यह सोचे क यह शंसा है अथवा आलोचना.
यह मानते हए
ु क अगर आलोचना भी है तो इसिलए क जो िलखा है उसे बेहतर बनाया
जा सके. यह पा डु िल प भी सबसे पहले उ ह ं ने पढ़ है . उनके अनेक सुझाव से यह
पु तक बेहतर हो पाई है . उ ह ं के सुयो य िश य, युवा और उ साह ा यापक डॉ प लव
ने भी इस पा डु िल प को बेहतर बनाने के िलए अनेक सुझाव दये. अपने अ ज डॉ
मनोहर भाकर, ‘समय माजरा’ के स पादक और सुप रिचत कथाकार डॉ हे तु भार ाज,
सुप रिचत यं यकार डॉ यश गोयल, सुधी िम वमल जोशी, नाबाड के व र बंधक ी
जी आर केजर वाल, युवा िम यशवंत गहलोत, हमारे िनकट थ ी आन द कुमार गग,
ने भी काशन पूव ह इस पु तक को पढ़ कर अनेक सुझाव दान कर मुझे उपकृ त
कया है .

इस पु तक क पा डु िल प तैयार करते समय मेरे सामने एक बड़ उलझन इस दे श (संयु


रा य अमर का) के नाम क नागर वतनी को लेकर रह है . अं ेज़ी वतनी (America) के
अनु प उपयु था क म 'अमे रका' िलखता. ार भ म िलखा भी. ले कन कुछ संशय
होने पर जब यान दया तो पाया क ह द म इसे कई तरह से िलखा जाता है .
अमर का, अमेर का, और अमे रका. बीबीसी ह द सेवा वाले इसे 'अमर का' िलखते ह.
अमर का क सुप रिचत सारण सं था VOA (Voice of America) को िलख कर पूछा तो
वहां से उ ो षका र म शु ला ने भी इसी वतनी के प म अपनी राय द . मज़े क बात
यह क इस पु तक के मेरे लेख जहां भी छपे, व ान स पादकगण ने मेरे िलखे
'अमर का' को ायः 'अमे रका' म त द ल कर ह छापा. म इस पु तक म 'अमर का' ह
िलख रहा हंू .

इस पु तक के अनेक लेख जनस ा, मधुमती, समय माजरा, समयांतर, अनौपचा रका, लोक
िश क आ द म छप कर पाठक तक पहंु च चुके ह. इनके स पादक के ित आभार.

तो जैसी भी है , कताब आपके हाथ म है .


कहना अनाव यक है क आपक ित या क मुझे ती ा रहे गी.

1 जनवर 2006
-- दगा
ु साद अ वाल

परदे स म िनकला चांद

राह मासूम रज़ा क पं यां ह : "हम तो ह परदे स म, दे स म िनकला होगा चांद." जब


आप दे श म होते ह तो आपका एक बडा सपना होता है क वदे श जाएं, और जब वदे श
पहंु च जाते ह तो अपना दे श कुछ यादा ह याद आने लगता है . दे श क हर बात याद
आने लगती है . पछले दन ह द क सुप रिचत ले खका मृदला
ु गग अमर का आ तो
उ ह यहां क बेहद-बेहद सफाई के बीच भारत क धूल-िम ट क याद बेचैन कर गई.
अमर का म, या कसी भी दे श म रह रहे भारतीय भारतवासी भारतीय से यादा भारतीय
हो जाते ह. परदे स म हो रहा हर भारतीय आयोजन उ ह अपने दे श के थोड़ा िनकट ले
जाने वाला अवसर बन जाता है .

ऐसा ह कुछ अनुभव हआ


ु मुझे िसएटल म 'जगजीत िसंह नाइट' म जाकर. अब यह
कहना तो कोई माने नह ं रखता क जगजीत मेरे पस द दा गायक ह. भारत म शायद ह
कोई हो जसे जगजीत क गायक पस द न हो. इस मुकाम तक पहंु चने म जगजीत को
कम से कम चालीस साल लगे ह. चार दशक क कड़ मेहनत और इस दौरान अ जत
अनुभव उनक गायक और टे ज तु तय म बहत
ु साफ प रल त होते ह.
जब हमारा अमर का आने का काय म बन रहा था तभी अमर का म जगजीत नाइट का
चार शु हो गया था. बेट चा को जगजीत के ित हम दोन क द वानगी का पता है ,
इसिलये उसने हमारे िलये दो ट कट तुरंत ह खर द कर रख िलये. उसके सव क
स भा वत ितिथ भी वह थी जो इस कंसट क थी, इसिलये यह तो तय ह था क बेट -
दामाद इस शाम का लु फ नह ं ले पाएंग.े

अमर का आने वाले हर भारतीय क तरह हम भी इस मज़ के िशकार ह क हर डॉलर


अमर क मू य को भारतीय मु ा म त द ल कर भारत क क मत से तुलना कर, जैसी
भी थित हो, दःखी
ु , च कत, ग वत होते ह. इसिलये जब वमला के कई बार और कई
तरह से पू ने के बाद चा ने बताया क इस शो के एक ट कट का मोल साठ डॉलर है ,
तो हमने मन ह मन सुना- तीन हज़ार पये, और कंिचत दखी
ु हु ए. कुछ माह पहले ह
जगजीत को जयपुर म पांच सौ पये का 'महं गा' ट कट खर द कर सुन चुके थे. पर यह
अमर का है !

14 मई को चा ने बेट को ज म दया. हम लोग अ पताल म ह थे, पर जाने कब


उसने अपने साथी नरे श जैन से गुपचुप बातकर यह यव था कर द क नरे श इस साढ़े
सात बजे वाले शो के िलये हम लेने छः बजे अ पताल आ पहंु च.े अब यह ं यह भी चचा
कर दं ू क दिनया
ु कतनी छोट और गोल है ! नरेश के दादाजी से िसरोह म मेर अ छ
िम ता रह है . मुकेश के वग य पताजी का भी नरे श के इस प रवार से गहरा अपनापा
था. फर संयोग यह बना क राज थान क पूव-इं जीिनय रं ग पर ा (पी ई ट ) म उ ीण
होने पर नरे श और चा एक साथ ह िसरोह से उदयपुर काउं िसिलंग के िलये गये. पढे
अव य अलग-अलग कॉलेज म. और अब नरे श, मुकेश और चा तीन ह माइ ोसॉ ट
म काम करते हए
ु भारत का नाम रोशन कर रहे ह. एक और संयोग यह भी क नरे श
का प रवार जयपुर म रहता है , हम भी. तो, इस नरे श के साथ अपने अ पताल से कोई
पचास कलोमीटर दरू मूर िथएटर के िलये रवाना हए
ु .

मूर िथएटर डाउनटाउन िसएटल म थत है . जब हम पहंु चे तो घड ठ क साढे सात बजा


रह थी. हॉल के बाहर का य दे खकर म हआ
ु क कह ं हम भारत म ह तो नह ं ह.
इतने सारे भारतीय एक साथ! ये भारत म इतने भारतीय नह ं होते. यहां अपने पहनावे
म ये भारत क तुलना म यादा भारतीय थे. वहां ये लोग भले ह जी स वगैरह म होते,
यहां यादातर लोग पार प रक भारतीय वेशभूषा, यािन साड़ , सलवार सूट, कुता पाजामा
वगैरह म थे.
जो ट कट हमारे पास थे उनम बाकायदा यह अं कत था क हम आयल (Aisle) 3 से
वेश करना है और S कतार म हमार सीट न बर 2 व 3 है . पर वहां तक पहंु चने के
िलये खासी मश क़त करनी पड . िथएटर क लॉबी म इतनी भीड थी क आगे बढ
पाना ह मु क़ल था. लोग के हाथ म लेट थीं, लेट म समोसे, छोले, ट क वगैरह
और चार तरफ थी भारतीय पकवान क जानी पहचानी खुशबू.

हाल-चाल पूछे जा रहे थे, ठहाके लग रहे थे, चटखारे िलये जा रहे थे. ऐसा भारतपन भला
रोज़-रोज़ कहां नसीब होता है ! इस सात समु पार के वलायत म बड इं तज़ार के बाद
यह शाम उतर थी और इसने इस मूर िथएटर को एक िमनी ह द ु तान म त द ल कर
दया था. इस बहत
ु इ फामल ए ट यूड वाले दे श म जैसा दे स वैसा भेस बनाकर रह रहे
भारतीय आज अपने पूरे रं ग म थे. म हलाओं ने तो मानो अपने गहन -कपड क नुमाइश
ह लगा द थी.

हम जैसे-तैसे अपनी सीट तक पहंु च.े िथएटर कुछ पुराना-सा था, यादा ह भ य. वरना
यहां के िथएटर (भारत क तुलना म) बहत
ु सादे होते ह. जगजीत मंच पर आ चुके थे.
ार भक औपचा रकताएं भी शायद पूर क जा चुक थीं. बहत
ु ह के-फु के अ दाज़ म
उ ह ने अपने साथी संगतकार का प रचय कराया. हर कलाकार के िलये तािलयां और
सी टयां बजती रह ं, और इस सबके बीच ह जगजीत ने गाना शु कर दया.

जगजीत क गायक का या कहना ! उसके जाद ू का असर न हो, यह मुम कन ह नह ं.


वे एक के बाद एक गज़ल सुनाते गये. कब डे ढ़ घ टा बीत गया, पता ह नह ं चला. पं ह-
बीस िमिनट का म यांतर हआ ू पड़े . फर
ु , लोग फर खाने और िमलने-जुलने पर टट
काफ दे र तक गाने के बीच लोग का आना-जाना चलता रहा. जगजीत ने फर डे ढ़ घ टा
गाया, और अचानक शो समा . जगजीत अ सर ऐसा ह करते ह.

यह कहने क कोई ज़ रत नह ं क जगजीत ने अ छा गाया. यह भी कहने क ज़ रत


नह ं क उ ह ने ोताओं के मूड के अनु प गाया. यहां जो ोता थे वे सब बहत
ु ग भीर
ोता नह ं थे. जगजीत खुद एम ट वी पर अपने एक इं टर यू म कह चुके ह क उनके
कंसट म कुछ ोता ऐसे होते ह जनका संगीत से कोई वा ता नह ं होता. वे महज़
इसिलये होते ह क अगले दन यह दखावा कर सक क वे भी कल यहां थे ! कुछ ोता
ार भ से ह काफ 'उ च अव था' को ा थे. िथएटर म भी एक बार (Bar) था. जो घर
से उ च अव था को ा होकर नह ं आये थे, उनम से अनेक यहां उस अव था को ा
हो गये. और जब आप उस महान अव था को ा हो चुके ह तो आपके िलये
'आ ह ता-आ ह ता' और 'िम ट दा बाबा' म कोई फक न रह जाये, यह वाभा वक ह है .
‘िम ट दा बाबा' जगजीत क बहुत य रचना है . वे गाते भी इसे पूरे दद के साथ ह.
शायद उ ह अपना ववेक ह याद आ जाता हो, इसे गाते व त. इसिलये जब इस गीत
पर भी लोग सी टयां, तािलयां और चुट कयां बजाने लगे तो जगजीत यह याद दलाये
बगैर नह ं रह सके क यह 'उस तरह' का गीत नह ं है ! मेर अगली क़तार म बैठे एक
स जन हर गीत के ख म होते न होते 'दरबार ' क फरमाईश कर रहे थे. बा-आवाज़े-
बुल द. मज़े क बात यह क जब जगजीत ने वाकई दरबार गाना शु कया, तब भी वे
मांग कर रहे थे - दरबार ! मेरे ठ क आगे एक युवक हर गीत पर जस तरह अपना हाथ
उठाकर अपने आ ाद का दशन कर रहा था उससे शु -शु म तो मुझे लगा क यह
उसका फेव रट नगमा होगा, पर पं ह-बीस गीत पर उसक एक-सी ित या दे खकर मुझे
उसक जवानी पर ह यादा लाड़ आया. और, जवानी म समझ होती ह कहां है ? मेर
दांयी तरफ से एक बुज़ुग स जन कभी-कभी 'गािलब' क गुहार लगा दे ते थे. उनक
आवाज़ तो मंच तक नह ं पहंु ची पर जगजीत ने उनक शाम साथक ज़ र कर द .
जगजीत गािलब को गा रहे थे, म उन स जन को दे ख फराक़ को मरण कर रहा था-

आए थे हं सते खेलते मैखाने म फराक़


जब पी चुके शराब, संजीदा हो गये !

जगजीत बहत
ु ह के मूड म थे. ोताओं से चुहल करते जा रहे थे. साउं ड िस टम पर
खफा होने का उनका िचर-प रिचत अ दाज़ यहां भी बरक़रार था. एक शो-मैन के प म
वे मंज चुके ह. और इस मंज जाने क अपनी सीमाएं होती ह जो यहां साफ गोचर
थी. जगजीत ने वे ह सार चीज़ सुना जो वे हर कंसट म सुनाते ह. नई और ग भीर
चीज़ सुनाने क र क य ली जाये ? एक मुकाम पर आकर शीष पर टके रहने क
चाह आपक एक ऐसी मज़बूर बन जाती है जो कुछ भी नया और बेहतर करने क
आपक योगशीलता को बािधत करती है . जगजीत ने अ छा गाया, पर वे बेहतर गा
सकते थे.

जो लोग इस कंसट म आये, उनम जगजीत क गायक के ित अनुराग से यादा अपनी


धरती क महक क ललक थी. तीन-चार घ ट के िलये एक ह द ु तान ह बन गया था
वहां. अगर यह कहना अिश तापूण न लगे तो कहंू क वह अ त य तता, वह ध का-
मु क , वह गमजोशी, वह अपनापा, वह सब कुछ जो अपने दे श म होता है !
दरअसल, यह भी परदे श म रहने क एक भावना मक ज़ रत होती है . आप घर वाल से
बात कर सकते ह, उनके समाचार पा सकते ह, घर म ह द ु तानी खाना खा सकते ह पर
आपके चार तरफ तो अमर का ह होता है ना , जो चाहे कतना ह अ छा य ना हो,
अपना तो नह ं होता. इसी ‘अपने’ क तलाश, अपनी धरती का मोह भारतीय को इस
तरह के आयोजन म खींच लाता है . यह कारण है क यह शो बीस दन पहले ह सो ड
आउट (Sold out) हो चुका था. ऐसे म, कसने या गाया, और कसने या सुना, इसका
कोई खास मतलब नह ं रह जाता. असल बात यह थी क जगजीत के इस कंसट के
बहाने यहां इस िसएटल शहर म भी च द घ ट के िलये वह चांद िनकल आया था
जसे याद कर राह मासूम रज़ा उदास हए
ु थे.

इस चांद के ितिल म से बाहर िनकले तो रात के साढे यारह बज रहे थे. काफ सद रात
थी पर मूर िथएटर के उस इलाके म ह ब-मामूल चकाच ध बरक़रार थी. बहमं
ु ज़ला
इमारत , शानदार यावसाियक ित ान और तेज़ भगती कार क हे डलाइ स क च ध.
ब क इससे भी कुछ यादा. सड़क पर बखर भारतीय सु द रय के आभूषण क , उनके
चमचमाते झलिमलाते व क और इन सबसे यादा अभी-अभी ‘भारत से लौटकर
आये’ उनके फु लत चेहर क उ लासपूण आभा इस चमक को और बढा रह थी.

इस चकाच ध के घेरे से बाहर िनकल, कुछ दरू चले तो हम और दन क बिन बत


अमर क आकाश आज कुछ कम चमकदार लगा.

िनकले हए
ु चांद को हम पीछे जो छोड़ आये थे !

*************

है पी बथ डे टू यू

चा ने सुबह ह कह दया था क शाम को हम द पका के यहां जाना है .

द पका और रजनीश (राज) इन लोग के नज़द क दो त म ह. नज़द क कई तरह क


है . घर एकदम पास है . पैदल कोई 3-4 िमिनट क दरू पर. मुकेश और राज दोन ह
माइ ोसॉ ट म ह. दोन , ब क चार बेहद िमलनसार और खुशिमज़ाज़ ह. पछली बार,
डे ढ़ेक साल पहले जब हम लोग यहां आए थे, इन प रवार म दो ती नह ं थी. ले कन इस
बीच गंगा म बहत
ु सारा पानी बह चुका है . दोन प रवार कई बार साथ बाहर जा चुके ह,
और अगर एक घर म कोई खास डश बनती है तो दसरे
ू घर म उसके वाद क तार फ
होती ह है . दोन प रवार क नज़द क का एक आयाम यह भी है क चा और द पका
क गभाव था एक साथ आगे बढ रह है . दोन क स भा वत सव ितिथ एक ह है .
अ पताल एक है , डॉ टर एक है . और जैसे इतना ह काफ न हो, गभकाल म मदद के
िलये चा के मां-बाप(यािन हम) आये हए
ु ह तो द पका के भी मां-बाप आये हए
ु ह. दोन
प रवार अ वाल ह.

आज द पका का ज म दन है . सवकाल िनकट होने से यह संशय तो बना ह हआ


ु था
क शाम को द पका (या चा , या दोन ) घर पर ह ह गी या सूितगृह म, पर फर भी
आयोजन कर ह िलया गया था.

मुकेश भी आज द तर से ज द आ गये. सात बजे. रोज़ साढ़े आठ-नौ बजे तक आते ह.


ज द से नहा-धोकर तरोताज़ा हए
ु और हम चले राज के घर. पहले एक च कर िनकट
क दकान
ु का. चा द पका के िलये कुछ लेना चाहती थी. राज ने साढ़े सात बजे बुला
रखा था. इन दन अमर का म सूया त बहत
ु दे र से होता है - रात साढ़े नौ बजे के आस
पास. साढ़े सात बजे तो ऐसा लग रहा था जैसा भारत म शाम चार बजे लगा करता है .
पूरा, चमकता, उजास भरा दन. ज द करते-करते भी हम थोडा लेट हो ह गये. राज के
यहां पहंु चे तो घड़ आठ बजा रह थी. बहत
ु बड़ा आयोजन नह ं था. कोई दस-बारह लोग
थे. सभी सहकम . सभी युवा. सभी भारतीय. यहां भारतीय व अमर कय के स बंध
काम-काज तक ह सीिमत ह. घर आने-जाने क आ मीयता लगभग नह ं है . भारतीय
क अपनी एक अलग ह दिनया
ु है . िसएटल जैसे शहर म इस दिनया
ु का बना रहना
सहज और स भव है भी. अकेले माइ ोसॉ ट म ह लगभग चार-पांच हज़ार भारतीय ह.
कह ं भी जाएं - शॉ पंग माल म, पाक म, रे टोरे ट म, आपको साड़ ,सलवार, चूड़ , ब द के
दशन हो ह जाएंगे.

तो हम भी जूते उतार कर भीतर पहंु च.े बता दं ू क यहां जूते अिनवायतः बाहर उतारे
जाते ह. सभी आ चुके थे. दो युवा माताएं और उनके पितगण - अपने अपने िशशुओं म
मगन. एक क संतान पछली जून म हई
ु थी, एक क जुलाई म. चचा हई
ु क मई म मां
बनने वाली दो युवितयां (चा व द पका) यहां ह. इस तरह मई,जून,जुलाई,अग त म
लगातार बथडे पा टयां हआ
ु करगी. एक दो त इन लोग क दो-तीन दन बाद भारत से
आने वाली ह. उ ह ने अग त म िशशु को ज म दया था. उ ह भी िगन िलया गया था.
उनके पित पाट म थे. एक और दं पती थे. प ी गभवती थीं. दखाई भी दे रह ं थी पर
उनका प रचय यह कहकर कराया गया क वे ै ने ट ह. यहां गभाव था को गोपनीय
नह ं माना जाता. उसके बारे म जतनी खुलकर और सहज भाव से उ लासपूण चचा होती
है उसक भारत म क पना भी नह ं क जा सकती. इस खुलेपन का एक बड़ा फायदा यह
है क यां अपनी गभाव था के बारे म, उसके क के बारे म और उन क से बचने
के उपाय के बारे म सब कुछ जान जाती ह. डॉ टर भी बहत
ु खुलकर और व तार से
बात करते ह. नए माता- पता के िलये बाकायदा सेिमनास/काउं िसिलंग सेशस
ं होते ह और
लोग पैसा खच कर उनका लाभ उठाते ह. यह है जीवन के ित व थ कोण!

सभी से प रचय हआ
ु . रजनीश क बहन नयनतारा भी इसी िसएटल शहर म रहती है .
वह भी आई हई
ु थी. द पका के माता- पता और हम दोन को छोड़कर शेष सभी आपस
म बहत
ु अ छ तरह घुल-िमले
े थे. पर असहज हम भी महसूस नह ं कर रहे थे. अमर क
जीवन और आबो-हवा म कुछ ऐसी अनौपचा रक सहजता है क आप वाह से अछूते रह
ह नह ं सकते. हं सी-मज़ाक के दौर पर दौर चल रहे थे. नयनतारा से कहा गया क वह
आजकल राज के यहां बहत
ु आती ह. उसने भी मज़ाक का पूरा मज़ा लेते हए
ु जवाब
दया क आजकल यहां अ छे -अ छे पकवान जो बनते ह. इतना सुख क न केवल
खाओ, अगले दन के िलये पैक करके भी ले जाओ.. म सोच रहा था, या भारत म इस
तरह मज़ाक कया जा सकता है ? और या यह भी बहत
ु वाभा वक होगा क एक ह
शहर म बहन-भाई अलग-अलग घर म रह? बड़े शहर क द ू रय और काम क
य तताओं ने अ वाभा वक को भी वाभा वक बना दया है . जब भी फुरसत िमलती है ,
नयनतारा भाई के यहां आ जाती है . एमबीए कया है . कसी अ छ क पनी म काम
करती है . छोट -सी, यार -सी,गु डया-सी लडक . भारत म होती तो शायद मां कह ं अकेले
जाने ह नह ं दे ती, ले कन यहां सात समु पार पूरे दमखम से शानदार ज़ दगी जी रह
है . यह है आज क युवती.

यहां खाने क कुछ िभ न पर परा है .पहले अपेटाइज़र. पर भारत म इस से जो आशय


होता है (सूप वगैरह) उससे थोड़ा अलग. यहां अपेटाइज़र का आशय खा से होता है , बेशक
उसके साथ पेय भी हो सकता है . हम ेड रोल और कांजी बड़ा दया गया. यहां पेपर
नैप कन ( जसे ये लोग ट यू पेपर कहते ह) का भरपूर उपयोग होता है . िगलास
ड पोज़ेबल, पर इतने सुघड़ और सु दर क चाह तो अलमार म सजा ल. ट यू भी कम
ग रमापूण नह ं.

हं सी-मज़ाक का दौर चल रहा था. हम फेिमली म म ह थे. फेिमली म यहां एक


ऐसी जगह होती है जसम कचन भी शािमल होता है . ओपन कचन. कचन, एक बड़
ू , ट वी, यू ज़क
टे बल, कुछ सोफे ( ज ह ये लोग काउच बोलते ह), कुछ कुिसयां, टल
िस टम; यािन जहां बैठकर आप गपशप करते हुए, अनौपचा रक व सहज प से खा-पी
सक. टे बल पर केक लगा दया गया था. द पका ने ( ज ह डॉ टर के अनुमान के िलहाज़
से इस समय अ पताल म होना चा हये था) केक काटा. सबने तािलयां बजा , ‘है पी बथ
डे टू यू’ गाया.

राज और मुकेश ने पूछा क म ंक म या लेना पस द क ं गा. राज के यहां बहत



समृ बार है . मेर पस द ह क थी. राज ने ट चस ह क क बॉटल िनकाली. राकेश
जी और उषा जी -द पका के माता पता- लखनऊ म रहते ह. ये गु ा दं पती भी हमार
ह तरह दसर
ू बार अमर का आये ह. हम लोग यहां के जीवन के बारे म अपने अनुभव
बांटना शु करते ह. यहां क सु यव था, यहां क सफाई, यहां का सुगम नाग रक जीवन,
वगैरह. इन लोग ने कल 'धूप' फ म दे खी थी और इनसे ह उसक ड वीड लेकर आज
दोपहर हमने भी दे ख डाली. मेरे जेहन पर 'धूप' का कथानक छाया हआ
ु था. भारत म
शायद यह फ म रलीज़ ह नह ं हो पाई है , हालां क इसका संगीत काफ चला है . म तो
इस फ म से अिभभूत था. गु ा जी भी. कहानी भारत म या ाचार और
िनक मेपन से एक आदमी (ओम पुर ) क लड़ाई क है . इससे मुझे सव र दयाल
स सेना क 'लड़ाई' भी याद आती रह . हम दोन यह चचा करते रहे क य भारत म ह
ऐसा होता है , अमर का म नह ं. यहां तो जसे जो काम करना है , पूरे मन से करता है .
भारत म तो जैसे वक क चर है ह नह ं. चचा ह ब-मामूल िस टम पर आकर अटक
जाती है . हम लोग अमर का क , उसक पूंजीवाद सं कृ ित क , मनु य वरोधी आचरण क ,
सार दिनया
ु पर अपनी चौधराहट लादने क खूब लानत मलामत करते ह. पर इसी
अमर का का दसरा
ू पहलू भी है, यहां का साफ-सुथरा नाग रक जीवन. इसी को दे खकर
समझ म आता है क य अमर का दिनया
ु के सबसे समृ , शानदार और जीवंत दे श म
िगना जाता है . हमार चचा इससे फसलकर आम जीवन पर आ जाती है . भारत म हम
कपड़ वगैरह क खूब िचंता करते ह. यहां उनक ब कुल भी िचंता नह ं क जाती. आप
जो और जैसे चाहे पहन ल. िन कर(घुट ना) और िघसा हआ
ु बिनयान जैसा ट शट पहन
कर तो लोग नौकर पर चले जाते ह. इस आयोजन म भी कोई बना-ठना नह ं था.
युवितयां भी नह ं. एक अपवाद द पका थीं. उ ह होना भी था. पर वे भी उस तरह सजी-
संवर नह ं थीं जैसे अपने ज म दन पर भारत म होतीं. शेष सब तो िनतांत काम
चलाऊ कपड़ म थे. अमर का म कपड़ का तो यह आलम है क पछली बार जब हम
यहां आये तो म जो सूट टाई वगैरह लाया था, उ ह उसी पै ड अव था म वापस ले गया.
लगा क सूट-टाई म अजूबा लगूंगा. यहां तो शॉट, ट शट, जींस यह चलता है . घर म
भी, द तर म भी और पाट म भी. औपचा रक वेशभूषा तो बहत
ु ह कम अवसर पर
इ तेमाल होती है .

हमार गपशप के बीच ह प ज़ा भी आ गया. एक पेग ख म हो गया, गु ा जी दसरा



बना लाये. उधर युवा समूह म ( जसम ीमती गु ा और ीमती अ वाल भी थीं,बावज़ूद
इसके क उनका युवा होना स द ध था) गपशप का उ मु दौर चल रहा था. य म

सहज हो जाने का ज मजात गुण होता ह है . आवाज़ के टकड़े हम तक भी आ रहे थे.
द पका के पता और म अपना अपना िगलास लेकर इस फेिमली म से सटे िल वंग
म (जो हमारे ाइं ग म के समक होता है ) म जा बैठे. पूर पाट म म दरा ेमी हम
दो ह थे. वहां से भी हम इधर का सब कुछ दखाई-सुनाई दे रहा था. बाद म घर आकर
मने वमला से जाना क सभी अपने-अपने ब च के ज म का ब दास वणन कर रह
थीं. वमला घर आकर भी 'हाय राम' मोड (Mode) म थी. यहां सव के समय पित तो
उप थत रहता ह है , अ य प रवार जन भी रह सकते ह. नयनतारा से कहा जा रहा था
क वह द पका के सव क फोटो ाफ करे और वह (बेचार कुंवार ह द ु तानी लड़क )
सव का नाम सुनकर ह घबरा रह थी, और सब दे वयां उसक इस घबराहट का मज़ा ले
रह थीं.
यहां कोई कसी से औपचा रकता नह ं बरतता. सब एक दसरे
ू को उसके नाम से पुकारते
ह. जी, साहब, बहनजी, भाभीजी का बोझ ये लोग भारत से यहां ढोकर नह ं लाये ह. खाने
पीने के मामले म कोई मनुहार नह ं है . यह बहत
ु आम है क आप कसी के घर जाएं तो
गृह वामी आपके खाना शु करने का इं तज़ार ह न करे . आपको खाना है , खाएं, न खाना
है , न खाएं. अगर यह आस लगाई क कोई दो बार आ ह करे गा तभी खाएंगे, तो भूखे
ह रह जाएंगे.

खाना खाकर झूठे बतन िसंक म साफ करना तथा डश वाशर म लगाने के िलये तैयार
कर दे ना यहां आम है . इससे गृह वामी/ वािमनी को जो आसानी होती है , उसे दे खकर
ह समझा जा सकता है .

लोग एक एक करके वदा हो रहे थे. हम य क उनके वदा माग म ह थे, सभी हमसे
भी बाय-बाय करते जा रहे थे. ं क ख म कर और पेट म वा द प ज़ा ठू ं स कर (म तो
यादा ह खा गया था!) हम लोग भीतर वाले िल वंग ए रया म आ गये. अब हम
प रवारजन ह रह गये थे. राज-द पका, नयनतारा, मुकेश-चा , और हम दोन माता पता
युगल. थोड़ दे र सी वस खेला. पहली बार ह खेला पर मज़ा आया..
जब उठे तो यारह बज रहे थे. इस वास म हमारे िलये पहला अवसर था यह दे खने
समझने का क एक िभ न सं कृ ित कस तरह आपको अपने अनु प ढालती है , और य द
आप ववेकशील ह तो कस तरह दोन सं कृ ितय क अ छाइय को अपना लेते ह!

.*******************

ज़ंदगी, मेरे घर आना, ज़ंदगी !i


उफ
नई ज़ दगी का शानदार वागत !

यह हमार दसर
ू अमर का या ा थी.

पहली बार 2002 के अ टोबर म बेट -दामाद के बुलावे पर अमर का घूमने आए थे.
अमर का या ा के म म सबसे मु क़ल होता है अमर का का वीज़ा िमलना. उस व त
हम बमु क़ल तीन मह ने का वीज़ा िमल पाया, उसम से भी एक मह ना तो रज़वशन
वगैरह िमलने म ह बीत गया. डे ढ़ मह ना यहां रहे , खूब घूमे- फरे .

दो साल भी नह ं बीते क फर अमर का आने का संयोग बन गया. बेट गभवती थी.


बेट -दामाद ह नह ं, इनके प रवार वाले भी चाहते थे क इस व त हम लोग इनके साथ
ह . हम भी कोई खास द क़त नह ं थी. पछली बार तो सरकार नौकर म था, यादा
छु टयां िमलना मु क़ल था. अब सेवािनवृ हो जाने से वह द क़त भी नह ं रह थी.

द क़त एक ह थी - वीज़ा िमलने क . अमर क वीज़ा िमलना इतना मु क़ल माना जाता


है क भारत के अखबार म तो पेशव
े र वीज़ा सलाहकार के व ापन पते ह, आपको
इ टर यू के िलये बाकायदा तैयार कया जाता है . ले कन हमने तो सोच िलया था क जो
भी पूछा जाएगा, उसका सच-सच जवाब दे दगे.

ले कन चा क सलाह कुछ अलग थी.

प ी का और मेरा खयाल था क अमर क दतावास


ू म इ टर यू म यह तो पूछा ह
जायेगा क हम इतनी ज द दबारा
ु अमर का य जाना चाहते ह ? और हमारा सौ-टका
सच जवाब होगा- "बेट क गभाव था म उसक सहायता के िलये." ले कन चा ने
सलाह द थी क हम भूलकर भी यह जवाब न द. च कने क बार हमार थी. सच को न
बताने क वजह ? चा ने समझाया क यह उ र दे ने पर वीज़ा अिधकार यह कहकर हम
िन र कर दगे क "इस कारण जाने क कोई ज़ रत नह ं है , इस काम के िलये तो
अमर क िच क सा सेवाएं ह पया ह." हमारा भारतीय मन इस बात को पचा नह ं
पाया. आ खर कोई भी डॉ टर, कोई भी अ पताल- चाहे कतना ह अ छा य न हो,
मां-बाप या घर वाल का वक प कैसे हो सकता है . ले कन फोन पर बहस मुम कन नह ं
थी...

क़ सा कोताह यह क चा क सलाह पर अमल कया, कहा हम सेवा िनवृ के बाद


फुसत से अमर का घूमना चाहते ह, प ली बार यादा छु टयां न िमल सकने के कारण
ठ क से घूम नह ं पाए थे (और यह बात िम या भी नह ं थी !)-- और दस साल का
वीज़ा िमल गया, म ट पल ए वाला. वीज़ा िमल जाने क याशा म हवाई जहाज म
ट कट पहले ह लाक करवा रखे थे, अत: उसम कोई समय लगा नह ,ं और 28 अ ेल
2004 क दोपहर हम अमर का क धरती पर, अपनी यार बेट और उससे भी यारे दामाद
के सामने थे.

चा ने जो कहा था, उसे दे खने-समझने का मौका िमला कोई पं ह दन बाद.

ु ड़ -टक
इस बीच टक ु ड़ म अमर का क िच क सा सु वधाओं के बारे म हमारा ानवधन
होता रहा.

अमर का म िच क सा सु वधा बहत


ु यादा महं गी है . इसके अपने कारण ह, जनक चचा
कभी अलग से क ं गा. ले कन इस समाज ने महं गी िच क सा ा करने का भी एक
तर का तलाश िलया है , या बना िलया है . वह है मे डकल इं योरस. यहां अिधकांश लोग
अपना मे डकल इं योरस कराते ह और तब इलाज़ का यय भार इं योरस क पनी वहन
करती है . इं योरस क कई ला स ह, बीिमत रािश भी अलग-अलग होती है , इ ह आप
अपनी ीिमयम चुकाने क है िसयत के अनुसार चुन लेते ह. मुकेश और चा दोन
य क माइ ोसॉ ट म काम करते ह, माइ ोसॉ ट ह इन दोन का ीिमयम भरता है .
इस िलहाज़ से माइ ोसॉ ट काप रे शन अमर का के े तम िनयो ाओं म से है क वह
अपने कमचा रय को सव े िच क सा बीमा का संर ण दलाने का यय भार वहन
करता है . मज़े क बात यह क सूित यय भी मे डकल इं योरस से ह होता है . चा
क सूित का सारा यय भार इनके मे डकल इं योरस से ह वहन हआ
ु और उस
इं योरस का ीिमयम इनके िनयो ा ने चुकाया. (हमने बाद म जाना क चा के सव
पर कुल 14,000 डॉलर खच हआ
ु , यािन भारतीय मु ा म . 7 लाख.)

गभ धारण करते ह आपको कसी अ पताल म पंजीयन करवा लेना होता है . यहां
लगभग सब कुछ िनजी े म है . चा ने अपना पंजीयन एवर ीन अ पताल म करवाया
था. संगवश, यह बता दं ू क इस अ पताल क गणना सूित के िलहाज़ से अमर का के
दस े अ पताल म क जाती है . बहत
ु िनयिमतता से चा का चेक-अप होता रहा,
दवाइयां िमलती रह ं. इसी दौरान चा और मुकेश -भावी माता पता- को उन सेिमनास
को भी अटै ड करने का मौका िमला जनम गभ धारण, गभ वकास-उसक या,
सम याओं और सावधािनय का पूरा ान कराया गया और नवजात िशशु को पालने का
बहत
ु सघन िश ण दया गया. इन लोग से समय-समय पर हई
ु चचा से यह बात पता
लगी क जो बात हम दादा-दाद बनकर तथा अब नाना-नानी बनने के कगार पर
पहंु चकर भी नह ं जान पाये ह वे सब बात ये लोग वै ािनक तौर पर जान-सीख चुके ह.
जब भी इनके दो त, जो क वाभा वक प से इनके हम उ ह, घर आते, ब च के बारे
म ह चचा होती, और हम इनक जानकार क गहनता से च कत होते. कहना अनाव यक
है , यह सारा ान उ ह िश ण क दे न था जो भावी माता- पता को अ पताल म दया
जाता है . यह ं यह भी बता दं ू क इन म से अिधकांश िश ण भार फ स चुकाकर ा
कये जाते ह. और यह भी, क यहां गोपनीयता जैसा कुछ भी नह ं होता. सब-कुछ
ू . िन य ह इस खुलेपन के अपने फायदे ह, ज ह हम भारतीय
बेबाक, दो टक यादा
अ छ तरह समझ सकते ह.

तेरह मई क शाम से चा को सव पीड़ा शु हो गई थी. हम दोन िचंितत थे, ले कन


चा और मुकेश अपने िश ण क वजह से जानते थे क नवजात के आगमन का ण
अभी कतना दरू है . रात इन लोग ने अपने डॉ टर को फोन करके मश वरा कया. कहा
गया क सुबह अ पताल आ जाएं.

रात जैसे-तैसे कट . सुबह मुकेश चा को लेकर अ पताल चले गये और हम बेस ी से


उनके स दे श क ती ा करने लगे. कोई एक घंटे बाद मुकेश का फोन आया क चा
को भत कर िलया गया है और हम दोन को लेने उनके िम राज, जो पास म ह रहते
ह, आ रहे ह.

राज के साथ हम अ पताल पहंु च.े


अमर का म अ पताल से यह हमारा पहला सा ा कार था. अगर हमने बाहर बोड न पढ़ा
होता तो यह समझते क राज हम कसी पाँच िसतारा होटल म ले आये ह. बहत
ु भ य
और एकदम साफ सुथरा. कर नेदार. ऑटोमे टक दरवाज़ को पार करते हए
ु , और जन
दरवाज़ से आपको न गुज़रना हो, आपक आहट से उनम लगे ससर स य हो जाने से
उनके भी खुलने ब द हो जाने के खेल का आन द लेते हए
ु , कई साफ सुथरे , चमचमाते
गिलयार से गुज़र कर हम उस कमरा न बर 2169 तक पहंु चे जहां हमार बेट अनेक
हाई-टे क उपकरण के बीच एक बड़े बेड पर लेट थी. कमरे म एक छोटा ज, एक ट वी,
एक वीसीड -ड वीड लेयर, एक यू ज़क िस टम, एक अित र बेड, एक बाथ म, जसम
जाकुजी सु वधा तक थी, एक क यूटर वगैरह थे. यह पूर सूची नह ं है , पर इससे वहां
उपल ध सु वधाओं का अ दाज़ लगाया जा सकता है . जस बेड पर चा लेट थी उस
पर कई तरह के वच थे जनसे पलंग को ऊपर-नीचे कया जा सकता था, संगीत सुना,
ट वी दे खा जा सकता था, नस से बात क जा सकती थी या उसे बुलाया जा सकता था,
वगैरह. कमरे के बाहर एक खुला-खुला बड़ा-सा ती ालय था, जहां और एक ट वी था
और थी कई सार प काएं. पास ह , यािन 5-6 कमर के बीच एक साझा कचन जैसा कुछ
था जहां एक माइ ोवेव अवन, ज ( जसम काफ माल भरा था), कॉफ के बड़े -बड़े थमस
वगैरह थे. बहत
ु सारे पाउच थे जनम दध
ू , चीनी, नमक, िमच, कई तरह क चाय थी. इस
कचन से कोई भी अपनी ज़ रत के अनुसार साम ी ले सकता था या अपने साथ लाई
साम ी यहां लाकर गरम कर सकता था. अ पताल के वेश ार के पास ह एक वे डं ग
मशीन भी थी जसम िस के डाल कर को ड ं क, िच स वगैरह खर दे जा सकते थे. वह ं
एक िग ट शॉप भी थी जहां से गुलद ते और छोटे -मोटे उपहार खर दे जा सकते थे.
यादा सह तो यह कहना होगा क वहां अ पताल म आने वाल के काम क हर चीज़
उपल ध थी.

चा के कमरे म एक नस थी - जीना. बहत


ु ह स य, बहत
ु ह शालीन, अ यिधक
कमिन . वह सारे मॉनीटस पर तो नज़र रख ह रह थी, साथ-साथ अ पताल के तं से
जुड़े क यूटर पर सूचनाओं का ेषण भी करती जा रह थी. और इतना ह नह ं, चा क
हर ज़ रत पूर करते हए
ु उसक विभ न ज ासाओं का समाधान भी करती जा रह थी.
पूरे दन म दो-एक बार उसे बाहर जाना पड़ा तो अपनी जगह कसी और को बठा कर
ह गई. जो भी नई नस आती, मु कराकर हाय/है लो करती, अपना नाम बताती और ऐसी
त परता से अपने काम म लग जाती मानो कई दन से यह ,ं इसी कमरे म काम कर
रह हो. इनको दे खकर जी चाहता था श दकोष से कामचोर श द को िमटा ह दया
जाए.
हमारे िलये उस दन खाना राज और द पका अपने घर से बनाकर ले आये थे. (बाद म
भी मुकेश-चा के कोई न कोई िम ह अपने घर से हम सबके िलये खाना-ना ता लाते
रहे . न केवल अ पताल म, ब क घर पहंु चकर भी हम दो दन िम के घर से आया
भोजन ह करते रहे .) द पका का सव भी इसी अ पताल म होना था और डॉ टर भी
उसने वे ह चुने थे जो चा ने चुने थे. यहां मर ज़ को हक़ है क वह अपना डॉ टर
चुने. सव क स भा वत ितिथ भी एक ह थी. मज़ाक चलता रहता था क द पका भी
भत हो जाएं तो हम एक साथ ह दो िशशुओं को लेकर घर जाएं. चा -मुकेश तथा
राज-द पका को दे खकर दो ती के नये रं ग क खुशबू का एहसास हआ
ु .

चा के पर ण बराबर चल रहे थे. डॉ टर िचंितत थे क िशशु के आगमन क या


उनक आशा के अनु प व रत नह ं है . उ ह ने या को गित दे ने के यास करने के
साथ ह चा क र ढ म एक इं जे शन (epidural) भी लगा दया ता क सव वेदना कम
से कम महसूस हो.

काफ य और ती ा के बाद अंततः शाम कोई साढ़े चार बजे डॉ टर ने यह िनणय


िलया क सीज़े रयन करके ब चे को दिनया
ु म लाया जाय. अगर यह नॉमल डलीवर
होती तो ब चा उसी कमरे म दिनया
ु के पहले दशन करता जसम चा अब तक थी. पर
सीज़े रयन के िलये चा को ऑपरे शन िथएटर म ले जाया जाना था.

यहां दं पती को पहले से ह एक फॉम भरकर यह बता दे ना होता है क सव के व त


कौन-कौन य उप थत रहे गा. ऐन सव के व त पित तो उप थत रहता ह है ,
प रवार या िनकट के और भी जतने लोग चाह उप थत रह सकते ह. मुकेश ने खुद के
अलावा वमला का नाम दे दया था. हमार चा को लगभग अ बेहोशी म े चर पर
िलटाकर ऑपरे शन िथएटर क तरफ ले जाया गया. मुकेश, वमला और म साथ थे. चा
ने थोड़ -सी आंख खोली तो मने आंख ह आंख म उसे आशीवाद दया, उसका हाथ हौले-
से दबाया, और वे लोग मुझे बाहर छोड़ भार दरवाज़ के भीतर ऑपरे शन िथएटर म घुस
गये.

अब म था और था ल बा गिलयारा. सामने भार दरवाज़ा. उसके पीछे शायद और


दरवाज़ा, फर कुछ और . . .और शायद तब एक टे बल पर लेट मेर बेट . . . . . .

गिलयारे म कभी-कभार कोई गुज़रता. अगर -स पक होता, हाय/है लो हो जाती. आम


अमर क को कसी भी अजनबी को दे खकर मु कुराने व उसका अिभवादन करने म ज़रा
भी संकोच नह ं होता. आ मीयता का यह अकु ठत व तार अ छा लगता है . यादातर
अमर कय के हाथ म कोक का कैन या कॉफ का ढ कनदार िगलास ज़ र होता.
कसी- कसी के साथ गोरे-गोलमटोल-गदबदे बबुए जैसे िशशु भी. या क उछलते-कूदते
ब चे. समय बीतता जा रहा था, परं तु उसक गित जैसे धीमी हो गई थी. अ दर न जाने
या चल रहा होगा? कैसी होगी हमार बेट ? कभी दरवाज़ा खुलने क आहट होती तो
मन चौक ना हो जाता. अ दर से बाहर कम आ रहे थे, बाहर से अ दर ह थोड़ -थोड़ दे र
म कोई न कोई जा रहा था. शायद दसेक लोग तो भीतर जा चुके ह गे. कह ं कोई
ग भीर संकट तो नह ?ं अपना यान बंटाने को बाहर ताकने लगता हंू . गिलयारे के छोर
तक दो च कर पहले ह लगा चुका हंू . बाहर साफ-सुथरा मैदान है . दरू-दरू तक फैली
ह रयाली और उस पर उतरती शाम क मुलायम धूप. ऐसी ह धूप के िलये तो धमवीर
भारती ने कहा होगा- ‘जॉजट के पीले प ले-सी धूप’. दरू कह ं से आते संगीत के वर
मानो हौले-से मुझे सहला जाते ह, आ त कर जाते ह. कहां से आ रहे ह गे ये वर?
चार तरफ तो शीशे जड़े ह! पूरा भवन वातानुकूिलत है . बाहर क कोई आवाज़ तो
अ दर आ ह नह ं सकती. फर यह वर-लहर ? अपना यान क त करता हंू . अ छा !
तो यह बात है . पूरे ह भवन म यू ज़क िस टम लगा है . बहत
ु ह क , थपथपाती-सी
वर लहर उसी से वा हत होती रहती है . इतनी ह क , मान हो ह ना. संगीत का
भाव यहां महसूस होता है . उ े िलत मन को शांित िमल रह है . पा ा य शा ीय संगीत
जैसा कुछ है . मैने दे खा है क यहां ये लोग अपनी वरासत का बहत
ु खूबसूरत
(वा ण यक) उपयोग करते ह. गभवती मां के सुनने के िलये मो ज़ाट, बाख, बीथोवेन
आ द के संगीत क सीड यहां आम है . यह चा रत करते हए
ु इ ह बेचा जाता है क
इससे गभ थ िशशु के मानिसक वकास को गित िमलती है . चा के यहां ऐसी सीड
दे खकर मुझे बहत
ु अ छा लगा. मन म यह वचार भी आया क प डत र वशंकर, िशव
कुमार शमा, उ ताद अली अकबर खां, ह र साद चौरिसया आ द के संगीत का भी तो
यह भाव होता होगा - अगर होता हो. असल बात तो माक टं ग क है , पर सच कहंू , इस
माक टं ग से मुझे खुशी हई
ु . बाद म मने यह भी पाया क नवजात िशशु के जो खलौने
ह उनम भी मो ज़ाट, बीथोवेन, बाख वगैरह के संगीत का उपयोग कया जाता है .
अ पताल म जो संगीत बज रहा था, वह चाहे जसक रचना हो, था बहत
ु भावशाली.
अगर भारतीय संगीत होता तो म उसे पहचान भी लेता.

तभी दरवाज़ा खुलने क आवाज़ हई


ु .
दो आकृ ितयां. शायद एक पु ष, एक म हला. शायद इसिलये क दोन ने अ पताल के हरे
चोग म अपने को पूर तरह आवृ कर रखा है . "पापाजी" - अरे यह तो मुकेश क
आवाज़ है . "कां े युलेशस
ं , इ स अ डॉटर !" एक ी वर. मुकेश के हाथ म वी डयो
कैमकॉडर है , डॉ टरनी के हाथ म मेर स जात नाितन. मेरा गला ं ध-सा जाता है .
डॉ टर को ध यवाद दे ता हंू पर इतने अ प वर म क शायद उ ह सुनाई भी न पड़ा
हो. सुनाई पड़ा भी होगा तो समझ नह ं आया होगा. वे लोग गिलयारे के दसरे
ू छोर पर
चले गये ह. या यह सपना था? या वाकई हम नाना-नानी बन गये ह! कुछ और चहल-
पहल होती है . ऑपरे शन िथएटर से कुछ और लोग िनकलते ह. और फर े चर पर मेर
लाड़ली चा . नीम बेहोशी म. साथ-साथ वमला, जसे हरे चोगे म पहचानने म थोड़ा ज़ोर
लगाना पडा. आवाज़ पहले पहचानी, आकृ ित बाद म. चा को होश नह ं है . वमला मुझे
आ त करती है क सब कुछ ठ क से हो गया है . म भी उनके पीछे -पीछे हो लेता हँू .
चा को फर से उसके कमरे म ले आया गया है .

शाम 6.02 बजे हमार नाितन ने इस दिनया


ु म अपनी आंख खोली ह. म मन ह मन
ाथना करता हंू . भगवान इसे ल बी उ दे ना और दे ना वह श क यह अपनी दिनया

को और बेहतर बना सके. याद आने लगता है क अपने छोटे -से शहर िसरोह म हम
लोग चा के मां-बाप के प म भी जानने लगे थे. यह नई पहचान हम अपनी बेट क
मेधा के कारण िमली थी. आज वह छोट -सी चा जो सात समु पार आकर शान से
अपनी गृह थी चला रह है , खुद एक बेट क मां बन गयी है . िसरोह जैसे छोटे शहर म
रहकर, सरकार कूल म पढ़कर, सॉ टवेयर इं जीिनयर बनकर अपना और हम सबका
नाम रोशन करने वाली चा क बेट भी इसी तरह उसका और हम सबका नाम रोशन
करे - इसके िसवा और कोई भाव मन म नह ं उभरता.

चा वमला, नस और डॉ टर के साथ कमरे म ले जाई गई. थोड़ दे र म नए, ग वत,


आ ा दत पता मुकेश भी अपनी नई-नवेली बेट के साथ कमरे म आ गए. वमला ने
दरवाज़ा खोल मुझे पुकारा- "चा आपको बुला रह है !" भीतर गया तो चा ने बहत

ह के-से अपना हाथ बढ़ाकर लगभग ं धे वर म कहा, " पापा, आप नाना बन गये!"
नह ं याद क मने जवाब म या कहा. कुछ कहा भी या नह ं ? न भी कहा हो तो या
हज़? मन म तो थीं मौन ाथनाएं. आंख म थे आंसू. खुशी के आंसू. शायद जीवन म
ऐसे आंसू कभी नह ं आये. मां-बाप के िलये ब चे कभी बड़े नह ं होते. चा मेरे िलये अभी
भी 'मु नू' ह है . ले कन अब चा मां है . उसके पास ह झूले म लेट है उसक बेट .
सामने दपण पर एक खूबसूरत चाट लगा है जस पर दो कालम म तीन-तीन खाने बने
ह. पहले कालम म मां, पता और िशशु के नाम, दसरे
ू म अ पताल के ऑन यूट टाफ
के नाम. चा , मुकेश के नीचे तीसरा नाम िलख दया गया है- न या !

थोड दे र म डॉ टर आती ह, शायद चीनी ह. फर से हम मुबारकबाद दे ती ह. फर नस


नवजात िशशु को नहलाने क तैयार करती है , पहले बहत
ु सावधानी से पानी का तापमान
जांचती है , फर कुछ रसायन से (शायद शै पू हो, या कुछ और) वह ं कमरे म लगे वाश
बेिसन म ब टया क ब टया न या को नहलाती है . मुकेश फोटो ाफ म य त ह. यहाँ
बड़ दलच प बात यह है क अ पताल वाले फोटो ाफ के िलये मना नह ं करते, कुछ-
कुछ ो सा हत भी करते ह. न या भा यशाली है क बड़ होकर वह दिनया
ु म अपने
आगमन का पूरा वृ ांत दे ख पायेगी. वह यह भी दे खेगी क जब वह दिनया
ु म आ रह
थी, उसके पता कतने आ ा दत थे और मां ने उसे दिनया
ु म लाने के िलये कतनी
पीड़ा सह थी. िन य ह ये छ वयां उसे अपने मां-बाप के ित अिधक संल नता का
अनुभव करायेगी. इस बीच मुकेश ने नहा-धोकर पालने म लेट अपनी लाड़ली के साथ
हमारे फोटो खींचे ह. कुछ फोटो मने भी िलये ह. म बाहर जाकर कॉफ ले आया हंू .

मुकेश उसी कमरे से सेलफोन से सबसे पहले अपने गांव वराड़ा अपनी मां को यह शुभ
समाचार दे ते ह, फर मु बई अपने बड़े भाई को. फर म सूरत फोन कर (अपने बेटे)
व ास को यह सुसमाचार दे ता हंू क वह मामा बन गया है .

मुकेश ने फोन कर दया था. राज आ गये ह. हाथ म फूल क खूब बड़ डिलया और
उससे बंधा गैस का आकषक गु बारा जस पर िलखा है - कॉ े युलेशस
ं ! चा भी बीच-
बीच म आंख खोल लेती है . थोड दे र म न या भी अपनी उप थित का एहसास कराने
लगती है . चा को जैस-े जैसे होश आता जा रहा है , उसक वेदना (श य- या जिनत)
बढ़ती जा रह है .

डॉ टर बार-बार आकर मां-बेट को स भाल रह है . नस तो वहां अनवरत सेवा म है ह .

अब जाकर मुझे समझ म आया है क य अमर क वीज़ा अिधकार के सामने यह


कहना बेमानी होता क हम अपनी बेट के सव के िलये अमर का जाना चाहते ह. यहां
हमारे िलये करने को था ह या ? जो कुछ करना था, ब क यादा सह तो यह कहना
होगा क जो कुछ भी कया जा सकता था, उसके िलये तो अ पताल ज़ रत से यादा
त पर और मु तैद था, और है .
अमर क समाज मनु य जीवन को कतना क मती मानता है , इस बात को यहां क
िच क सा यव था को दे खे बगैर समझा ह नह ं जा सकता.

पूरे गभकाल म समय समय पर चा क जांच क गई, उसे परामश और यथाव यकता
दवाइयां द ग . यहां यादा दवाइय म व ास नह कया जाता. जब तक बना दवा के
काम चल सकता है , चलाया जाता है , उसके बाद कम से कम दवा से इलाज़ क कोिशश
रहती है . न केवल चा को, मुकेश को भी नए िशशु के आगमन के बारे म सब कुछ
समझा-बता कर उ ह उनक नई ज़ मेदा रय का वहन करने के िलये तैयार कर दया
गया था.

यह सब तो हमने केवल सुना.

ले कन अ पताल म रहकर जो दे खा वह हम अिभभूत करने के िलये पया था. डॉ टर


हो या नस, अपनी ज़ मेदार के िनवाह के िलये सौ नह ं ब क एक सौ दस ितशत
तुत. अपने काम म पूरे तरह द . यवहार म िनतांत िश , शालीन और वन .
दरअसल यहाँ कुछ भी चांस पर नह ं छोडा जाता. मां और नवजात िशशु के सारे पर ण,
सारे सुर ा कवच, सारे र ा यास. यह कारण है सव के दौरान कुछ भी अ य घ टत
होना यहां क पना से बाहर ह है . अगर सामा य सव हो, दस बारह घ टे म अ पताल
से छु ट . चा का य क सीज़े रयन था, उसे 72 घ टे अ पताल म रखा गया.

एक व थ समाज म नई ज़ दगी के आगमन का उ सव कतना ज़ मेदार भरा और


शानदार होता है , यह दे खने का मौका हम हमारे चा -मुकेश ने दया. ब क कहंू , हमार
न या ने दया.

सब कुछ अपनी आंख दे खकर लगा क अगर अमर क वीज़ा अिधकार सव के समय
कसी प रवारजन के उप थत होने क ज़ रत म सूस नह ं करते तो इसम गलत या
है ? इतनी उ दा, ोफेशनल और क टयस िच क सा सेवा, क आप उस पर भरोसा कर चैन
क नींद सो सक, केवल सराहनीय ह नह ं अनुकरणीय भी है . अ पताल म ग दगी का
नामो-िनशान नह ं, कह ं कोई अ यव था नह ं, कोई चीख-पुकार नह ं, शोर शराबा नह ं,
झगड़ा-बहस नह ं क यह मेरा नह ं अमुक का काम है , म य क ं . मुझे तो बार-बार
अपने िम सु िस कथाकार वयं काश क कहानी 'अगले जनम' क याद आती रह .
ज ह ने भारतीय अ पताल म सव क बेहू दा थितयां खुद नह ं दे खी-भोगी ह, उ ह
यह कहानी ज़ र पढनी चा हये. सूता से नस कैसी बेहू दा बात करती ह, ग दगी का या
आलम होता है , वगैरह. हालां क कहानी का असल मक़सद कुछ और है . लगे हाथ उसक
भी चचा कर ह दं .ू भारतीय समाज म सार िश ा, सार गित, तमाम आधुिनकता के
बाद भी अभी भी लड़क का ज म उ लास का नह ं, अवसाद का ह संग होता है . बड़े -बूढ़े
तो ठ क, नौजवान पीढ़ के लोग भी पु ी ज म पर "चलो ल मी आई है " कहकर
सां वना ह दे ते ह. लड़के और लड़क क बराबर क बात केवल मंच और कताब तक
ह सीिमत है . बदलाव आ रहा है , पर इतना धीरे क लगता है जैसे कुछ भी नह ं बदल
रहा है . पा ा य समाज म ऐसा नह ं है . मह व लड़का या लड़क को नह ं, मां और संतान
क सुर ा को दया जाता है . लड़क का पैदा होना भी उतना ह मह वपूण और
आनंददायी होता है , जतना पु ज म. यहां अमर का म रह रहे भारतीय ने भी इस दे श
से यह सीख िलया है . यह संयोग ह था क इन दन चा -मुकेश के कई दो त प रवार
म नए िशशु क कलका रयां गूंजी. यह भी संयोग ह था क सभी नवजात लड़ कयां ह
थीं. सभी के यहां भरपूर खुशी और उ लास का माहौल. मुझे कह ं भी, लेशमा भी उदासी
या अवसाद, ढंू ढे से भी न िमला, और इससे मुझे बेहद खुशी हई
ु . इस बात क , क चलो
इ ह ने प म क एक अ छाई को आ मसात कया.

हम अमर कय से और कुछ सीख न सीख, उनक जीवन प ित और राजनीितक सोच


पर चाहे जतनी बहस कर ल, मनु य जीवन को वे जतना मह वपूण मानते ह और
ग रमा दान करते ह, वह तो अनुकरणीय है . म तो उनका मुर द हो गया हंू .

अगर हम वीज़ा न िमलता और इस मौके पर न आ पाये होते तब भी हमार बेट इसी


आ त और सुर ा के साथ मां बनती. उसे कोई खतरा तब भी नह ं होता. हां, इतना
ज़ र होता क हम अमर क यव था के एक उजले, और फर कहंू - अनुकरणीय पहलू को
अपनी आंख नह ं दे ख पाये होते.

बेट चा ने हम अमर का दे खने का मौका दया, उसक बेट (न या) ने इस अमर का का


एक बहत
ु यारा लोज़ अप दखाया.

ध यवाद न या !

पुन ः कुछ ह दन बाद हमारे घर डाक से एक छोटा-सा पैकेट आया. उस डॉ टर क तरफ से जसने
चा का सव करवाया था. पैकेट म िसरे िमक का एक छोटा-सा, बहत
ु खूबसूरत जूता था जस पर मुकेश,
चा , न या और उस डॉ टर के नाम अं कत थे तथा अं कत थी न या के इस दिनया
ु म पदापण क ितिथ.
डॉ टर क ओर से यह मृित िच पाकर हम सब को बहत
ु खुशी हई
ु . यावसाियकता को कला मक
आ मीयता का प दे ने का यह अ दाज़ बहत
ु यारा था.
*********************

i
गुलज़ार रिचत एक गीत क थम पं .

खूबसूरती का कारोबार

अमर का क आज क कशोर पीढ़ एक दशक पहले क कशोर पीढ़ से कई मामल म


बहत
ु अलग है . आज क यह पीढ़ इस बात को लेकर बहत
ु सजग है क जो कपड़े उसने
पहने ह उनके लेबल बहत
ु महं गे ह . यह ं यह कह दे ना ज़ र है क इन महं गे कपड़ का
खच इनके मां-बाप नह ं, ये खुद वहन करते ह. यािन महं गे कपड़े खर दने के िलये अगर
स ाह म पं ह बीस घ टे कसी बेकर म काम करना पड़े तो भी कोई हज़ नह ं.

कशोर वय क लड़ कयां आज जस बात को लेकर सबसे यादा िचंितत ह, कपड़ से भी


यादा, वह है उनके व का आकार. पं ह-सोलह वष क वय से ह ये लड़ कयां वशाल
व का सपना पालने लगती ह. इस सपने को साकार करने के िलये ये श य-िच क सक
के सतत स पक म रहती ह, पैसा बचाती-जमा करती ह और चाहती ह क कॉलेज जाएं
तो वशाल व के साथ ह जाएं.

आंकड़े बताते ह क 2000 से 2001 के एक वष म ह अठारह वष से कम उ क


लड़ कय म यह व श य या का आंकड़ा 65,231 से बढकर 79,501 हो गया, यािन
21.8% का उछाल! अमर कन सोसाइट ऑफ ला टक सजस(ASPS) के एक बयान के
अनुसार वष 2000 म 18 वष तक के युवाओं म हई
ु श य याओं म यह व - वशालन
क श य या तीसर सबसे लोक य श य या थी. इस एक वष म 3682 युवितय ने
अपने व बड़े करवाये. इसी एक वष के अ य सौ दय वषयक आंकड़े भी दे ख ली जये :

29,700 कशोर ने नाक का आकार ठ क करवाया,


23,000 कशोर ने कान का आकार ठ क करवाया,
95,097 कशोर ने अपनी वचा को िछलवाया (Peeled),
74,154 कशोर ने चेहरे क वचा को ठ क करवाया, और
45,264 कशोर ने लेज़र प ित से बाल हटवाये.
जहां तक व श य या का है , यह ं यह उ लेख कर दे ना भी ज़ र है क य प
अमर का का फूड ए ड ग एडिमिन े शन (FDA) 18 वष से अिधक क य को ह
यह श य या करवाने क अनुमित दे ता है , इससे कम वय क कशो रय को भी
(अलब ा गैर-कानूनी तर के से) यह काम करवाने म कोई बड द कत दरपेश नह ं
आती.

कशोर म अपनी काया को संवारने (य द इसे संवारना कहना अनुिचत न हो) के ित


यह उ माद बढता ह जा रहा है . 1994 म जहां व का आकार बढवाने वाली कशो रय
क सं या महज़ 392 और चब सोखवाकर(Liposuction) दबला
ु होने वाली क सं या 511
थी, 2001 म ये सं याएं बढकर मशः 2596 तथा 2755 हो ग .यािन 562 % क वृ .
यह जानकार दे ने वाले अमर कन सोसाइट ऑफ ला टक सजस (ASPS) के अनुसार
सभी वय के लोग म व बड़े करवाने तथा िलपोस शन ारा दबला
ु होने क दर म
1992 से 2000 के बीच मशः 386 तथा 476% क वृ हई
ु है .

श य या से अपने व का आकार बडा करवाने, आंख का आकार ठ क करवाने, ठु ड


क आकृ ित बदलवाने, नाक सीधी करवाने या कान को थोडा पीछे करवाने जैसी बात को
लेकर इन कशो रय के मन म ल जा या संकोच का कोई भाव नह ं है . हां उनक िचंता
यह अव य है क उनके व र जन उनके इस बदलाव का नो टस न ल. व र जन से
आशय कॉलेज के सीिनयस से है . और इसिलये ये लोग ऐसा समय चुनने पर वशेष
यान दे ती ह. आदश समय माना जाता है कूली पढ़ाई पूर होने और कॉलेज शु होने
के बीच का अंतराल.

मैनह टन के एक मुखाकृ ित ला टक सजन फिलप िमलर का कहना है क उनके पास


आने वाल म 30% वे लड़ कयां होती ह जो अपनी नाक छोट या मुंह बड़ा करवाना
चाहती ह. ये लोग फैशन प काओं म छपी मॉड स या िसने ता रकाओं क त वीर
दखाकर उन जैसा बना दे ने का अनुरोध करती ह.

व तुतः युवा पीढ का यह मानिसक झान उस बाज़ार क दे न है जो आकषक, रं ग-


बरं गी, भावी त वीर से अपना माल बेचने के म म युवाओं के सामने एक आदश
छ व खड कर दे ता है . बाज़ार ारा सृ जत यह दबाव इतना गहरा और घना होता है क
इन युवाओं को उन रोल मॉड स से िभ न कुछ भी बलकुल बेकार लगने लगता है .
अमर का म े ट इ ला ट स ता नह ं है . लगभग 7000 डॉलर. यािन भारतीय मु ा म
साढे तीन लाख पये. और, फर याद दला दं ू क यह धनरािश ायः इन युवाओं क
अपनी मेहनत क कमाई होती है . पर जैसा मने कहा, बाज़ार जो आदश रच दे ता है , उसके
िनकट पहंु चने के िलये कोई भी क मत यादा नह ं लगती. व ापन का मोहक संसार
आपके चार तरफ सवागपूण मॉड स का एक ऐसा संसार खडा कर दे ता है क आपको

अपनी दे ह क कोई छोट -सी वकृ ित (?) भी अखरने लगती है और आप उसे द ु त कराने
के िलये बड़ से बड़ क मत चुकाने को बेताब हो उठते ह.

और मामला जब बड़ क मत का हो तो कई तरह के खेल का चालू हो जाना आ यजनक


नह ं. कशो रयां मॉड स को दे खकर आकृ होती ह. उनके इस आकषण को हवा दे ने का
काम वे जन-स पक एजिसयां करती ह जनक सेवाएं महं गे दाम पर ल टक सजन
लोग खर दते ह. ये एजिसयां फैशन तथा सौ दय प काओं म इस तरह क
सौ दया मक(Cosmetic) ला टक सजर क कथाएं छपवाती ह. न केवल फैशन
प काओं म ब क समाचार प म भी वशाल व वषयक लेख छपवाकर इनके प
म माहौल बनाया जाता है . अब इ टरनेट के लोक य हो जाने के बाद तो इन ला टक
सज स ने अपनी वेबसाइटस के मा यम से भी कशो रय -युवितय को लुभाना शु कर
दया है . कुछ सजन यह काम अिधक सू म तर के से भी करते ह. वे सौ दयाकां ा को
आ म व ास से जोड़ दे ते ह. आपके कम आ म व ास क वजह आपक नाक, कान या
छाती के आकार को बताकर आपको अपने लिनक क तरफ खींचते ह.

सु दर द खने क यह चाहत 'बड़ा' या वशाल होने म ह नह ं, इसक वपर त दशा म भी


अिभ य होती है . नई पीढ़ क कशो रय म दबला
ु होने क चाहत भी कम बल नह ं
है . दे ह पर एक िमलीमीटर भी चब (गलत जगह पर) न हो, और आप कसी मॉडल-सी
त वंगी दख इसके िलये भूखा मरना सबसे आसान (और स ता भी) उपाय है . यह
लोक य भी कम नह ं है . पर इसके बावज़ूद दबला
ु बनाने का धंधा भी यहां बड़े मज़े म
धड़ ले से चल, ब क दौड़ रहा है . व ापन , दवाइय , कसरत और कई तरह क सलाह
के ज़ रये आपको त वंगी बना दे ने का खूबसूरत वाब दखाने वाले भी यहां भरपूर कमाई
कर रहे ह.
सु दर द खने का यह पूरा कारोबार एक खुदगज़ उ यावसाियक समाज क दे न है . यह
समाज आपके सामने पहले रोल मॉडल स जत करता है , फर उन जैसा बनने के तर के
सुझाता है , फर उन तर क क सफलता क ामा णक(?) कथाएं गढ़ और चा रत कर
आपको अपने जाल म फंसाता है . सारा कारोबार चलता है बतज़ ‘तु ह ने दद दया है
तु ह ं दवा दे ना’. और यह सारा कारोबार इतनी कुशलता से संचािलत कया जाता है क
आपको तो केवल मंच पर नाचतीं-िथरकतीं कठपुतिलयां ह दखती ह, उ ह नचाने वाले
धागे और उं गिलयां तो से ओझल ह रहते ह. यह अध स य आपके जीवन को उस
दशा म मोड़ने म कामयाब होता है जस दशा म उसके जाने से 'उ ह' फायदा हो.
************

कहो जी तुम या- या खर दोगे1

अमर का म बाज़ार और खर ददार का अनुभव भारत के अनुभव से बहुत िभ न है . न


यहां वैसी भीड़-भाड़ है , न िच ल-प , न ल बे-चौड़े वादे , न मोल भाव! ले कन जो है वह
कम मह वपूण नह ं है .

अमर का म दकान
ु / टोस का आकार भारत क दकान
ु क तुलना म काफ बड़ा होता है .
इतना बड़ा क लोग दकान
ु के भीतर ितप हया कूटर चला कर भी खर ददार करते ह. ये
कूटर खुद दकान
ु वाले ह िनःशु क उपल ध कराते ह. दकान
ु म सामान चुनने के िलये
गा ड़यां (carts) तो होती ह ह. दकान
ु ायः बेचे जाने वाले सामान या सामान-समूह के
अनुसार होती ह, मसलन कपड़ क , फन िशंग क , ॉसर क , इले ॉिनक सामान क ,
खलौन क , आ द. इनम कई बार बड़े सू म वभाजन भी होते ह जैसे िशशुओं के कपड़
क दकान
ु अलग और ब च के कपड़ क अलग. ा ड शॉ स भी खूब ह, यािन ऐसी
दकान
ु जहां कसी एक ह ा ड के उ पाद िमलते ह. अमर का म दकान
ु क ख
ं ृ लाओं
(Chains)का बड़ा चलन है . यािन एक ह क पनी/नाम क दिसय , बीिसय , सकड़ , हज़ार
दकान
ु . ये दकान
ु / टोर कपड़ , खा साम ी, उपभो ा साम ी, आम ज़ रत क चीज़ से
लेकर रे तरां और कताब तक क ह. यहां तक क से ड वच(सबवे), फल के रस
(जा बा यूस),वी डयो लाइ ेर ( लॉकब टर) और नाई क दकान
ु (सुपर क स) तक क

ं ृ लाएं ह. कुछ ख
ं ृ लाओं से तो हम भारत म भी प रिचत ह,जैसे मै डोन स, प ज़ा

हट, के टक ाइड िचकन (KFC) वगैरह. इन ख
ं ृ लाब दकान
ु म वगभेद भी कम नह ं
है . वाल माट क दकान
ु अपे ाकृ त गर ब लोग के िलये ह तो बोन मेसी, जे सी पेनी या
नॉड ोम क अमीर के िलये. को टको क ख
ं ृ ला बहत
ु लोक य है य क यहां थोक
माल अपे ाकृ त कम मुनाफे पर बेचा जाता है . कई टोर अपने मे बस को कुछ अित र
छूट दे कर अपनी ओर खींचने का यास करते ह. यह मे बरिशप कह ं सशु क होती ह,
कह ं िनःशु क. टोस का आकार च कत कर दे ने वाली हद तक बड़ा होता है . े ड मायर,
जे सी पेनी, वालमाट, को टको आ द के टोर म अगर आप केवल घूमना ह चाह तो 2-3
घ टे चा हय. ाय'ज़ का इले ॉिनक शो म (रे डयो,ट वी,क यूटर,कैमरे , ज,
संगीत, फ म,दरबीन
ू ,गे स वगैरह वगैरह) कसी छोटे -मोटे शहर से कम नह ं. मुझे तो
इले ॉिनक शो- म क अवधारणा ह भारत से िभ न लगी. हमारे यहां एक ह दकान
ु म
इतने व वध उ पाद नह ं रखे जाते. अलब ा अब इस तरह के टोर आने लगे ह, पर यह
ाय'ज़ आकार म दकान
ु नह ं शहर के िनकट बैठता है .

दकान
ु / टोस के समूह का नाम है मॉल. अब तो भारत म भी शॉ पंग मॉ स उभर रहे ह,
ले कन अमर का के मॉ स म जो भ यता, वराटता, चमक-दमक, शानोशौकत है वह अभी
हमारे यहां क पना ह है . मॉ स म सामान अपे ाकृ त महं गा होता है पर वहां का शॉ पंग
अनुभव अलग ह तरह का होता है . आप कुछ भी न खर द तो भी मॉ स आपको एक
अलग तरह क खुशी तो दे ती ह ह. मॉ स म खर ददार करने वाल के िलये बैठने, खाने-
पीने व मनोरं जन का भी पूरा बंध होता है . अ सर संगीत के काय म चलते रहते ह.
अवसरानुकूल सजावट होती है . जैसे समस पर समस बनाये जाते ह जनक छटा
दे खते ह बनती है . िनतांत साफ-सुथरे रे ट स होते ह जनम ब च के डायपर बदलने
के िलये भी अिनवायतः समुिचत बंध होता है . वकलांग के िलये कह ं भी जा सकने क
अलग, स मानजनक, सु वधापूण , उ म यव था होती है . यहां तक क इस बात का भी
यान रखा जाता है क वे अपनी ह ल चेयर स हत ह रे ट म के भीतर तक आ जा
सक. जो लोग धू पान करना चाह उनके िलये मॉल के वेश ार के पास एक िनधा रत
थान होता है . कहना अनाव यक है , मॉल के भीतर धू पान नह ं कया जा सकता. पूरा
का पूरा मॉल शीतताप िनयं त जो होता है .

सभी दकान
ु / टोस/शो स म वयमसेवा प ित होती है , यािन आप सामान दे ख,
पस द कर, उठा कर अपने काट म रख ल. अगर कुछ जानना चाह तो से सपसन से पूछ
ल. यह नह ं क से सपसन आकर आपसे उ पाद क धुंआधार तार फ ( जसम बहत
ु कुछ
िम या ह हो) करना शु कर दे . आप पूछगे तभी वह बतायेगा. पूर ामा णकता और
ईमानदार के साथ. अगर उसे पता नह ं होगा तो ऐसे य को बुला दे गा जसे पता हो.
या फर साफ कह दे गा क इस बारे म जानकार सुलभ नह ं है , पर गलत जानकार कभी
नह ं द जाएगी. हम लोग एक माइ ोवेव अवन (Microwave Oven) खर दना चाहते थे.
अमर का म व ुत उपकरण 110 वो ट पर चलते ह जब क भारत म 230 पर चलते ह.
हमने कम से कम दस टोस पर पूछा होगा, पर सभी पर से सपसस ने यह कहा क
कनवटर पर अवन ठ क से नह ं काम करे गा. भारतीय से समेन कभी ऐसा नह ं कहता.
उसक कोिशश यह होती क आप एक बार तो खर द ह ल.

बहत
ु बड़े , भरे -पूरे टोस या शो स, पर टाफ बहत
ु कम. व तुतः यहां हर आदमी हर
काम िन संकोच कर लेता है . यह नह ं क मैनेजर है तो सामान नह ं उठाएगा. ाहक
क चौक दार भी, कम से कम दखाई दे ती हई
ु तो नह .ं होती तो है ह . सुर ा कैमरे भी
लगे होते ह और वेश ार पर बाकायदा यह सूचना दिशत क जाती है क यहां सुर ा
कैमरे लगे हए
ु ह. यह सूचना इसिलये भी क कह ं न कह ं इससे आपक िनजता
(Privacy) तथा य गत वाधीनता (जो अमर का म सव प र है ) का हनन होता है . एक
दसर
ू यव था मुझे यादा मज़ेदार लगी. हर उ पाद पर एक बार कोड (Bar Code) लेबल
लगा होता है . जब आप कोई सामान खर द कर चैक आउट करते ह तो उस बार कोड को
कैन कर िलया जाता है . इसीसे बल भी बन जाता है . जब आप ससर(Sensor)लगे
दरवाज़े से बाहर िनकलने लगते ह तो वहां लगे ससस यां क प से ह यह पड़ताल कर
लेते ह क आप कोई बगैर चैक आउट कराया सामान लेकर तो नह ं िनकल रहे ह. अगर
आपके पैकेट/काट म ऐसा कोई सामान हआ
ु तो तुरंत सायरन बज उठे गा. यदा-कदा
गलती से भी सायरन बज जाता है . पर तब आपसे पूर वन ता से मा-याचना कर ली
जाती है . ऐसी गलती होती कम ह है .

दकान
ु म मू य णाली वैसी है जसे भारत म हम बाटा क मत के नाम से जानते ह.
सभी चीज़ क क मत 99 (से ट/डॉलर) पर समा होती है , जैसे 3.99 या 999. ज़ा हर है ,
इसका एक मनोवै ािनक भाव होता है . आप हज़ार डॉलर का नह ं नौ सौ िन नानवे
डॉलर का माल खर दते हए
ु नौ सौ पर यान दे ते ह. ले कन इस मू य यव था के ज़
के साथ यह बताना आव यक है क दकानदार
ु आपको एक से ट (डॉलर का स वा भाग)
भी लौटाता है . 'खु ला नह ं है ' का बहाना कोई नह ं करता.ले कन यह बात ाहक प पर
भी उतनी ह लागू होती है . ‘ऊपर के पैसे तो छोडने ह ह’ का आ ह भी कोई नह ं
करता. इसिलये एक तरह से मामला बराबर रहता है .
'सेल' तो यहां चलती ह रहती है . अवसर आते रहते ह. जैसे मेमो रयल डे , इ डपडस डे ,
वैले टाइन डे , है लोवीन, थ स िग वंग डे , पैरे टस डे , ै डिशप डे , वगैरह. समस और यू
ईयर तो सेल के सबसे बड़े अवसर ह ह . अगर कुछ नह ं तो वीक ए ड सेल ह सह , या
फर मौसम बदलने पर टॉक लयरस सेल. पर खास बात यह क ये सेल फज़ नह ं
होती. यािन दाम वाक़ई घटाये जाते ह. दरअसल यहां नए का े ज़ इतना यादा है क
चीज़ जैसे ह थोड पुरानी होती ह उनके दाम घटाकर उ ह िनकालकर नए के िलये जगह
बनानी पडती है . आज जो े स एक सौ डॉलर म िमल रह है , अगर आप एक-डे ढ़ माह
ती ा कर तो वह आपको 25 डॉलर म िमल जाएगी. यादातर टोस यह भी दावा
करते ह क उनके दाम बाज़ार म सबसे कम ह, और इस दावे पर खरा उतरने के िलये वे
इतना तक करते ह क अगर वह उ पाद आपको कह ं भी उससे कम दाम पर िमल जाये
तो आप अंतर क रािश वापस ले ल, या माल लौटा द. बड़े टोस अपना माल बेचने के
िलये कई तरह के यास करते ह. इनम से एक यास का ज़ करना चाहंू गा. वह है
मेल-इन- रबेट (Mail in rebate). चा रत कया जाता है क अमुक माल 50 डॉलर का है
पर उस पर 30 डॉलर क मेल-इन- रबेट है , इस तरह वह माल आपको 20 डॉलर म ह
िमल रहा है . आप 50 डॉलर चुका कर वह चीज़ खर दते ह और उसके बाद कुछ
फॉम/कूपन िन द पते पर भेजते ह. दो-एक मह ने म 30 डॉलर क रबेट का चैक
आपके पते पर आ जाता है . अब होता यह है क कई ाहक मेल-इन- रबेट के लालच
म माल खर द तो लेते ह पर य तता या भूलवश बाद क औपचा रकता पूर नह ं कर
पाते है , और क पनी उ ह रबेट दे ने से बच जाती है . इस क म के पीछे एक सोच यह
भी है क मेल-इन- रबेट दो मह ने बाद द जानी है , तब तक तो वैसे भी वह माल सेल
पर आ जाना है . मनोवै ािनक सोच का उपयोग कर आपको वह माल आज ह बेच दया
जाता है जो आप अ यथा दो माह बाद खर दते ( या पता तब तक आपका इरादा बदल
ह जाता !). बहत
ु सारे टोस कुछ खास उ पाद के िलये कूपन भी बांटते ह. कूपन दे ने
पर कुछ छूट िमल जाती है . मज़े क बात यह लगी क आप चाह तो टोर पर से ह
कूपन उठाएं और छूट का लाभ ले ल. पर इस के पीछे भी दरू काम करती है . आप
छूट के लालच म टोर म जाएंगे तो और भी कुछ खर द लगे. ‘एक के साथ एक ’
जैसी क स तो चलती ह रहती ह.

यहां के बाज़ार म सबसे मह वपूण बात मुझे यह लगी क दकानदार


ु ाहक पर पूरा
व ास करता है . कैसे ? आपने कोई चीज़ खर द , एक मह ना उसे काम म िलया, उससे
संतु नह ं हए
ु . दकान
ु पर जाएं, चीज़ लौटाएं. पूरा पैसा तुरंत वापस. दकानदार
ु कभी
आपसे कोई सवाल नह ं करे गा, कोई झक झक नह ं करे गा, ज़रा भी आप नह ं करे गा.
यािन गार ट क अवधारणा यहां पूर ईमानदार से लागू क जाती है . हम लोग ने एक
सोफा सेट खर दा. तीन-चार माह उसे बरता. लगा क उसके ंग दबते जा रहे ह.
लौटाया और नया ले आये. भारत म यह बात क पनातीत है . आशंका यह भी होती है
क कोई इस सु वधा का द ु पयोग कर ले तो? आप एक ट वी खर द कर लाएं, दो-तीन
मह ना दे ख, और फर लौटा द. यहां कोई ऐसा करता ह नह ं. जो ईमानदार दकानदार

म है वह ाहक म भी है . तभी यह यव था चल पाती है . दकानदार
ु क ईमानदार के
तो यहां हम अनेक अनुभव हए
ु . एक अनुभव तो म ता ज़ दगी नह ं भूलूंगा. बात बहत

छोट है . उतनी ह बड़ भी. अपनी पछली अमर का या ा म हम े टर लेक घूमने गए
थे. यह थान िनकट के रा य ओरे गॉन म है . बहत
ु ल बी कार-या ा थी. रा व ाम
कसी मोटल म कया. सुबह फर चल पड़े . भूख लगी तो कसी बहत
ु छोटे -से गांव के
मामूली से रे टोरे ट म गए. अब, यहां शाकाहार लोग के िलए मु कल रहती है . खास
तौर पर छोट जगह पर. हम अपने खाने यो य एक ह चीज़ नज़र आई. ेड. उसम
कोई फिलंग लेने से हमने मना कर दया य क कोई वेज (Vegetarian) फिलंग
उपल ध थी ह नह ं. हम ेड खाना शु करने ह वाले थे क काउ टर पर जो म हला थी
वह हमारे पास आई और मा-याचना करती हई
ु बोली क जो ेड हम लाए ह वह बासी
है , कल क बनी हई
ु है . हमने उसे अपनी शाकाहार ववशता बताई. उसने रे टोरे ट
मािलक से वमश कया और फर आकर हम अपना फैसला सुनाया. एक तो हमने बासी
ेड ली है , दसरे
ू कोई फिलंग भी नह ं ली है , इसिलये हमसे कोई पैसा नह ं िलया जाएगा.
मुझे तो उसी व त लगा क म खड़ा हो जाउं और ज़ोर से कहंू : “सलाम अमर का !”
यह अनुभव तो हम एकािधक बार हए
ु ह क कसी रे टोरे ट म गए ह, कोई खास डश
हम अ छ नह ं लगी है , हमने वेटर से अनायास ह इसका ज़ कर दया है ; जब बल
आया है तो पाया है क उस डश को बल म शािमल नह ं कया गया है . या आप
भारत म इस बात क क पना कर सकते ह? एक औसत, आम दकानदार
ु क पहली
कोिशश ह बासी, पुराना, खराब माल िनकालने क होती है . हमम से हरे क के मृित कोष
म ऐसे अनेक संग ह जब दकानदार
ु ने अपने माल क खराबी वीकार करने क बजाय
हमीं को गलत ठहराया है . ‘क टमर इज़ आलवेज़ राइट’ तो कताब और द वार पर
िलखी जाने वाली इबारत है . और अगर ाहक वदे शी हो तो फर कहना ह या ! सोने
का अ डा दे ने वाली मुग बार-बार हाथ थोड़े ह आती है . उसे तो एकदम से हलाल कर
ह दे ना है . ले कन अमर का म यह शायद सावजिनक (और िनजी भी) जीवन क
नैितकता है क कोई आपको ठगने क चे ा नह ं करता. मुझे तो बार-बार यह खयाल
आता रहा क अगर हम एक वदे शी के प म भारत घूमने आये होते तो हम जो
अनुभव होते, उनसे ये अनुभव जो एक भारतीय के प म अमर का घूमते हए
ु हो रहे थे,
कतने िभ न और वपर त ह. चाह तो यह बात और जोड़ ल क भारत म वदे शी, गोर
चमड़ वगैरह के ित अित र स मान-भाव के बावज़ूद वदे िशय से द ु यवहार होता है
और उनको ठगा जाता है , जब क दिनया
ु म अपनी चौधराहट के िलए कु यात इस दे श म
हम तो, तीसर दिनया
ु के नाग रक होने के बावज़ूद, ये अ छ याद बटोर रहे ह.

यापा रक नैितकता का एक और नमूना यहां इस बात म भी दे खने को िमला क अगर


कसी क पनी को पता चलता है क उसका कोई उ पाद ु टपूण था तो वह बाकायदा
व ापन दे कर उस उ पाद को वापस लेती (Recall) है . हमने ऐसे कई व ापन दे खे
जनके ारा कसी खास बैच के उ पाद को िनमाता ने अपने खच पर वापस मांगा. लोग
लौटाते भी ह. एक उदाहरण तो यह लेख िलखते िलखते ह िमला. साइ कल के ताले
बनाने वाली एक िस क पनी को यह िशकायत िमली क उसके ताले महज़ बॉल
पॉइ ट पेन क पतली ला टक बॉड से ह खोल िलये जा सकते ह. क पनी ने पड़ताल
क और िशकायत को सह पाया. क पनी ने उन ताल का सारा टॉक बाज़ार से उठा
िलया है और यह सूचना सा रत क है क जन लोग ने वे ताले खर दे ह वे उ ह लौटा
कर र लेसमे ट ा कर ल. या मेरे आदरणीय पाठक को अपने भारत का भी कोई
ऐसा उदाहरण याद आता है ?

और जब भारत का ज़ आ ह गया है तो दो एक बात इसी म म भी कर ह लूं.


अमर का के बाज़ार म घूमते हए
ु मने यह नोट कया क ‘मेड इन अमर का’ उ पाद तो
बहत
ु ह कम ह. लगभग सार ह दिनया
ु म िनिमत उ पाद हम दे खने को िमले. व तुतः
अमर क क पिनयां भी अपने उ पाद और-और दे श म ह बनवाना यादा फायदे म द
पाती ह, बावज़ूद इस बात के क यह आउटसोिसग यहां का एक बड़ा राजनीितक मु ा है .
‘मेड इन अमर का’ उ पाद तलाश करने िनकलगे तो वह िस व ापन पं ह याद
आएगी: ‘ढंू ढते रह जाओगे’. स ती साम ी (केवल स ती ह नह ं, बहत
ु महं गी और हाई-
टे क भी) सवािधक चीन िनिमत िमलती है . ऐसी साम ी जस पर ‘मेड इन इ डया’ का
लेबल हो, बहत
ु ह कम दे खने को िमली. भारत िनिमत कपडे ह यादातर यहां दे खने को
िमले, बस! इतना वशाल दे श, इतने ाकृ ितक संसाधन, पर व बाज़ार म उप थित
नग य ! य ? इस य का जवाब कह ं हमारे उ पाद क 'गुणव ा' म तो नह ं िछपा है .
या राजनीित म? या कह ं और? कहां? हम िचंितत होना चा हये.
भारत से जुड़ एक और बात.

जन शहर म भारतीय नाग रक बड़ सं या म ह, जैसे इस िसएटल म, वहां ऐसी भी कुछ


दकान
ु खुल गई ह जो सारा भारतीय सामान रखती ह. िसएटल म ‘मयूर ’ म जाकर हम
सदा यह लगा क हम भारत म ह ह. ह द राम क भु जया, बेडेकर का अचार, एमड एच
के मसाले, बीकानेर के पापड, पाल जी के ब कट और ऐसी ह तमाम चीज़. सारे
भारतीय मसाले. या नह ं था वहां? सार भारतीय फ म, उनका संगीत! और हमारे दे खते
ह दे खते इस मयूर ने एक चाट भ डार भी खोल कर रह -सह कमी भी पूर कर द .
दकान
ु के बाहर खड़े हो जाएं तो केवल भारतीय ह नज़र आएं. कभी-कभार अमर क भी.
आ खर भारतीय यंजन उ ह भी तो पस द आते ह. इस शहर म ऐसे अनेक रे टोरे ट
भी ह जो ामा णक भारतीय यंजन परोसते ह, और वे खचाखच भरे रहते ह. एक मूवी
िथएटर केवल ह द फ म ह दखाता है . वैसे यहां ह द फ म लगभग उसी दन
दे खी जा सकती ह जस दन वे भारत म रलीज़ होती ह. उनक वैध ड वीड (DVD)
आसानी से उपल ध होती ह.

बहत
ु छोट दकान
ु जैसी कोई चीज़ हम यहां दे खने को नह ं िमली. जैसे हमारे यहां के
पान के ग ले, या चाय क थड़ . ब क कई बार तो यह अखरा भी क सड़क पर क कर
पान खाने क न सह (भई, अमर का है , यहां पान कहां?) िसगरे ट पीने क सु वधा (वह भी
एक िसगरे ट खर द कर) यहां नह ं है . और न ह है कसी मु ड़या पर बैठ कर चाय पीने
का सुख मय सर है . िसगरे ट पीनी है तो पूरा पैकेट (मू य 4 डॉलर=200 पये) खर दये,
मोकस ज़ोन म जाइये; यादातर दकान
ु , टोर,मॉल वातानुकूिलत जो ह. जो नह ं ह वहां
भी धू पान तो व जत ह है . चाय का चलन यहां कम है . खास तौर पर उस चाय का
जसे पीने के हम आद ह. अलब ा यहां एक िभ न तरह क बगैर दध
ू चीनी क चाय
िमल जाती है , पर उससे हमार तलब पूर नह ं होती. कॉफ क अनेकानेक क म ह.
कॉफ शॉ स तो खूब ह ह , कसी भी बड दकान
ु म, अ पताल तक म कॉफ क वे डं ग
मशीन तो होगी ह . शीतल पेय क भी. िस का डािलये, माल हा ज़र. हम जस िसएटल
म कर ब छह माह रहे वहां क दिनया
ु को दे न लाटे कॉफ भी है . टारब स नामक कॉफ

ं ृ ला क गणना अमर का के बहत
ु बड़े ित ान म होती है . यह ित ान िसएटल का
ह है .

अमर का के बाज़ार क चचा क ं और कताब क दकान


ु का ज़ न क ं , यह कैसे
स भव है? बान ्-स ए ड नोबल तथा बोडस यहां क दो िस और बहत
ु बड़ पु तक
व य ख
ं ृ लाएं ह. नेट आधा रत अमेज़न डॉट काम तो है ह . आप कसी भी पु तक
दकान
ु म जाएं, कताब वषयानुसार जमी िमलती ह, न केवल वषयानुसार, उसम भी तरह-
तरह के सू म वग करण. सा ह य-क वता- गितवाद -िनराला क क वता, इस तरह से.
कताब को, खास तौर पर नव कािशत कताब को, ड ले भी बहत
ु आकषक तर के से
कया जाता है . खूब चार होता है . लेखक जगह-जगह जाकर पु तक पर ह ता र करता
है , पाठक से चचा करता है . कताब क दकान
ु म कॉफ शॉप तो होती ह है . कताब क
दकान
ु एक तरह से लाइ ेर भी होती है . आप कसी भी कताब को वहां बैठकर कतनी
भी दे र तक पढ सकते ह. चाह तो खाते-पीते हए
ु भी. मने कई दकान
ु म ब च क
कताब के से शन म माताओं को ज़मीन पर बैठकर अपने िशशुओ/
ं ब च को दकान
ु क
कताब से कहानी/गीत/क वता पढकर सुनाते दे खा. कताब क दकान
ु म संगीत (अथात
कैसेट, सीड ,ड वीड आ द) भी अिनवायतः िमलता है . य यहां य पु तक (Audio
Books) का भी काफ चलन है . थोड़ बहत
ु टे शनर भी हर दकान
ु पर िमलती ह है .
अनेक दकान
ु ऐसी ह जो आधे मू य पर या एक िन त मू य पर - जैसे एक डॉलर म-
कताब बेचती ह. काशन के एक आध माह बाद ह पु तक घट क मत पर िमलने लग
जाती है . मज़े क बात यह क आम ज़ रत का सामान रखने वाली दकान
ु व टोस म
भी कताब का एक ख ड अव य होता है . यह अलग बात है क वहां ग भीर कताब
कम और बे टसेलर नुमा कताब यादा िमलती ह. नेट आधा रत अमेज़न डॉट काम पर
तो आप दिन
ु या क कसी भी कताब का ऑडर कर सकते ह.

व तुतः धीरे -धीरे इ टरनेट एक अलग ह बाज़ार का प लेता जा रहा है . आपको कुछ
भी खर दना है, नेट पर ऑडर कर सकते ह. नेट पर ऐसी भी अनेक साइ स ह जो
व तुओं के बारे म व तृत जानकार , समी ा, यहां तक क विभ न दकान
ु पर का उनका
तुलना मक मू य भी उपल ध कराती ह. आप दे ख, परख, चुन और ऑडर कर द. माल
आपके पास पहंु च जाएगा. आपको तो अपनी टे बल से भी नह ं हटना है .संतु न ह तो
माल लौटा तो सकते ह ह. असल म इस तरह का यापार एक नैितक समाज म ह
पनप सकता है , और अब तो यह कह कर म अपने को दहरा
ु ह रहा हंू क अमर का म
दकानदार
ु क व सनीयता स दे ह से परे है . ाहक क भी. इसीिलये यहां इ टरनेट
आधा रत यापार तेज़ी से फैलता जा रहा है .

अमर का म भुगतान के िलए े डट काड का बहत


ु यादा उपयोग होता है . ऐसा लगता है
क इसने एक हद तक पेपर करसी को व था पत कर दया है . इ टरनेट पर खर ददार
के िलये तो इसका उपयोग होता ह है , लगभग हर टोर, हर रे टोरे ट, हर सेवा े डट
काड वीकार करती है . हमने कोई ऐसी जगह नह ं दे खी जहां े डट काड वीकार नह ं
कया जाता हो. यहां तक क सरकार महकमे भी े डट काड से भुगतान वीकार करते
ह. अगर आप नकद भुगतान करते ह तो कैिशयर यह बोलता है क आपने उसके हाथ म
कतनी मु ा थमाई है . इसके बाद अगर उसे आपको कुछ रािश लौटानी है तो लौटाते
व त वह फर से यह बोलता है क कतनी रािश लौटाई जा रह है . इससे पारदिशता
बढती है . पहले ह कह चुका हंू क शेष रािश लौटाने म, चाहे वह कतनी ह तु छ (1
से ट भी) य न हो कोई कोताह नह ं होती. दकानदार
ु वदा के व त ‘ है व अ नाइस डे ’
जैसा वा य कहने से कभी नह ं चूकता. अगर आप कसी छोट दकान
ु म भी वेश करते
ह तो वहां उप थत कमचार मु कान के साथ आपका वागत करते हए
ु यह पूछना नह ं
भूलता क या वह आपक सहायता करे . आशय यह क अगर आप कोई खास चीज़
तलाशने म उसक मदद चाहते ह तो वह हा ज़र है , अ यथा ‘नो, थ स’ कह कर आप
अपने आप अवलोकन कर सकते ह.

सामा यतः चीज़ अं कत/मु त मू य पर िमलती ह. अमर का म भारत क तरह एम


आर पी (MRP) का चलन नह ं है . चीज़ पर टोर वाले ह मू य अं कत करते ह और ये
मू य अलग-अलग टोस म अलग-अलग भी हो सकते ह. कभी-कभी चीज़ पर दखाई
दे ने वाला मू य अं कत नह ं होता अथात बार कोड क कूट िल प म ह अं कत होता है .
बड़े टोस म तो ऐसे यं लगे होते ह जहां आप यह अ य मू य पढ सकते ह. चाह तो
से स पसन से पूछ सकते ह. ऐसे म मोल-भाव क तो सार थितयां ह ख म हो
जाती ह. ले कन हम इसी अमर का म एक अलग तरह का अनुभव भी हआ
ु . अब तक तो
म छोट चीज़ क खर ददार के अनुभव आपसे बांट रहा था. अलग अनुभव का
ताअ लुक बड खर द से है . हमारे दामाद मुकेश को एक नई कार खर दनी थी. एक
खासी बड़ कार इन लोग के पास थी ले कन अब न या के पदापण के बाद और बड़
कार क ज़ रत महसूस होने लगी थी. य भी अमर का म ‘ जतने ाणी उतनी कार’
वाली थित आम है . इन लोग के ऑ फस म ले सबल व कग ऑवस (Flexible
working hours) वाली यव था है , यािन जब आपक इ छा और सु वधा हो द तर आ
जाएं. तो इस सु वधा का उपयोग भी करना था क चा और मुकेश दोन अलग-अलग
समय पर ऑ फस जाएं ता क कोई एक ब ची के साथ घर पर रह जाए. मुकेश ने
इ टरनेट पर खासी पड़ताल कर एक खास ा ड और मॉडल चुना. बहत
ु महं गा. लगभग
40 हज़ार डॉलर (यािन 20 लाख) का. क पनी के शो म पर जाने पर िभ न तरह के
अनुभव हए
ु . ऐसे अनुभव क हम अपने जयपुर का बापू बाज़ार - नेह बाज़ार याद आ
गया, जहां दकानदार
ु अपनी बताई क मत से तभी पीछे हटता है जब आप उसक दकान

छोड़ कर आगे िनकल जाएं. यहां भी हम कोई तीन चार बार शो म से उठकर चल
दये. हर बार लगा क अब तो वाता भंग हो गई. ले कन अंततः मुकेश काफ दाम कम
कराने म सफल रहे . इससे पता चला क मोल-भाव यहां भी उसी तरह होता है जैसे
भारत म होता है .

अमर का म रहते हए
ु मेरा यान कुछ खास बात पर बार-बार गया. एक यह क यहां
चीज़ क पै कंग पर बहत
ु यान दया जाता है . बा पै कंग पर न केवल सार जानकार
मु त क जाती है , पया सुर ा चेताविनयां भी अिनवायतः अं कत क जाती ह. इस बात
पर बहत
ु यान दया जाता है क पै कंग को खोलने म आपको कम से कम असु वधा
हो. हमने दे खा क दवा क पै कंग म यह यान बहत
ु यादा रखा जाता है , जैसे अगर
दवा जोड़ के दद क है तो उसक पै कंग इस बात को यान म रख कर क जाती है क
इस रोग का मर ज़ भी उसे आसानी से खोल सके. खा पदाथ क पै कंग पर यू शन
वषयक पूर जानकार अं कत होना ज़ र है .

एक बहत
ु बड़ बात मुझे यह लगी क यहां अपनी कला-सं कृ ित का भरपूर यावसाियक
दोहन कया जाता है . म यह बात शंसा के तौर पर कह रहा हंू . मुझे यह दे खकर सुखद
आ य हआ
ु क गभवती माताओं और नवजात िशशुओं तक के िलए मो ज़ाट, बीथोवन,
बाख, हे डे स, ववा ड , ा स आ द का संगीत इस चार के साथ बेचा जाता है क
इससे िशशु के मानिसक वकास क गित ती होती है . िशशुओं के िलए लो रयां इन
महान संगीतकार के सृजन पर आधा रत होती है . िशशु और बाल पु तक तक म प म
के महानतम कलाकार क कृ ितय का उपयोग कया जाता है . मह वपूण बात यह क
यह सार साम ी सुलभ है . इसका बड़ा फायदा मुझे यह लगा क इस तरह न केवल
माता- पता, ब क िशशु भी अपनी वरासत के उ कृ के स पक म आता है . म सोचता
रहा क िशव कुमार शमा का संतूर सुनने से गभवती मां पर वह असर य नह ं हो
सकता जो बीथोवन का संगीत सुनने से होता है , या राग भैरवी पर आधा रत लोर ( जसे
कशोर अमोनकर ने गाया हो) सुनने से िशशु को मीठ नींद य नह ं आ सकती?
यवसाय के पीछे भी कला मक सोच हो सकता है , ब क होना चा हये- यह मने यहां
आकर दे खा समझा.

भारत म अमर का क तीखी आलोचना आम है . पूंजीवाद क सार ु ताओं को हम घर


बैठे ह अमर का पर च पा कर दे ते ह. पर यहां आकर जो अनुभव होते ह वे बहत
ु िभ न
ह. बाज़ार तो पूंजीवाद का मू प है , पर यहां का बाज़ार जो अनुभव दे ता है वे आम
तौर पर मीठे ह. िन य ह बाज़ार का मूल मं मुनाफा है . जो कुछ भी होता है िनमाता
और व े ता के लाभ के िलये ह होता है . ले कन यह तो जीवन च क अिनवायता है .
इसे वीकार करने म संकोच य हो? दे खने क बात यह है क कोई अपना लाभ कमाने
क या म आपको नुकसान तो नह ं पहंु चा रहा है , और उसका लाभ कमाना आपके
क का कारण तो नह ं बन रहा है? अमर का के बाज़ार म मुझे सवािधक शंसनीय यह
लगा क यहां हर स भव यास कया जाता है क आपका बाज़ार अनुभव सुखद हो.
तभी तो आप बार-बार बाज़ार आएंगे. खर दना न खर दना आपक ज़ रत और इ छा
श पर िनभर करता है . सा हर लुिधयानवी क पं यां 'कहो जी तुम या या
खर दोगे, यहां तो हर चीज़ िमलती है ' अमर का के बाज़ार म कान म गूंजती रहती ह.

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1. शीषक सा हर लुिधयानवी रिचत एक फ मी गीत से, साभार.

माइकल मूर : असहमित म उठा हाथ

इन दन माइकल मूर अमर का म सवािधक चिचत नाम म से है . टाइम प का ने भी


उ ह अपने आवरण(12 जुलाई,2004) पर जगह द है . सारे दे श म उनके वचार को
लेकर ती बहस हो रह है . बहस के मूल म है उनक ताज़ा फ म – ‘फारे नहाइट
9/11’. 9/11 का मतलब है यारह िसत बर. अमर का म मह ना पहले िलखा जाता
है , तार ख बाद म.पाठक को मरण ह होगा क यारह िसत बर को यूयाक के व ड
े ड सटर पर हमला हआ
ु था. उस घटना ने अमे रका को हलाकर रख दया था.

23 अ ेल 1954 को ज मे माइकल मूर एक फ म िनदशक, लेखक, िनमाता,


अिभनेता और कुछ हद तक ए ट व ट ह. उनक एक ट वी िसर ज़ ' ट वी नेशन'
अमर का म काफ चिचत व लोक य रह है . ' यूड, हे यर इज़ माई क ' और
' टु पड हाइट मेन' कताब ने अमे रका के बौ क जगत म ती उ ेजना पैदा क
थी. अब माइकल क ताज़ा फ म न केवल िसनेमाघर म भार भीड़ आक षत कर रह
है , इसने जैसे पूरे अमर का को ह दो भाग म बांट दया है . वे जो माइकल के साथ
ह, एक तरफ ह और इस फ म पर तार फ के फूल बरसा रहे ह. दसर
ू तरफ वे ह जो
माइकल के िलये अपनी गािलय का पूरा खज़ाना खोले हए
ु ह और इस फ म को बेहद
फूहड़, गैर-कला मक और झूठ का पुिल दा बता रहे ह.

इस फ म म रा पित बुश क इराक़ वषयक नीितय का खुला वरोध है . उन पर आरोप


लगाया गया है क उ होने 11 िसत बर क घटना का बहाना बनाकर इराक़ पर हमला
कया. फ म बुश क काय णाली का खुला वरोध करती है . इसके िलये जो संग उठाये
गये ह वे वा त वक ह. इसीिलये यह फ म डॉ यूमे है .

फारनहाइट 9/11 116 िमिनट अविध क डॉ यूमे फ म है . इस फ म ने


अपनी जमात क फ म म सफलता के सारे क ितमान व त कर नये झंडे गाडे ह.
कान फ म समरोह म इस फ म ने अपनी ण
े ी क 17 फ म को पछाड़ कर
सव े फ म का 'पाम डो' पुर कार जीता तथा अमर का म रलीज़ होने के पहले तीन
दन म दो करोड़ से यादा क कमाई क . य अमर का म इस तरह क डॉ यूमे
फ म का खासा चलन है . हाल ह म ' सुपरसाइज़ मी' जो फा ट फूड के वरोध म
थी और ' व ड माइ ेशन' जो पयावरण सँर णके प म थी, भी खासी लोक य
रह ह. ले कन अमर का म बॉ स ऑ फस पर इतनी सफल होने वाली यह पहली
डॉ यूमे है . इस फ म को इसक राजनीितक कृ ित के कारण यहां क वा ट ड नी
क पनी रलीज़ करने से मना कर चुक थी ले कन अब अपनी सफलता के कारण यह
अपनी ण
े ी क पहली फ म बन गयी है .

फ म के सवािधक ववादा पद एवं चिचत संग म से एक म रा पित बुश को 11


िसत बर को लो रडा के एक एलीम कूल म दखाया गया है . व ड े ड सटर से दो
वमान टकरा चुके ह. बुश दसर
ू क ा के ब च को ' मेर यार बक़र ' सुना रहे ह.
तभी उनके चीफ ऑफ टाफ एं यू काड आते है , और उनके कान म कुछ कहते ह. हम
बाद म पता चलता है क काड ने बुश को बताया है क अमर का पर हमला हआ
ु है .
रा पित जड़वत ह. फ म क गित धीमी होती है , जससे उनक एक-एक हरकत
उभरती है . कर ब सात िमिनट बुश क ा म ह रहते ह. इसके बाद वे अपने टाफ से '
हमले' के बारे म चचा करने जाते ह.
यारह िसत बर क घटना क पड़ताल करने वाले आयोग क रपोट म भी कहा गया है
क उस अविध म पटागन से कोई स पक नह ं कया गया. रा पित के क़ा फले ने 9.35
पर कूल से याण कया तथा 9.45 पर रा पित ने पहली बार अपने उप रा पित से
बात क .

यह फ म रा पित बुश तथा बन लादे न के प रवार के बीच भी एक नापाक र ते क


तरफ इशारा करती है . कुछ ऐसा आभास दया जाता है क बुश के टे सास एयर नेशनल
गाड ज़माने के एक दो त जे स बाथ के मा यम से बन लादे न प रवार का धन बुश क
असफल तेल खुदाई क पनी आब टो एनज म लगाया गया.

मूर ने बुश और लादे न प रवार क नज़द क के िलये वािशंगटन थत इ वट फम


कालाइल म उनके साझा हत क तरफ भी संकेत कया है . रा पित बुश के पता इस
कालाइल ुप के ए वाइज़र भी रहे ह. ले कन जानकार के अनुसार, यह संग बहत

ामा णक नह ं है .

मूर ने वािशंगटन पो ट के हवाले से यह कहा है क रा पित बुश ने अपने कायकाल के


थम आठ माह का 42 ितशत समय छु टयां बताने म ह यतीत कया. रा पित के
समथक ने इस आरोप का खंडन यह कह कर कया है क बुश ने इस दौरान भी अपने
सहायक से मी टं ग कर के रा यकाय कया. बहस इस बात पर भी है रा पित ने 42
ितशत समय छु टय म बताया या 39 ितशत. कोई ता ज़ुब नह ं अगर हम
भारतीय को इस पर नेह लो हया क िस बहस क याद आ जाये.

माइकल ने इस बात पर कड़ आप क है क 11 िसत बर के बहाने से बुश शासन


ने अमर क नाग रक को उनक कुछे क नाग रक वाधीनताएं तज़ दे ने के िलये े रत
कया. मूर ने अमर क कां ेस क इस बात के िलये भी िनंदा क है क उसने बगैर पढे
ह 'यू एस ए पै या टक ए ट' के नाम से जाने जाते आतंकवाद वरोधी बल को तुरत
फुरत पा रत कर दया.

अब यह तो कैसे पता चले क बल को पढ़ा गया या नह ं, पर यह माण-िस है क


इसे कुछ यादा ह ज दबाजी म पा रत कया गया. यह बल सरकार को लोग पर
िनगाह रखने, आ वािसय को ब द बनाने या दे श से बाहर िनकाल दे ने जैसे अिधकार
दे ता है . यह ं यह उ लेख कर दे ना भी उिचत होगा क माइकल मूर अपनी वेबसाइट पर
इस बल के वरोध म जनमत जगाते ह. वे जगह-जगह भाषण दे कर भी यह काम करते
ह.

अपने विभ न प म माइकल अमर क स ा तं क बहत


ु सार परत खोलते ह. अपनी
कताब ' टु पड हाइट मेन' म, तथा इस फ म म भी, वे यह बताकर च काते ह क
11 िसत बर के बाद अमर क वायुयान म सुर ा जांच कड़ कर द गई थी. या य के
पास कोई भी खतरनाक चीज़ नह ं रहे , इस यास म उनसे बुनाई क सलाई, कपडा
सीने क सुई,िलफाफा खोलने वाले चाकू तक रखवा िलये जाने लगे. ले कन, मूर आ य
और ोभ के साथ बताते ह क इन सब िन ष सामान म िसगरे ट लाइटर नह ं था.
और वह भी तब जब क यादातर उड़ान धू पान र हत होती ह. आप कसी भी उड़ान
पर िसगरे ट लाइटर ले जा सकते थे. य ? मूर बताते ह क हालां क ितबंिधत सामान
क सूची म लाइटर था, पर जब वह सूची अनुमोदन के िलये हाइट हाउस भेजी गयी
तो त बाकू उ ोग लाबी हरकत म आई और उसी के दबाव म आकर हाइट हाउस ने
इस असल खतरनाक चीज़ को सूची से हटा दया ता क हवाई जहाज़ से उतरते ह या ी
अपनी य िसगरे ट का कश लगा सके और त बाकू उ ोग को कोई नुकसान न हो.

माइकल मूर ने इस फ म म हा य- यं य, कथा, स वेदना,भावुकता, अ पकथन,


ब बोलापन- सभी का ब-खूबी इ तेमाल कया है . फ म क सफलता ने इसके द ु मन
क एक ल बी क़तार ह खड कर द है . फ म क सफलता से ु ध हो कर यहां के
एक द णपंथी फ मकार माइक व सन ने एक जवाबी डा यूम बनाने क घोषणा
क है , जसका शीषक होगा- 'माइकल मूर हे स अमर का'. एक सुप रिचत व ान
कथाकार रे ेडवर यह कहते हये
ु इसका वरोध कर रहे ह क मूर ने उनक एक व ान
कथा - 'फारनहाइट 45' के शीषक को चुराया है . यहां पाठक को यह याद दलाना
उिचत होगा क 45 ड ी फारनहाइट पर कताब जल सकती ह. रे महाशय ने 1953 म
कािशत तथा बहु चिचत रहे इस उप यास म एक ऐसे िचंताजनक भ व य क क पना
क थी जहां एक फायरमेन घर तथा पु तकालय को इस खयाल से जलाता है क लोग
वतं प से सोच न सक. मूर ने अपनी इस फ म म फारनहाइट 9/11 उस तापमान
को कहा है जहां वाधीनता जलने लगती है .

यह अमर का म चुनाव वष है . इस कारण यहां इस फ म का वशेष मह व हो गया है .


यहां इस बात को लेकर भी बहत
ु चचा है क यह फ म जन-चेतना को जगाने या
जनमत को ढालने म कतनी सफल होगी. अगर फ म बॉ स ऑ फस पर पट गई होती
तो ये सवाल नह ं उठते, पर फ म क सफलता ने एक साथ ह बहत
ु सारे सवाल खड़े
कर दये ह.

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पूंजीवाद के दे श म समाजवाद क घुसपैठ

भारत के बारे म प म के अ ान क अ सर चचा होती है . मसलन प म म भारत को


अभी भी सपेर -हािथय वाले आ दम दे श के प म जाना जाता है . मज़े क बात यह क
प म के बारे म भारत के अ ान का भी कमोबेश यह हाल है . जैसे क पे रस म कांच
क सड़क ह या अमर का म इतनी अमीर और इफरात है क लोग अपनी कार सीधे
समु म ह डाल दे ते ह. इधर सूचना ांित और चा ुष मा यम के व रत वकास से

इस तरह के आधारह न िमथक टटते जा रहे ह.

िन य ह अमर का बाहु य का दे श है . खासी अमीर है इस दे श म. डॉलर क भी, मन


क भी. लोग को उपभोग का और नवीनतम को अपनाने का जैसे जुनून ह है . नए का
ेज़ इतना है क महं गी से महं गी े स एक डे ढ़ मह ने बाद ह सेल पर चली जाती है .
ले कन जो सामान आपने खर द िलया है और अब आप जसका इ तेमाल नह ं करना
चाहते ह, उसका या हो? समु म फका जाए? अगर ऐसा ह हो रहा होता तो समु कब
का कचरे के ढे र म त द ल हो चुका होता. समु म फकने क बात महज़ अितशयो पूण
क पना है .

तो फर होता या है ?

वैसे तो अमर का म गेराज सेल क अवधारणा काफ लोक य है . व तुतः यहां के गेराज
हमारे टोर का अमर क सं करण भी होते ह. वहां न केवल कार/कार खड़ क जाती ह,
घर का वह सारा सामान भी रखा जाता है जो एक हद तक गैर या कम ज़ र होता है .
तो, अगर कसी को कुछ भी सामान अनुपयोगी लगता है , वह उसे अलग छांट, गेराज
सेल के बोड के साथ गेराज म रख दे ता है . अखबार या इ टरनेट पर व ापन दे दया
जाता है . मू य भी चा रत कर दया जाता है . ज़ रतम द आते ह, सामान पस द करते
ह, कभी-कभार मोल-भाव भी होता है , और बस!
ले कन हर चीज़ के साथ तो यह यव था कारगर नह ं हो पाती है . अगर आपके सामान
का कोई खर ददार न िमले तो? आप खुद ह उसे बेचना न चाह(पर उससे मु अव य
पाना चाह)तो? जैस-े जैसे पयावरण के ित जाग कता बढती जा रह है , चीज़ को फकने
(और इस तरह पयावरण को बगाड़ने) का चलन घटता जा रहा है . ऐसे अनेक संगठन
बन गये ह जो व ापन दे कर आपसे आपका बेकार सामान लेते ह (कभी-कभी कुछ
शु क भी) और उसे र -साइकल करते ह.

पर इधर हाल ह म कुछ और भी तेज़ दमाग लोग ने एक और अ छ पहल क है .


लगता है पूंजीवाद दे श म भी समाजवाद आ रहा है . आपके पास यादा है तो उसे दे द
जसे उसक ज़ रत है .

कैसे होता है यह?

एक संगठन बन गया है - साइकल(Free cycle). इस संगठन क एक वेब साइट है :


www. recycle.org. आप इस साइट पर जाएं और अपने इलाके के संगठन को ढंू ढ ल. एक
छोटा-सा पंजीकरण फॉम भर - वह भी ऑनलाइन, और बस ! कोई सद यता शु क नह ं.
संगठन का मूल सोच यह है क कोई चीज़ कबाड़ नह ं होती. हो सकता है जो चीज़
आपके िलये अनुपयोगी हो गई है उसक ज़ रत कसी और को हो. संगठन दोन के बीच
आदान- दान को सुगम बनाता है . हमारे इलाके म जो समूह है उसका नाम साइकल
िसएटल है . इस समूह क साइट पर दो तरह के व ापन दये जाते ह : ऑफड, और
वा टे ड, यािन दे ना है और चा हये. अब आपने ऐसा कोई स दे श दे खा जसम ऑफर क
गई व तु आपको चा हये, तो आप व ापन दाता को ई-मेल कर द. या होगा, अगर
उस चीज़ को चाहने वाले एक से अिधक ह ? जसने सबसे पहले आ ह कया, उसका हक़
है . स वाद से समय तै कर िलया जाएगा, और आपक ज़ रत क चीज़ आपको िमल
जायेगी. दोन ह प क यूटर पर यह स दे श सा रत कर दगे क उनक तम ना पूर
हो गई है .कुछ िनयम -िस ांत का कड़ाई से पालन कया जाता है . जैस,े सारा लेन-दे न
िनशु क होगा, जो चीज़ ली-द जाएंगी, वे अवैध नह ं ह गी, वगैरह.

साइकल संगठन इतना लोक य होता जा रहा है क लोग गेराज सेल से वमुख होते
जा रहे ह. लोग को लगता है क यह संगठन अपने पड़ौसी को जानने व उससे आ मीय
होने का उ दा मा यम है . संगठन क लोक यता बढ़ने के साथ-साथ इसके िश ाचार
िनयम भी गढ़े जाने लगे ह. लोग को सलाह द जाती है क वे उतना ह ल जतना उ ह
वांिछत हो, और यह भी क उ ह यादा खुश दे कर होना चा हये, न क लेकर.

इस संगठन क सफलता ने कुछ मतल बय को भी अपना उ लू सीधा करने का मौका दे


दया है . लोग यहां से ा ई-मेल पत को पाम (Spam, अवांिछत ई-डाक) भेजने के
िलये इ तेमाल करने लगे ह. अमर का म पाम एक बड़ा सरदद है . जब भी आप अपना
ई-मेल का इन बॉ स खोलते ह, उसम इतनी अवांिछत डाक होती है क आपक काम क
डाक मानो खो ह जाती है . यह अवांिछत डाक ाय: व ापन होती है , ले कन इसम कभी-
कभी वायरस भी होते ह.

अ छ बात यह है क चीज़ के आदान- दान क इस पहल क सफलता ने कुछ और


संगठन भी बनवा दये ह. ऐसा ह एक संगठन है : टाइमब स (Timebucks). यह
संगठन लोग को व तु क बजाय समय और सेवाओं के आदान- दान का मौका दे ता है .
म आधा घ टा िनकाल सकता हंू, आपको ज़ रत है , आपके काम आ जाऊं. म पढ़ा सकता
हंू , आपको पढ़ना है , िमल ल.

इन संगठन के बारे म जाना-पढ़ा तो लगा क समाजवाद कभी मर नह ं सकता.

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अमर का म अखबार

बचपन म कभी पढ़ा या सुना था क अमर का म अखबार बहत


ु ' व थ' होते ह. कोई
100-150 पृ के. तभी से यह ज ासा थी क आ खर रोज़ इतने प न म या परोसा
जाता होगा! इधर इले ोिनक मी डया और फर इ टरनेट के आगमन तथा चलन के
बाद मु त श द पर जो खतरे मंडराने लगे ह, उनके प र े य म भी अमर क अखबार को
दे खने परखने क आकां ा मन म थी. यािन, मेरे िलये अमर का क 'दशनीय' चीज़ म
अखबार भी था.

अमर का म जगह-जगह अलग-अलग अखबार के िलये वे डं ग मशीन लगी होती ह


जनम अखबार के मू य के बराबर िस के डालकर आप अखबार ा कर सकते ह.
वांिछत मू य का िस का डािलये, अलमार नुमा चीज़ का दरवाज़ा खुल जायेगा. आप अपने
आप एक अखबार उठा ली जये. बेईमान ह तो यादा भी उठा सकते ह, पर यहां कोई
ऐसा करता नह ं. बडे -बडे टोस म, कॉफ क दकान
ु , गैस टे शस
ं (यािन पै ोल प प)
वगैरह म भी अखबार बकते ह. यहां न बकने वाले यािन मु त म िलये जा सकने वाले
अखबार क सं या भी काफ है . कसी भी बडे टोर के बाहर कम से कम 15-20 इस
तरह के अखबार भी रखे िमलगे, ज हे बगैर मोल चुकाये उठाया जा सकता है . पर मने
कसी को भी इ ह उठाते नह ं दे खा. घर के मेल बॉ सेज़ म भी इस तरह के अखबार
डाल दये जाते ह. इन अखबार क आय का ोत इनम कािशत व ापन होते ह. पर
इनक चचा थोडा बाद म.

मने यहां ल बे समय तक िनयिमत प से एक अखबार ‘िसएटल टाइ स’ पढा. वैसे


समय-समय पर अ य अखबार भी दे खता रहा. मेरा यह लेख मु यतः इसी ‘िसएटल
टाइ स’ पर आधा रत है . मुझे अ य अखबार भी कमोबेश इसी तरह के लगे.इस अखबार
क एक ित का मू य 25 से ट है . र ववार य सं करण डे ढ डॉलर का है , यािन दै िनक से
छह गुना. भारतीय मु ा म ये रािशयां मशः 12 तथा 75 पये बैठती है . मािसक दर
थोड कम ह और उस पर भी अ सर कोई न कोई आकषक 'ड ल' चलती रहती है . बना
कसी क म के अखबार का मािसक मू य 15.5 डॉलर यािन 625 पये होता है .

अखबार एक पॉलीथीन क थैली म आता है और कर ब-कर ब रोज़ ह उसके साथ 10-12


प न के अलग व ापन भी रखे होते ह. र ववार को यह अित र साम ी 100 प न
तक हो जाती है . प कर दं ,ू यह साम ी अखबार के अलावा होती है . लगभग उसी तरह
जस तरह भारत म अखबार म रख कर है ड बल वत रत कये जाते ह. फक़ यह है क
यहां यह साम ी बहत
ु अिधक आकषक होती है . न केवल मु ण और तुतीकरण म, इस
अथ म भी क इनम बहत
ु सारे कूपन भी होते ह ज ह खर ददार करते व त इ तेमाल
कर अ छ बचत क जा सकती है . यह कारण है क गृ ह णयां इनका इं तज़ार करती ह.
दै िनक अखबार लगभग 70 पेज का तथा र ववार य लगभग 160 पेज का होता है . ये पृ
अलग-अलग ख ड म वभ होते ह तथा ये ख ड अलग-अलग ह मुडे होते ह, यािन 70
पेज का अखबार 8-10 अखबार के समूह क मािन द होता है .

अखबार के मु य ख ड रा ीय, अंतररा ीय, थानीय, यापार, खेल ्-कूद, स ाहांत, वग कृ त


व ापन वगैरह होते ह. कुछ ख ड दै िनक न होकर सा ा हक होते ह यािन वे स ाह म
कसी एक दन कट होते ह. ऐसे ख ड ह मोट रं ग, टै नोलॉजी,फूड ए ड वाइन, या ा,
िसनेमा-िथएटर, गाडिनंग वगैरह. पूरे स ाह म कम से कम 4 पेज पु तक समी ाएं होती
ह. पर कहानी-क वता कभी नह ं होते.

अखबार क साम ी म खासा वै व य होता है . रा ीय-अंतररा ीय मु पर ग भीर


समाचार होते ह. समाचार और वचार म घालमेल ायः नह ं होता. सभी समाचार म
घटना प पर यादा बल होता है , कथन प पर यूनतम. हमारे दे श क तरह नह ं क
व य ह समाचार हो. बडे लोग के व य समाचार म तभी आते ह जब उनक कोई
खास अहिमयत हो. बडे लोग बहत
ु यादा पेस भी नह ं लेते ह. अमर क रा पित क
नगर या ा का समाचार पूरे पृ पर नह ं फैला और न पूव रा पित क मौत के समाचार
ने सब कुछ को पीछे धकेला. अंतररा ीय समचार म भारत को बहत
ु ह कम जगह
िमलती है . भारत म आम चुनाव के समय तीन-चार दन लगातार भारत के समाचार
छपे, या फर कु भकोणम ासद के समय. ले कन इसका अथ यह नह ं क यहां भारत
क उपे ा होती है . असल बात यह क जब भी इनके िलहाज़ से भारत म कुछ भी
मह वपूण होता है , उसे ये िन संकोच मुखता दे ते ह. अग त 04 के पहले स ाह म
लगातार चार दन तक मुखपृ पर मुखतम थान पर िसएटल टाइ स के टै नोलोजी
रपोटर ायर डडली क एक आमुख कथा धारावा हक छपी- ‘Shifting Fortunes:Pain and
gain in the global economy’ यािन बदलती तक़द र उफ वै क अथ यव था के सुख-दख
ु .
हर कथा- क त पूरे अखबार के कम से कम तीन पृ म फैली थी और साथ म थे अनेक
रं गीन िच . अपने पांच माह के अमर का वास म इस अखबार म कसी एक करण को
इतनी तव ज़ोह मैने नह ं दे खी. कथा म था यह क वै क अथ यव था कैसे भारत क
आकृ ित संवार रह है . है दराबाद और बंगलौर क त यह कथा भारत म क यूटर ांित
का लगभग गुणगान ह थी. गौरतलब है क इन दो शहर ने पछले कुछ वष म सूचना
ौ ोिगक के े म खासी उपल धयां अ जत क ह. कथा म भारत के उन नीित
िनधारक क उ मु सराहना क गई ज ह ने िश ा और वकास का आधारभूत ढांचा
खडा कया. पूर कथा पढकर हम भी अपने भारतीय होने पर गव हआ
ु . ले कन कथा
एक तरफा नह ं थी. इसका एक अमर क प भी था. अमर का म आउटसोिसग को लेकर
एक ग भीर बहस चल रह है . अमर क क पिनयां अपना बहत
ु सारा काम तीसर
दिनया
ु के दे श म करवाने लगी है . यह आउटसोिसग है . अमर क जनता के एक वग
का खयाल है क इस कारण अमर का म रोज़गार क थित पर ितकूल भाव पड रहा
है , और इसीिलये यहां इसका वरोध भी है . पर जो इसके समथन म ह वे कहते ह क
ऐसा नह ं है, साथ ह यह भी क तीसर दिनया
ु म म स ता होने क वजह से न केवल
उ पादन लागत घटती है, तीसर दिनया
ु के लोग का जीवन- तर ऊंचा उठाने का पु य
भी िमलता है . इस अित- व तृत, गवेषणापूण, सकारा मक आमुख कथा को पढते हए
ु मुझे
लगा क अखबार,आदमी,कु ा और काटना...(वह िस कथन क कु ा आदमी को काटे
तो खबर नह ं होती, खबर तो तब होती है जब इसका उलट हो.)यािन असामा य, वकृ त
और नकारा मक को ह सामने नह ं लाता है, और न सारे समाचार राजनेता बनाते ह,
अखबार के िलये तो इन िसतार से आगे जहां और भी ह..

स पादक य म अ सर अमर का के अ द नी मामल पर ह ट पणी होती है . बहत



व ेषणा मक तथा संतुिलत. अ य वैदेिशक मामल पर भी पूरे संयम समझ-बूझ तथा
तैयार के साथ िलखा जाता है . बीच के प न म वशेष के उ दा लेख हर रोज़ पढने
को िमल जाते ह. इन पृ पर रोज़ ह पाठक के ऐसे प भी छापे जाते ह जनम
समकालीन मु पर ग भीर ित याएं होती ह. अमर क प क तीखी आलोचना करने
वाले प क सं या भी कम नह ं होती. यहां अखबार म पाठक क सहभािगता काफ
होती है और इस सहभािगता को अ लम द के साथ अलग-अलग जगह पर रखा जाता
है ; मसलन थानीय मु को अलग जगह, खेल वषयक को अलग, यातायात वषयक को
अलग, कला-सा ह य वषयक को अलग, टै नोलॉजी वषयक को अलग और िनतांत िनजी
को अलग.

ऐसे बहत
ु सारे कालम इस अखबार म छपते ह जनम पाठक अपनी सम याओं/उलझन
क चचा कर स ब वशेश से मश वरा मांगते ह. ऐसे दो कालम तो बहत
ु ह
लोक य ह. एक है 'ड यर एबी'. एबीगेल वान यूरेन िल खत यह िसं डकेटे ड कालम रोज़
छपता है . यह म हला कुछ-कुछ हमारे यहां क एगोनी आ ट क तरह है . पाठकगण
इनसे अपनी िनजी उलझन क चचा करते ह. इन चचाओं को पढ़ कर मुझे अमर क
समाज को यादा अ छ तरह समझने का अवसर िमला. सम याएं ेमी/पित क
बेवफाई, सास के अवांिछत ह त ेप, ब हन क उपे ा, सहकम के ओछे पन जैसी चीज़ को
लेकर अिधक होती ह. एबीगेल क सलाह पर भी पाठक क ित याएं छापी जाती ह.
इस कालम को पढकर यह भी पता चलता है क अमर क समाज कतना खुला समाज
है , यह भी क इन लोग क य गत क प रभाषा या है, और यह भी क ये लोग
िश ाचार क सू मताओं क कतनी परवाह करते ह. इसीसे िमलता-जुलता एक त भ
िमस मैनस नाम से जू डथ मा टन िलखती ह. शु -शु म तो यह त भ मुझे काफ
हा या पद लगा ले कन धीरे -धीरे इसने मेरे सामने अमर क समाज का एक उजला प
उजागर कया. भारत म जन चीज़ को हम क़तई तव जोह नह ं दे ते ह, उनक बहत

परवाह ये लोग करते ह, यह जानकर मुझे इनसे थोड ई या ह हई
ु .िश ाचार वषयक
ज ासाएं बहत
ु दलच प ह. एक क चचा तो मने इस पु तक म अ य क भी है .
अिभवादन, उपहार, िनमं ण, बधाई, स वेदना जैसे वषय पर बहत
ु बार क सवाल उ कृ
समाज यवहार के ोतक ह. वैसे भी, यह समाज यवहार यहां हर जगह दखाई दे ता है .

कला सा ह य सं कृ ित के प रिश (अगर उसे यह नाम दया जा सके) म नई फ म ,


कताब , संगीत समारोह , कला दशिनय , आ द क व तृत समी ा या चचा होती है . यहां
क एत षयक सार गित विधय क सूचनाएं भी िनयिमत प से छपती ह. एक अलग
सी बुकलेट म स ाह भर के ट वी काय म क सूची और एक अ य बुकलेट म तमाम
िसनेमाघर , कलावीिथय , होटल -रे टोरे ट आ द के बारे म (हर स ाह) ववरण छपता है .

खेलकूद के ित अमर कय का लगाव जगजा हर है , अतः वाभा वक ह है क पो स


वाले ख ड म खेल कूद गित विधय क सिच , वशद चचा होती है . ओल पक के दौरान
ित दन लगभग छह पृ भर वशेष साम ी अलग से द जाती रह . वा ण य- यापार
वाले 6 पृ ीय अंश म कोई तीन पेज तो शेयर बाज़ार को ह सम पत रहते ह, शेष तीन
पेज म बडे वा ण यक समाचार होते ह.इसी ख ड के अंतगत स ाह म एक दन
टै नोलॉजी वषयक प रिश आता है जसम नए तकनीक उ पाद क चचा के साथ-
साथ वशेष गण ारा पाठक क तकनोलॉजी वषयक शंकाओं एवम उलझन का
समाधान कया जाता है . बागबानी, मोट रं ग,ज़मीन जायदाद आ द के प रिश भी इसी
तरह के होते ह. फूड ए ड वाइन वाले प रिश म वाइं स पर ग भीर और च कत कर दे ने
वाली वशेष तापूण चचा होती है . स ाह म एक दन पूरा एक प ना वा य चचा का
होता है . इस प ने पर पीपु स फामसी शीषक कालम म लोग क दवा वषयक
ज ासाओं के उ र दये जाते ह. यहां दवा क दकान
ु को फामसी तथा दवा को ग
कहा जाता है . हर रोज़ मौसम क सिच , वशद चचा होती है , अमर का और पूर दिनया

के मुख शहर का तापमान आ द छपता है , और मौसम क भ व यवाणी पती है , जो
आ यजनक प से सह िस होती है . भ व यफल, कॉिम स, वग पहे ली वगैरह रोज़
छपते ह.

कुल िमलाकर पूरा अखबार बहत


ु संतुिलत, वशेष तापूण,वै व यभरा होता है . सारा
अखबार तो शायद ह कोई पढता हो. इसी बात को यान म रखकर उसे अलग-अलग
ख ड म पेश कया जाता है . म तो ज़मीन-जायदाद (Real Estate), बज़नेस,और पो स
के ख ड आते ह अलग रख दया करता था. बज़नेस का ख ड उसी दन दे खता था
जस दन उसम तकनोलॉजी क चचा होती थी. अ य पाठक भी अपनी-अपनी िच के
अनु प ऐसा ह करते ह गे. पर, आप जस ख ड को भी दे ख, यह अव य पाएंगे क उसे
पूर समझ और तैयार के साथ तैयार कया गया है . पूर साम ी को एक साथ परख तो
उसका वै व य च कत व आ ा दत करता है . लगता है , अगर िच व फुरसत हो तो इस
एक अखबार को ह िनयिमत प से पढकर आप अपने ान ्, सोच व समझ को खासा
समृ , उ नत व प र कृ त कर सकते ह.

अखबार के ले-आउट(Lay-out) को लेकर भी समय-समय पर योग कये जाते ह. मेरे


दे खते-दे खते भी इसका ले-आउट बदल कर इसे यादा यूज़र ै डली बनाया गया.

इसी अखबार को इ टरनेट पर भी पूरा पढा जा सकता है . इस मामले म यह हमारे


अखबार से काफ आगे है . हमारे अिधकांश अखबार अभी भी नेट पर अंशतः ह उपल ध
होते ह.

अब थोड चचा मु तया अखबार क . यहां नमूने के तौर पर म 'िसएटल वीकली' को


लेता हंू . कुल 124 पेज का यह अखबार कर ब-कर ब व ापन से ह भरा है .इस काशन
म कोई 100 पेज शु व ापन के ह. सा ा हक म वैसे भी आप ताज़ा समाचार क
उ मीद तो नह ं करते. यहां कुछ छोटे -मोटे लेख ह और ह आयोजन क सूचनाएं. नई
फ म , नए संगीत और नई जार ड वीड ज़(DVDs) क समी ाएं ह. भ व यफल भी है .

घर, गाड , फन चर, बागवानी आ द के आम व ापन तो इसम भरपूर ह ह , मुझे बेहद


च काने वाले व ापन वे लगे जो Women seeking men,Men seeking women,Men
seeking men, Swap meet, Adult employment जैसे शीषक के अंतगत छपे थे. इन
व ापन म न तो संकेता मक श दावली थी न कोई दराव
ु -िछपाव. सीधे-सीधे, एकदम
ब दास तरह से अपनी ज़ रत या अपनी सेवा को चा रत कया गया था. और भी
आगे, कुछ दे वय ने तो अपने िच के साथ ह व ापन दे रखे थे. चाह तो इसे इस
समाज क वकृ ित कह ल. म तो इसे शंसनीय खुलापन ह कहंू गा. जो है , है ! उसे कोई
आवरण दे ने क या ज़ रत है ? या हम 'मसाज पालर' का असली अथ नह ं समझते?
फर, जैसे ये कहते ह, उसम या बुराई है ? पर ऐसे व ापन ज़ मेदार अखबार म नह ं
छपते.

अमर क अखबार क इस चचा को अपनी एक सराहना के साथ समा करना चाहता हँू .
िसएटल टाइ स म हर र ववार को एक कालम छपता है - Rant and Rave जसके मा यम
से आम पाठक अपनी सराहना या िन दा को अिभ य दे ता है . अगर कसी य त
सडक पर कसी ने गलत तर के से ओवरटे क कया तो उसक आलोचना और अगर कसी
सूनी सड़क पर आपको परे शान दे खकर कसी ने आपक मदद क तो उसके िलये
कृ त ता. जनके िलये यह सब िलखा जाता है , उनके नाम नह ं होते, पर िलखा इस
उ मीद से जाता है क वे इसे पढगे. मुझे लगा, अपने समाज को सजाने-संवारने और
उसक खर-पतवार को साफ करने का यह एक उ दा तर का है .

अगर भारत के अखबार भी ऐसा कर तो?

*******************

एक शह द दवस अमर का म भी

जब से अमर का क थापना हई
ु है , लगभग 20 लाख ी-पु ष इसके विभ न आदश व
हत क र ा के िलये अपने ाण क आहित
ु दे चुके ह. यह कृ त रा साल म कम से
कम एक दन उनको मरण कर अपने ासुमन अ पत करता है . यह एक दन है मई
माह का अंितम सोमवार. इस दन यादातर द तर ब द रहते ह और नाग रक से
अनुरोध कया जाता है क वे अपरा तीन बजे कुछ ण का मौन रख कर उन ात-
अ ात शह द क मृित को नमन कर.

इस अवसर को औपचा रक और सरकार तो नह ं बनाया गया है ले कन मनाने का तर का


कर ब-कर ब भारत जैसा ह है . ठ क तीन बजे एक घ ट बजे, एक िमिनट का मौन रखा
जाए और य द स भव हो, TAPS नामक बगुल गीत या चा स ाउस कृ त 'ऑन दस
डे ' गीत गाया या सुना जाए. य द कोई इस व त गाड़ चला रहा हो तो वह अपनी गाड़
क हे डलाइ स जला कर भी शह द क मृित को नमन कर सकता है .

चा स ाउस का 'ऑन दस डे ' गीत बहत


ु मािमक है . इसके भाव कुछ इस तरह ह :

इस दन कुछ ण के िलये सुन मौन को.


और याद कर उ ह जो चले थे हमारे साथ, ले कन अब नह ं ह.
ले कन उनके िलये आंसू न बहाएं,

ब क सुन उनक हं सी-


य क ज़ दा है उनक भावनाएं !
मृित क रह यपूण धारा से हो जाने द दल को ग वत.

हम बनाएं वन ,
बनाएं जानकार
और मननशील
उसके ित जो घ टत हो चुका है .

आज, अभी और सदा-सवदा-बनाएं इस दे श को एक !

दे श के िलये ाण का उ सग कर दे ने वाल को भुला दे ने के मामले म अमर का का


रकाड भारत से बेहतर नह ं है . मुझ जैसे पछली पीढ़ के लोग को यह जानकर शायद
कुछ राहत िमले क हाल ह म कये गए एक गैलप पोल से ात हआ
ु है क अमर का
के बमु कल 28 ितशत लोग को ह इस मेमो रयल डे क मह ा क जानकार है .

एक और बात.

यह शह द मृित दवस यहां एक और भी रं गत ले गया है . कम से कम मुझे तो यह


दे खकर अ छा नह ं लगा क इस मेमो रयल डे से कर ब एक स ाह पहले से यहां के
अखबार म 'मेमो रयल डे पेशल सेल' के व ापन क भरमार हो गई थी. मेमो रयल डे
को छु ट होती है , इसिलये लोग को अपनी दकान
ु क तरफ खींचने के िलये ये व ापन
दये जा रहे थे.

कम से कम भारत म अभी शह द के नाम पर कुछ बेचा तो नह ं जाता है .

********************

वाधीनता का उ लास
4 जुलाई अमर का का वाधीनता दवस है . यहां भी भारत क तरह दो ह 'रा ीय' पव
ह. वाधीनता दवस तथा शह द दवस, जसे मेमो रयल डे के नाम से भी जाना जाता
है और जसक चचा म एक अ य लेख म कर चुका हंू .

इस बार (2004) वाधीनता दवस र ववार को था. इसिलये वाधीनता दवस का


अवकाश अगले दन यािन सोमवार को कया गया. शिनवार को यहां वैसे भी यादातर
कामकाज ब द रहता है , इसिलये शु वार क शाम से ह वीक-ए ड का उ सवी माहौल
शु हो गया. दकान
ु , गैस टे शस
ं वगैरह तक पर से समेन-वुमन 'है व अ नाइस ल ग
वीक-ए ड' क शुभकामनाएं दे रहे थे.

अमर का म झ डे को लेकर उस तरह का प व ता का भाव नह ं है जैसा भारत म है .


कोई भी, कह ं भी, कसी भी तरह, झ डे या उसके पैटन या उसके अंश का उपयोग
कर सकता है . यह आज़ाद थी क मह ने के पहले दन से ह पूरा माहौल रा ीय वज-
मय नज़र आने लगा था. सडक पर, दकान
ु म, पाक म, गा ड़य म, हर कह ं
अमर क झंडे दखाई दे ने लगे थे.

य क यह यावसाियक समाज है , दकानदार


ु ने इ डपडस डे सेल के बडे -बडे व ापन
दे ने शु कर दये थे. अमर कय को इस बात म महारत हािसल है क वे हर संग को
अपना माल बेचने के अवसर म त द ल कर सकते ह.

चार जुलाई को यहां वैसा कुछ भी नह ं होता जैसा इसके एक माह यारह दन बाद भारत
म होता है . न रा को स बोधन, न वजारोहण, न परे ड ! यहां आज़ाद का यह दन
भरपूर उ सव, उ लास और मौज़-मज़े का दन है . लोग घर से बाहर िनकलते ह,
पकिनक मनाते ह. अमर क वैसे भी घर से बाहर िनकलने और मौज़-मज़ा करने के
यादा ह शौक न होते ह. ज़रा-सा मौका िमलना चा हये उ ह बाहर िनकलने का. पूरा
तामझाम लेकर िनकल पड़गे. जुलाई म तो मौसम भी अ छा होता है . याद आता है क
ह रशंकर परसाई ने िलखा था क भारत म वाधीनता दवस भीगता है और गणतं
दवस ठठु रता है . अमे रका म धूप और उजास भरा खुला-खुला दन अ छा माना जाता
है . इस िलहाज़ से इस बार यहां मौसम कुछ यादा ह उ दा था. यह भी एक अित र
कारण था क सडक पर गा डय क रे लम-पेल थी और सारे पाक,बीच(Beach) और
आमोद- मोद के अ य सभी थान उ लास,उमंग और ज़ दगी से लबरे ज़ अमर कय से
खचाखच भरे थे.
वाधीनता दवस का यहां सबसे बडा आकषण होता है आितशबाज़ी का सावजिनक
दशन. वैस,
े अमर का म आितशबाज़ी पर पूण ितबंध है . दो कारण से. एक- इससे
जान-माल का खतरा पैदा होता है , और दो-इससे होने वाला शोर आपक य गत
वाधीनता को आहत करता है . अमर क लोग अपनी वाधीनता को लेकर बहत

स वेदनशील ह; और यहां का शासन सुर ा को लेकर. इसिलये भारत क तरह क
आितशबाज़ी क आज़ाद क तो यहां क पना भी नह ं क जा सकती. और इसीिलये,
साल म एक बार होने वाली आितशबाज़ी का मह वपूण बन जाना वाभा वक ह है .
आितशबाज़ी का आयोजन सावजिनक तौर पर कया जाता है और उसे दे खने के िलये जो
भीड़ जुटती है वह बस दे खने ह का बल होती है !

य क इन दन यहां रात दे र से होती है , इस बार यहां आितशबाज़ी का काय म रात


10.30 बजे शु होना था. पर जस मेर मूर पाक म हम आितशबाज़ी दे खने जाने को थे
वहां पा कग आठ बजे से ह ब द हो जानी थी. यह बात अखबार म भी छप चुक थी.
हम लोग जब चार बजे पाक पहंु चे तो भी पा कग क जगह बमु कल ह िमल सक .
और पाक का नज़ारा ? मुझे तो बाबा तुलसीदास याद आ गये- अवस दे खये दे खन जोगू
! बहत
ु बड़ा पाक (इतना बडा क इसी म अमर का के छ: सबसे बडे वेलो स म से एक
थत है ) और उसम रं ग- बरं गे, या कम, या बहत
ु ह कम कपड़ वाले अमर क अपनी
पूर गृह थी के साथ. चादर बछ ह, टे बल-कुिसयां लगे ह, ि ल पर बार-बे- यू हो
रहा है , छोटा ब चा झूले म झूल रहा है , दो पालतू कु े अपनी अपनी लीश (डोर ) म
बंधे इधर-उधर दौड़ लगा रहे ह, युवा लोग बा केट बाल जैसा कुछ या सबी खेल रहे
ह, और कहना गैर-ज़ र है क यह सारा सामान घर से लाया गया है . मने कहा ना,
अमर कय को पूर गृह थी साथ लेकर चलने का तो जैसे जुनून ह है . सु वधा भी है .
बड़ -बड़ गा ड़यां और सब कुछ के बाद भी यादा भीड़-भाड़ नह ं य क जनसं या कम
है . तो जैसे लोग ने घर ह बसा रखे थे. सामान हमारे पास भी कम नह ं था. यादा
सामान के साथ-साथ अमर कय का एक और जुनून चचा यो य है . खाने-पीने का. यह
जुनून इतना है क आपको हर व त, हर जगह, हर इं सान कुछ न कुछ भकोसता ह
दखेगा. भारत म भले ह चलते- फरते खाना अिश ता क ण
े ी म शुमार हो, यहां तो
यह जीवन-प ित का अंग है . इसिलये एक हाथ म बगर या हॉट डॉग (गम-कु ा !)
तथा दसरे
ू म कोक या कॉफ लेकर चलने वाल को ढंू ढने क ज़ रत नह ,
ं बकौल
शायर, एक ढंू ढो हज़ार िमल जाते ह. तो, पाक म भी खाना-पीना पूरे शबाब पर था.
पीने को लेकर यहां कोई अपराध बोध नह ं है . पर उसे लेकर कोई बड़ ललक या
असहजता भी यहां दे खने को नह ं िमलती. हां, अठारह वष से कम वाले नह ं पी सकते,
कम से कम सावजिनक तौर पर. यहां पाक म म दरा के टॉ स भी थे. पर वहां पहंु चने
से पे तर एक सरकार अफसर के सामने से गुज़रना होता था. वह आपक वय कता को
पहचान कर (और य द कोई स दे ह हो तो माण मांगकर) आपके हाथ म एक परिमट-
प ट बांध दे ता था. उसे दखाने पर ह म दरा य क जा सकती थी. म दरा का
उपभोग करते समय भी इस प ट का हाथ पर होना ज़ र था. इस छोटे -से सरकार
ितबंध के िसवा सब तरह क आज़ाद थी. यह ं लगे हाथ यह भी बता दं ू क अमर का
म 18 वष से कम के लोग िसगरे ट भी नह ं खर द सकते.

तो, खाना-पीना मौज -मजा चल रहा था. सामने एक लाइव बै ड पॉप यू ज़क क धूम
मचा रहा था. लोग अपने-अपने म खोये भरपूर आन द ले रहे थे. यहां का समाज अपने
म पूर तरह मगन रहता है (पता नह ं इसके िलये वह गगन वन पित खाता है या
नह ं), न वह आपक ज़ दगी म दखल दे ता है , न अपनी ज़ दगी म कोई दखल सहन
करता है . यह कारण है क पाक म 'चाहे जैसे' कपड़े पहने ी-पु ष भी भरपूर थे पर
उनक तरफ यान दे ने क फुरसत या इ छा कसी को नह ं थी.

इस सबम वाधीनता दवस था तो केवल इतना क कसी का ट शट झंडे का था,


कसी क चादर, कसी का तौिलया, कसी क टोपी.

रात ठ क साढे दस बजे आकाश रं ग- बरं गी आितशबाज़ी से नहा उठा. हर चमक पर


तािलयां या हष- विन क गुंजार. आितशबाज़ी ठ क-ठाक थी. सच कहंू , भारत क
आितशबाज़ी को मरण कर म थोड़ा िनराश ह हआ
ु . जो कला मकता और
क पनाशीलता हमार आितशबाज़ी म होती है , वह यहां नह ं थी. पर सब लोग ( जनम
हम भी शर क थे) इस आितशबाज़ी का भरपूर मज़ा ले रहे थे. याह रात, यािन घना
अंधेरा और रं ग- बरं गे फूल या तार या तीर से भर-भर जाता आकाश और हर तुित
पर ज़मीन से उठता शंसा और उ लास का आ ादक शोर. अमर क लोग शंसा करने
म क़तई कंजूस नह ं ह. वे बहत
ु खुलकर दाद दे रहे थे, और इससे उनका अपना
उ लास भी दोगुना-चौगुना हो रहा था.

तो, ऐसा था अमर क आज़ाद का उ सव.

ब क, असल आज़ाद का उ सव तो था ह यह . आपक आज़ाद क सीमा कहां तक है


और दसरे
ू क आज़ाद क सीमा कहां से शु होती है , यह जान लेना और इसका खयाल
रखना - इससे बड़ आज़ाद और या हो सकती है ? इस समाज ने यह पाठ बहत

अ छ तरह न केवल पढ़ िलया है, इसे आ मसात भी कर िलया है .

***************

एक पु तकालय के भीतर

भारत म अकादिमक मंच पर ायः यह चचा और िचंता क जाती है क नई तकनीक


पु तकालय को एकदम अ ासंिगक कर दे गी. वैसे तो पु तक पर म डराने वाले खतर
क चचा इले ोिनक संचार मा यम के आगमन के साथ ह शु हो गई थी, य क इन
मा यम ने पु तक के अ त व को कई तरह से चुनौती द थी. पाठक के समय पर
क ज़ा चुनौती का एक पहलू था, नए-नए आए छोटे पद का आकषण दसरा
ू , चीज़ क
सजीव तुित तीसरा..... . बार क तर पर इन मा यम ने भो ा के सोच व हण म
जो बदलाव कये उससे बहत
ु सारा िल खत व मु त फ का लगने लगा. लेखक ने अपनी
तरह से भी इस चुनौती से टकराने क चे ाएं क ं. उसने अपने लेखन का तर का भी थोडा
बदला. लेखन और पु तक इस चुनौती से जूझ ह रहे थे क तकनीक का एक और बड़ा
क र मा उससे भी बड़ चुनौती के प म आ खड़ा हआ
ु . दिनया
ु का बहत
ु सारा ान
इ टरनेट पर आ गया. इसने तो भार भरकम कताब और उसके वशाल सं ह यािन
पु तकालय को बेमानी िस करने म कोई कसर ह नह ं छोड़ . कोई य अपने घर म
24 ज़ द वाला एनसाइ लोपी डया रखे? उसे दे खने के िलये पु तकालय भी य जाये?
ड शनर भी य घर म रखे? माउस लक करे और इ छत जानकार क यूटर के
न पर पढ़ ले. अगर ज़ रत हो, उसका टआउट भी िनकाल ले. कताब और
कताबघर क ज़ रत ह ख म!

ले कन हर क़ताब केवल सूचना ह तो नह ं होती. और अगर कुछ के िलये हो भी तो


क़ताब को हाथ म लेने का सुख, कसी श द, वा य या पं को पढ़ते हए
ु क कर
सोचने का सुख, कागज़ क सतह को छूने का सुख, कागज़ और याह क गंध म खो
जाने का सुख -- इन सबका वक प और कुछ हो ह कैसे सकता है ? छो ड़ये ये सब.
भावुकता क बात ह. आज क ज़मीनी हक़ क़त के सामने इनक कोई अथव ा नह ं है .
इस तरह क ऊहापोह चलती रहती है . यावहा रक लोग कहते ह, कताब और लाइ ेर
ख म भी हो जाए तो या हज़ है ! और पु तक ेमी इस क पना पर ह मुंह लटका लेते
ह. अतीत का मोह कम बल नह ं होता.

अभी पछले दन आकाशवाणी क एक प रचचा म हम इसी मु े पर बहस कर रहे थे


क या इ टरनेट और इसी तरह क अ य तकनीक पु तकालय को पूर तरह ख म कर
दगी? भारत म पु तकालय क दशा वैसे भी यादा अ छ नह ं है . दशा तो पु तक क
भी कहां अ छ है ? छोटे शहर क तो छो ड़ये, बड़े शहर म भी आपको ऐसी दकान
ु नह ं
िमलेगी जहां आप मनपस द कताब ढंू ढ़ सक. दरअसल कताब क या कसी भी अ य
व तु क दकान
ु आपको खर दने का ह नह ं, दे खने का भी सुख दे ती है . आप स ज़ी
बाज़ार जाएं और खर द भले ह यादा न, पर हर -भर , ताज़ी, रं ग- बरं गी स ज़य के रं ग-
प-गंध का साहचय आपको एक खास तरह का सुख दान करता है . कताब क दकान

म भी ऐसा ह होता है . खर द आप भले एक ह क़ताब(या एक भी नह ं) पर सैकड़ -
हज़ार कताब के बीच होने का, उ ह दे खने-छूने का सुख अवणनीय होता है . बशत ऐसी
दकान
ु हो! दकान
ु न सह , पु तकालय ह सह . ब क वहां तो यह अपराध बोध भी नह ं
होता क इतनी दे र म कुछ भी नह ं खर दा. लोकलाज म खर दने क ववशता भी नह ं
होती. पर भारत म आिथक कटौती क गाज़ सबसे पहले पु तकालय पर ह िगरा करती
है . बार-बार पु तकालय के बजट म कटौती कर हमने उ ह लगभग िन ाण ह बना
डाला है . जन चेतना के अभाव क वजह से इसका कोई ितरोध भी नह ं हआ
ु है .
सावजिनक पु तकालय ह नह ,ं िश ण सं थाओं के पु तकालय भी इस नासमझी भर
कटौती के िशकार हए
ु ह. राज थान के महा व ालय म, जहां मने अपनी लगभग पूर
ज़ दगी बताई, आज पु तकालय क जो दशा है , उसे दे ख िसफ सर ह धुना जा सकता
है . बना पु तकालय कसी उ च िश ण सं थान क क पना भी नह ं क जा सकती, पर
मेरे रा य म यह अजूबा भी चल रहा है .

बहरहाल.

जब अमर का आया तो मन म यह भी था क दे खूं यहां पु तकालय का या हाल है ?


इस दे श म तो इ टरनेट का खासा चलन है . अगर इ टरनेट ह कारण हो तो यहां
पु तकालय मर ह चुका होगा. क यूटर आम है , इ टरनेट क पीड बहत
ु उ दा है , लोग
के पास फुरसत नह ं है , भाग-दौड़ क और चमक-दमक भर और थोड़ वलािसतापूण
ज़ दगी है . ये सब बात पु तकालय को ख म कर दे ने के िलये काफ ह.

कुछ ऐसे ह खयालात मन म थे, जब म यहां अमर का म एक पु तकालय म गया.

रे डम ड र जनल लाइ ेर नामक यह पु तकालय कंग काउ ट लाइ ेर िस टम (KCLS)


क 43 शाखाओं म से एक है . ये शाखाएं पूरे इलाके म फैली ह तथा सूचना तकनीक के
मा यम से आपस म जुड़ ह. इस केसीएलएस के पास 40 लाख आइट स
( कताब,प काएं,समाचार प ,पै फले स,ऑ डयो-वी डयो टे स, सीड ,वीसीड ,ड वीड ,एलपी
आ द-आ द) का वृहद सं ह है . सं ह क स पूण सूची इ टरनेट पर उपल ध है और
वभावतः कई तरह से वग कृ त है .

म बात रे डम ड र जनल लाइ ेर क कर रहा था. एक बहत


ु भ य, सु िचपूण और
सु वधाजनक इमारत म थत यह पु तकालय मानो आपको अपनी तरफ खींचता है .
ह रयाली, खुलापन और टॉनी एंजेल का तीका मक मूित-िश प-' वज़डम सीकस'
( ज ासु!) आपका वागत करते ह. इस मूित-िश प म एक वशालकाय ेनाइट िशला
पर चार कौए वराजमान ह. पा ा य िमथक म कौए को ज ासु और बु मान प ी
माना जाता है . इस तर िश प म तीन कौए एक धरातल पर ह - अलग-अलग दशाओं
म दे खते हए
ु , और चौथा कौआ उनसे नीचे है, उ ह दे खता हआ
ु . तीन कौए कह ं से भी
ान ा करने को त पर ह और चौथा कौआ इस बात का सूचक क हम ािनय से
ान ा करने म कोई हचक नह ं होनी चा हये.

कोई भी नाग रक अपनी पहचान का माण दे कर पु तकालय क सद यता ले सकता है .


सद य बन जाने पर उसे एक काड िमल जाता है जो े डट काड जैसा होता है . इस काड
पर अनिगनत साम ी ा क जा सकती है . पु तक 28 दन के िलये, प काएं 7 दन
के िलये. शेष साम ी क भी अलग-अलग समय सीमा है . यह ं यह बता दं ू क
पु तकालय से सीड ,वीसीड ,टे प-कुछ भी ले जाया जा सकता है . वल ब होने पर जुमाना
अदा करना होता है . जुमाना रािश आपके खाते म िलख द जाती है, आप सु वधानुसार
कभी भी जमा करा सकते ह, यािन तुरंत जमा कराना ज़ र नह ं है . पु तकालय म
लगभग 50 क यूटर ह जन पर अपनी पस द क कताब/प का/अ य साम ी क
तलाश क जा सकती है . यह काम इ टरनेट के ज़ रये अपने घर से भी कया जा सकता
है . घर से ह आप कसी भी कताब या साम ी को(और ज़ र नह ं क वह साम ी इसी
रे डम ड पु तकालय क हो, वह केसीएलएस क 43 शाखाओं म से कसी क भी हो
सकती है ) आर त (Hold) करा सकते ह. जब वह साम ी रे डम ड पु तकालय म आ
जाती है तो आपको ई-मेल या फोन से सूिचत कर दया जाता है तथा पु तकालय म वह
साम ी आपके नाम क पच के साथ अलग रख द जाती है . इसी तरह क सु वधा
केसीएलएस क तमाम शाखाओं म सुलभ है . पु तकालय म बैठ कर तो पढ़ा ह जा
सकता है . अ यिधक सु वधाजनक टे बल कुिसयां तथा समुिचत काश यव था है . अगर
यादा कताब वगैरह ले जानी ह तो वह ं उपल ध हाथ-ठे ले(Cart) का इ तेमाल कया
जा सकता है . साम ी घर ले जाने के िलये पॉलीिथन क थैिलयां सुलभ रहती ह.

सार साम ी आप खुद ह इ यू करते ह. पहले ऑ ट कल र डर के सामने अपने सद यता


काड को लाय, इससे आपका खाता खुल जाता है . फर एक-एक कर इ यू करने वाली
साम ी के बार कोड को इस ऑ ट कल र डर के सामने लाते जाएं. बस! कोई चौक दार
नह ं, कोई िगनती नह ं. अमर क समाज म वैसे भी आपक ईमानदार पर पूरा व ास
कया जाता है . साम ी का लौटाना तो और भी आसान है . पु तकालय के बाहर लैटर
बॉ स नुमा ब से बने ह. उनम आप साम ी डाल द और हो गया काम.

मने पहले भी कहा, यहां से पु तक, प काएं, कैसे स,सीड ,वीसीड ,ड वीड कुछ भी घर ले
जाया जा सकता है . मने महज़ ज ासा से दे खा तो पाया क कोई 200 ह द फ म
क ड वीड यहां मौज़ूद ह. कई ऐसी ह द फ म म यहां दे ख पाया जनके िलये भारत
म तरसता ह रहा था, जैसे याम बेनेगल क ‘अंतनाद’ या स य जत रे क अनेक
फ म. प डत र वशंकर वगैरह का संगीत भी यहां भरपूर मा ा म है . मुझे यहां अपने
राज थान का लोक संगीत तक िमल गया : लंगा और मांग णयार. पा ा य फ म और
संगीत वगैरह का तो मान खज़ाना ह भरा पडा है . भारतवंशी ज़ुबीन मेहता क संगीत
रचना भी म यहां से लेकर सुन पाया. बीथोवन वगैरह का भी बहत
ु सारा कृ ित व यहां
सुनने को िमला.

पु तकालय आपको अपनी ई-मेल चैक करने क सु वधा भी दे ता है . यह कतई ज़ र


नह ं है क आप पु तकालय के सद य ह तभी इस सु वधा का उपयोग कर सकते ह.
गैर सद य, मसलन वासी/या ी भी पूरे अिधकार के साथ इस सु वधा का लाभ उठा
सकते ह. यहां पु तकालय को एक सामा जक सेवा दाता के प म भी चलाया जाता है .
यह भी सोच है क इस तरह क सेवा से और अिधक लोग पु तकालय क ओर आकृ
ह गे.

पु तकालय म र ो ाफ क पया और समुिचत सु वधा है . जो भी साम ी आपको


चा हये, उसक फोटोकॉपी करल. क यूटर पर कोई साम ी आपके काम क है तो उसका
ट आउट िनकाल ल.

इस लाइ ेर को दे ख कर लगा क क यूटर और इं टरनेट पु तकालय के श ु नह ं,


सहायक ह. इ ह ने तो पु तकालय सेवा का व तार ह कया है . इनके मा यम से तो
ान के वशाल भ डार म से अपने काम क चीज़ ढंू ढना बेहद आसान हो गया है .
इ टरनेट ने पु तकालय क आपसी और आपसे उनक दरू भी समा कर द है .
तकनीक ने यह भी स भव बनाया है क य द आप पु तकालय तक न जा सक तो अपने
घर बैठे ह पु तकालय क सेवाओं का लाभ उठा ल. समय क भी ब दश ख म.
आपको रात के बारह बज़े फुरसत िमली है तो उस व त भी आप पु तकालय से जुड़
सकते ह. अब आप ह बताय, अगर ऐसी लाइ ेर हो तो भला कौन उसका बार-बार
उपयोग न करना चाहे गा?

इतना ह नह ं, लाइ ेर के एक कोने म एक वे डं ग मशीन भी लगी है जसम िस के डाल


कर कॉफ या शीतल पेय वगैरह खर दे जा सकते ह, और उसक चु क लेते-लेते पढा जा
सकता है . कॉफ या कोक पीते हए
ु पढ़ना अमर क जीवन प ित का अंग है . उसक
सु वधा पु तकालय जुटाता है .

पु तकालय म घुसते ह आपका सामना नई आई पु तक के रै क से होता है . इस रै क क


कताब को हर दसरे
ू -तीसरे दन बदला जाता है . इ टरनेट पर भी नई आई कताब क
सूचना अलग से उपल ध होती है . पु तकालय म नई फ म और नया संगीत भी
लगातार आता है और यहां के यूज़ लैटर म तथा इ टरनेट पर बाकायदा उसक सूचना
द जाती है .

पु तकालय का काम इतना ह नह ं है . यहां रचना पाठ, लेखक से िमिलये, पु तक चचा,


पु तक/िच /कलाकृ ित दशनी आ द के काय म लगातार चलते रहते ह. ये काय म
इतने यादा और इतनी िनयिमतता से होते ह क इनक सूचना के िलये एक मािसक
यूज़ लैटर कािशत कया जाता है . पु तकालय एक उ दा काय म और चलाता है .
इसका नाम है 'र डं ग रवाडस’ (Reading Rewards) यािन पढने का पुर कार. 18 वष से
अिधक क वय का कोई भी पाठक एक छोटा-सा फॉम भरकर और अपनी ताज़ा पढ
कताब पर अपनी छोट -सी ट पणी िलखकर इस काय म का सद य बन सकता है .
फर पूरे एक साल म उसे 50 कताब पढकर उन पर अपनी ट प णयां दे नी होती ह.
इतना कर दे ने पर उस पाठक को पुर कृ त कया जाता है . उसक िलखी ट प णय को
मु ण तथा इ टरनेट के मा यम से कािशत भी कया जाता है . पु तकालय एक और
उ दा सेवा करता है . कोई भी पाठक या नाग रक अपनी पढ़ हई
ु पु तक या पु तक
पु तकालय को भट कर सकता है . पु तकालय उ ह रयायती दाम पर बेचकर अपनी
आय म वृ कर लेता है . इस यास म आय से यादा मह व इस बात का है क आप
पु तकालय से संल नता महसूस करते ह, साथ ह जो पढ़ने के शौक न ह उ ह कम दाम
पर पु तक िमल जाती है . अगर यह सु वधा न होती तो पु तक वैसे भी कचरे के मोल
ह जाती. इस तरह क सेवाएं दे कर पु तकालय अपने को नाग रक के िनकट लाता है .

मुझे यह दे खकर बहत


ु सुखद आ य हआ
ु क यह पु तकालय दन के हर व त पाठक-
पा ठकाओं से लगभग भरा रहता है . और भी यादा खुशी इस बात से हई
ु क इन
पाठक-पा ठकाओं म भारतीय भी खूब होते थे.

या हमारे दे श म ऐसे पु तकालय नह ं हो सकते?

*************

रोगी क दशा उ म है 1 !

अमर का म मनु य जीवन को कतना मह वपूण माना जाता है , यह चचा म एकािधक


थल पर कर चुका हंू . जहां कह ं भी आपको खतरा हो सकता है , 'सावधान' के संकेत
अव य लगाये जाते ह. अगर फश धोया गया है और आपके फसल जाने का खतरा है तो
'सावधान' का बोड न लगाया जाये, यह क पनातीत है . ब च के खलौन पर, दवा
क शीिशय पर, घरे लू उपकरण पर, वाहन म, दकान
ु के वचािलत दरवाज पर,
यानी जहां ज़रा भी ज़ रत हो, सावधान रहने क चेतावनी ज़ र द जाती है . ‘सावधानी
हट ,दघटना
ु घट ' म यह समाज पूरा-पूरा व ास करता है .

ऐसे समाज म अगर कोई बीमार हो जाये तो ?


अमर क िच क सा यव था को भी नज़द क से दे खने का मौका िमल ह गया.

यहां आने के बाद से ह ऐसा लग रहा था क मेरा रे ट म जाना बढ गया है . रे ट म


भारतीय साधन का अमर क सं करण है . पहले रात को इस िनिम एक बार उठता था
अब चार-पांच बार उठना पडता है . फर जाने कैसे एक दन याद आया क कुछ ऐसे ह
ल ण क वजह से जयपुर म मेरे िम डॉ टर मनोहर भाकर को ो टे ट ए लाजमे ट
वषयक ऑपरे शन कराना पड़ा था. यह भी याद आया क कदािचत मुझे भी यह िशकायत
कोई एक साल से है . यान यहां आकर गया. िचंितत होना अ वाभा वक नह ं था. एक
दन प ी से अपनी िचंता क चचा क . साथ-साथ इं टरनेट पर गूगल सच म ो टे ट
ए लाजमे ट के बारे म पड़ताल क .

यह इं टरनेट भी या चीज़ है ! सार दिनया


ु का ान आपक उं गिलय का गुलाम बना
कर रख दया गया है . सच एं जन आपके िलये इतनी सार सूचनाएं लाकर रख दे ते ह
क बस ! काफ कुछ पढ़ िलया. लगा क सारे ल ण उसी के ह.

उधर प ी ने चा से चचा कर द . और चा , हमार बेट ! वैसे तो बे टयां होती ह ऐसी


ह पर हमार बेट तो कुछ यादा ह 'ऐसी' है . अपने मां-बाप क जैसी िचंता वह करती
है वैसी, मुझे तो लगता है , शायद ह कोई और बेट करती होगी. मेरा खयाल तो यह
था क यह सम या कोई बड़ सम या नह ं है , भारत लौटकर इसका उपचार करा लूंगा,
ले कन उसने चुपके-से ह (अगर मुझे बताती तो म मना कर दे ता - ऐसा उसे डर था)
हम लोग के एक डॉ टर िम से चचा कर ली.

डॉ टर पंकज राजवंशी और उनक प ी डॉ टर आरती राजवंशी मेरे ससुराल प क ओर


से हमारे र तेदार ह. पर पहली मुलाक़ात उनसे पछली बार यहाँ आने पर ह हई
ु . फर
वे लोग और चा -मुकेश बहत
ु नज़द क आ गये. पंकज और आरती बहत
ु मज़ेदार युगल
ह. पंकज को टे नोलॉजी,कला,राजनीित, मण और जाने कन- कन चीज़ म गहर
दलच पी है और आरती जैसे जीवंतता का खज़ाना है . इसी 4 जुलाई (2004) को इन
दोन को यहां क नाग रकता िमल गई है .

तो, एक शाम ये राजवंशी द पती घर आये, पंकज ने मेरा पर ण कया, ल बी चचा


क , कुछ र पर ण वगैरह करवाने को कहा.
अगले ह दन मुकेश मुझे र पर ण के िलये ले गये. डाय ना टक सटर वाल को
पंकज ने पहले ह फोन कर दया था. आप सीधे पर ण नह ं करवा सकते - जैसे भारत
म लैब म जाकर करवा िलया करते ह. डॉ टर का िनदश यहां ज़ र होता है . जहां हम
जाना था, वह जगह घर से कोई 30-40 मील दरू थी. बहत
ु शानदार (यह भी
अ पकथन ह है ) बहमं
ु ज़ला इमारत क पांचवीं मं ज़ल पर (िल ट से) पहंु च.े
रसे शिन ट को अपना नाम बताया - भारतीय नाम को समझने म इन लोग को
द कत होती है इसिलये ए जी आर ए ड यू ए एल करके बताया. भ म हला ने काड
िनकाला - डॉ टर पंकज के फोन करते ह काड बना दया गया था. मुकेश ने बता दया
क मेरा कोई इं योरस नह ं है ( यादातर अमर कय का होता है , भुगतान सीधे
इं योरस क पनी से ह हो जाता है ), अतः शु क का भुगतान मुकेश ने अपने े डट
काड से कर दया.

मुझे पर ण क म ले जाया गया. पहले मू पर ण. फर र पर ण. एक कुस पर


बठाकर पेट के आगे लगभग वैसा ह अवरोधक लगा दया गया जैसा हमारे यहां झूल
म सुर ा के िलये लगाया जाता है . सौ य भ म हला (नस!) मीठ -मीठ बात करती जा
रह थी. बांह पर पहले रबड़ क एक डोर बांधी, फर मु ठ म एक गद दे कर उसे दबाने
को कहा (ता क नस उभर आये), फर प रट से नस के आसपास क जगह साफ क .
जब एक बड़ -सी िस रं ज और बड़ -सी शीशी उसने हाथ म ली, तो मने घबराकर पूछा
क या इतना सारा खून िनकालगी, और उसने मुझे आ त कया क नह ं, बस,
थोड़ा-सा ह लगी. भ म हला वाकई भ थीं. सुई इतनी धीरे -से चुभाई क बस मुझे यह
पता चला क खून िलया जा चुका है . फर जहां सुई चुभाई थी वहां एक सुर ा प ट
िचपकाई, और वदा.

िन य ह इस लैब ने भार रािश ली होगी. पर जो यव था, जो सफाई, जो


शालीनता, जो िश ाचार था वह मेरे िलये क पनातीत था. भारत के िलहाज़ से. मुकेश ने
मुझे बताया क अंतर महं गे-स ते का नह ं है . सेवा का तर हर जगह यह होता है .

वहां से रपोट पंकज को भेज द गई. अगले दन पंकज का फोन आया क य प और


कोई कॉ लकेशन नह ं है (मसलन यूर न इं फे शन, डाय बट ज़, कडनी मालफं शन
वगैरह) पर मुझे दवा तो लेनी ह होगी. और उ ह ने दवा भी िभजवा द . इसके बाद भी
हर दसरे
ू -तीसरे रोज़ फोन करके पंकज मेरा हाल चाल पूछते रहे .
दस बारह दन बाद पंकज को लगा क दवा का अपे त असर नह ं हो रहा है . उ ह ने
दो सलाह द ं. एक, म एक और लड टे ट करवा लू,
ं दो, एक यूरोलॉ ज ट को भी
दखा लू.ं दोन क यव था भी उ ह ने कर द . लड टे ट पहले क ह तरह हो गया.
लैब हालां क उतनी बड़ और भ य इमारत म नह ं थी पर सावधानी, सफाई और
सु यव था म कसी भी तरह कम नह ं थी. यािन, म यह मानने को बा य हआ
ु क ये
गुण यहां क यव था म ह अंतिन हत ह.

लैब ने दसरे
ू ह दन रपोट डॉ. पंकज को िभजवा द . बकौल पंकज, सब कुछ ठ क था.
पर यूरोलॉ ज ट से तो िमलना ह था. पंकज ने न केवल अपने एक िम डॉ टर नर
सूद का नाम सुझाया, उनसे बात भी कर ली. इसी हवाले से मुकेश ने डॉ टर सूद के
द तर म फोन करके अपाइं टमट भी ले िलया. यहां यह ज़ र है . यह नह ं क जब भी
आपका मन (या सु वधा) हो आप डॉ टर के पास चले जाय. अपाइं टमट िमला कोई 15
दन बाद का.

दसरे
ू ह दन डॉ टर सूद के कायालय से एक मोटा िलफाफा आन पहंु चा. इसम
अपाइं टमट क सूचना तो थी ह , उनके लिनक तक पहंु चने का व तृत िनदश भी था.
यहां यह ज़ र भी है . सड़क पर यातायात क गित ती होती है - आप हर कह ं गाड़
नह ं रोक सकते. और रोक कर होगा भी या? कससे पूछगे क भाई साहब, गली
न बर 13 कधर है ? कोई भाई साहब (या बहन जी) पैदल तो ह गे नह ं. सड़क पर
नज़र आती है बस गा ड़यां और गा ड़यां. पैदल चलते आदमी के दशन बड़े भा य से ह
नसीब होते ह. तो, व तृत माग-िनदश भेजना यहां क यव था का अंग है . सड़क क
न बर यव था, भवन पर न बर का अंकन और माग िच सब इतने सु प ,
मानक कृ त और सुिन त होते ह क आप द िनदश के सहारे बना भटके कह ं भी
पहंु च सकते ह. कसी गंत य का माग ढंू ढने का एक और तर का क यूटर भी है .
क यूटर म अपनी लोकेशन और गंत य का पता फ ड क जये और पूरा न शा हा ज़र,
जसमे यह तक अं कत होगा क आपको यह दरू तै करने म कतना समय लगेगा. अब
तो गा ड़य म भी जी. पी. एस.(Global Positioning System)आने लगे ह जो
आपक या ा को और भी सुगम बना दे ते ह. डॉ टर पंकज के घर हम पहली बार
क यूटरजी से रा ता पूछ कर ह पहंु चे थे. क यूटर ने या ा का समय 35 िमिनट
बताया था और ठ क 35 व िमिनट पर हम जस घर के सामने थे वह पंकज का था.
पर यह सब क यूटर का ह चम कार नह ं है . नगर िनयोजन क भूिमका भी इतनी ह
अहम है . गिलय क न बर यव था (यहां उनके न बर ह होते ह, नाम नह ं) बहत

यव थत, योजनाब , मानक कृ त वै ािनक और तकसंगत है . इसिलये अगर आप
गली न बर 138 तक पहंु च गये ह तो यह िन य मािनये क अगली गली 139 ह
होगी. यह हाल मकान का भी है . कोई मकान बना न बर का नह ं होता और न बर
यव था भी उतनी ह तकसंगत तथा वै ािनक होती है .

ले कन फर भी म तो भटक ह गया हंू ! बात िच क सा यव था क कर रहा था, ज़


रा त का करने लगा. फर अपनी राह पकड़ता हँू .

डॉ टर सूद के मोटे िलफाफे म कुछ प थे जनम मुझे अपने बारे म, अपनी सेहत के
बारे म, अपनी आदत के बारे म सवाल के जवाब दे ने थे. इन प को मने भर
िलया. संगवश, फर यह बता दं ू क यह सब भी यहां क यव था का एक अिनवाय
अंग है . कुछ ह दन बाद वमला को भी ऐसा ह अनुभव हआ
ु . हआ
ु यह क उसक एक
ु ड़ा टट
डाढ़ का एक छोटा-सा टक ू गया. बचा हआ
ु तीखा ह सा गाल को भीतर से आहत
करने लगा. बहत
ु छोटा-सा मामला था. कसी डे ट ट के पास जाकर डाढ़ के नुक ले
ह से को थोडा-सा िघसवा लेना था. पर यहां कोई शॉट-कट नह ं होता. तीन पेज भर
सवाल के जवाब तो दे ने ह पड़े . उसके बाद ए स-रे भी. बहरहाल.

िनधा रत ितिथ को िनयत समय पर चा मुझे लेकर डॉ टर सूद के अ पताल पहंु ची.
हां,एक दन पहले डॉ टर सूद के कायालय से फोन आ गया था क अगले दन इतनी
बजे हमारा अपाइ टमे ट है . ऐसा यहां हमेशा कया जाता है . हमारा अपाइ टमे ट
1.15 बजे का था. 1.15 पर जब हम रसे शिन ट के सामने पहंु चे तो उसने सूचक
िनगाह से दे खते हये
ु सवाल कया- 'डू रगा एगरवाल'? यहां भारत क तरह नाम को
सं करने (दगा
ु साद=ड पी) का रवाज़ नह ं है इसिलये पूरे नाम का ह योग करना
होता है और भारतीय नाम वभावत: इन लोग को अटपटे लगते ह.

रसे शिन ट म हला ने भुगतान के बारे म र मी सवाल पूछे, हमने बता दया क
हमारा कोई इं योरस नह ं है . वह हम बल थमाने को ह थी क उसक एक स कम ने
आकर उससे कुछ गु तगू क . (उसने कहा क डॉ टर सूद का िनदश है क हमसे फ स
न ली जाए). यह पंकज क करामात थी.

डे क क औपचा रकताओं के बाद मुझे अ दर भेजा गया. पहले मू पर ण. रे ट म


म जाने को कहा गया. वहां से पल दे ने के िलये एक साफ सीलब द शीशी, हाथ वगैरह
धोने के िलये साबुन यु ट यूज़ रखे हए
ु थे तथा कैसे या करना है क बाबत व तृत
िनदश द वार पर अं कत थे. शालीनता का तकाज़ा है क म उन िनदश क चचा यहां न
क ं , ले कन इतना संकेत अव य कर दं ू क इन सारे िनदश का असल मक़सद यह था
क जो से पल आप द वह एकदम शु हो, यािन उसम कसी भी तरह का बा
सं मण न हो. कहना अनाव यक है , भारत म, आम तौर पर, ऐसी सावधानी नह ं
बरती जाती है . ट ल क एक छोट -सी खड़क म िनधा रत थल पर से पल रख कर
बाहर आया तो मुझे र पर ण के िलये कुस पर बठा दया गया और वह सार
या दहराई
ु गई जसका वणन म पहले भी कर चुका हंू .

इसके बाद मुझे एक पर ण क म ले जाया गया. एक द वार पर ो टे ट वषयक चाट


टं गे थे. एक ब दा, थोड़े ल बे बाल वाला, आया. हं स कर अपना प रचय दया क
डॉ टर सूद का सहायक हंू ; मेरा र चाप, न ज़ पर ण कया और चला गया. कोई दस
िमिनट बाद एक अजीब-सी चीज़ पर सवार एक अधेड़ भारतीय पु ष कमरे म आये. यह
अजीब-सी चीज़ एक ह ल चेयर, ू और
टल कूटर का संकर अवतार थी और इस पर
आ ढ़ स जन डॉ टर सूद थे. द ली के डॉ टर सूद वष से अमर का म ह और घुटने
म लगी चोट क वजह से इस अजूबे का इ तेमाल करते ह.

यह ं फर एक संगांतर करना पड़ रहा है .

अमर क समाज म वकलांग दया, सहानुभूित या हकारत के नह ं ब क वशेष


तव जोह के पा माने जाते ह. हर पा कग थल पर दरवाजे के ठ क पास वाली जगह
वकलांग क गा ड़य के िलये आर त होती है और र होने पर भी अ य लोग
उसका इ तेमाल कर ह नह ं सकते, यािन वकलांग न हो तो वह जगह खाली ह रहे गी.
भार -भरकम दरवाज़ के िनकट वकलांग क सहायता के िलये एक बटन होता है , जसे
दबाने पर दरवाज़ा खुद-ब-खुद खुल जाता है . अ य को काफ ताकत लगाकर, धकेल
कर यह दरवाज़ा खोलना पड़ता है . हर फुटपाथ पर ह ल चेयर के
चढ़ाने-उतारने के िलये एक डप (dip) होता है , हर इमारत म ह ल चेयर के िलये
अलहदा रै प होता है . एक य तो मेर मृित म जैसे िचपक ह गया है . हम लोग
खलौन क िस दकान
ु 'टॉयज़ आर अस' ( जसे म मज़े म टॉय सारस कहने लगा
हंू ) गये थे. चा और वमला अ दर चले गये, म गाड़ म ह बैठा रहा. दे खा, एक
बड़ -सी कार आकर क . आगे का दरवाज़ा खुला, दो हाथ ने पहले एक प हया नीचे
रखा, फर फो डे ड ह ल चेयर, फर उसे खोला, फर दसरा
ू प हया, फर तीन को
जोड़ा और ह ल चेयर तैयार हो गई. इसके बाद कोई पचासेक बरस का एक गोरा
आ ह ता-से कार क ाइ वंग सीट से फसल कर ह ल चेयर म बैठा, कार का दरवाज़ा
ब द कया. पीछे का दरवाज़ा खोला, चार-पांच साल क एक ब ची फुदकती हई
ु बाहर
आई. दरवाज़ा ब द कया, रमोट से कार को लॉक कया और ह ल चेयर पर वरा जत
स जन तथा उनके पीछे -पीछे वह ब ची दकान
ु म चले गये. कोई पं ह िमिनट बाद यह
य फर दहराया
ु गया, वपर त म म. इस बार स जन ने गाड़ का ं क भी खोला
( ं क, यािन ड क ). खर दा हआ
ु सामान उसम रखा. भरपूर आ म व ास, कह ं
आ म-दया का कोई भाव नह ं, उसक एक ह क -सी झलक तक नह ं. वाह अमर का!

फर अपनी राह पर आता हंू .

डॉ टर सूद मेरे पास आने से पहले मेरे सारे पर ण क रपोट का अ ययन कर चुके
थे. इसीिलये उ ह आने म दस िमिनट लगे. कुछ इधर-उधर क बात क , ता क म
सहज हो जाऊं, और फर मेरे रोग क चचा. भारत म हम होिमयोपैिथक िच क सक का
खूब मज़ाक उड़ाते ह क वे सवाल पर सवाल पूछ कर ह आपको इतना तंग कर डालते
ह क आपको अपना रोग छोटा लगने लगता है . पर ये डॉ टर सूद तो उनके भी पता ी
िनकले. बाप रे बाप! या- या सवाल नह ं पूछ डाले. कोई आधा घ टा. पूर तस ली से.
पूर आ मीयता से. एक दम अनौपचा रक सहजता से. कोई ज दबाजी नह ,
ं बड़ पन के
आतंक का कोई बोझ नह ं. जैसे डॉ टर न ह , बरस पुराने दो त ह . फर दे ह पर ण,
फर सवाल.

और अंत म यह क मेर आशंका िनमूल है . यादा स भावना यह है क ो टे ट म ऐसे


कसी सं मण क वजह से, जो पर ण म भी पकड़ म न आ पाता हो, थोड़ सूजन
हो. इसके िलये बहत
ु ह क -सी दवा लेना पया होगा.

डॉ टर सूद के पास से लौटते हुए म बेहद आ त था. उनका यवहार, उनक


यावसाियक द ता, उनक िसंिसय रट ( ह द म या कहगे इसे?) ने मुझे आ त
करने म कोई कसर नह ं छोड़ थी.

कुछ दन बाद डॉ टर सूद के कायालय से एक मोटा िलफाफा आया जसम वह सारा


ववरण अं कत था जो उ ह ने मुझसे चचा करके ा कया था, थे उनके िनदान तथा
वे अ य सार बात ज़नक भ व य म कभी भी इलाज़ करवाते हए
ु मुझे ज़ रत पड़
सकती है . यह था िच क सा का पूरा ोफेशनल अ दाज़ !
म सोच रहा था, भारत म भी मुझे ऐसा ह अनुभव हो, इसके िलये कतने वष ती ा
करनी होगी ?....

****************

1. इस लेख का शीषक िमज़ा गािलब के िस शेर 'उनके दे खे से जो आ जाती


है ...' के प डत ा रका साद िम ारा कये गये ह द अनुवाद के अंश से,
साभार.

पूरा अनू दत शेर इस तरह है :


उनके दशन से जो आ जाती है मुख पर आभा
वो समझते ह क रोगी क दशा उ म है !

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ज़ दगी के साथ भी, ज़ दगी के बाद भी !1

अमर क समाज म इं सानी जान को कतनी अहिमयत द जाती है , इसक चचा म


एकािधक बार कर चुका हंू . अ पताल म तो रोगी पर पूरा यान दया ह जाता है , पूर
क पूर जीवन प ित ह ऐसे सांचे म ढाल द गई है क जन- जन-बात से आपक
जान को खतरा हो, उन पर यथास भव िनयं ण कया जाए. यातायात वभाग सतत
यास करता है क दघटनाएं
ु कम ह , सड़क पर यातायात इस तरह िनयं त व
संचािलत कया जाता है क तेज़ गित के बावज़ूद दघटनाओं
ु क आशंका यूनतम रह गई
है . प -प काओं म, संचार मा यम म लगातार खतर के िनवारण पर चचा होती है और
सलाह द जाती ह.

मनु य क आज़ाद को यहां बहत


ु मह व दया जाता है . जातं है भी यह क हरे क को
अपनी तरह से जीने का अिधकार िमले. ले कन यह अिधकार जीवन के साथ ह य
समा हो जाए? उसके बाद भी य न बरक़रार रहे ?

शायद इसी सोच को आगे बढ़ाते हए


ु अमर क समाज और कानून य को यह
अिधकार भी दान करता है क वह अपनी अंितम सांस कैसे ले! मे डकल टै नोलॉजी
ने मनु य को अनेक वक प दे दये ह क वह जीवन बचाने क िलये कैसे और कतना
संघष करे . कानून उसे अिधकार भी दे ता है क वह जीवन र क यं , दवाइय , सुईय ,
मॉनीटस आ द से बंधा- िघरा अंितम सांस ले या सब कुछ ऊपर वाले के हाथ छोड़, बना
संघष और ितरोध के मृ यु का वरण कर ले. अमर क समाज तो मनु य को यह
अिधकार भी दे ता है क य द वह चाहे तो अंितम समय म अ पताल म जाए ह नह ं, या
ले जाया ह न जाए.

यहां लोग को सलाह द जाती है क वे बुढ़ापे का इं तज़ार कये बगैर एक स पूण


द तावेज़ समूह तैयार कर जसम य द वे 'उस' समय अपनी बात कह सकने म असमथ
भी ह तो उनक इ छा का पालन करने क ग रमा बरती जा सके. इस द तावेज़-समूह
म एक ‘ यूरेबल पॉवर ऑफ अटन फॉर हे थ’ (Durable power of attorney for health-
DPOA) होता है जो कसी य को यह अिधकार दान करता है क आपके बोल न
पाने क थित म आपक ओर से िच क सा वषयक िनणय ले. इसी के साथ एक
िनदश िच क सक के नाम होता है क आप अपनी जीवन र ा के िलये कन- कन उपाय
का इ तेमाल करना या नह ं करना चाहते ह. इसे ज़ दा वसीयत भी कहा जा सकता है .
आपक इन बात का अ रशः पालन हो, इसके िलये लोग को यह सलाह द जाते है क
य द वे ग भीर प से बीमार ह तो एक अ य फॉम ( जसे POZSTकहा जाता है ) पर भी
ह ता र कर व कराकर रख. व तुतः यह िच क सक ारा ितह ता रत आदे श होता है
जो आपके िनणय क पूण पालना को वैधता दान करता है . अगर यह फॉम बाकायदा
भरा हो तो मृ यु के बाद , स द धाव था म क जाने वाली पुिलस कारवाई से िनज़ात
िमल जाती है .

अमर क समाज भारतीय समाज से बहत


ु अलग है . इसीिलये यहां बूढ़े मां-बाप क परवाह
के िलये सलाह दे ने वाली कताब भी काफ िलखी-छापी-बेची जाती ह. और, इस वषय पर
ह य , यहां तो हर वषय को ह िस ांत का जामा पहना दया जाता है . ब चे कैसे
पाल, दादा-दाद ,नाना-नानी या कर- या न कर से लेकर दादा-दाद नाना-नानी के िलये
या कर तक सब कुछ. वज िनया मॉ रस क एक बहत
ु िस कताब है - 'बूढ़े मां बाप
क दे खभाल कैसे कर.' इस कताब म यह तक बताया गया है क य द बूढ़ा/बु ढ़या वग
िसधार जाए तो हड़बडाहट क कोई ज़ रत नह ं है . आप चाहे तो रोएं, चाहे तो वग य का
हाथ थाम कर उनसे मौन स वाद कर, चाहे ाथना कर. ये सार सलाह कताब म ह.
जो लोग कसी असा य रोग से त होते ह और जनके जीवन के च द ह दन शेष
बचे होते ह उनके िलये यहां एक अलग सेवा- Hospice भी सुलभ है . यह सेवा न तो
ज़ दगी को बढ़ाने का यास है न मौत को नज़द क लाने का. इस सेवा म यह
अवधारणा िन हत है क जतनी भी ज़ दगी बची है उसे ग रमापूवक तथा स ब य
क इ छानुसार बताने दया जाए. मह वपूण बात यह है क इस सेवा को केवल अंितम
सांस िगन रहे य तक ह सीिमत नह ं रखा गया है . उसके प रवार जन को भी इसम
शािमल कया गया है . जयपुर के संतोकबा दलभजी
ु अ पताल वाल क अवेदना आ म
सेवा से कुछ-कुछ सा य रखती यह सेवा िश त वयंसेवक के मा यम से अ यिधक
स वेदनशील तर के से य क शार रक, मानिसक, आ या मक सभी ज़ रत को पूरा
करने क सवागपूण सेवा यव था है .

मृ यु के बाद पुिलस (911) को फोन कया जाता है . पुिलस आती है पूर ग रमा के साथ.
बना चमचमाती लाल लाइट और बना सायरन बजाते. अ यथा थित म चमचमाती
लाल ब ी और बजता हआ
ु सायरन आम है . लोग को यह भी बताया जाता है क पुिलस
इस कॉल को इमजसी नह ं मानती है , इसिलये उसके आने म कंिचत वल ब भी हो
सकता है . दे खये है न बड़ बात! पुिलस को बुलायगे तो उसका तुरंत आना िन त है .
थोड़ा वल ब भी होना है तो आपको बताकर ह होना है . य द पुिलस आ त है क
मृ यु वाभा वक है तो वह वग थ य के िच क सा अिधकार तथा मे डकल
ए ज़ािमनस ऑ फस से स पक कर मृ यु माण प तैयार कराएगी. अंितम सं कार के
िलये यहां यावसाियक ित ान (Funeral homes) होते ह.प रवार जन को उनसे स पक
कराने म भी पुिलस ह मदद करती है . यह है पुिलस क असल 'मेरे यो य सेवा' भूिमका.

मुझे बड़ बात यह लगती है क यह समाज जीवन क ह नह ,ं जीवन के बाद क िचंता


भी उतनी ह िश त से करता है .

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1. शीषक भारतीय जीवन बीमा िनगम के व ापन से, साभार!

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जन वेगस नह ं वे या...
उफ
लास वेगस रहे गा याद1

वायुयान ने जैसे ह मैक-कैरन के छोटे -से हवाई अ डे से उड़ान भर , नीचे रं ग- बरं गी


रोशनी का आंचल लहराने लगा. यह एक ऐसा य था जसे म जब भी याद क ं गा,
वाणी और श द क असमथता महसूस क ं गा. रोशिनयां थीं लास वेगस क , जहां तीन
दन बताकर हम िसएटल लौट रहे थे. सिच प काओं- कताब म और ट वी- फ म के
पद पर इन रोशिनय को पहले भी दे खा था और यह भी जाना सुना था क लास वेगस
जगमगाता है , पर जगमगाहट ऐसी होगी यह तो क पना से परे ह था. मुझे तो उ व
वाले सूरदास बुर तरह याद आ रहे थे: ‘एक हतो
ु सो गयो याम संग....’. मेरा मन तो
वेगस के पास ह रह गया था.

वायुयान काफ ऊपर उठ चुका था. रोशिनयां धीरे -धीरे एक ब द ु म त द ल होकर अंधेरे
म वलीन होने को थीं और म सोच रहा था....

सोच रहा था क अगर चा -मुकेश के लास वेगस मण के ताव को वीकार न कया


होता तो म कैसे अनुभव से वंिचत रह गया होता! वायुयान काफ ऊपर उठ चुका था.
रोशिनयां धीरे -धीरे एक ब द ु म त द ल होकर अंधेरे म वलीन होने को थीं और म सोच
रहा था....

जब इन लोग ने कहा क हम कसी स ाहांत लास वेगस घूम आय, तो सच कहंू , म


क़तई उ सा हत नह ं था. लास वेगस के बारे म जतना जानता था उससे मुझम वहां
जाने क कोई ललक नह ं थी. ऐसा शहर जो अपने जुआघर (Casinos)के िलये व यात
है , भला मुझे कैसे आकृ करता? मुझे तो ताश तक खेलना नह ं आता. दलच पी ह नह ं
है . कभी दवाली पर र म अदायगी तक के िलये भी जुआ नह ं खेला. मुझे भला लास
वेगस य जाना चा हये? चा ने बताया क वहां बड़े -बड़े होटल ह. खूब दशनीय! म
सोचता रहा, होटल का या दे खना? अपने उदयपुर का लेक पैलेस, जयपुर का ला स
आमेर, द ली का अशोका और मु बई का ताज दे खा तो है . आ खर होटल म होगा या?
वह लॉबी, विमंग पूल, शॉ पंग आकड वगैरह ना? हंु ह! यह भी मन म था क तीन दन
करगे या? ऊपर से यह जानकार भी क लास वेगस नेवाडा के घोर रे िग तान म है, इन
दन बेतहाशा गम पड़ रह है वहां. बेट -दामाद ने लास वेगस क प क तार फ क ,
े मो ट ट का गुणगान कया, रोशिनय क तार फ क . म, कुए का मढक, अपने
उदयपुर-जयपुर क गिलय -बाज़ार क दवाली क रोशनी को सजावट क पराका ा
मानता हआ
ु इनक बात से खास उ सा हत नह ं हआ
ु .

पर अब मन ह मन इस बात पर अपनी पीठ थपथपा रहा था क बहत


ु अ छा कया जो
न जाने क ज़ पर न अड़ा. अगर न गया होता, जीवन के एक अ तीय तथा
अ व मरणीय अनुभव से वंिचत ह रह गया होता. लास वेगस जाकर ह महसूस कया
क श द और त वीर से आगे भी बहत
ु कुछ होता है . सब कुछ को अिभ य कर दे ने
क साम य इनम भी नह ं है . जो आपक आंख दे ख सकती ह वह कोई और आप तक
पहंु चा ह नह ं सकता. तभी तो बाबा तुलसीदास कह गये ह- ‘िगरा अनयन, नयन बनु
वाणी’, यािन ज ा दे ख नह ं सकती और नयन दे ख सकते ह पर बोल नह ं सकते. उस
फ मी गीत म भी तो यह बात है - ‘ना ज़ुबां को दखाई दे ता है , ना िनगाह से बात होती
है ’.

आ खर ऐसा या था लास वेगस म क मुझे असगर वज़ाहत के िस नाटक ' जस


लाहौर नह ं दे या, ओ जन या ह नह ं' से अपने इस लेख का शीषक उधार लेना पड़
गया?

सार दिनया
ु लास वेगस आती है . जस हवाई अ डे से हम लास वेगस पहंु चे थे वह व
का 12 वां य ततम हवाई अ डा है . पछले वष कोई साढ़े तीन करोड़ लोग इस हवाई
अ डे से वेगस आये थे (मज़े क बात यह क वेगस क अपनी आबाद महज़ पांच लाख
है !). लास वेगस को व क मनोरं जन राजधानी (Entertainment Capital of the World)
कहा जाता है . लास वेगस म चौबीस घ टे वह नज़ारा रहता है जो हमारे दे श म कुछ-
कुछ दवाली क शाम 8-9 बजे रहा करता है . यािन चकाच ध और ऐसी भीड़-भाड़ क बस
सर ह सर दखाई द, ज़मीन नह ं. इस शहर क पूर अथ यव था पयटन, मनोरं जन और
जुआघर पर टक है . लास वेगस िन य ह कैिसनोज़ यािन जुआघर का शहर है . शेष
सब कुछ उ ह ं के इद-िगद बुना गया है . जुआघर का आलम यह क हवाई अ डे पर
उतरते ह लाउं ज म सबसे पहले आपका सामना लॉट मशीन ( जनम िस के डाल कर
क मत आजमाई जाती है ) से ह होता है . हर होटल म जुआ खेलने क बे-इं ितहा(यािन
हज़ार ) मशीन लगीं ह. कसम- कसम क , और अलग-अलग दर तथा इनाम वाली.
यूनतम दर 25 से ट (डॉलर क चव नी, साढ़े बारह पये के बराबर) और अिधकतम?
जतना आप सोच सक उससे भी कई गुना यादा! केवल लॉट मशीन ह नह ं, लट भी
( जनम गोलाकार म एक च घूमता है ), और लैक जैक टे ब स भीं. पोकर टे ब स भीं,
और भी इसी तरह का बहत
ु सारा तामझाम. ऐसे य हम सबने ह द फ म म ज़ र
ह दे खे ह. मशीन और टे बल पर जुटे ी-पु ष. खेलने वाल के हाथ म िसगरे ट,िसगार,
बीयर, वाइन या कोई और ं क. खेलने वाल को ं क मु त. ं क सव करती हई
ु चु त
वे े सेज़ - इतने कम कपड म क आपको अपनी क पना को ज़रा भी ज़हमत न दे नी पड़े .
वे े सेज़ क सज-धज होटल क थीम के अनु प, यािन पे रस म च और ल सर म
िम ी. कैिसनो म पूरा उ मु वातावरण, पर अमर का के इस कानून का अ रशः पालन
क 18 वष से कम के लोग जुआ नह ं खेल सकते. इस हद तक पालन क गोद के िशशु
को लेकर भी आप कसी मशीन या टे बल के पास नह ं क सकते. हम दशक थे, न या(4
माह) जसक भी गोद म होती उसे बस चलते रहना होता था, एक ण भी कह ं के
नह ं क कोई न कोई सुर ाकम आकर टोक दे ता. कानून का उ लंघन करने पर सज़ा
का ावधान है , और हमने दे खा क खुद होटल वाले भी कानून का पालन करने-कराने म
पूर -पूर दलच पी रखते ह. िन य ह ये कैिसनो लास वेगस के सबसे बड़े आकषण ह.
दिनया
ु भर से लोग अपनी क मत आज़माने यहां आते ह और अगर विभ न जुआघर
म लगे सूचना प ट पर व ास कर तो ज़ीरो से सुपर ह रो बनकर लौटते ह. ले कन
वेगस का सारा आकषण इन जुआघर तक ह सीिमत नह ं है .

लास वेगस का असल आकषण तो है 'द प' (The Strip) यािन वह ल बी सड़क जसके
दोन तरफ कोई 36 होटल बने ह. अब होटल कहने सुनने से जो त वीर मन म बनती है ,
बराय महरबानी उसे एकदम से िमटा द जये. जब म कहंू 'होटल', आप सुिनये 'शहर'. जी
हां, इनम से हरे क होटल अपने आप म एक शहर ह है , वह भी मु तिलफ मु क का.
इतना वशालकाय क अगर आप पूरा दन उसम भागते-दौड़ते घूम तो भी दे खने को
बहत
ु कुछ बचा ह रह जाए. इनम से हर होटल कसी एक थीम (Theme) पर िनिमत
है . जैसे ल सर िम के परािम ज़ क थीम पर तो अला न ( जसम हम ठहरे थे)
अरे बयन नाइ स पर; एम जी एम ै ड हॉलीवुड के इसी नाम के िस टू डयो के
आधार पर तो सीज़स पैलेस जूिलयस सीज़र के जीवन और समय पर. पे रस और
यूयाक- यूयाक के नाम ह उनक थीम का खुलासा कर दे ते ह. इसी तरह हर होटल को
बनाया-बसाया गया है . जब आप पे रस होटल म घुसते ह तो सब कुछ ांस जैसा होता
है - गिलयां, उनके नाम, दकान
ु , होटल के मे यू, यंजन, सव करने वाले बैर क वेशभूषा,
यहां तक क जुआ खेलने क मशीन भी ांस क ह विभ न चीज़ के आधार पर. और
यह सा य इतना आगे तक जाता है क पे रस का आइफेल टावर भी यहां लाकर खड़ा
कर दया गया है . उसक खलौना ितकृ ित नह ं (वे तो मृित िच क दकान
ु म
बकती ह ह) ब क पूर 50 मं ज़ला, 540 फट ऊंची हू-ब-हू आइफेल टावर. वैसे यह ं
यह बता दं ू क असली टावर क ऊंचाई इससे कर ब दगु
ु नी यािन 1051 फ ट है . एक
पारदश एिलवेटर 340 फ ट ित िमिनट क र तार से आपको इस टावर के लगभग शीष
(500 फट) पर ले जाता है और वहां से लास वेगस का जो नज़ारा आप दे खते ह, वह
आपको कहने को ववश कर ह दे ता है -‘ जन वेगस नह ं वे या..’ उस य को श द म
बयान कया ह नह ं जा सकता. जगमगाती प और चमचमाते होटल. पर ये श द तो
बहत
ु मामूली ह, जब क नज़ारा िनहायत ह गैर-मामूली है . इस पे रस होटल म 2916 कमरे
ह.

जस होटल अला न म हम ठहरे , उसक वशालता का कुछ अनुमान इस त य से


लगाया जा सकता है क उसम 2567 कमरे थे, एक लाख वग फ ट म फैला कैिसनो था
जसम 2800 लॉट मशीन, और 87 टे बल गे स थे. इस होटल म दिनया
ु भर के सभी
तरह के यंजन परोसने वाले 16 रे टोरे ट, विमंग पूल, हे थ लब, पा तो थे ह , थी
कोई 130 चमचमाती दकान
ु भी. होटल का ‘अला न िथएटर फॉर द परफािमग आटस’
दावा करता है क उसका ोसीिनयम आच मंच व का वशालतम है . होटल के एक
भाग को नाम दया गया है डे ज़ट पैलस
े यािन म महल. इसम जब आप घूमते ह तो
अचानक वषा होने लग जाती है . चम कार यह क पैलेस क पूर छत कृ म है .
वभा वक ह है क वषा भी कृ म ह होती है , पर असली से भी यादा असली. अंधेरा
छाता है , बादल गरज़ते ह, बजली कड़कती है , बूंद आपको िभगोती ह. इसी अला न होटल
म जो अनेक शो रोज़ होते ह उनम ट व वाय रक का जाद ू बहत
ु िस है . खासा महं गा
ट कट, पर शो एकदम पैसा वसूल! हमने दे खा. खेल तो कर ब कर ब वह जो हमारे यहां
के जादगर
ू दखाते ह, ले कन तुित उनसे हज़ार गुना बेहतर. विन काश का
आधुिनकतम उपयोग. और इ ह ं से सारे भाव का सृजन. खेल म दशक क
सहभािगता भी. शो के ट कट के साथ ं क मु त.

हर होटल म ऐसे शो होते ह. कुछ बा- ट कट, कुछ बे- ट कट. होटल बैली म हर रात दो
बार एक ‘जुबली शो’ होता है जसम 2000 गैलन पानी म टाइटे िनक जहाज़ डू बता है .
होटल सीज़स पैलस
े म ‘अटला टस का पतन’(Fall of Atlantis) शीषक िनशु क शो होता
है जसम एटलस क संतान का अटलां टस पर िनयं ण के िलये संघष िच त कया
जाता है . आदमकद से कोई तीन गुना बड ितमाएं और विन- काश क व मय-
वमु धकार कलाकार . एकदम हाई-टे क! इसी तरह 3000 कमर वाले होटल बेला जयो म
एक शो होता है - ‘ओ’ नाम का. ट कट एक सौ डॉलर, पर उसके िलये भी ती ा कई
घ ट क . कोई 90 िमिनट का यह शो 80 से यादा अंतररा ीय कलाकार, जनम तैराक,
करतबबाज़ सभी होते ह, पेश करते ह. यह शो जीवन- ेम और मृ यु क मानो महागाथा
ह है .

एम जी एम ै ड होटल, जसम 5034 कमरे ह और जसे दिनया


ु का सबसे बड़ा होटल
माना जाता है , म सब कुछ एम जी एम टू डयो क मािन द है . होटल के बाहर ह एक
बडा व णम शेर बना हआ
ु है , जो एम जी एम का सुप रिचत तीक है . भीतर बहत
ु सार
चीज़ के अलावा एक लॉयन हे बटाट (Lion habitat) भी है जहां दो ज़ दा शेर कांच क
एक 34 फट ऊंची छत पर अपने े नर के साथ अठखेिलयां करते रहते ह और आप नीचे
से उ ह दे खते ह. जब आप 4408 कमर वाले ल सर होटल म जाते ह तो आप महज़
होटल म नह ं ब क एक 30 मं ज़ला कांच के परािमड म घुसते ह. इस होटल म ाचीन
िम के रह य को आधुिनक तकनोलॉजी के मा यम से सजीव कया गया है . अ दर क
सार द वार यह एहसास कराती ह क आप िम म ह. तूतनखामन क क़ भी यहां है .
होटल म एक आइमे स (I-Max) िथएटर भी है जसका पदा 68 फट ल बा और 48 फट
चौड़ा है . इसी होटल म एक अ य िथएटर म हमने 4 आयामी (4 dimensional) फ म
दे खी. 2 आयामी फ म तो सार ह होती ह, तीन आयामी फ म भी कभी-कभार बन
जाती है (जैसे ह द क ‘छोटा चेतन’ या हाल क 'आबरा का डाबरा') पर यह चौथा
आयाम कहां से आ गया? मन म बड उ क ठा थी जानने क . ऐसी फ म म कथा का
यादा मह व नह ं होता. यह कथा समु डाकुओं क थी. तीन आयाम तो सुप रिचत ह
थे. डाकू ने ब दक
ू तानी तो जैसे वह हमार ह कनपट से आकर लगी, मधुम खयां
हमारे कान के ब कुल पास आकर िभनिभना . ले कन ये तो तीन ह आयाम हए
ु . जब
कसी ने पानी म छलांग लगाई तो समु से जो पानी उछला, उसने हम भी, वाकई,
िभगोया. जब एक पहाड़ से लुढकता हआ
ु वशालकाय प थर ज़मीन पर िगरा तो हम भी
थरथराए. भीगना और थरथराना-ये ह थे चौथे आयाम. सीट के नीचे फ वारे लगे थे और
उ ह कंपाने का बंध था. इस होटल म ‘िमडनाइट फटे सी’ नाम से एक टॉपलेस शो भी
होता है . वैसे डांस, कैबरे वगैरह हर होटल म होते ह ह.

जूिलयस सीज़र के नाम वाला 2399 कमर वाला होटल सीज़स पैलेस अपनी लािसक
रोमन भ यता क वजह से होटल कम और असल सा ा य यादा लगता है . इसके
फोरम शॉ स नामक बाज़ार म दिनया
ु के तमाम क मती और बेहतर न उ पाद दे ख-खर
े दे
जा सकते ह. इस होटल के एक शो क चचा म थोडा पहले कर ह चुका हंू . 2023 कमर
वाले होटल यूयाक- यूयाक म जाकर लगता है क आप वाकई यूयाक ह पहंु च गये ह.
होटल के बाहर आपका वागत करती है सुप रिचत टे यू ऑफ िलबट और भीतर जाते
ह तो दे खते ह ए पायर टे ट ब डं ग, टाइ स वायर, स ल पाक वगैरह. इस होटल का
एक बड़ा आकषण है यूयाक हारबर क ितकृ ित पर बना रोलर को टर - मैनह टन
ए स ेस. 67 मील ित घ टा क र तार वाला यह रोलर को टर इतनी कलाबा ज़यां
खाता है क आपका कलेजा मुंह को आने लगता है .

इतने सारे होटल क चचा के बाद भी होटल वेनेिशयन क चचा कये बगैर अधूरापन
महसूस हो रहा है . 4049 कमर वाले इस होटल म नहर , गो डोला (छोट नाव) और
घूमते फरते दशनकार कलाकार के मा यम से तो वेिनस को साकार कया ह गया है ,
जैसे ह आप वेश करते ह, इसक छत पर यूरोपीय कला के सव े क बानगी दे ती हई

सुनहर कलमकार आपको मं मु ध कर दे ती है . इस होटल का एक बडा आकषण है
से ट पीटसबग, सो वयत स के व यात हिमटाज सं हलय क शाखा - गगनहाइम
हिमटाज यू ज़यम. इन दन इसम ‘The pursuit of pleasure’ नामक दशनी चल रह
थी जसम 16 से 20वीं सद क रे नुआं, पकासो, जान ट न, पीटर पाल बज़ आ द
महान कलाकार क लगभग 40 मूल कृ ितयां दिशत थीं. इतने महान कलाकार क मूल
पे टं ज़ के सामने होना ह जीवन को साथक कर दे ने के िलये पया है . इसी होटल का
एक अ य बडा आकषण है ल दन के िस मदाम तुसॉद के मोम सं हालय क एक
शाखा.यहां कोई 100 चुिनंदा पुतले मौज़ूद ह. जब आप अ ाहम िलंकन, जाज वािशंगटन,
जाज बुश, माइकल जै सन, मडोना, राजकुमार डायना, ए वस ी ले, क िसना ा, जूिलया
राब स आ द से मुखाितब होते ह तो वाकई इनके साथ होने का ह अनुभव करते ह. जब
लोग इनके साथ खड़े होकर फोटो खंचवा रहे थे तो हमारे िलये यह तै करना क ठन था
क कौन असली है और कौन नकली. ये पुतले ह तो मोम के ले कन इ ह छूना मना
नह ं है . आप चाह हाथ िमलाय, चाहे गले म बांह डाल…. जैसी आपक मज़ . कुछ पुतले
तो बोलते भी ह, जैसे ए वस ीसले का पुतला.

जब यह सब िलखते हए
ु ह मेरा मन नह ं भर रहा है तो सोचा जा सकता है क इन
सबको दे खते हए
ु कैसा लगता होगा. अपनी होटल चचा को होटल बेला जयो म हर दन
कई-कई बार होने वाले िन:शु क आधे घ टे के संगीतमय फ वार के दशन के ज़ के
साथ समेटता हंू . होटल के सामने बनी चौथाई मील ल बी झील म जब सैकड़ फ वारे
संगीत क वर लहर के साथ अठखेिलयां करते ह तो बस दे खते ह बनता है . फ वारे
मानो बोलने लगते ह और उनके मा यम से संगीत सुनाई दे ने लगता है . इसी होटल क
लॉबी म व व यात कलाकार डे ल िचहली
ु रिचत लगभग 2000 कांच के फूल क टा
भी अ त
ु है .

हर होटल म थीम के आधार पर ह सब कुछ है . सभी म ढे र -ढे र दकान


ु ह. दिनया
ु का
हर बड़ा, महं गा और सुप रिचत उ पाद यहां मौज़ूद है . हर जगह मृित िच क भरमार.
आ खर हरे क अपनी या ा क मृित को संजोना तो चाहे गा ह . मज़े क बात यह क इन
सारे होटल म वेश िन:शु क है . आप मज़े म, बे झझक घूमते रह. कैिसनो म लोग खेल
रहे ह, पी रहे ह. आप उ ह दे खते रह. मन आये तो आप भी खेल ल, नह ं तो गुनगुना
ल- ‘बाज़ार से गुज़रा हंू , खर ददार नह ं हंू ’.

लास वेगस का एक और बडा आकषण है े मो ट ट. नगर के मु य आकषण क ‘द


प’ से कुछ मील दरू डाउन टाउन म थत यह गली नुमा बाज़ार अपने अनूठे विन-
काश काय म के कारण हर पयटक के िलये ज़ र है . ट क कोई चौथाई मील
ल बी अध गोलाकार छत पर रोज़ रात कोई सवा करोड एल ई ड (LED-एक तरह के
छोटे ब ब) और 550000 वाट ट रयो विन के साथ एक क यूटर चािलत शो होता है .
छत पर एक के बाद एक फूल , िततिलय , नतक , वगैरह क छ वयां उभरती ह और संगीत
आपको झूमने को ववश करता है . यह दशन तकनीक के कमाल क अनुपम िमसाल है .

तीन दन भागते-भागते घूम कर हम इतने थक गये थे क अगर चौथे दन कते तो


होटल म ह पड़े रहते. ले कन मन नह ं भरा था. गािलब याद आ रहे थे-

गो पांव को नह ं ज़ु बश, आंख म तो दम है


रहने दो अभी लास वेगस को मेरे आगे !

(असल शे'र कुछ य है -


गो हाथ को नह ं ज़ु बश, आंख म तो दम है,
रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे !)

*
लास वेगस क याित ऐसे नगर के प म भी है जहां बड़े लोग ववाह करना पस द
करते ह. ए वस ी ले ने यह ं शाद क थी और कुछ समय पहले टनी पीयस ने
यहां (पहली तथा अ पजीवी) शाद कर सनसनी फैलाई थी. हर होटल म इसके िलये
समुिचत बंध है . ववाह के िलये चैपल तक. इसे चा रत भी खूब कया जाता है . पर
यह न समझ ल क वेगस म केवल बड़े /अमीर लोग ह शाद कर सकते ह. आम जन
के िलये आसान सरकार यव था भी है . आप एक सरकार द तर (जो सात दन, 24
घ टे खुला रहता है ) म जाएं, दो-एक साधारण फॉम भर, बहत
ु थोड़ा-सा शु क जमा कराय
: बस हो गई शाद . पूर तरह सरकार और सवमा य. ज़ रत बस केवल इतनी क वर-
वधु वय क ह . दरअसल सरल चीज़ को सरल कैसे रहने दया जाय, यह अमर का से
सीखना चा हये. भई, अगर दो वय क शाद करना चाहते ह तो करने द. रा य को भला
इसम य आप हो? रा य का फज़ आपका जीवन सुगम बनाना है, न क दगम
ु . आंकड़े
बताते ह क वेगस म ित वष लगभग 1,20,000 ववाह होते ह.

लास वेगस क यह शंसाभर चचा करते व त मेरे जेहन म डॉ भगवतशरण उपा याय
क एक िस समी ा (शायद अ ेय के उप यास ‘नद के प’ क ) के शीषक क याद
आती रह . शीषक था-'सु दर पके फल म क ड़े ' . या यह शीषक लास वेगस पर लागू
नह ं होता? इतना खूबसूरत शहर, उसके मूल म या? जुआ ! एकदम अनैितक! पाप!!
और भला जसके मूल म पाप हो वह सु दर कैसे हो सकता है ? और जब पाप पु य क
बात क ं तो भला यह कैसे हो सकता है क ‘िच लेखा’ वाले भगवती चरण वमा याद न
आय? वो या कहा था उ ह ने, क 'हम न पाप करते ह और न पु य करते ह. हम वो
करते ह जो हम करना पड़ता है !' भई वाह !

हम लोग दरू से, भारत म, वेगस को एक पाप-नगर के प म ह दे खते-जानते रहे ह.


(अमर का म भी जेरेमी कोरोनेडो जैसे लोग क एक जमात है जो वेगस को ‘िसन
िसट ’-पाप नगर कहती है !) यह कारण है क जब मने अपने िम से फोन पर यह
ज़ कया क हम वेगस जा रहे ह तो उनक ित या कुछ खास तरह क , यं यपूण
थी. शायद अ छे -बुरे के बारे म पी ढ़य से ब मूल सं कार हम चीज़ को उनके सह
प र े य म दे खने म अवरोधक िस होते ह. अगर मने भी खुद अपनी आंख वेगस को
नह ं दे खा होता तो मेर भी धारणा वह होती जो मेरे िम क थी, और है .

पर अब खुद अपनी आंख लास वेगस को दे खकर म अलग तरह से सोचने लगा हंू .
लास वेगस ने जुए को न केवल एक कला का दज़ा दान कया है , इसे पयटन से
जोड़कर नगर, रा य व दे श क अथ यव था को भी बेपनाह मज़बूती द है . इस बात पर
िन य ह घोर असहमितयां हो सकती ह क रा य जुए को वैध करार दे तथा अपनी
आय का साधन बनाये. मेरा खयाल है क य द चीज़ को सह प र े य म दे खा जाए तो
ये असहमितयां कम हो जाती ह. या यह उपयु नह ं लगता क एक वय क समाज
अपने नाग रक को अपनी तरह से ज़ दगी जीने का और मौज़-मज़ा करने का हक़ दे ?
और अगर इससे रा य क अथ यव था सुधरती है तो कसी को आप य हो? रा य
क ज़ मेदार मने यहां इस प म दे खी क 18 वष से कम वय के कशोर-ब चे-िशशु
जुआ नह ं खेल सकते. ये लोग धू पान व म दरापान भी नह ं कर सकते. इन िनयम का
पूर स ती से पालन कया व कराया जाता है . पर जो उ के िलहाज़ से समझदार ह,
अपना भला-बुरा पहचानने क यो यता रखते ह, उ ह अपनी तरह से अपनी ज़ दगी को
जीने दया जाए, यह उिचत लगता है . मने तो यह महसूस कया है क जो लोग चाहते ह,
और अफोड कर सकते ह, उ ह उनक चाह खुशी सुलभ कराना और इसी के मा यम से
अपनी बहबूद का इं तज़ाम कर लेना कतई गलत नह ं है . लास वेगस के होटल, कैिसनो
और अ या य सं थान लाख लोग को आन द दान करते ह और हज़ार लोग के घर
म चू हा जलाते ह. या इनक यह साथकता कम है ?

मने खुली आंख और बहत


ु खुले मन से लास वेगस को दे खा. यह दे खा क लोग मौज़-
मज़ा कर रहे ह पर कसी तरह क कोई अिश ता कह ं नह ं थी. जसको जस बात म
आन द िमल रहा था, ले रहा था. मानो ‘कामायनी’ का आन दलोक बसा हआ
ु था.
मनु य और उसके उ म ने घनघोर रे िग तान म जो वग िनिमत कर दया है , उसे दे खे
बगैर उसके सौ दय क क पना क ह नह ं जा सकती. लास वेगस ने कई तरह से मेर
आंख खोलीं. िसतार से आगे जहां और भी है का पूरा अथ यह ं आकर समझा मने. यह ं
आकर यह दे खा जाना क भ य या होता है . यह ं आकर यह दे खा क खुशी से दमकते
चेहरे कैसे होते ह. और यह ं आकर यह सबक भी िलया क पाप पु य का िनणय शू य
म नह ं कया जा सकता. कम से कम अपने बारे म तो कह ह सकता हंू क लास वेगस
ने मुझे ज़ दगी को दे खने का नया नज़ रया दया है . जब तक चीज़ को आप खुद, और
वह भी एकदम खुले मन से न दे खल, आपके िन कष ांत ह रहगे. इसीिलये, मने अपने
स दभ म कहा क जसने वेगस नह ं दे खा, वह तो मान जनमा ह नह ं.

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1. शीषक के िलये असगर वज़ाहत के नाटक ' जस लाहौर नह ं दे या ओ जन या ह नह 'ं
तथा अ ेय क पु तक- ' अरे ! यायावर रहे गा याद' के ित कृत तापूण आभार.

ज़ दगी एक सफर है सुहाना..

भारत म पछले कुछ वष म सड़क क दशा म काफ सुधार हआ


ु है . ले कन इसी के
साथ यह कहने वाल क सं या भी कम नह ं है क इन उ दा सड़क ने दघटनाओं
ु को
बढावा दया है . सड़क अ छ है इसिलए आप गाड़ तेज़ चलाते ह, इसिलये दघटनाएं

यादा होती ह.

पहली बार अमर का आया तो यहां दोन बात दे खकर डरा. बहत
ु अ छ , साफ-सुथर , खूब
चौड़ सड़क, जन पर कोई ग ढा तो दरू खर च तक ढंू ढे से भी न िमले, और उन पर बहत

तेज़ गित से भागती गा ड़यां. 100 मील (यहां माप का पैमाना मील है , कलोमीटर नह ं.
मील यािन 1.6 कलोमीटर. 100 मील माने 160 कलोमीटर) ित घ टा क र तार को
सामा य औसत माना जा सकता है . हाइवे पर 120-130 मील क र तार भी हो सकती है ,
और य त माग पर 60-70 मील क . तो, इन दो चीज़ से तो दघटनाएं
ु बहत
ु यादा
होनी चा हये. कुछ धुकधुक भी हई
ु . अपनी जान कसे यार नह ं होती ! ले कन धीरे -
धीरे आ त होने लगी. ऐसा नह ं है क यहां दघटनाएं
ु नह ं होतीं. पर अगर अनुपात म
दे ख तो भारत क तुलना म बहत
ु कम. जतनी होती ह, उ ह भी कम करने के िलये
सतत यास कये जाते ह.

कैसी है अमर का क सड़क यातायात यव था?

सड़क बहत
ु चौड़ और साफ-सुथर ह, यह म पहले कह चुका हँू . जहां तक स भव होता
है , सड़क पर यातायात को एक तरफा रखा जाता है यािन जाने वाली सड़क अलग, आने
वाली अलग. सड़क पर लेन सूचक अंकन बहत
ु प होता है . लेन अंकन अ सर तो
धातु क चौकोर ड बय से होता है जो रात को चमकती भी ह. कहां मुड़ना है, और कहां
नह ं मुड़ना है यह भी प प से अं कत होता है . इस अंकन का उ लंघन कभी कोई
नह ं करता. ै फक लाइ स हमारे यहां क लाइ स क तुलना म यादा ऊंचाई पर होती
ह. सड़क के बीच म, ऊपर से नीचे को झूलती हई
ु . इसिलये यादा दरू से दखाई दे जाती
ह.लाल लाइट पर गाड़ न के, यह हो ह नह ं सकता. फर भी, य त माग पर वी डयो
कैमरे भी लगे होते ह जो उ लंघनक ा क फोटो ले लेते ह. उन माग पर, जहां दो सड़क
के िमलने क वजह से ट (T) बनता है , मु य माग पर आकर िमलने वाली जगह से
ठ क पहले STOP का लाल िच होता है , और यातायात हो या न हो, आपको कना ह
होता है . अगर न के, िन य मािनये, आपको ' ट कट' िमल जायेगा. ट कट से त काल
तो आपक जेब ह क होती ह है , इसके दरगामी
ू प रणाम भी हो सकते ह. आपको खराब
ाइवर माना जा कर आपसे अिधक इं योरस ीिमयम वसूल कया जा सकता है . ै फक
पुिलस अ सर सड़क के कनार पर 'िछपी' रहती है और कसी भी तरह का उ लंघन
करते ह कट हो कर अपनी बजली चमकाती, सायरन बजाती गाड़ आपके आगे ले
आती है . आपको रोका जाता है , और पूरे आदर से (पुिलस और आपको आदर दे - इट
है प स ओनली इन अमर का !) ट कट थमा दया जाता है . न कोई कहता है क एस पी
साहब मेरे दो त ह, या थानेदार साहब अंकल ह, न कोई सेलफोन दखाकर बेचारे िसपाह
को आतं कत करता है ! कानून का पालन तो होना ह है . आम नाग रक जानता है क
उसने कोई गलती क है तो सज़ा तो िमलनी ह है , और इसिलये कोई जान बूझकर
गलती नह ं करता. या हआ
ु जो रात के ढाई बजे ह और सड़क एकदम सूनी है . लाल
ब ी पर या टॉप िच पर तो कना ह है . या हआ
ु जो अपने गंत य वाले ए ज़ट
(Exit) से बीस कदम आगे िनकल गये, गाड़ घुमा लेते ह. नह ं. बीस मील का च कर
पड़े तो पड़े , सह तरह से ह लौटगे. हमारे साथ कई बार हआ
ु . मेरे भारतीय मन ने सोचा,
ज़ र ऐसा कर लगे, पर कसी ने नह ं कया.

सड़क पर सारे िच , सारे संकेत, सारे िनदश बहत


ु प ता से और िन त तौर पर अं कत
होते ह. कस लेन से बांये मुड़ना है और कस लेन से नह ं मुड़ना है , कस लेन पर
ए ज़ट लेना ह है , और कस लेन से ए ज़ट नह ं िलया जा सकता है , कहां दांये या बांये
नह ं मुड़ना है - यह सब साफ साफ अं कत होता है . हर कह ं गाड़ खड़ कर लेने क
आज़ाद नह ं है . ब क हाइवे पर तो यह तक अं कत होता है क कने क अगली जगह
40 मील बाद है , और हर 2-3 मील बाद व ाम थल क घट हई
ु शेष दरू क सूचना
अं कत होती है . हाइवे पर हर कह ं तो का नह ं जा सकता, इसिलये हर 40 मील के बाद
'रे ट ए रया' िनिमत कर दये गए ह जन तक पहंु चने के िलये हाइवे से बाहर िनकलना
होता है . इन व ाम थल पर पया पा कग थल, छोटा-सा जलपान गृह, व छ
शौचालय आ द होते ह. कु को शौच करवाने तक क अलग से िनधा रत जगह होती है .
जलपान गृह म अ सर उ ण पेय िनःशु क होता है . आप अपनी इ छा या मतानुसार
रािश ड बे म डाल सकते ह.
सभी सड़क पर, बावज़ूद गा ड़य क रे लमपेल के, दो गा ड़य के बीच खासा फासला रहता
है . यह इसिलये ज़ र भी है क गा ड़यां बहत
ु तेज़ र तार से चलती ह. अगर फासला न
हो.... पर सावधानी सार बरती जाती है . कोई भी वाहन चालक बगैर संकेत दये अपनी
लेन नह ं बदलता है . अगर बदल ले, अमर का म तो राम का नाम ज़रा यादा ह ज द
स य हो सकता है . वाहन चालक हॉन का इ तेमाल लगभग नह ं के बराबर करते ह.
अगर कसी ने आपके िलये हॉन बजाया है तो यह बहत
ु ग भीर बात है . आपको शिम दा
होना चा हये. भारत क तरह डपर दे ने का चलन भी नह ं है . केवल मुड़ने क सूचना दे ने
वाली लाइ स का योग होता है .

सड़क पर िसफ कार ह द खती ह. कसम कसम क . भारत वाली व वधता यहां नह ं है
क एक ह सड़क पर सुअर, बकर , पैदल चलता आदमी, रगता अपा हज िभखार , साइ कल,
साइ कल र शा, ी ह लर, ऊंट गाड़ , कूटर, मोटर साइ कल, मा ित 800, मस ड ज़, क
सभी के दशन एक साथ हो जाएं! इस व वधता के कारण यातायात क ज टलताएं बढती
ह. सड़क पर बढती जनसं या का दबाव तो है ह . अमर का म यह सब नह ं है, इसिलए
मामला आसान है . यहां तक क भार क वगैरह भी आम रा त पर नह ं द खते. कभी
कभार िसट बस ज़ र द खती है , लगभग खाली! मज़ा यह क लोग उसके आगे
(बाकायदा जगह बनी होती है ) अपनी साइ कल तक लटका लेते ह. िसट बस मे गंत य
सूचक जो बोड लगा होता है वह ायः इले ोिनक होता है . जगह-जगह ऐसे थल भी
बने होते ह ज ह 'पाक ए ड राइड' कहा जाता है . आप अपनी कार पाक कर और बस म
बैठकर चले जाएं. यह कुछ-कुछ वैसा ह है जैसे हमारे जयपुर म नारायण िसंह सकल पर
है . फक इतना है क वहां दप
ु हया वाहन खड़े कये जाते ह, यहां चौप हया.

सड़क पर आदमी कम ह नज़र आता है . मतलब - गाड़ के बाहर आदमी. कह ं-कह ं


फुटपाथ (यहां साइडवाक) पर चलते युवा या शो डर (सड़क का कनारा) पर साइकल
दौड़ाते (अलग तरह का हे मेट लगाये) इ का-द ु का आदमी-औरत या साइडवाक पर ह
केट बोड पर दौड़ते कशोर ह नज़र आते ह. वाहन चालक पैदल या साइकल सवार को
वशेष अहिमयत दे ते ह. अगर आप पैदल ह और सड़क पार कर रहे ह तो ै फक को
कना ह है . मुझे तो यह दे खकर नीरज क एक बहत
ु पुरानी क वता याद हो आई
जसका शीषक 'राज माग के पिथक से' या ऐसा ह कुछ था. क वता राज माग पर वाहन
के बीच डरे -सहमे पिथक को स बोिधत है और इसम क व एक ऐसे भ व य क क पना
करता है जब पिथक िनडर होकर राज माग पर चल सकेगा. वह ब च को भी आ त
दे ता है क वे भी सड़क पर खेल सकगे. नीरज का यह सपना अमर का म हक़ कत के
िलबास म दे खने को िमला, जहां ब चे सड़क पर के स पर दौड़ते ह और पैदल चलने
वाला इस बात से आशं कत नह ं होता क कोई तेज़ र तार गाड़ उसे परलोक पहंु चा
दे गी. वैस,े यहां पैदल चलने वाल के िलए सड़क पार करने के िनधा रत थान होते ह
और उनके ार भ थल पर एक खास तरह का बटन लगा होता है , जसे दबाने पर
यातायात रोकने वाली लाल ब ी जल उठती है . मह वपूण बात यह क अगर कोई
अचानक भी कसी ववशता से सड़क पार करे तो उसके िलये यातायात थम जाता है .
दकान
ु , शॉ पंग मा स आ द से बाहर िनकल कर जब आप पा कग थल तक जाते ह तब
भी आपको पैदल दे ख, वाहन आपको सुर त सड़क पार करने दे ने के िलए थमे रहते ह.
यह बात िनयम से बाहर यहां क सं कृ ित का ह ह सा बन गई है .

गैस टे शन इफरात से ह. गैस माने पै ोल. गैस है भी स ती. लगभग 2.18 डॉलर ित
गैलन. कर ब 26.00 पया ित िलटर. गैस एकािधक क म म िमलती है, उनक दर भी
अलग-अलग होती ह. इसीिलए मने औसत श द का योग कया है . हम जस रा य
वािशंगटन म रहे वहां गैस आपको खुद भरनी होती है . पर कुछ अ य रा य म इसके
वपर त वाली यव था है . वहां आप चाह तो भी खुद गैस नह ं भर सकते. गैस टे शन
का कमचार ह यह काम करे गा. गैस टे शन पर पोचा नुमा चीज़ पड़ रहती ह जन से
आप खुद अपनी कार के शीशे वगैरह साफ कर सकते ह. हर गैस टे शन पर एक अ छा
खासा टोर भी होता है जो अमर कय क खाने-पीने क तलब पूर करता है . खाने पीने
का तो जैसे अमर कय को जुनून ह है . गैस टे शन पर बीयर भी िमल जाती है . वहां
सशु क और िनःशु क दोन तरह के अखबार भी िमल जाते ह.

कार म सीट बे ट लगाना ज़ र होता है . आगे बैठने वाल के िलये ह नह ं, पीछे बैठने
वाले सभी लोग के िलए भी. एक बहत
ु खास बात यह क ब चे को, चाहे वह कतना ह
छोटा (एकदम नवजात भी) य न हो, अलग कार सीट म ह बठाना पड़ता है , और यह
कार सीट पीछे ह लगती है . ज़ा हर है , यह ावधान भावी पीढ़ क ज़ दगी क अहिमयत
को समझ कर कया गया है . कार सीट म, और वह भी पीछे होने से, ब चा यादा
सुर त रहता है . जब आप नवजात िशशु के िलए कार सीट खर द कर अपनी कार म
लगाते ह तो अ पताल यह जांच भी करता है क सीट ठ क से लगाई गई है या नह ं.
ब चे को सीट म बठाना ह पया नह ं है , उसे बे ट से बांधा जाना भी उतना ह ज़ र
है . सीट म बठाने वाला यह ावधान ब चे के 6 वष या 60 पाउ ड वज़न का हो
जाने तक लागू रहता है . कार क पा कग क समुिचत यव था होती है . पा कग थल
िनधा रत होते ह, हर गाड़ के िलए अलग से अंकन होता है और लोग उस अंकन का
यान रख कर ह अपनी गाड़ पाक करते ह. गा ड़य क बहलता
ु क वजह से पा कग
क जगह का टोटा पड़ने लगा है , पर इस सम या के समाधान भी िनकाले जा रहे ह. बहु
मं ज़ला पा कग आम है . य त सड़क के कनारे भी मीटर आधा रत पा कग का ावधान
होता है . आप पैसे डाल कर िन त समय के िलये अपनी गाड़ पाक कर सकते ह.
अ य भी, जहां थानाभाव होता है , सशु क पा कग का ह ावधान होता है . बड़े
यापा रक सं थान अपने ाहक के िलए अलग से आर त पा कग थल भी उपल ध
कराते ह. जगह-जगह इस आशय के बोड लगे रहते ह क अनिधकृ त प से पाक क
गई गाड़ आप ह के यय पर उठा कर ले जाई जाएगी. मने दे खा क गा ड़य क इतनी
इफरात के बाद भी पाक करने या पाक क हई
ु गाड़ िनकालने म कोई द क़त दरपेश
नह ं आती, य क हर आदमी िनयम और िनदश का अ रशः पालन करता है .

ऐसा नह ं है क यहां सड़क दघटनाएं


ु नह ं होती ह. ऑटोमोबाइल असोिसएशन ऑफ
अमर का क एक ताज़ा रपोट बताती है क सड़क पर डाल दये गये कबाड़-कूड़े क वजह
से ह साल म 25,000 दघटनाएं
ु हो जाती ह और इनम कम से कम 90 लोग अपनी जान
से हाथ धो बैठते ह. गैर- ज़ मेदार लोग कहां नह ं होते ? यहां भी ह. उनक गैर-
ज़ मेदार और वाहन क तेज़ गित का िम ण घातक बन जाये तो या आ य? एक
दन पढा क वेब वा सन नाम क 55 वष य म हला अपने काम से घर लौट रह थी क
उनक कार के आगे जाते वाहन से सड़क पर पड़ा एक सात पाउ ड वज़न का धातु का

टकड़ा उछला और उनक कार के व ड न को तोड़ता हआ
ु उनके चेहरे क सार
ह डयां चकनाचूर कर गया. बेचार वेब कार को ेक भी नह ं लगा पा . कार सीधी एक

खाई म जा िगर . 14 इं च ल बा, 3 इं च चौडा और 1 इं च मोटा यह धातु का घातक टकड़ा ,
शायद कसी क से िगर गया था. कुछ ऐसे ह घटना म म कुछ समय पहले वािशंगटन
व व ालय क एक 24 वष य नातक मा रया फेडे रक का म त क व चेहरा ग भीर
प से आहत हो गया था.

ये दो उदाहरण महज़ यह बताने को क दघटनाएं


ु यहां भी होती ह, पर अगर हम भारत
के िलहाज़ से सोच तो यह क इतने वाहन गुणा इतनी तेज़ गित के कारण जतनी होनी
चा हये, उससे बहत
ु कम. यह भी क हर दघटना
ु को बहत
ु ग भीरता से िलया जाता है .
अगर दो गा ड़यां थोड़ -सी भी िभड़ जाएं तो ए बुलस, पुिलस, राहत ट म सब कुछ च द ह
पल म मौका-ए-वारदात पर हा ज़र हो जाते ह. पहला काम होता है आहत को राहत
पहंु चाने का. बाक सब उसके बाद. दघटना
ु के कारण क ग भीर पड़ताल क जाती है ,
उन पर व तृत शोध कये जाते ह और शोध के िन कष पर अमल कया जाता है .
भारत म अभी गित का वैसा बुखार नह ं है जैसा अमर का म है . सच तो यह भी है क
ू -फूट सड़क पर ह क -फु क
न हमार सड़क इस का बल ह, न गा ड़यां . जगह-जगह टट
मा ित 800 को आप कस र तार से भगा लगे? 40-50-60, हद से हद 80-90 कलोमीटर
ित घ टा. सड़क एकदम सह हो तो भी इससे तेज़ र तार पर तो आपक गाड़ झूमने
लगेगी. यािन हमार सम या अभी गित-ज य नह ं है . अगर लोग को सड़क यवहार क
समुिचत िश ा द जाए तो भारत म सड़क यातायात का सुधार कोई मु कल काम नह ं
है . लोग सड़क पर सह यवहार कर इसके िलये दो बात हो सकती ह. एक, सह यवहार
या है , यह लोग को बताया जाए, और दो, गलत यवहार करने पर समुिचत द ड दया
जाए. बहत
ु सार गलितय के मूल म अ ान या अपया सूचना भी होती है . अमर का के
यातायात को दे ख इन बात का मह व समझ म आता है . अगर सावधानी हो तो सुर ा
हो ह जाती है . दघटना
ु तो होती ह तब है जब सावधानी हटती है .

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यह सच है ?1

अमर क लोग के िश ाचार, शालीनता, स यवहार ने मुझे बहत


ु भा वत कया है . आप
पैदल सड़क पार कर रहे ह तो गाड़ म बैठा य आपको तस ली से सड़क पार करने
दे गा, आप दरवाज़ा पार कर रहे ह तो आपसे आगे वाला य आपके िलये दरवाज़ा थामे
रहे गा, अप रिचत भी आपसे स पक होते ह मु कुराकर है लो कहे गा, अगर कसी को
ज़रा भी ऐसा लगा क उसके कारण आपको असु वधा हई
ु है तो वह आपसे मा याचना
करे गा....वगैरह. म वा ण यक और यावसाियक ित ान क चचा यहां जान बूझकर
नह ं कर रहा हंू , हालां क भा वत वहां भी कम नह ं हआ
ु हंू . कसी भी दकान
ु का
से समेन या वुमन, हालां क आपको उनसे स पक का अवसर (भारत क तुलना म) कम
ह िमलता है , शालीनता क ितमूित ह होता/होती है . जस अ पताल म हमार बेट
सव के िलये भत थी वहां क नस के िलये तो एक दन बेसा ता मुंह से िनकल गया
क ये तो हम डाय बट ज़ कर के ह मानगी. पर यह चचा यादा इसिलये नह ं क
यावसाियक-वा ण यक ित ान (और अ पताल भी उ ह ं म से एक है ) से तो यह
अपे त है ह . आ खर इस यावसाियक समाज म अपनी जगह बनाये रखने के िलये
यह तो करना ह होग! कोई तो यहां तक कह रहा था क इन लोग को बाकायदा
स यवहार का िश ण दया जाता है . अगर यह सच है तो भी अ छा ह है . काश !
हमारे भारत म भी ऐसा ह हो, जहां खास तौर पर सरकार द तर म तो लगता है क हर
कोई कटखना ह है . तो जब म अमर क लोग के स यवहार से अिभभूत हो रहा था,
तभी एक ज़ोर का झटका (धीरे से नह ं, पूरे ज़ोर से) लगा.

म यहां 'िसएटल टाइ स' िनयिमत प से पढता हंू , और य क फुरसत कुछ यादा है ,
यादा ह डू ब कर पढता हंू . एक और कारण डू ब कर पढने का यह भी है क इस
अखबार क वषय व तु मुझे अमर क समाज को समझने म मददगार लगती है . जस
झटके का ज़ मने कया वह मुझे एक ह दन (20 मई 2004) के अखबार क साम ी
से लगा.

या थी वह साम ी?

यु डथ मा टन नाम क एक म हला 'िमस मैनस' नाम से एक सा ा हक कालम िलखती


ह. इस कालम म वे पाठक के िश ाचार (एट केट) वषयक सवाल के जवाब दे ती ह.
अब यह तो बहत
ु अ छ बात है कोई समाज िश ाचार को इतनी अहिमयत दे . अ सर
लोग के सवाल उनक स वेदनशीलता का ह प रचय दे ते ह. कसी आयोजन म कस-
कस को बुलाया जाए, य द िनमं ण वीकार न कर पाएं तो या कर, कैसा उपहार द,
आ द. ले कन इस अखबार म िमस मैनस से जो तीन ज ासाएं क गई ह, ज़रा उनक
बानगी दे ख.

एक म हला ने िलखा है क जब वे क मोथैरॉपी (कसर उपचार) कराकर घर लौटती ह तो


घर पर नस उनसे कहती ह क वे अपने पित क मां जैसी दखती ह. वे यह भी िलखती
ह क जब से वे बीमार हई
ु ह कईय ने उ ह कहा है क वे अपने बेटे क दाद -मां जैसी
लगती ह. उनक एक िम अ सर उनसे बीमार , इलाज़, वज़न आ द क अ ीितकर चचा
कर उ ह आहत करती ह...

एक अ य म हला ने हालां क तो एट केट वषयक कया है , पर जो बात उ ह ने िलखी


है वह मुझे कुछ यादा ह अजीब लगी. उ ह ने िलखा है क वे अपने पित के साथ एक
उ दा रे टोरे ट म डनर के िलये ग . वहां उ ह एक बड़ ेड परोसी गई जसे उ ह
लोग को एक बड़ छुर से काटना था. लगभग आधा खाना खा चुकने के बाद, इस ेड
को काटते हए
ु उनके पितदे व अपना अंगूठा भी काट बैठे. बहते खून को ब द करने के
िलये इन भ म हला ने अपने पस से बै ड एड िनकाल कर पितदे व को द और पितदे व
उसे लेकर पु ष के रे ट म (यहां ' साधन' को रे ट म कहा जाता है ) म चले गए. उ ह
भीतर गये कुछ िमिनट ह हए
ु थे क इस म हला क इ छा ेड खाने क हई
ु .(हाय रे पेट
क अगन !). छुर अभी भी ेड म ह धंसी थी. पितदे व का लाइस आधा कटा था. प ी
जी ने पित का लाइस उठा कर उनक लेट म रखा, फर अपने िलए एक लाइस काटा.
यहां वे यह बताना नह ं भूली ह क न तो छुर पर और न ह ेड पर कोई खून का दाग
था. अब, प ी जी ने जानना चाहा है क अलब ा उनके पित को उनके यवहार से कोई
िशकायत नह ं थी, या उ ह ने पित क इस सं अनुप थित म ेड काट कर कसी
मयादा का उ लंघन कया है?

िन य ह ये संग मेर भारतीय स वेदना के िलये कुछ अलहदा और अ ीितकर ह. खास


तौर पर इसिलये और भी क म तो अमर क लोग क शालीनता पर लगभग मु ध ह
हंू . हमने अ पताल म जब नस को उसक सेवाओं के ित कृ त ता व प चॉकलेट का
एक छोटा-सा ड बा दया तो उसने जस मधुरता से हमारे इस (अ कंचन!) उपहार क
सराहना क वह मेरे मन म हमारे दे श क याद ताज़ा करने को पया था जहां आप
टे लीफोन उपकरण लगाने आने वाले सरकार कमचार को पचास पये द तो वह आपको
खा जाने वाली िनगाह से ताके बगैर न रहे , और जहां ब शीश भी दादािगर से मांगी
जाती है ( द ली हवाई अ डे पर मुझे कुछ ऐसा ह अनुभव हआ
ु , पर उसक चचा अभी
नह ं.वैसे भी ऐसे अनुभव हम सबको होते ह रहते ह.). तो, ऐसे िश -शालीन समाज म
यह बात क कसी बीमार को बार-बार ठे स पहंु चाना या कसी औरत का उस व त
अपनी भूख पर स न कर पाना जब उसका पित अपने ज़ म से जूझ रहा हो और फर
इस बात को लेकर नह ं ब क मयादा वषयक सू म सवाल पर परे शान होना - ये तो
अलग ह छ वयां ह. या ताल-मेल है इन िभ न छ वय म?

इसी अखबार म ए बगेल वान यूरेन का भी एक कालम छपता है - डयर एबी. यह


कॉलम काफ लोक य है . इस कालम म पाठक-पा ठकाएं अपनी मनो यथाएं उजागर
करते ह. आज ह के अखबार म एबी ने एक तेरह वष य लड़क के उस प क चचा क
है जो उ ह ने कुछ स ाह पहले कािशत कया था और जस पर उ ह पूरे दे श से
ित याएं िमल रह ह. आज भी उ ह ने एक सीनेटर और एक टे ट े ज़रर क
ित याएं छापी ह. इस तेरह वष य लड़क ने उ ह िलखा था क जब एक दन उसने
अपनी क ा म यह कह दया क वह अपने दे श क रा पित बनने का सपना दे खती है
तो उसके सहपा ठय तथा िश क ने उसका खूब उपहास कया. सीनेटर महोदय ने इस
लड़क को िलखा है क उसका उपहास करने वाले भूल गये ह क हम एक ऐसे दे श म
रह रहे ह जहां हर ब चे को - चाहे वह लड़का हो या लड़क - पलने बढ़ने के समान अवसर
ा ह और वे बना कसी भेदभाव के रा पित, अ यापक,डॉ टर, सीईओ या दकानदार
ु बन
सकते ह. सीनेटर महोदय ने गव से िलखा है क ऐसा दिनया
ु म केवल इसी दे श म
स भव है . (सारे जहां से अ छा वाला भाव कहां नह ं होता?)

जैसे ये संग काफ न ह . आज ह के अखबार म डे टा एयरलाइं स वषयक एक


समाचार और इसी िलहाज़ से गौरतलब है . समाचार यह है क इस एयरलाइं स क
अ पमोली सेवा सांग (Song) ने अपने उन या य को जो एक दसरे
ू के ित स यवहार
का दशन करगे, अनेक छूट दे ने क घोषणा क है . सांग वायुसेवा के सीईओ जॉन
से वािगयो ने यह कहकर अपनी पीठ थपथपाई है क जो लोग दसर
ू के िलए कुछ करते
ह उनके िलये कुछ करते हए
ु उ ह स नता है . इस कुछ म शािमल है 5000 मु त
ट कट. समाचार म ह सांग वायुसेवा क इस पहल पर व ेषणा मक ट प णय का
समापन एक वायुसेवा व ेषक रे नायडल के इस कथन से कया गया है : म कामना
करता हंू क दिनया
ु म यादा भले लोग न ह . वायुसेवाओं क माली हालत पहले से ह
ख ता है !

या एक पूंजीवाद समाज क अ छाई का यह सच है ?

हो सकता है रे नायडल क यह ित या महज़ एक चुहल भर ट पणी हो. इसे


ग भीरता से न भी ल तो सांग वायु सेवा क पहल पर तो वचार करना ह होगा. या
वाकई इस वायु सेवा के या य म स यवहार दलभ
ु हो चला है? और इसी वायु सेवा के
या य म य ? इस बात को पछले कुछ संग से जोड़कर दे ख तो जो त वीर बनती
है वह िन य ह एक आदश समाज क तो नह ं है . उस समाज क भी नह ं जस पर म
मु ध हआ
ु था. कभी-कभी मुझे लगता है क मनु य यवहार भला अलग-अलग दे श म
अलग-अलग हो भी कैसे सकता है? मनु य क कमज़ो रयां तो सवभौिमक ह ह न!

म खुद कुछ िन य नह ं कर पा रहा हंू .

एक मन कहता है क भीतर से अमर क और भारतीय सब समान ह. अलग जो है वह


मुल मा है, यािन मेकअप. अमर का एक पूंजीवाद दे श है . यहां पैके जंग का मह व पूर
तरह समझ िलया गया है , जब क हमारे यहां, भारत म चीज़ अभी भी बहत
ु कुछ अपने
कृ त प म ह ह. यह कारण है क भारत म बहत
ु वकृ ितयां, व पताएं, ब तमी ज़यां,
अशालीनताएं नज़र आती ह. हम शानदार पैके जंग जो नह ं आती. ये लोग बहत
ु उ नत
ह. इ ह ने अपने यवहार पर शालीनता क बहत
ु उ दा परत चढ़ा ली है . कसी उ दा
यूट पालर से साधन करा कर िनकली म हला को दे ख और फर उसी को बगैर मेक
अप के दे ख. मुझ जैसे भारतीय को अमर का को जतना और जैसा दे खने का मौका
िमलता है उससे जो छ व मन पर अं कत होती है , वह अपनी तरह से वाभा वक है . आम
तौर से हमारा स पक यावसाियक लोग से ह तो होता है , और या फर नाग रक से
ऐसी थितय म जहां उनका कृ त प सामने नह ं आ पाता.

ले कन एक और मन है मेरा जो कहता है क नह ं ऐसा नह ं है . यह समाज कुछ मान


म िन य ह बेहतर है . इ ह ं संग को इस नज़र से दे खता हंू तो पाता हंू क ये बात
इस समाज क ग भीर िचंताओं को ज़ा हर करती ह. या हम ऐसी बात पर ाकुल
होते ह? अगर ये लोग इन बात क िचंता कर रहे ह तो यह तो इनक स वेदनशीलता
का ोतक है . या हम ऐसी छोट -छोट बात को अहिमयत दे ते ह? आ खर सोचना करने
क पहली सीढ़ ह तो है . जन कॉलम का हवाला मैने दया उनम ऐसे-ऐसे सू म मु े
उठाये जाते ह क म तो च कत रह जाता हंू . एक दन एक भ म हला ने अपनी एक
बहत
ु ह खास सम या क चचा क . वे अं ेज़ी के साथ-साथ च भी बोलती ह और
अपनी बेट को भी उ ह ने इन दोन भाषाओं म वीण कया है . बेट से वे च म ह
बात करती ह. इस भ म हला का आजकल एक ऐसे स जन से णय- संग चल रहा है
जनके तीन बे टयां ह. ये लोग केवल अं ेज़ी बोलते ह. भ म हला ने जानना चाहा है
क इन लोग के सामने मां-बेट का आपस म च म बितयाना इ ह आहत तो नह ं
करता होगा? है ना सू म स वेदनशीलता क बात !

या बात है क हम भारतीय इस तरह क सू म बात पर िचंितत नह ं होते, ये अमर क


होते ह? यह तो फक़ है . मने अपने शहर म वदे शी पयटक से अ सर द ु यवहार ह होते
दे खा है, जब क यहां न हमने कभी कसी भी तरह के द ु यवहार का अनुभव कया, न
कसी अ य भारतीय से ऐसा एक भी अनुभव सुना. हम अपने दे श म अपने दे शवािसय
से भी ाय: ऐसा यवहार नह ं िमलता क जसक तार फ म कुछ कहा या िलखा जाए,
जब क यहां हर जगह हर संग का बले-तार फ ह िमला. दकानदार
ु ‘है व अ नाइस डे ’
कहे गा ह , सॉर और थ स का उदारतापूण योग आम है . कोई अजनबी भी आपसे
स पक होते ह मु कुराये बगैर नह ं रहे गा, आपको कसी तरह क असु वधा न हो, इसका
यान हर कोई रखता ह है . या इन बात को एकदम ह नज़रअ दाज़ कर दे ना
यु संगत होगा?
आप या सोचते ह?

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1. शीषक के िलये म नू भ डार क िस कहानी (यह सच है) के ित आभार हंू .

पढ़ोगे िलखोगे तो...

िसएटल के अपने िम द प डॉ पंकज राजवंशी और डॉ आरती क थोड़ चचा म अपने


एक लेख (रोगी क दशा उ म है ) म कर चुका हंू . जब भी इनके घर जाना हआ
ु , इनके
आ मीय आित य क मीठ याद संजो कर लौटा. पंकज क बहु वध िचय और आरती
क बेबाक़ जीवंतता ने मुझे इस द प का मुर द बना दया है . इनके यहां जाने पर एक
और बात ने मेरा यान आकृ कया. य तो मने यह नोट कया क यहां अमर का म
सभी लोग अपने ब च पर बहत
ु यान दे ते ह (यह बात म भारत के स दभ म, बहत

सोच-समझ कर िलख रहा हंू ) पर पंकज और आरती अपने ब च पर जतना यान दे ते
ह वह तो अतुलनीय है . छोटा रोहन तो लगभग सारे समय पंकज के कंध पर ह चढ़ा
रहता है , जब क बड़क ईशा क पढ़ाई और उसके य व के सवतोमुखी वकास के िलए
दोन जैसे पागल ह रहते ह. यह िचंता है क आरती ने अपनी नौकर तक को
ितलांजिल दे द है, और पंकज भी नौकर या काम को संतुिलत समय ह दे ते ह. अभी
बहत
ु सारा खच कर पंकज ने अपने घर के बेसमे ट म नया िनमाण करवाया है ता क
ईशा को पूरा पेस िमल सके. जब भी इन लोग से बात होती है , ब च क िचंता और
उनके िलए कुछ करने का मु ा ज़ र आता है . रोहन डे ढ़ साल के ह और ईशा छह बरस
क . ईशा अपने घर के पास के ह एवर ीन कूल क दसर
ू क ा क छा ा ह.
पंकज-आरती से अ सर ईशा के कूल क और वहां क गित विधय क चचा सुन-सुन
कर लगा क ऐसे कूल को तो दे खना ह चा हये. अब इन लोग के बारे म या कहंू ?
दोन ह एक से बढ़कर एक ह. आपके मुंह से कुछ िनकलने क दे र है . न भी िनकले,
इ ह लग जाए क यह आपके मन म है . बस! फर जब तक वह काम हो न जाए, इ ह
चैन नह ं पड़ने का. ऊपर अपने जस लेख का ज़ मने कया, उस स दभ म भी पंकज
यह करते रहे . याद मुझे दलाना चा हये था, पर म फोन क ं उससे पहले ह इनका फोन
आ जाता. यादा या िलखूं? व तार म जाउं गा तो सच भी अितशयो लगेगा. यह
हाल आरती का है . मने तो ह का-सा ज़ कया था क अगर कूल दे ख सकता तो...
और उनका एक सू ी काय म हो गया अंकल को कूल दखाना. यहां आपका कसी
कूल म जाना आसान नह ं है . बाकायदा इज़ाज़त लेनी होती है . और उसके िलए कारण
बताना होता है , बंधन को आ त करना होता है . यह सब आरती ने कया. कूल
बंधन को बताया क मेरे अंकल ह, भारत म िश ा के काम से जुड़े रहे ह, वगैरह. और
अनुमित लेकर ह मानीं. अब आई दसर
ू सम या. वहां तक जाने क . संयोग यह पड़ा क
उन दन मुकेश और चा दोन ह अपने द तर के काम म अ यिधक य त थे,
इसिलए मने उनसे चचा नह ं क . अगर कर दे ता तो वे कुछ भी करते, मुझे वहां ले ह
जाते. मने आरती को ह अपनी द क़त बताई, और एक दन घने कोहरे को भेदती हई
ु ,
सुबह आठ बजे वे हमारे घर आ ग . इससे पहले उ ह ने रोहन को डे केयर म और ईशा
को उनके कूल म भी छोड़ा. रा ते म म उनसे यहां क िश ा णाली और इस कूल के
बारे म जानकार ा करता रहा.

जस एवर ीन कूल म हम जाना था वह िसएटल के दो सबसे अ छे (और वभावतः


महं गे भी) कूल म से एक है . आरती बता रह थीं क ईशा पर लगभग सवा हज़ार
डॉलर (पचास हज़ार पये) ितमाह खच होता है . यह तो फ स है . शेष अलग. दसरे

कूल थोड़े कम महं गे ह. सरकार कूल भी ह. लगभग िनःशु क. आरती ने चलती गाड़
म से ह एक सरकार कूल भी दखाया, जो मुझे कसी भी तरह 'सरकार ' नह ं लगा.
भारतीय स दभ म 'सरकार '. एवर ीन कूल म लगभग 300 ब चे पढ़ते ह. कूल आठवीं
तक का है .

पहले से फोन कर दया गया था इसिलए कूल के वेश ार पर ह इसके अपर डवीजन
के हे ड कारमाइन िचकडे ल ती ारत थे. 45-50 साल के खूब ल बे, खूब व थ अमर क .
प रचय और वागत क औपचा रकता के बाद रसे शन पर अपना नाम पता वगैरह दज़
कर और कमीज़ पर अपने नाम का लेबल िचपका कर (ता क सामने वाला आपको आपके
सह नाम से स बोिधत कर सके?) हम उनके सजे-धजे क म थोड़ दे र बैठे. िचकडे ल क
जानकार के तर ने मुझे च कत कया. हम अपने कूल म इस तरह के व , वा पटु ,
समझदार, यावहा रक लोग क क पना आम तौर पर नह ं करते. िचकडे ल महोदय काफ
दिनया
ु दे खे हए
ु ह. उनसे हई
ु चचा ने मुझे अमर क िश ा यव था को जानने का मौका
तो दया ह , इससे भी अिधक, एक स य, सुसं कृ त, जीवंत िश ा व से बितयाने का सुख
दान कया.

हम 5-6 क ाओं म गए. पहली से आठवीं तक. अब, यह कहना तो कोई अथ नह ं रखता
क कूल के पास साधन क चुरता है . फर भी आिथक संसाधन का अभाव यहां भी
रहता है , ऐसा आरती बता रह थीं. कई तर क से अिभभावक तथा अ य का सहयोग
जुटाया जाता है . सभी क ाओं म दो बात पर मेरा यान गया. एक, बैठने क
अनौपचा रक-सी यव था और दो, िश क-िश ाथ के बीच खुल,े आ मीय संवाद का
माहौल. इन दोन बात के सू आपस म जुड़ते ह. हमार भारतीय िश ा यव था म
अनुशासन पर जो अ यिधक ज़ोर रहता है (और फर भी बे हसाब अनुशासनह नता होती
है !) उसके एकदम उलट यहां अनुशासन जैसी कोई बात ह नह ं थी (और फर भी कसी
क म क कोई अ यव था नह ं थी!). मुझे लगा, हम भी यह प ित आजमानी चा हये.
व ाथ िश क को उसके नाम से पुकारते ह, न सर, न िम टर. केवल जे स या मेर .
क ा म बैठने क यव था कुछ-कुछ गोलाकार, या चौकोर, और वहां भी इस बात पर
कोई यान या आप नह ं क व ाथ कैसे बैठा है , टांग ऊपर करके या टे ढ़ा होकर.
व तुतः इतनी आज़ाद क आज़ाद दे ने का सवाल ह नह ं उठे . जतना सहज व ाथ ,
िश क भी उतना ह सहज और बेतक़ लुफ! क़तई तना हआ
ु नह ं, तनाव त नह ं. म
सभी क ाओं म िश क को सुनता-दे खता-परखता रहा और वभावतः अपने दे श के
िश क से मन ह मन उनक तुलना भी करता रहा. मुझे लगा क हमारे दे श के िश क
के तनाव का एक बहत
ु बड़ा कारण उनका ानाभाव है . यह भय क अगर व ाथ ने
कह ं कुछ ऐसा पूछ िलया जो उ ह नह ं ात, तो कलई खुल जाएगी,मुल मा उतर
जाएगा. (कह ं इसके मूल म गु को महान मानने-बताने वाली पर परा तो नह ं है ? गु
और गो व द म से गु बड़ा है . फर भला ऐसा कैसे हो सकता है क गु का अ ान
ज़ा हर हो जाए?) इसिलए अनुशासन का ड डा. चुप रहो. बोलो मत. कुछ भी पूछना हो तो
पहले हाथ उठा कर गु जी से अनुमित ा करो, वरना... और इसके वपर त, यहां क
शैली. यहां तो िश क पढ़ाता ह नह ं है . उस अथ म जस म भारतीय िश क 'पढ़ाता' है .
या यान तो मने होते पाया ह नह ं. बस, बातचीत ! ले कन पूर तैयार के साथ. तैयार
जतनी िश क क उतनी ह व ाथ क भी. दरअसल यहां सारा ज़ोर चीज़ को समझने-
समझाने पर है . उसम दोन ह प क पूर -पूर तथा स य भागीदार रहती है . इस
या म साधन क वपुलता क भी भूिमका को नज़रअ दाज़ नह ं कया जाना चा हये.
व ाथ -िश क का अनुपात ह दे ख. कसी भी क ा म 20 से यादा व ाथ नह ,ं
अ सर तो 16 ह . इसिलये िश क और व ाथ के बीच संवाद कायम हो सकता है .
िश क तो मा संकेत करता है , पढ़ता व ाथ खुद है . इसिलए मने कहा क यहां िश क
पढ़ाता नह ं है . फर अ छ लाइ ेर , कसम- कसम क आधुिनकतम सहायक साम ी-
ट वी, वी सी आर, क यूटर वगैरह सब कुछ. इन सबका केवल होना ह नह ं, उदार, उ मु
उपयोग भी.

अब यह ं एक वषयांतर कर लूं.

म सा ह य का अ यापक रहा हंू . नौकर के िलहाज़ से. अ यथा तो खुद एक व ाथ ह


था और हंू . नौकर करते हए
ु अ सर इस सवाल से जूझता रहा हंू क सा ह य को
'पढ़ाया' कैसे जा सकता है ? वह तो रसा वादन क चीज़ है . कम से कम पुराना सा ह य.
नया सा ह य भी रस का न सह , आ वाद का आकां ी तो है ह . हण तो उसे भी करना
ह होता है . अब, रसा वादन या हण तो खुद ह कया जाएगा, दसरा
ू कैसे करवा सकता
है ? रसगु ला आप खुद खाएंग,े तभी तो उसका वाद आएगा. रसगु ले के वाद के बारे म
या यान तो बहत
ु ह बेहू दा बात है . और यह बेहू दगी म पूर ज़ दगी करता रहा, और
सोचता भी रहा क या बकवास बात है ( म खयाल हंू कसी और का, मुझे सोचता कोई
और है / सरे -आईना कोई और है , पसे-आईना कोई और). पर इतनी मॉडे ट न बरतूं तो
कह सकता हंू क मने पार प रक अथ म कभी पढ़ाया ह नह .ं और शायद यह मेरे
आ मसंतोष का राज़ है . मेर कोिशश ह यह रह क मेरे व ाथ खुद सा ह य से ब
ह . अगर उ ह कोई मदद इसम चा हये, और म कर सकने म समथ हंू , तो कर दं ;ू समथ
नह ं हंू तो वीकार कर लू.ं मेरे अ यापक का तो थान ब द ु ह यह रहा क मुझे सब
कुछ नह ं आता है . बहरहाल.

मूल वषय पर लौट.

मने यहां य दे खा क िश क 'पढ़ाता' नह ं, अनुभव कराता है . शु से ह . शायद


पहली क ा थी, या दसर
ू . बात नाप-तौल क थी. दो अ या पकाएं और सोलह ब चे.
मैदान म ले जाकर ब च से कहा गया क उनम से हरे क एक िन त ब द ु पर खड़ा
होकर वहां से पेड़ क दरू का अनुमान लगाए और उसे अपनी कापी म िलख ले. फर
उसी दरू को फ ते से नाप कर दे ख,े और दोन प रणाम क तुलना करे . इसी तरह पेड़ के
तने क मोटाई क नाप-जोख, और फर एक पार प रक रे ड इ डयन कबीलाई तर क़े से
पेड़ क ऊंचाई नापने का योग. सब कुछ खेल के अ दाज़ म. ब च को मज़ा आ रहा
था, अ या पकाओं को भी, हम भी. अ या पकाओं को दे खते हए
ु मुझे म नू भ डार से कह
राज यादव क बात याद आ रह थी क ‘मासटरनी’ वह जसम मांस न हो और जो
केवल टर-टर ह करती हो! यहां भी इन मासटरिनय पर मांस तो नह ं था (अलब ा
इसका कारण िभ न था!) पर ये टरा भी नह ं रह थीं .मांस न होने वाला भारतीय कारण
(कम वेतन) यहां भी है . पर जब आप कोई काम कर तो उसे पूर िन ा से कर, रस लेकर
कर - इस भाव के कारण इनके अ यापन कम म वैसी ऊब दखाई नह ं दे रह थी जैसी
अपने दे श म दखाई दे ना आम है .

आठवीं क ा म चीन के बारे म पढ़ाया जा रहा था. पढ़ाया तो या जा रहा था, बात क
जा रह थी. कोई पं ह-सोलह लड़के लड़ कयां, खूब ल ब-तड़ं ग, जैसे हमारे यहां कॉलेज म
होते ह. एकदम रले ड मूड म. िश क भी उतना ह सहज. सामने चीन का एक न शा
लटका हआ
ु . िश क ने कल इस क ा को चीन के बारे म पढकर, जान कर आने को कहा
था. आज व ाथ चीन के बारे म अपनी-अपनी जानका रयां तुत कर रहे थे. बैठे ह
बैठे. यह ज़ा हर था क व ािथय से अिधक जानकार िश क को थी. व त ज़ रत वह
उनक जानका रय म संशोधन भी करता जा रहा था. िचकडे ल महोदय ने हम बताया था
क इस साल आठवीं के व ािथय को चीन मण पर ले जाया जाएगा. (जैसे चीन न
हआ
ु चांदपोल हो गया.) मण के यय का बहलां
ु श कूल वहन करे गा. यह हई
ु न बात.
ऐसे पढ़ा-पढ़ाया जाए तो कुछ बात है !

एक अ य क ा म एक बुज़ुग अ या पका बहत


ु छोटे ब च को कताब म से कोई क वता
पढकर सुना रह थी. पूरे हाव-भाव और भरपूर अिभनय के साथ. ब चे भी भरपूर आन द
ले रहे थे.

लाइ ेर बहत
ु बड़ नह ं थी, पर कूल के िलहाज़ से पया थी. पु तक का चयन
वै व यपूण और अ तन था. एकदम साफ-सुथर , ऐसी क बैठकर पढ़ने का मन करे .
ब च को कुछ समय अिनवायतः लाइ ेर म बताना होता है . कूल का अपना एक
अ छा मंच भी है जस पर ब चे समय-समय पर अपनी तुितयां दे ते ह. एक तुित
क ड वीड हम पंकज के सौज य से दे खने को भी िमली. अलग-अलग दे श के महापु ष
को पूर मेहनत के साथ जीवंत कया गया था.

दरअसल यहां कई चीज़ का मेल है . सोने पर केवल सुहागा ह नह ं, वगैरह-वगैरह भी है .


यादातर अिभभावक अपने ब च क िश ा, उनके सवतोमुखी वकास तथा बेहतर भ व य
को लेकर बहत
ु संज़ीदा, िचंितत और स य ह. उनके पास साधन क कोई कमी नह ं है .
समय क कमी होते हए
ु भी ब च के िलए वे समय क कमी को आड़े नह ं आने दे त.े
कूल के पास साधन ह और है उनको उपयोग करने का उ साह व सलीका. तकनीक का
पूरा-पूरा सदप
ु योग है . इन सबसे अिधक मह वपूण बात यह क पूर यव था पर ह
जनसं या का दबाव बहत
ु कम है . पूर क पूर अमर क यव था दािय वबोध व
ईमानदार पर आधा रत है . सभी तर पर भरपूर आ मानुशासन है . फर भला त वीर
खुशनुमा य न हो?

जस तरह से व जस गित से मने यहां िश क को पढ़ाते दे खा उससे मेरे मन म तुरंत


एक सवाल जागा. इस गित व शैली से कोस कैसे पूरा हो सकता है ? सवाल के मूल
म थे अपने दे श के अनुभव तथा सं कार! भारत म िश क पर बहत
ु बड़ा दबाव रहता है
कोस पूरा कराने का. िश ा-तं , व ाथ , अिभभावक - सभी िश क का मू यांकन इसी
आधार पर करते ह क उसने समय पर कोस पूरा कराया या नह ं. और बेचारा िश क?
उस पर बोझ भार -भरकम पा य म का, व वध तर के व ािथय (एक क ा म 100-
125 भी हो सकते ह) का, कम काय दवस का, पढ़ाने के अलावा भी बहत
ु सारे दािय व
का. ऐसे म कैसे पूरा कराए वह अपना कोस? यह उसक फतरत नह ं मज़बूर है क जैसे
तैसे ह सह , पा य म क घास काट डाले ता क ... यहां अमर का म थित िभ न है .
एक तो कोस ह यादा नह ं रखा जाता. और शायद इसीिलए अमर का म रहने वाले
भारतीय कहते पाए जाते ह क यहां पढ़ाई का तर भारत क तुलना म नीचा है . हमारे
दे श म तीसर क ा के ब चे के म त क म जतना ान (ब क सूचना, या जानकार )
ठू ं स दया जाता है, उतना यहां उसके दो-तीन साल बाद तक भी नह ं दया जाता. ले कन,
यह कहते हए
ु इस अंतर को भी नज़रअ दाज़ कर दया जाता है क भारत म सूचना
उ डे ल दे ने को ह िश ा का पयाय मान िलया गया है - और यह ामक थित िश ा
के सव च सोपान तक बनी रहती है . यह चे ा कभी नह ं क जाती क आपको कुछ
समझाया भी जाए, उसे आपके अनुभव का ह सा भी बनाया जाए, आपको वतं प से
सोचने-समझने के िलए तैयार कया जाए. ऐसा करने क न यो यता है , न फुरसत, न
साधन, न मन.

भरतीय िश ा यव था से, उसक खािमय से भली-भांित वा क़फ होने क वजह से मुझे


इस अमर क कूल को दे खकर यादा अ छा लगा. यहां क प ित और कूल क तार फ
करते हए
ु यह बात मेरे ज़ेहन म बहत
ु साफ है क जो थितयां यहां ह वे फलहाल
हमार पहंु च से परे ह. यह तो म शु म ह कह चुका हंू क यह कूल यहां के सव म
म से है , पर अब यह और जोड़ दं ू क अमर का म जो सव म नह ं होता, वह भी उ म
तो होता ह है , िनकृ कदा प नह ं. भारत म अभी न तो इतनी समृ है , न और न
िश ा को इतनी अहिमयत. पर जो नह ं है , उसका भी सपना तो दे खा ह जा सकता है .
प म से हमने बहत
ु कुछ िलया है , और अ सर उसक आलोचना -िन दा होती है . जैसे
एम ट वी, जैसे फा ट फूड, जैसे...पर जो यहां अ छा है वह हमारे अनुकरण का वषय
नह ं बनता. शायद इसिलए क मनु य वभाव ह कुछ ऐसा है क वह बुराई क तरफ
ज द खंचता है , या शायद इसिलए क यावसाियक हत के चलते वे ह बात और चीज़
हम तक पहंु च पाती ह जनक हम क़तई ज़ रत नह ं है .

जो हो, मुझे तो इस कूल को दे खकर बहत


ु खुशी हई
ु . यह था मानो मेरे सपन का कूल.
थोड़ा ह सह पर भली-भांित पढ़ाने वाला कूल. ब च को सह सं कार दे ने वाला
कूल, ऐसा कूल जहां पढ़-िलखकर तो ब चे नवाब बनगे ह , जहां खेल कूदकर भी खराब
नह ं ह गे, नवाब ह बनगे. यादा सह तो यह कहना होगा क यहां पढ़ाई-िलखाई और
खेल-कूद के बीच इस तरह क द वार है ह नह ं. खेल म ह पढ़ाई है और पढ़ाई म ह
खेल है .

कूल का यह सुखद अनुभव कराने के िलए ध यवाद, आरती !

*****************

उ च िश ा : यहां और वहां
कभी-कभी लगने लगता है क पूरब और प म म, भारत और अमर का म कोई फक नह ं
है . पर दःख
ु क बात यह क इस तीित से खुशी नह ं होती. अगर सा य अ छ बात
को लेकर होता तो खुशी होती. ददशा
ु क समानता खुशी का कारण कैसे हो सकती है ?

यहां यािन अमर का के अखबार म िसएटल व व ालय क एक छा ा जूिलया उगात क


यथा पढ़ तो मुझे अपना दे श याद आ गया. य , याद तो सदा ह रहता है . वह जो
अ ेय ने िलखा है न क हम अपने य को कभी याद नह ं करते, य क उसे कभी
भूलते ह नह ं ह. तो, दे श याद तो तब आता, जब उसे भूला होता, हां, अपनी नौकर के
दन क थितयां एकदम से, चलिच क भांित आंख के आगे तैर ग .

इस लड़क जूिलया ने िलखा है क जस िसएटल व व ालय म वह पढ़ती है वहां 34%


टाफ अंशकािलक है . इस लड़क ने अमर क िश ा वभाग क जनवर 2003 क उस
रपोट का भी हवाला दया है जसके अनुसार पूरे दे श के कॉलेज और व व ालय म
43 ितशत िश क अंशकािलक ह.

जूिलया ने बड़ यथा के साथ िलखा है क अमर क व व ालय म पूणकािलक


ोफेसर क जाित अब वलु होती जा रह है और इसक जगह लेती जा रह है एक
नई जाित, जसे एडजं ट (Adjunct) का नाम दया गया है . इस नई जाित का
ववरण पढ़कर मुझे अपने दे श क उस जमात क याद आ गई जसक अपमानजनक
थित को थोड़ा सहलाने के िलये हमने एक स मानजनक नाम दे दया है - गै ट
फैक ट . हमारे यहां, राज थान म कॉलेज - व व ालय म कई कारण से पूणकािलक
िश क क जगह ऐसे युवा (और बूढ़े भी) लेते जा रहे ह ज ह ित कालांश क दर से
भुगतान कया जाता है . भुगतान क वतमान दर 75 पया ित कालांश है . नातको र
तर क पढ़ाई पूर कर और नेट/ लेट क वैतरणी पार कर नौकर क इं तज़ार म बैठे
फालतू युवा भागते भूत क लंगोट यािन इस 75 पया ित कालांश क दहाड़ से
अपना पेट पालने क कोिशश कर रहे ह. राज थान म पछले तीनेक साल म िनजी
कॉलेज खूब खुले ह. इन कॉलेज के संचालक को भी यह यव था खूब रास आ रह है .
थाई िश क को द जाने वाली तन वाह और भ े और अ य कई सु वधाएं न दे कर
दहाड़ पर पढ़वा लेना उनके िलये तो नफे-मुनाफे का एक और सौदा बन गया है . जो
प र मी और ज़ रतम द युवा ह, खास कर बड़े शहर म, उ ह ने भी इस वषम थित
को अपने अनुकूल ढाल िलया है . ये लोग एक ह दन म एकािधक कॉलेज म पढ़ाकर
ठ क-ठाक पैसा कूट लेते ह.
इस यव था के मूल म चाहे जो मज़बू रयां रह ह , एक बात तो यह प है क इससे
उ च िश ा पर होने वाला रा य सरकार का व ीय भार कम हआ
ु है , और सरकार को
यह बात रास आती है . दभा
ु यपूण यह है क इस यव था क अ य जो प रणितयां ह
या हो सकती ह, उन पर हमारे यहां यादा व तार से चचा नह ं हई
ु है . केवल िश क
संगठन ने कुछ आवाज़ उठाई है , पर हमारे यहां दखद
ु बात यह है क िश क संगठन
का यादा सरोकार िश क से है , िश ा से बहत
ु कम, यािन वे े ड यूिनयन क तरह काम
करते ह. मुझे संतोष तब होता जब ये संगठन िश क क िचंता के साथ-साथ उतनी ह
िचंता िश ा के तर के उ नयन क भी करते.

जस ट पणी से म यह िलखने को े रत हआ
ु हंू , उसम छा ा जूिलया ने कुछ बड़े सवाल
उठाये ह. वे हमारे िलये भी उतने ह ासंिगक ह. जूिलया ने कहा है क य प यह
एडजं ट ोफेसर क यव था फा ट फूड और इं टे ट मैसेज के युग के अनु प तीत
होती है , पर इससे उ च िश ा के ासाद म दरार पड रह ह. छा ा क पीड़ा है क इस
यव था के तहत काम कर रहे ोफेसरगण व ािथय को चचा और वमश के िलये
उपल ध नह ं होते और इससे व व ालय का अकादिमक पयावरण न होता जा रहा
है . छा ा ने और भी कई पीड़ाएं य क ह, पर उनके व तार म जाने का यह अवसर
नह ं है .

अमर क समाज तो सूचना ौ ौिगक का समाज है . यहां इ टरनेट, ई-मेल जैसे साधन न
केवल मौज़ूद, ब क लोक य भी ह. क यूटर का योग व ाथ करते ह करते ह. पर
ये सारे साधन मनु य के मुक़ाबले तो दोयम दज़ के ह ह. भारत म तो खैर ये दोयम
दज़ के वक प अभी दरू क क पना ह.

जो बात इस छा ा ने कह है वह बात हमारे िश ा नीित िनमाताओं से भी कह जानी


चा हये. इसने कहा है क य प उ च िश ा के सामने बजट क सम याएं ह (अमीर के
दे श अमर का म भी!) पर बजाय िश क के वेतन मद म कटौती के, बचत के अ य
उपाय सोचे और खोजे जाने चा हये.

भारत का अथ संकट तो और गहरा है . राज थान का और भी यादा. संकट इस कारण


और भी गहरा जाता है क सार िश ा सरकार व पोषण क ह मोहताज है . और
सरकार के सामने कई हाथ, कई कटोरे होते ह. िश ा के कटोरे म पैसा डालना उसे चुनाव
के िलहाज़ से लाभदायक नह ं लगता. ले कन, सवाल यह है क या समाज को भी इस
िचंताजनक अव था को वीकार कर लेना चा हये? कोई ितरोध नह ं करना चा हये? कोई
वक प नह ं दे ना चा हये ?

हमारे यहां गै ट फैक ट के वरोध म समाज या व ािथय क कोई प आवाज़ सुनाई


नह ं द है . समाज म म िश क संगठन को भी शािमल कर रहा हंू . य द इस छा ा से
ेरणा ली जा सके तो कहंू गा क गै ट फैक ट क दोषपूण, नुकसानदायक और
अपमानजनक यव था के वरोध म िश क , िश क संगठन , व ािथय , व ाथ संगठन
और अिभभावक सबको एकजुट होना चा हये.

बहस इस बात पर तो हो सकती है क सरकार उ च िश ा का कतना भार वहन करे ,


करे भी या न करे, पर भार उठाने क उसक असमथता का खािमयाज़ा समाज य
भुगते? पर यह बात उठानी तो समाज को ह पड़े गी. ठ क वैसे ह जैसे अमर का म इस
लड़क ने उठाई है .

*************

जोड़ने वाला पुल

भारत म रहकर इतना पता नह ं चलता क तकनीक कस तरह और कस हद तक


आपके जीवन को बदल रह है , जब क प रवतन वहां भी कम नह ं हए
ु ह. मेर पीढ़ के
लोग क मृित म वह ज़माना ताज़ा ह है जब टे लीफोन एक वलािसता क चीज़ हआ

करता था और उसके बदसूरत काले चोगे को उठाकर दसर
ू तरफ से आने वाली ऑपरे टर
क ऊबी हई
ु , ककश आवाज़ म 'न बर लीज़' क ती ा करनी होती थी. ती ा इसिलए
क यह क़तई ज़ र नह ं था क यूट के समय भी ऑपरे टर महोदय/महोदया अपनी
सीट पर ह ह . उनका चायपान या ग प गो ी म य त होना अपवाद से अिधक िनयम
ह हआ
ु करता था, और तब ब दा कर भी या सकता था इं तज़ार करने के िसवा. उस
ज़माने म, जो अभी भी यादा पुराना नह ं हआ
ु है , यह भी आम ह था क आप डाकतार
वभाग के पीसीओ म जाकर ं क काल बुक करवाते थे और आपका कॉल 6-8-10-20
घ टे म लगता था, नह ं भी लगता था. तब संचार का मु य मा यम िच ठयां हआ

करती थीं. टे ली ाम तो कसी इमजसी म ह दया जाता था. 'तार वाला' सुनते ह कलेजा
ध क से बैठ जाया करता था, कह ं कोई बुर खबर न हो! और इस बात को भी कतने
दन बीते ह क ट वी का केवल एक ह चैनल हआ
ु करता था, वह भी ेत- याम, और
उस पर कृ ष दशन जैसे वकासा मक काय म के बीच एकमा आकषण हआ
ु करता था
स ाह म एक या दो बार आने वाला िच हार. और ऐसी ह कतनी ह बात. कतनी तेज़ी
से बदला है हमारा चतु दक !

ले कन भारत से अमर का आकर, यहां क ज़ दगी दे ख कर लगा क अभी तो बहत


ु कुछ
बदलना शेष है हमारे यहां. ऐसा नह ं है क हम पछड़े हए
ु ह, हमने तर क नह ं क है .
म तो मा यह कहना चाह रहा हंू यहां बहत
ु कुछ ऐसा है जो अभी हमारे यहां नह ं है .
चाह तो यह समझ ल क तकनीक के िलहाज़ से हमार तर क क र तार धीमी है . यह
अमर का म ह पता चलता है क तकनीक ने कस तरह लोग क ज़ दगी को बदला है .
इस लेख म मेरा ल य सारे तकनीक प रवतन को िच त या सूचीब करना नह ं है . न
तो यह स भव है और न म इसके िलए यो य हंू . म तो केवल इतना कर रहा हंू क
अमर का म तकनीक के े म जो मुझे अ छा व नया लगा, उसका वणन कर रहा हंू .
तकनीक के साथ जो दसरे
ू बहत
ु सारे मु े जुड़े हए
ु ह उनके व तार म जाने का का यह
उपयु थान नह ं है , इसिलये उन पर चचा फर कभी.

पछले तीन-चार दशक म क यूटर ने सार दिनया


ु म बड़े और ांितकार बदलाव कए
ह. अब यह दे खये क भारत म ह यह कसने सोचा था क आप जैसलमेर म बैठकर
जमशेदपुर से क याकुमार तक का रे ल आर ण करवा सकगे? यह क पना अब एक ऐसी
हक़ क़त बन गई है क कसी का इस पर यान तक नह ं जाता. यह कमाल क यूटर
और इ टरनेट का है . बावज़ूद इसके क भारत म अभी भी क यूटर आम नह ं खास ह
है और इ टरनेट क गित अभी भी बैलगाड़ वाली ह है . यहां अमर का म और वह भी
माइ ोसॉ ट के मु यालय वाले शहर रे डमंड (िसएटल) म और यहां भी सॉ टवेयर
इं जीिनयस के साथ रहते हए
ु क यूटर और इ टरनेट के जो उपयोग दे खे उनसे म एक
साथ ह च कत और आ ा दत दोन ह हआ
ु . यह जैसे हमारे आने वाले कल क एक
झलक थी मेरे िलये.

यहां कागज़-कलम तो जैसे अब अजायबघर क चीज़ हो गए ह. सारा ह काम क यूटर


पर हो जाता है . अगर कभी िलखने क तलब भी हो तो डजी पेन (Digi-pen) से
क यूटर के न पर ह िलख िलया जाता है . आपको द तर छु ट क अज भेजनी है ,
ई-मेल कर दया. पाट का िनमं ण दे ना, उस िनमं ण को वीकार-अ वीकार करना है , ई
मेल सेवा चौबीस घ टे हा ज़र है . डा कये क ती ा बीते ज़माने क बात हो गई है . घर
का सारा हसाब- कताब, सारा रकाड, सारे द तावेज़ क शरणगाह क यूटर है . इस
क यूटर ने आपक मृित से बहत
ु सारा दािय व लेकर अपने ऊपर ओढ़ िलया है . िम -
र तेदार के ज म- दन वगैरह आप य याद रख? क यूटर जी ह न आपक इस सेवा
के िलये. ब क, आप अगर चाह तो साल-छह मह ने पहले ह , जब भी आपको फुसत हो,
ई-काड ह क यूटर म फ ड करके रख द. क यूटर वतः यथासमय उ ह े षत कर
दे गा. वह आपको यह भी बता दे गा क आपका काड कब दे खा गया.

दरअसल अमर का म क यूटर वलािसता या सु वधा क चीज़ न रहकर ज़ रत क चीज़


बन गया है . िनत नए शोध और व रत वकास के कारण उसक क मत भी अब आम
आदमी क पहंु च से बाहर नह ं रह गई है . ऊपर से इं टरनेट क सुलभता व तेज़ गित.
व तुतः इ टरनेट क जतनी तेज़ गित यहां है उसक भारत म रहकर क पना भी नह ं
होती. सोने पर सुहागा, वायरलेस कने ट वट (Wireless connectivity) यािन बना तार
के ह इ टरनेट से जुड़ जाने क सु वधा. यह पूरा िसएटल शहर ह वायरलेस इ टरनेट
यु है . यािन आप अपना लैप टॉप लेकर शहर म कह ं भी इ टरनेट का इ तेमाल कर
सकते ह. अलब ा इसक क मत चुकानी पड़ती है . क मत े डट काड के मा यम से ऑन
लाइन चुकाई जा सकती है . प रणाम यह क पाक म, रे तराओं म, शॉ पंग मॉ स म,
पकिनक थल पर, हवाई अ ड पर - हर कह ं लोग अपने-अपने लैप टॉ स पर काम
करते नज़र आते ह. यहां का काफ कुछ, कह तो सब कुछ, इ टरनेट पर है . आपको
िसनेमा जाना है , नेट पर दे ख ल शो कतनी बजे शु होता है . यह भी क िथएटर तक
पहंु चने का रा ता या है . ट कट भी नेट पर ह खर द ल. यहां यादातर चीज़ के
ट कट नेट पर खर दे जा सकते ह. हम िसएटल से लास वेगस गए-आए. वायुयान
ट कट खर दने कह ं जाना नह ं पड़ा. इ टरनेट पर ह काम हो गया. वहां के होटल क
बु कंग भी घर बैठे ह नेट से करवा ली. वकुवर (कनाडा) म भारतीय फ मी िसतार
शाह ख, रानी मुखज , ीित ज़ टा, अजुन रामपाल वगैरह का एक शो दे खने गए. ट कट
घर बैठे इ टरनेट पर खर दे और टर पर उनके ट िनकाल िलए. इतना ह नह ं, घर
पर ह यह भी दे ख िलया पचास हज़ार दशक क मता वाले उस कोली ज़यम (िथएटर)
म हमार सीट कहां ह गी. पूरा न शा नेट पर था. कनाडा क सड़क वगैरह के भी
व तृत मान-िच नेट पर थे. हम अपने घर, िसएटल, से कनाडा क सड़क का पूरा
मानिच नेट से उतारकर ले चले थे और उसी के सहारे बगैर एक भी जगह कसी से
पूछे सीधे आयोजन थल पर ह पहंु च.े

दकान
ु वगैरह म क यूटर का इ तेमाल बहत
ु आम है . ब क इस कारण यापार-कम
बहत
ु सुगम हो गया है . वैसे यह भारत म भी थोड़ा-बहत
ु हआ
ु है , खास तौर पर बड़े टोस
म. पर यहां तो बहत
ु सार खर द-फरो त इ टरनेट पर ह हो जाती है . इसम दो-तीन
बात क बड़ भूिमका को अनदे खा नह ं कया जाना चा हए. यापार यहां एकदम साफ-
सुथरा है . यािन जो माल बताया या चा रत कया गया है , हू-ब-हू वह आपको िमलेगा.
कोई धोखा-धड़ नह ं होगी. कोई झूठ-फरे ब नह ं. मोल-भाव होता नह ं. और इसके बाद
भी, पस द न आने पर माल वापस लौटाने क खुली सु वधा तो है ह . लोग के पास
समय क भी कमी है . फलतः इ टरनेट पर यापार खूब फल-फूल रहा है . दकान
ु म
ाहक क सु वधा के िलए भी अनेक क यूटर लगे रहते ह.

अमर का म क यूटर व इ टरनेट क सफलता व लोक यता म बहत


ु बड़ भूिमका भाषा
क भी है . प म म तकनीक क भाषा अं ेज़ी ह है , इसिलए यहां के लोग को कोई
असु वधा नह ं होती. भारत जैसे बहु भाषा-भाषी दे श म, जहां अभी िश ा का भी यादा
सार नह ं हो पाया है , अं ेज़ी का क यूटर कैसे आम हो सकता है ? ऐसा नह ं है क
क यूटर पर ह द करण के यास ह नह ं हए
ु ह. व क सबसे बड़ सॉ टवेयर
क पनी माइ ोसॉ ट ने अपने बहत
ु सारे लोक य सॉ टवेयस के ह द तथा अ य
भारतीय भाषाओं के सं करण भी बाज़ार म उतारे ह. पर वे अभी अिधक लोक य नह ं
हो पाए ह. अलावा इसके क खुद भारत के सरकार तं क कोई गहन िच भारतीय
भाषाओं के योग को बढ़ावा दे ने म नह ं है , और इस कारण बाहर क दिनया
ु भी
हमार भाषाओं को तव जोह नह ं दे ती है , अ य कई कारण भी ह क क यूटर पर
भारतीय भाषाएं आम नह ं हो पा रह ह. ह द क ह बात ल. अभी तो ह द का कोई
मानक तथा सवमा य कुंजी पटल ह नह ं है, तकनीक श द के एक प ह द पयाय
सुलभ नह ं ह, आ द. फर जो आदमी ज़रा-सा भी पढ़ा िलखा है वह भारतीय भाषा क
बजाय अं ेज़ी का योग कर अपने 'िश त' होने का प रचय दे ना चाहता है . ऐसे म कोई
भी यावसाियक सॉ टवेयर क पनी भारतीय भाषाओं म सॉ टवेयर य बनाए? इस तरह
एक द ु बन जाता है . अमर का म इस तरह क द कत नह ं ह. और भी बात ह.
लोग म प र कृ त नाग रक बोध है . वे चीज़ को तोड़ते-फोड़ते या वकृ त नह ं करते.
इसिलए तकनीक क जन-सुलभता भी स भव हो जाती है . ले कन इसी के साथ यह भी
क यहां चीज़ का रख-रखाव बहत
ु िनयिमतता से होता है . अगर सावजिनक टे लीफोन या
क यूटर है तो वह चालू तो होगा ह . भारत म यह ज़रा कम दे खने को िमलता है .
टे लीफोन होता है पर अ सर खराब. इससे लोग म खीझ होती है और वह खीझ तोड़फोड़
के प म य होती है . अमर का म यव था का काम करना अपवाद नह ं िनयम है .
अगर कोई साइट है तो वह अ तन तो होगी ह . भारत म अभी यह सं कृ ित नह ं है .
बहत
ु सारे वभाग ने अपनी साइ स तो बना द है पर सूचनाओं को ताज़ा करने म वे
कोई दलच पी नह ं लेते. जन संचार से जुड़े एक बड़े ित ान क साइट दे ख रहा था.
पाया क सव च अिधकार के प म उन भ म हला का नाम ह चल रहा है जो छह
माह पहले थानांत रत होकर जा चुक ह. मने चाहा क सं थान को ई-मेल कर यह
संशोधन करवा दं ,ू तो पता चला क सं थान का ई-मेल अकाउ ट ह स य नह ं है . यह
तो एक नमूना है . व तुतः हमने अभी तकनोलॉजी को अपने जीवन का भाग बनाया ह
नह ं है . यहां तक क आप आम तौर पर यह भी उ मीद नह ं कर सकते क टे लीफोन
करने से ह आपका काम हो जाएगा. आपसे यह अपे ा क जाएगी क आप खुद हा ज़र
ह . लु फे-मै तुझ से या कहंू? हाय कमब त तूने पी ह नह ं ! इसी के साथ एक और
बात. बहत
ु मामल म अमर क समाज एक नैितक समाज है . है या बना दया गया है .
जो हो, इसके सुफल दखाई दे ते ह. यहां पाइरे टेड सॉ टवेयर (Pirated Software) का योग
कर ब-कर ब नह ं होता. सॉ टवेयर बनाने वाल को अपने कये का पूरा-पूरा ितफल
िमलता है, प रणामतः नए-नए सॉ टवेयर वकिसत होते ह, इससे यो ा को काम करने
म आसानी होती है . एक सुच बनता है .
*
इसी क यूटर तथा इ टरनेट ने और भी अनेक रोचक तथा उपयोगी बदलाव कए ह.
मुझे यहां यह दे खकर बहत
ु आ य हआ
ु क फ म रोल वाले कैमरे अब पूर तरह लु
हो गए ह. उनक जगह ले ली है ड जटल कैमर ने. न फ म खर दने, लोड करने का
झंझट, न उसे डे वलप और ट कराने का. बटन दबाओ और फोटो तैयार. इससे भी
आगे, आप खुद कलाकार बन जाएं अगर आपके पास क यूटर हो. अपने कैमरे से सीधे
क यूटर पर फोटो अपलोड (upload) कर और फर उस फोटो म मन चाहे सुधार,
संशोधन, प रवतन कर ल. बहत
ु यादा कला मक िनपुणता होनी भी ज़ र नह ं. यह
दािय व सॉ टवेयर ह वहन कर लेता है . घर म अगर टर भी हो तो फोटो का ट
भी िनकाल ल अ यथा कैमरा या केवल उसक मेमोर (मािचस क ल बाई-चौड़ाई के
आकार क एकदम पतली प ट ) या कसी और मा यम पर अपनी छ वयां ले जाकर
ट बनवा ल , ब क खुद ह बना ल . अमर का म तो ऐसी मशीन जगह-जगह लगी
ह जन पर आप खुद अपने ट बना सकते ह. इस ड जटल तकनीक ने फ म रोल
वगैरह का झंझट तो ख म कया ह है , इससे एक बड़ा ांितकार प रवतन यह हआ
ु है
क बेहतर फोटो ाफ के िलए आप जतने चाह उतने फोटो खींच सकते ह, बना यह
िचंता कए क फ म खच हो रह है . जो फोटो अ छा लगे उसे रख ल, शेष को िमटा द.
प रणाम त ण दे खे जा सकते ह (कैमरे के पीछे ह छोटा-सा न होता है ) इसिलए
यह तै करना भी स भव है क एक ह य को और शूट कया जाए या नह ं.

*
कुछ ऐसा ह बदलाव संगीत के े म भी आया है . चलते- फरते संगीत सुनने क
सु वधा वॉकमेन ने सुलभ कराई थी. जब संगीत ड जटल हआ
ु तो सीड बजाने वाले
ड कमैन आ गए. सीड क विन िन य ह कैसेट क विन से बेहतर होती है . इस
बीच 78 आरपीएम(RPM) के रकाड, तथा ईपी(EP), एलपी(LP) तो गायब ह हो गए. अब
आई एक नई तकनीक ने कैसेट या सीड को भी अ ासंिगक कर दया है . आप इ टरनेट
से सीधे ह संगीत खर द कर उसे अपने लेयर या क यूटर पर सुन तथा सुर त रख
सकते ह. यािन संगीत का सं ह आपके उपकरण क मृित म ह . अलग से कैसेट, सीड ,
ड वीड रखने क आव यकता नह ं. फलहाल तो इससे पायरे सी पर भी िनयं ण हआ
ु है .
सभी जानते ह क पायरे सी संगीत को कस तरह तबाह करने लगी थी. इस नई
तकनीक म जो भी संगीत आप डाउनलोड करते ह उसका मू य चुकाना ह होता है . इस
तकनीक म संगीत क वािलट बेहतर होती है और उसे सं ह करने म जगह यु नह ं
होती. एक और बड़ बात यह क नवीनतम संगीत सार दिनया
ु म एकसाथ सुलभ हो
जाता है . यह नह ं क आप ती ा कर क आपके यू ज़क टोर पर नया सीड आया है
या नह ं. और यह भी क आप केवल अपना मनचाहा संगीत खर दते ह. पस द का एक
गीत खर दने के िलए पूरा सीड नह ं खर दनी पड़ती.

इसी कताब म एक अ य लेख म एक और बदलाव क चचा मने क है . वह है पेपर


करसी (भारतीय भाषा म नोट, अमर क अं ेज़ी म बल) का लगभग पूर तरह व थापन.
अमर का म े डट काड का चलन बहत
ु अिधक है . दकान
ु , सेवाओं, यहां तक क सरकार
सं थान तक म े डट काड वीकाय ह. आपको जेब म पैसे रखने क ज़ रत ह नह ं.
दकानदार
ु को हसाब- कताब करने क ज़ रत नह ं. सारा काम क यूटर कर लेता है .
इसी वजह से कर चोर भी नह ं होती.

प रवतन और भी बहते
ु रे हो रहे ह. पर अभी वे बहत
ु लोक य नह ं हए
ु ह. ले कन एक
बात प क है . इन सभी प रवतन से मनु य का जीवन अिधक सुगम होता जा रहा है .
द ेट ड जटल डवाइड (The great digital divide) क सार चचाओं तथा इस बात के
बावज़ूद क यह तकनोलॉजी नए िसरे से दिनया
ु को ‘है स और है व नॉ स’ (Haves and
have-nots) म बांट रह है , मुझे यह लगता है क इन प रवतन का लाभ अब ज द
ज द नीचे तक पहंु चने लगा है . तकनोलॉजी अब वलािसता क व तु नह ं रह गई है .
टे लीफोन करते हए
ु , मनीऑडर भेजते हए
ु , रे ल का आर ण कराते हए
ु , और ऐसे ह बहत

सारे काम म कतार का आ खर आदमी भी तकनोलॉजी से लाभा वत होता है . इस
तरह एक अथ म तो तकनोलॉजी गर ब-अमीर, वकिसत-अ वकिसत, पूव-प म क खाई
को पाट भी रह है . भला ऐसी सकारा मक और जोड़ने वाली तकनीक का वागत कौन न
करना चाहे गा?

*****************

सोनम ली

पछले कुछ वष म सूचना ौ ोिगक के े म जो ांितकार व तार हआ


ु है उसक
वजह से भारत क युवा पीढ़ के िलए अमर का और भी नज़द क का तथा स भावनापूण
दे श बन गया है . भारत से क यूटर म कोई ड लोमा या ड ी, या अ य कोई द ता
ा क जाए और फर अमर का आकर उसे बढ़ाया जाए तथा यह ं नौकर कर ली जाए.
अपने दे श के संसाधन से पढ़ िलखकर, अमर का आकर, यहां नौकर कर 'अपने दे श क
सेवा' करने का व न दे खने वाल क तादाद दन दनी
ू रात चौगुनी बढ़ती जा रह है . यह
कहना अनुिचत होगा क इस व न के मूल म केवल डॉलर क चमक और खनक है .
तकनीक के े म काम करने वाल के िलए लगभग इतना ह या इससे भी बड़ा
आकषण अ तन के सजीव स पक का भी है . यह कहना इसिलए भी ज़ र है क
अ छा वेतन अब भारत म भी िमलने लगा है . य मा यम के व तार ने अमर का क
चमक-दमक भर ज़ दगी क जो अग णत छ वयां घर-घर पहंु चाई ह वे भी युवा पीढ़
के िलए अमर का को आकषण का क बनाती ह. और इस कारण वे लोग भी, जनके
पास इस तरह क तकनीक यो यता नह ं है , मेहनत मज़दरू के बल पर भी अमर का म
रह कर अपना जीवन संवारने का सपना पालने लगे ह.

पछले कुछ वष म भारत से अमर का आने वाल क सं या म काफ इज़ाफा हआ


ु है .
इनम पढ़ने आने वाले और काम करने आने वाले दोन ह शर क ह. वृ तो पयटक क
सं या म भी कम नह ं हई
ु है , ले कन उनक चचा यहां ासंिगक नह ं है .
क यूटर ोफेशन स को अमर का सवािधक आकृ करता है . अमर का म भी िसिलकन
वैली या माइ ोसॉ ट. अपने छह माह के अमर का वास म मुझे एक ऐसे शहर रे डम ड
(िसएटल) म रहने का अवसर िमला जहां भारतीय बहत
ु बड़ सं या म ह. इनके मा यम
से मुझे भी सपन के इस दे श म रहने के यथाथ को दे खने परखने का अवसर िमला.
उसी दे खे परखे क चचा इस लेख म कर रहा हंू .

क यूटर के े म अमर का आने वाले यादातर युवा ह. प चीस-तीस के आस पास.


पित-प ी दोन काम कर - यह भी आम है . ब क, एकल कामकाजी कम ह ह.
वाभा वक ह क इनम से अिधकांश के या तो अभी ब चे नह ं ह, या बहत
ु छोटे ह.
हमारे राज थान के युवा यहां बहत
ु अिधक नह ं ह. शायद इसका एक कारण िश ा के
े म हमारा पछड़ापन हो, पर ‘गेहूं छोड़कर म क खाना, मेवाड़/मारवाड़ छोड़ कर कह ं
नह ं जाना’ वाली मानिसकता क भूिमका को भी अनदे खा नह ं कया जाना चा हये.

भारत म रहते हए
ु अमर का आना और यहां रहना जतना आकषक लगता है , दरअसल
उतना है नह ं. ब क कुछ अिधक ह क ठनाइय , संघष और चुनौितय से भरा है .
अलहदा सं कृ ित, िभ न खान-पान, आचार यवहार, िभ न वेशभूषा सं कार और िभ न
भाषा! बावज़ूद अं ेज़ी के, अमर क अं ेज़ी बहत
ु अलग है . एक िभ न भाषा उसे कहना
गलत न होगा. इन सबका आद होने म व त तो लगता ह है . य सा य भी कम नह ं
है यह सब. कुछ चीज़ को आप अपना लेते ह, कुछ को वीकार करना मु कल लगता
है . शायद कभी-कभी ‘न उगलते बने, न िनगलते’ वाली थित भी आ जाती हो. म
सोचता हंू , भारत से, खासकर कसी छोटे क बे से आने वाली युवती जसने अपने दे श म
सलवार सूट के िसवा शायद ह कुछ पहना हो, और जो अगर नव ववा हता भी हो तो
ढे र चू ड़य , ब द , बछुए, पायल, चमचमाते िस दरू के बना अपने अ त व क क पना
भी नह ं कर पाती हो, जब जी स और ट शट जैसी अपे ाकृ त स मानजनक (अ यथा
आम तौर पर तो शॉट और बिनयान नुमा कुछ) वेशभूषा को अपनाने को तथा अपने
बहत
ु सारे साधन – सुहाग िच को छोड़ने को ववश होती होगी तो उसे कैसा लगता
होगा? यह ठ क है क अमर का म कोई आपके कपड़ क िचंता नह करता, कोई उस पर
ट पणी भी नह ं करता, ले कन आप अजूबा बन कर तो काम पर नह ं जा सकते. काम
क छोड़, बाज़ार भी नह ं जा सकते. आप खुद ह अपने को असहज महसूस करने लगगे.
‘जैसा दे श वैसा भेस’ यूं ह नह ं कह दया गया था. इस कथन क ताकत यह ं आकर
समझ म आती है . फर, खानपान का मामला. जो लोग घोर शाकाहार ह, उनक तो खैर
मुसीबत है ह . बाहर, बाज़ार म ऐसा बहत
ु कम िमल पाता है जो हमारे मानद ड के
अनुसार शाकाहार हो. व तुत: शाकाहार क हमार और इनक अवधारणा म ज़मीन
आसमान का फक़ है . यह कारण है क इनका बहत
ु सारा शाकाहार खाना भी भारतीय
शाकाहार के िलए अभ य होता है. अगर बाहर खाना ह पड़ जाए (और नौकर म तो
ऐसे अवसर आते ह रहते ह) तो आपके वक प अ यिधक सीिमत हो जाते ह. अगर
आप घोर शाकाहार न भी ह , सवभ ी भी ह तो वाद और पाक वधी क िभ नता को
वीकार करना भी आसान नह ं होता. त दरू या मुगलई सािमष भोजन के आद को
अमर क भोजन लगभग अ ा ह लगता है . और जहां तक घर पर खाना पकाने क
बात है , उन शहर म जहां भारतीय बहतायत
ु म ह, जैसे इस रे डम ड/िसएटल म, यहां तो
सार भारतीय खा साम ी िमल जाती है, ले कन जन थान पर भारतीय का ऐसा
जमावड़ा नह ं है वहां तो आप दाल, घी, आटा तक के िलए तरस जाते ह. यह ठ क है क
धीरे -धीरे आप ‘जो है जैसा है ’ के आद होते जाते ह, पर कमी तो खटकती ह है .

अमर का म वैसी आपसदार , मुह लेदार नह ं है जसके क हम भारतीय अ य त ह. कुछ


तो य तताएं और कुछ जीवन शैली तथा सोच. अमर का म हर य अपनी िनजता
(Privacy)को इतना मह वपूण मानता है क भारत जैसी आपसदार क पनातीत हो जाती
है . य तताएं तो ह ह . काम के ित इनका कोण हमसे बहत
ु िभ न है . हर आदमी
वाकई अपनी पूर मता भर, ब क उससे भी कुछ अिधक ह , काम करता है . एक दे श
के प म अमर का क सफलता का राज़ भी इसी म िछपा है . पर इस बात पर कम ह
यान जाता है क काम के ित यह जुनून आदमी के साथ नाइं साफ भी करता है . हम
लोग अपनी पछली या ा म कर ब डे ढ़ मह ना यहां रह कर गए. उस दौरान अपने एक
पड़ोसी द पती क तो एक बार भी श ल नह ं दे खी. बस, उनके घर क िचमनी से
िनकलते धुएं से यह एहसास होता क इस घर म कोई रहता है . दसरे
ू पड़ोसी द पती को
कभी-कभार आते-जाते दे ख लेते. एक दसरे
ू के घर आना-जाना दरू क बात है , दआ
ु सलाम
तक नह ं. यह बाद म पता चला क हमारे बेट -दामाद और उनके बांये-दांये वाले पड़ोसी -
तीन एक ह द तर, माइ ोसॉ ट म काम करते ह. िन य ह भारतीय प रवार म खूब
आना-जाना तथा सुख-दख
ु म भरपूर सहभािगता है, पर जस आपसदार के सं कार हमम
घुले िमले ह उसका अभाव न खटके यह अस भव है . िसएटल म हो सकता है यह अभाव
न भी खटकता हो, य क स बंध रखने के िलये भारतीय खूब ह, पर जन शहर म
भारतीय नह ं या नह ं के बराबर ह वहां या होता होगा? अमर क लोग का भारतीय के
यहां आना-जाना नह ं जैसा ह है . इसे रं ग भेद से जोड़ कर न दे ख. यह उनक जीवन
शैली ह है . वैसे म यह लगता होगा क चचा गािलब क पुकार यहां सात समु पार सुन
ली गई है :

र हये अब ऐसी जगह चलकर, जहां कोई न हो


हम सुखन कोई न हो और हम ज़बां कोई न हो.

बेदर-ओ-द वार सा इक घर बनाया चा हये


कोई हमसाय: न हो और पासबां कोई न हो.

प ड़ये गर बीमार, तो कोई न हो तीमारदार


और अगर मर जाइये, तो नौह: वां कोई न हो.

तीज- यौहार पर अपना दे श याद न आए, ऐसा हो ह नह ं सकता. समस और नया


साल यहां के सबसे बड़े पव- यौहार ह. अ य भी अनेक यौहार ह. खूब धूम-धड़ाका,
मौज-म ती रहती है . समस का उ लास लगभग नव बर से ह ार भ हो जाता है .
इस सबसे आप अछूते य रह? खुिशयां बांटने म हज़ ह या है ? है लोवीन पर भारतीय
भी अपने घर के बाहर क ू रखते ह, 4 जुलाई (अमर क वाधीनता दवस) को पूरे
उ लास से मनाते ह और समस पर रोशनी क झालर सजाते ह. ले कन जब दवाली
आम दन क तरह आकर िनकल जाए तो? या होली पर कोई आप पर रं ग का एक
छ ंटा भी न डाले तो? या राखी पर आपक कलाई सूनी रह जाए तो? या ईद पर घर से
सेवईय क महक न उठे तो? म कुछ यादा ह भावुक तो नह ं हो रहा? जब दे श से
बाहर ह तो से ट मटल हो जाना अ वाभा वक नह ं. जो चीज़ और बात अपने दे श म
बेमानी, ब क उबाऊ लगती ह उन तक का अभाव यहां खटकने लगता है .

दोन दे श के म य सां कृ ितक िभ नता बहत


ु अिधक है . एक उदाहरण काफ होगा. जब
हमारे दामाद ने अपने कसी सहकम को यह बताया क उसके सास-ससुर (यािन हम)
तीन मह ने के िलए उनके यहां आए ह (पहले हमारा वास काय म तीन मह ने का ह
था. बाद म बढ़ते-बढ़ते छह मह ने का हो गया!) तो उसने बहत
ु ग भीरता से उसके ित
अपने हमदद ज़ा हर क . इस दे श म मां-बाप का आपके साथ आकर रहना आन द का
नह ं अ पतु क और िचंता का वषय होता है . सास-ससुर का तो और भी अिधक. यह ं
आकर समझ म आता है क य अं ेज़ी म सास-ससुर पर इतने लतीफे होते ह. यह
समाज िनजता और वैय क वाधीनता पर इतना अिधक ज़ोर दे ता है क ‘या म दो ना

समाय’ याद आने लगता है . शायद वैवा हक स बंध के दरकने-टटने के मूल म एक बात
यह भी है . ले कन इस सां कृ ितक वैिभ य को पचा पाना आसान तो नह ं. कुछ बात को
आप हं स कर टाल सकते ह. जैसे दामाद के सहकम क सहानुभूित को, ले कन बहत

सार िभ नताएं आप पर भार भी पड़ती ह. अब यह बात ल क यहां क काय-सं कृ ित
भारत क काय-सं कृ ित से िभ न है . वैस,े या भारत म कोई काय सं कृ ित है भी? यहां
तो जब आपको काम करना है तो सब कुछ को भूलकर काम ह करना है . अिधकतर
क यूटर ोफेशनल सुबह आठ बजे द तर जाते ह और रात नौ बजे भी लौट आएं तो
गनीमत है . फर, घर आकर भी द तर का काम, जो कई बार सुबह के दो-तीन बजे तक
भी चलता रहता है . यह अपवाद नह ं, आम है . छु टयां बहत
ु ह कम. बावज़ूद इस बात
के क यहां स ाह म पांच दन ह काम होता है , काम का यह आिध य और दबाव मारक
नह ं लगता? पित-प ी दोन ह काम करते ह तो और भी अिधक. अपना जीवन तर
बनाये रखने के िलए दोन का काम करना ज़ र भी है . वेतन डॉलर म िमलता है . एक
अमर क डॉलर कर ब पचास पये का होता है . अमर क वेतन को भारतीय मु ा म
पांत रत करने पर सुखद आ य तथा गव होता है , ले कन जब उस बहत
ु बड़ रािश को
यहां के खच के सामने रख कर दे खते ह तो गु बारे क हवा िनकलने लगती है .
कामकाजी युवा द पती क यह ववशता होती है क वे अपनी संतान को डे केयर सटर
म छोड़ कर काम पर जाएं. डे केयर सटर यहां बहत
ु अ छे ह. एक डे केयर सटर हमने
दे खा. अ छा था. ले कन उसक फ स? न ह पूछ तो बेहतर. मा 1800 डॉलर ित माह.
यािन कोई एक लाख पये ित माह. भले ह पित प ी दोन काम करते ह , और उनक
तन वाह भी लाख म हो, इस तरह के खच जो आपको अश से फश पर उतार लाएं, कम
नह ं ह. हर चीज़ महं गी है . कसी ठ क-ठाक रे तरां म एक व त का खाना : 50 डॉलर.
िसनेमा का एक ट कट : 10 डॉलर. घ टे दो घ टे का कार पा कग शु क : 10 डॉलर.
एक कप कॉफ : 5 डॉलर. हे यर क टं ग : 15 डॉलर. एक बार घर क सफाई : 80 डॉलर.
या- या िगनाऊं? तो, यह सब खच करने के िलए काम तो करना ह है . दोन को. ले कन
तब पा रवा रक जीवन? हम लोग जब पछली बार यहां थे तो एक दन बात -बात म
मने बेट से कहा क तुम लोग इतना थक-पच कर द तर से आते हो और फर रात
यारह बजे ड वीड लगाकर फ म दे खने बैठ जाते हो. सो य नह ं जाते? बेट ने जो
जवाब दया वह मुझे अब भी हॉ ट करता है . बोली, पापा, अगर सो जाएं तो फर साथ
कब रह? सह भी है . काम-काज, नौकर क य तता और तनाव. इनके बीच र त क
ऊ मा को बनाये रखना भी खासा य सा य हो जाता है . दरअसल यह पूंजीवाद का
चर ह है क वह पहले आपको वैभव क चमक-दमक दखाकर अपनी तरफ आकृ
करता है , आपक जीवन शैली को अपने सांचे म ढालता है, आपको बहत
ु सार सुख
सु वधाओं का अ य त बनाता है . फर तो आप खुद ह उसके यूह म ऐसे फंस जाते ह
क उस ' तर' का िनवाह करने के िलए िनरं तर अिधक खपने-पचने को (अनचाहे भी)
ववश होते ह. यािन तब क बल ह बाबाजी को नह ं छोड़ता है .

तो, भारत से लोग जस वैभव क चमक-दमक से खंच कर अमर का आते ह, धीरे -धीरे
वह उनक एक ऐसी ज़ रत बन जाता है उसे चाह कर भी छोड़ पाना मु कल होता है .
‘चाह कर’ पर म जान-बूझ कर बल दे रहा हंू . आप य कमाते ह? इसिलए क अपने
कमाये का सुख ले सक - या क महज़ इसिलए क और अिधक खच कर सक? धीरे -धीरे
खच करना ह आपक ज़ रत बनता जाता है . खच का सुख उठाने क तो फुसत ह कहां
बचती है ?

यहां अमर का म नौकर का अथ भारत से बहत


ु अलग है . आप खुद नौकर न कर रहे ह
तब तो यह दे खकर बहत
ु अ छा लगता है क लोग बहत
ु िन ा से काम करते ह. ले कन,
को हू म पलने का दद तो बैल ह जानता है . काम आपसे ज़ दगी का सारा रस ह
खींच ले, यह कसे पस द आएगा? पर, वरण क वतं ता तो आप पीछे ह छोड़ आते ह.
यह समाज तो Hire or Fire म व ास करता है . और, यहां Fire हो जाने का मतलब बहत

गहरा है . बहत
ु के िलए काम न होने का एक अथ अमर का म रहने के अिधकार का
ख म हो जाना भी होता है . कोई भी Fire नह ं होना चाहे गा. और इसिलए, स न होने का
अिभनय करते हए
ु काम म पले रहना पड़ता है .

अमर का म ल बे समय तक गोरे और काले के बीच गहरा भेदभाव बरता जाता रहा है .
अब थितयां बहत
ु बेहतर ह. ले कन मनु य वभाव का या करगे आप? इस अनुभूित
का या करगे क ये वदे शी (आप पढ़ : ह द ु तानी) यहां आकर हमारे रोज़गार के
अवसर कम कर रहे ह. यह कोई नह ं दे खता, या जान बूझकर अनदे खा करता है क
अपने दे श के संसाधन का उपयोग कर वहां पढ़ िलख कर ये लोग इस दे श (अमर का)
क समृ म योगदान कर रहे ह. नज़र आता है तो बस यह क इनके कारण हमारे यहां
बेरोज़गार बढ़ रह है . बड़े थान व पद पर य क शालीन, अिभनय पटु लोग होते ह,
यह अनुभूित सतह के नीचे दबी रहती है , कंतु छोटे काम करने वाल के सम कट हो
जाती है . कट न भी हो, अनुभव तो होती ह है . दे व आन द ने कभी 'दे स परदे स' बनाई
थी और मह भ ला ने 'दसर
ू तरफ' िलखा था.
एक पराये दे श म रहना या होता है , इसका अनुभव दस-पं ह दन के वदे श मण से
नह ं हो सकता. तब तो केवल चमक-दमक-खनक और सुख-सु वधाएं ह नज़र आती ह.
यह दखता है क यह दे श कतना वकिसत है . सब कुछ हरा ह हरा दखता है . ले कन
जब आप तस ली से इन लोग क ज़ दगी दे खते ह तब यह समझ म आता है क
बना घरे लू नौकर के घर को साफ-सुथरा रखना कतना मु कल और य -सा य होता
है , या पूरे पांच दन द तर म खटने के बाद जब छठे -सातव दन घर म खटना पड़ता है
तो कैसा लगता है ! सुबह जाकर दे र रात लौटने पर खाना बनाने क बात तो छो ड़ये,
ज म जो बचा खुचा है उसे खाना भी द ु ार लगता है . आप कभी-कभार रे तरां म जाएं
यह आपका सुख है , पर जब मज़बूर म जाएं तो खाना वा द होते हए
ु भी वा द नह ं
लगता. अबोध िशशु को डे केयर या नैनी के भरोसे छोड़कर काम पर जाना कोई सुखद
अनुभूित नह ं दे सकता. एक बहत
ु िश , शालीन, शानदार समाज म रहने का तमाम सुख
इन अनुभव के कारण एकदम शू य हो जाता है . तब यह महसूस होता है क यह समाज
चाहे कतना भी अ छा य न हो, आपका अपना नह ं है . कमले र और नई कहानी के
शु आती दौर के उनके साथी अनेक कथाकार ने अजनबीपन के जस दं श का िच ण
अपनी अनेकानेक कहािनय म कया था, वह यहां कई गुना यादा महसूस होने लगता है .
उन लोग ने तो गांव से शहर आकर खो जाने क ह पीड़ा य क थी , यहां तो पीड़ा
अपने दे श से बहत
ु दरू चले आने क तथा नाना वध होती है .

यहां रहकर तथा यहां रह रहे भारतीय के जीवन को िनकट से दे खकर मुझे बार-बार
अ ेय क िस क वता 'सोनमछली' याद आती रह . क वता बहत
ु छोट है :

हम िनहारते प
कांच के पीछे
हांफ रह है मछली

प तृषा भी
(और कांच के पीछे )
है जजी वषा.

पर वक प या है ?
जो लोग उ च िश ा ा कर अमर का चले आए ह, यहां कुछ साल रह गए ह, उनका
दे श लौटना भी उतना आसान नह ं है जतना आम तौर पर मान िलया जाता है . यहां
रहकर आप उन बहत
ु सार बात , सु वधाओं तथा अ छाइय के अ य त हो चलते ह जो
अपने दे श म अभी क पनातीत ह ह. चिलये, उनक बात छो ड़ये. अपना दे श, जैसा भी
हो, अपना है . पर आपने जो द ता यहां अ जत क है , उसके योग का अवसर भी अगर
अपने दे श म न िमल पाये तो? काम करने के िलए जस तरह का वातावरण अमर का म
है , उस तरह का न तो भारत म है, न िनकट भ व य म होने क कोई उ मीद है . मेरा
वर बहत
ु िनराशावाद लग सकता है , और मेरे ‘दे शभ ’ पाठक को इस बात पर गहर
आप भी हो सकती है , पर यथाथ यह है .

ऐसा नह ं है क लोग अमर का से लौटे नह ं ह. लौटे भी ह और लौटकर उ ह ने दे श म


अपनी जगह भी बनाई है . ले कन वह लौटना भी बहत
ु सहज और सुखद शायद ह रहा
हो. जसे रवस क चरल शॉक कहा जाता है , वह तथा अ य बहत
ु सार यथाएं इस
वापसी के साथ खुद-ब-खुद जुड़ जाती ह. मुझे तो इस स दभ म फर से अ ेय ह याद
आते ह. उनक एक और क वता है , 'नह ं यूिलिसस'1. आप भी प ढ़ये :

नह ं यूिलिसस
न तु ह कभी िमलेगी इथाका
न कभी मुझे िमलेगी ारका !
वापसी म य भी
कोई नगर नह ं िमलते :
वासी लौटते तो ह
पर उनक घर वापसी नह ं होती
जहां वापसी होती है वहां उनके घर नह ं होते :
उ ह कोई नह ं पहचानता.

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1. यूनानी पुराकथा के अनुसार यूिलिसस उफ ओड िसयस इथाका का स ाट था. ोजन
यु के कारण उसे दस बरस अपने घर से दरू रहना पड़ा था. महाक व होमर ने 'ओडे सी'
म इसी क कथा कह है .

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या ा के बाद

अपनी दो अमर का या ाओं म जो कुछ मने दे खा, उसम से यादातर मुझे अ छा लगा,
और ऐसा ह मने अपने इन सारे लेख म, ज हे अब तक आप पढ़ चुके ह गे, िलखा भी.
कई िम ने इन लेख पर अपनी असहमित और नाराज़गी ज़ा हर क है . उनके मन म
प म क , और वशेषकर अमर का क एक छ व बनी हई
ु है . उस छ व से िभ न कुछ भी
उ ह वीकाय नह ं. अगर उ ह ने यह मान िलया है क अमर का म अित-भौितकता,
न नता, अ ीलता आ द-आ द है , तो बस, फर है . आप उससे मना कैसे कर सकते ह?
इससे उ ह कोई फक़ नह ं पड़ता क उनक छ व सुनी-सुनाई बात से िनिमत है और
आप आंखन दे खी कह रहे ह. एक अ य छ व अिधक पु ता आधार वाली है . जो िम
वैचा रक प से पूंजीवाद सं कृ ित के वरोधी ह वे सै ांितक आधार पर अमर का के
आलोचक ह. म वयं भी उसी प का हंू, और वैचा रक प से अब भी अपने को वह ं
खड़ा पाता हंू . इस बात का उ लेख मने इस पु तक के कई लेख म, जहां भी उपयु
अवसर आया है , कया है . इस पु तक क योजना म बड़े , सै ांितक, वैचा रक मु को
उठाने का अवसर नह ं था, इसिलए वभावत:वह प अछूता रहा है . ले कन औसत
नाग रक जीवन, जैसा मने अमर का म दे खा, उसक शंसा करते हए
ु कतई संकोच अनुभव
नह ं करता. इसे मेरा वैचा रक वचलन नह ं माना जाना चा हए.

यहां, म यह चचा करना चाहता हंू क आ खर या कारण ह क अमर का का नाग रक


जीवन इतना यव थत और आन ददायक है ? खास तौर से दरू से दे खने पर यह समाज
कैसा लगता है , यह चचा, और यह चचा भी क या वाकई यह एक सुखी समाज है , जैसा
क आम तौर पर मान िलया जाता है,कुछ आगे चलकर! व तुत: जब म भारत क चचा
करते हए
ु , या उसका हवाला दे ते हए
ु अमर का क शंसा करता हंू तो ऐसा नह ं है क
मेरा भारतीय होना कुछ कम हो जाता है . वा तव म तो म जब अमर का म था और
वहां कुछ भी अ छा दे खता तो मुझे अपना दे श याद आता - और म सोचता क काश!
मेरे दे श म भी ऐसा ह होता. इस बात पर म ज़रा भी शिम दा नह ं हंू, हालां क मेरे उन
िम को यह अ छा नह ं लगा जो बना कसी से तुलना कए ह यह तै कए बैठे ह क
भारत सव े है . मेरा मानना यह है क इस तरह तो हम खुद ह अपनी गित के रा ते
ब द करते ह. इसम कोई हज़ नह ं है क अपनी आंख खुली रखी जाए और जो भी
अ छा द खे उसे अपनाने म संकोच न कया जाए.

इन या ाओं ने मुझे अपने कोण को अिधक यापक बनाने का मौका दया है . मने
महसूस कया है क वैचा रक आधार पर धारणा बनाना एक बात है , और उसका बहत

मह व भी है ; पर उस धारणा पर, खुद दे ख कर पुन वचार करना और भी अिधक
मह वपूण है . अमर का म घूमते हए
ु , वहां िम से चचा करते हए
ु , और फर भारत आकर
उस सब पर पुन वचार करते हए
ु मेरे सामने कुछ बात उभर ह. यहां म उ ह ं को तुत
कर रहा हँू .

अब तक म यह मानता था क जनािध य भारत क असल सम या नह ं है . सम या का


उ स कह ं और है . जैसे हमारे गैर- ज़ मेदाराना रवैये म, अ यव था म, नौकरशाह म,
राजनीित म, आ द. अमर का म जो कुछ मने दे खा उसने मुझे यह मानने को ववश
कया क अमर का हमसे इसिलए भी बेहतर है क वहां हमारे जैसा जनािध य नह ं है .
इसके साथ ह अ य बात भी ह. ले कन सबसे बड़ बात यह है क जनसं या का दबाव
सार यव था न कर दे ता है . वहां जनसं या का हमारे जैसा दबाव नह ं है तो हर जगह
खुलापन महसूस होता है . आप कसी भी पाक म चले जाएं, कसी भी मॉल म जाएं, कसी
भी दशनीय थल पर जाएं, लगता है आप बहत
ु अ छ तरह सांस ले सक रहे ह, आपका
दम नह ं घुट रहा है . सब कुछ सु यव थत प से संचािलत होता है . यह इसीिलए
स भव है क वहां जनसं या कम है . कह ं भी वैसी भीड़भाड़ नह ं दखती जैसी दे खने के
हम अ य त हो चले ह. अमर का का े फल हमसे अिधक है , जनसं या हमसे कम.
अमर का का े फल 9,363,364 वग कलोमीटर है , भारत का े फल 3,166,414 वग
कलोमीटर. अब इसके सामने दोन दे श क जनसं या को भी दे ख. अमर का क
जनसं या 291,587,099 है तो उसी समय (जबके ये आंकड़े ह) भारत क जनसं या है
1,065,462,000. बात और अिधक साफ हो जाएगी अगर आप दोन दे श के जनसं या
घन व को दे ख. अमर का म जनसं या घन व ित वग कलोमीटर 31.1 है तो भारत म
336.5 ित वग कलोमीटर. यह थित और खराब होनी ह है , अगर कोई भावशाली
कदम न उठाए गए य क अमर का म जनसं या वृ दर 14.5 ित हज़ार है जब क
भारत म यह दर 26.2 ित हज़ार है . दोन दे श क मृ यु दर म बहत
ु कम फासला है .
अमर का म यह ित ज़ार 8.5 है तो भारत म 9.i फक़ तो पड़ना ह है . ले कन, जैसा
मने कहा, जनसं या का कम होना ह एक मा बात नह ं है . म एक हद तक अब भी
यह मानता हंू क हमारे दे श क सम या यव थागत भी है . अब तक हमारे यहां सब
कुछ करने का दािय व सरकार ने अपने सर पर ले रखा था. नेह के समाजवाद मॉडल
क दे न रह यह बात. इस सोच का अपना औिच य था, इसके फायदे भी हए
ु , ले कन
सरकार कस तरह काम करती है , यह कहना अनाव यक है . प रणाम यह क अगर हम
सौ कूल क ज़ रत है तो पचास ह खोले जाएंगे, उनका भी बंटवारा ता कक आधार पर
नह ं ब दरबांट के आधार पर कया जाएगा. उन कूल म जतने िश क क ज़ रत
होगी, उससे कम ह िनयु कये जाएंग,े और जतने िनयु कये जाएंगे उनम से भी जो
भावशाली ह वे अपना डे यूटेशन वगैरह करवा कर कूल म जाने से बच जाएंग,े वगैरह.
यह बात अलग से क जो कसी तरह कूल चले भी जाएंगे, वे पढ़ाएंगे या नह ं. ल बो-
लुआब यह क हम ज़ रत के अनुसार संसाधन उपल ध कराते ह नह ं. इस कारण, अगर
जनसं या कम भी हो तो थित म या फक़ पड़ने का है ? अमर का म आम तौर पर
ऐसा नह ं है . ज़ रत के आधार पर संसाधन उपल ध कराए जाते ह. इससे न केवल
अ यव था नह ं होती है , लोग को खीझ नह ं होती, जना ोश भी नह ं भड़कता. अगर
आपको बजली पानी का बल जमा कराने के िलए तीन-तीन घ टे कतार म लगना पड़े ,
रे वे टे शन पर लेटफॉम ट कट लेने के िलए दो घ टे जूझना पड़े तो यह भी सोचा
जाना चा हए क ये सब लोग राज व म वृ भी तो कर रहे ह - इ ह आधारभूत सु वधा
य नह ं उपल ध कराई जा रह है ? हमने तो कमी पैदा करना अपनी आदत म शुमार
कर रखा है . इसी म िन हत वाथ का हत भी सधता है . आप टे लीफोन कने शन दे ने के
िलए पांच साल इं तज़ार कराएंगे, गैस िसले डर के िलए दस साल(अभी ये अनुभव बहत

पुराने नह ं हए
ु ह), रे ल म आर ण के िलए तीन माह - और यह तब जब क इनम से
कुछ भी मु त नह ं है . और असल म तो मु त कुछ भी नह ं है . जो मु त दखाई दे ता है
वह भी अंतत: आपके हमारे टै स से ह तो चलता है . इतना ज़ र क जनता के वोट से
चलने वाली सरकार बहत
ु अिधक टै स नह ं लगा सकती. ले कन जो टै स वह वसूल कर
रह है उसका यायसंगत उपयोग तो कर सकती है . बड़े और भावशाली लोग पर
बजली-पानी-टे लीफोन का करोड़ पये का बकाया चलता रहता है , वे कसी न कसी
बहाने इसके भुगतान से बचे रहते ह. इसका खािमयाज़ा भुगतता है वह नाग रक जो पूर
ईमानदार से अपनी सार दे नदा रयां चुकाता है . अगर इसे द ु त कर िलया जाए, तो फर
हम अिधक जनसं या का उतना रोना नह ं रोना पड़े गा. ले कन जनसं या पर िनयं ण तो
करना ह होगा, भले ह इसके िलए कुछ अलोक य कदम भी य न उठाने पड़.

दसर
ू बात जो मने अमर का म महसूस क वह है आम नाग रक म यव था के ित
स मान का भाव. बात चाहे ै फक क हो, या यू क , धू पान िनषेध क या सफाई
बनाये रखने क , आम नाग रक सदै व द िनदश का अ रश: पालन करता िमला. यह
सह है क वहां कसी भी ावधान के उ लंघन पर कड़ सज़ा का ावधान है , पर ऐसा तो
हमारे यहां भी है . ले कन अंतर यह क हमारे यहां हम जानते ह क सज़ा िमलना िनयम
नह ं अपवाद है , और जो जतना बड़ा है उतना ह वह अपने को तमाम यव थाओं से
ऊपर मानता है , जब क अमर का म जो भी यव था है , वह सबके िलए है . इस कारण
आम जीवन बहत
ु सुगम हो गया है . ले कन यह ं यह बताना भी आव यक समझता हंू क
एक तो अमर क समाज म अनाव यक िनषेध नह ं ह, जैसे क हमारे यहां ह. हम तो
हर कह ं ‘फोटो ाफ मना है ’ क त ती लटका दे ते ह. दसरे
ू , वह समाज अगर िनषेध को
ज़ र समझता है, उसे लागू करता है तो उसके िलए वक प भी सुलभ कराता है . अब
धू पान को ह ली जए. अिधकांश जगह पर धू पान िन ष रहता है . ले कन यव था
के िनयंता यह भी जानते ह क लोग धू पान करगे, तो वे ऐसे थान भी िन द करते ह
जहां जाकर धू पान कया जा सकता है . या क कचरा फकने क बात को ह ली जए.
आदमी है तो कचरा भी होगा. वे लोग जगह-जगह कचरा पा उपल ध कराते ह. या
वा ज़ब दरू पर शौचालय (और वे भी िनतांत साफ-सुथरे ) सुलभ कराते ह. फर भला
ग दगी य हो? हम ऐसा नह ं करते. हम िलख तो दगे क ‘ग दगी करना मना है’,
ले कन यह नह ं सोचगे क केला खाने वाला उसका िछलका डालेगा कहां, या क अगर कोई
दो घ टे से बाज़ार म घूम रहा है तो वह कहां जाकर अपनी हाजत रफा करे गा? पान
खाना ह द ु तानी क आदत है , हम िलख दे ते ह-‘कृ पया पीक यहां न थूक’. या यह
पया है ? यह तो कोई नह ं बताता क यहां न थूक तो कहां थूक? ग दगी तो होनी ह है ,
और या होना है िनषेध का उ लंघन! या दोन !

एक बहत
ु आ य क कंतु मह वपूण बात यह क औसत अमर क जीवन म भरपूर
ईमानदार और नैितकता है . यह कहते हए
ु म और भी अिधक आ य के साथ अमर क
राजनीित और सरकार को अपनी शंसा के दायरे से बाहर रख रहा हंू . मुझे अनुभव हआ

क आम नाग रक खासा नैितक और ईमानदार है . आप बड़ से बड़ मॉल म चले जाएं,
कताब क दकान
ु म चले जाएं - कोई आपको स दे ह क िनगाह से नह ं घूरता, य क
वह सोचता ह नह ं क आप चोर कर भी सकते ह. यापार जस तरह बना कोई हल
हु ज़त कये बका हआ
ु माल वापस ले लेता है , या नेट आधा रत यापार वहां जस तरह
पनप रहा है - वह एक नैितक समाज म ह स भव है . एक छोटे -से रे टोरे ट क
नैितकता क चचा म इस पु तक म कर चुका हंू . एक और ज़ यहां क ं . जस शहर
रे डम ड शहर म हम रह रहे थे, वहां हमार ह क यूिनट (भारतीय अिभ य -कॉलोनी) म
एक ब डर ने कुछ मकान बनाये थे. उनक नुमाइश थी. पूणत: सुस जत मकान, ऐसा
लगे क जैसे इनम कोई रह रहा है , और अभी-अभी बाहर गया है . ज, ट वी, क यूटर,
रसोई का सामान, पद, कताब, खलौने - यािन वह सब कुछ जो एक बसे हए
ु घर म होता
है . इसिलए क आप दे ख कर क पना कर सक क पूर तरह सुस जत होने पर यह घर
कैसा लगेगा. यह तो था माक टं ग का एक उ दा नमूना. आ य क बात यह क इस
सबक चौक दार के िलए कोई नह ं. आदमी तो दरू, ऐसे भरे-पूरे घर के बाहर ताला भी
नह ं. आपको दे खना है, कु डा खोिलए, अ दर जाइए, अ छ तरह दे खए, बाहर आइए, कु डा
लगाइए, बस! कसी को यह भय नह ं क ऐसे तो घ टे दो घ टे म घर का सूपड़ा ह साफ
हो जाएगा. होता ह नह ं. बना बल के या दो न बर के यापार क अवधारणा अमर का
म नह ं है . आजकल सॉ टवेयर का ज़माना है , और यह दे ख-जान कर आ य होता है क
वहां पायरे सी बहत
ु ह कम है . इसके वपर त हमारे दे श म पायरे सी को उिचत ठहराने के
िलए भी तक़ गढ़े जाते ह (जैसे यह क सॉ टवेयर बहत
ु महं गे ह). इन अ छ बात का

े इस बात को दया जा सकता है क अमर का म इन सबके िलये समुिचत कानूनी
ावधान ह. ह तो हमारे यहां भी, पर लागू वे केवल अ कंचनजन पर ह होते ह, और
अ कंचन भी मौका लगते ह वी आई पी क जमात म शर क होकर तमाम कानून -
िनयम से ऊपर उठ जाना चाहता है . इसके वपर त अमर का म, एक सीिमत अथ म,
कोई वग भेद नह ं है . कानून क िनगाह म सब समान ह. इसिलए, चाहे तो आप कह ल
क कानून के भय से, यव था को बहत
ु ह कम तोड़ा जाता है . वैसे भी, आम नाग रक के
मन म भरपूर नाग रक बोध है . यह नाग रक बोध केवल ड डे के बल से स भव नह ं है .
इसके मूल म िश ा और सं कार भी ह. दभा
ु य यह क हमारे यहां सं कार का गुणगान
तो खूब कया जाता है , पालन करने क कतई िचंता नह ं क जाती. गड़बड़ हमारे सं कार
और पर पराओं म भी है . मुझे ह रशंकर परसाई क एक ट पणी याद आती है . उ ह ने
िलखा था क जस दे श म पर ा दे ने जाता हआ
ु बालक हनुमान जी के म दर के
सामने क कर यह कहता है क हे भगवान, अगर तुम मुझे पास कर दोगे तो म तु ह
सवा पये का साद चढ़ाउं गा, उस दे श म भला ाचार कैसे ख म हो सकता है ? इसी
तरह मुझे तो यह बात भी गड़बड लगती है क आप कसी प व नद म नान कर तो
आपके पाप धुल जाएंगे. राज थान के एक िस दे वता, एक धम वशेष के पालक के
यापार म ह सेदार होते ह. भ का खयाल है क भगवान को ह सेदार बनाने से
उनके यापार म बरकत होती है . इस तरह भगवान नैितक, अनैितक दोन ह यापार म
शर क हो जाते ह. अनैितक यापार पर भी उनक मुहर लग जाती है . िश ा के नाम पर
भी हमने सं कार दे ने क कोई चे ा नह ं क . अगर क होती तो आज जो मू यह नता
और सं कार वह नता दखाई दे ती है , वह कुछ तो कम होती. हमने तो िश ा का अथ
सूचना दे ने तक सीिमत कर रखा है . अगर नैितक या इसी तरह क श दाविल के अंतगत
कुछ पाठ पढ़ाए भी जाते ह तो वे वपर त बा प रवेश के कारण अ भावी रहते ह.

इसी के साथ म अमर का म व मान काय सं कृ ित क भी चचा करना चाहता हंू . मुझे
तो वहां हर आदमी भरपूर िन ा से काम करता िमला. लगा क वह जो भी काम कर रहा
है , मन से कर रहा है , उसका आन द ले रहा है . उसे बेगार क तरह, ववशता म नह ं कर
रहा है . अब कुछ लोग इसे पूंजीवाद क दे न भी कहते ह. आपके सर पर हमेशा तलवार
लटक रहती है . थाई नौकर जैसा कुछ भी नह ं है . मेरे पाठक ह सोच, अगर कसी से
यह अपे ा क जाती है क वह अपना काम ठ क से करे तो इसम बुरा या है? फर, वहां
अगर काम न करने या खराब तरह से करने पर द ड का ावधान है तो अ छे काम के
िलए पुर कार का ावधान भी है . फलत: यादातर लोग बेहतर काम करने के िलए
य रत रहते ह. इस काय सं कृ ित से नाग रक जीवन बहत
ु सुखद हो जाता है . आपको
अपना काम कराने के िलए कसी के आगे िगड़िगड़ाना नह ं पड़ता, इधर से उधर च कर
नह ं लगाने पड़ते, छोट -सी बात के िलए बड़ -सी िसफा रश का जुगाड़ नह ं करना पड़ता.
व तुत: भारत म हम इन थितय पर दो िभ न य से बात करते ह. जब हम
काम करने वाले क से बात करते ह तो तमाम तरह क सु वधाओं और सुर ाओं
क अपे ा करते ह. तब हम काम के समय म ह नमाज़ पढ़ने जाने क छूट भी ज़ र
लगती है , दे र से आने और ज द जाने क अ सर ज़ रत महसूस होती है, काम के समय
म ह दो त - र तेदार से सुद घ गपशप क आव यकता महसूस होती है , अपना काम
दसरे
ू पर और आज का काम कल पर टालने म कोई संकोच नह ं होता है . ले कन जब
हम काम करवाने वाले क नज़र से दे खते ह तो एकदम मुक मल सेवा क अपे ा
करते ह. तब हम सामने वाले को वा ज़ब छूट तक नह ं दे ना चाहते, उसक सीमाओं को
भी नह ं समझना चाहते. इस दोहरे मापद ड का एक मज़ेदार उदाहरण इस बात म दे खा
जा सकता है क वे सरकार कमचार भी, जो बना र त िलए एक ितनका भी इधर से
उधर नह ं करते, इस बात पर यापा करते िमल जाते ह क टे ट इं योरस या जी पी
एफ महकम म बना र त कोई काम नह ं होता. एक और मज़ेदार बात यह भी क
हमारा धम और हमार महान सं कृ ित हम क़तई े रत या बा य नह ं करते क हम
अपना काम ईमानदार और िन ा से कर. माथे पर ल बा ितलक लगाए, हाथ म मोटे -
मोटे कलावे बांध,े िनयम से नमाज़ अदा करने वाले कामचोर, हरामखोर, बेईमान ,
ाचा रय को ढंू ढने के िलए आपको मश कत नह ं करनी पड़े गी. एक ढंू ढो हज़ार िमल
जाएंगे. आप दिनया
ु के कई हवाई अ ड को दे खने-अनुभव करने के बाद जब द ली या
मु बई के हवाई अ डे पर आते ह तो काय सं कृ ित का अंतर बहत
ु खरता से महसूस
करते ह. हरामखोर के ित सहानुभूित रखने वाले इसे गर बी से जोड़ते ह. िन य ह
भारत म गर बी है , कम वेतन, कम सु वधाएं ह. पर यह एकमा कारण होता तो कम से
कम ऊंचा और अ छा वेतन वाले तो कमठ होते.

ऐसी ह और बहत
ु सार बात ह, जनका अनुभव कदम-कदम पर होता है . वहां था तो
लगता, काश भारत म भी ऐसा ह होता. मन म यह सवाल भी उठता क आ खर य जो
अ छाई अमर का म है , भारत म नह ं है . इस सवाल का एक उ र इस बात म भी है क
अमर का क आज़ाद हमार आज़ाद से बहत
ु पुरानी है . दोन दे श क तुलना करते हए

इस बात को नह ं भूलना चा हए. दे श का च र एक दन म नह ं बन जाता. व त लगता
है . ले कन दे खना यह होगा क या हम सह दशा म बढ़ रहे ह? गित बाद क बात है .

ले कन ऐसा क़तई नह ं है क अमर का म रहते हए


ु मुझे भारत क किमयां ह याद आती
रह ं. सच तो यह है वहां के जीवन म बहुत कुछ ऐसा है जसे कसी भी भारतीय के िलए
पचा पाना क ठन है . इस तथाकिथत उ नत समाज म जो घोर य वा दता है अकेले
वह हमारे भारत को उस दे श से बेहतर िस करने को पया है . लगता है जैसे हर य
एक वतं और िनरपे इकाई है . अपने प रवेश से एकदम अस पृ . अपने िसवा कसी
क कोई परवाह नह ं. लोक यवहार म ये लोग भले ह भरपूर शालीन ह , पार प रक
यवहार के मामले म एकदम ठ डे ह. प रवार म हर एक बस अपनी परवाह करता पाया
जाता है .अपने िसवा कसी और के िलए सुई भर ज़मीन भी छोड़ने को कोई तैयार नह ं
है . यह कारण है क वहां शा दयां द घजीवी नह ं होती. य के अकेलेपन से जतनी
सम याएं हो सकती ह, वे सब वहां ह. वे लोग पालतू पशुओं पर अपना पैसा, यार और
यान लुटाते ह, पर प रवारजन के िलए उनके पास कुछ भी नह ं है . इसके िलए उनके
पास तक भी यह है क पालतू पशु कोई अपे ा नह ं रखते. यािन जो अपे ा रखते ह
उनके िलए उनके पास कुछ नह ं है . हम लोग तो यह मानते ह क यह सृ ह पर पर
आदान- दान पर टक है . आपसी सहयोग के कारण ज़ दगी कतनी खूबसूरत बन जाती
है , यह हम हर रोज़ अनुभव करते ह, अमर क समाज म यह पार प रकता नह ं है . उन
लोग को जैसे प बन कर रहना पस द है . अमर क अखबार म पाठक के प म जो
सम याएं उठाई जाती ह वे इस समाज का एक ऐसा चेहरा तुत करती ह जो ई या का
नह ं दया का पा लगता है . ये प ह यह दशाते ह क यह समाज कतना एकलसुरा है .
उस व त लगता है क सार बात के बावज़ूद भारतीय समाज कतना समृ है !

अमर क समाज पूंजीवाद समाज है .हर आदमी आपा-धापी म फंसा नज़र आता है . एक
यावसाियक, औ ोिगक, अथ क त समाज जैसा हो सकता है , वैसा ह वह समाज है . हर
आदमी पैसा कमने क धुन म, और यादा अमीर हो जाने क धुन म कुछ इस तरह डू बा
हआ
ु क उसे अपने आस-पास का भी कोई भान नह ं. पास के पौधे पर नया फूल खला
है , यह कसे दखाई दे ता है ? काम के अपने तनाव. काम छूट जाने क तलवार सदा सर
पर लटक हई
ु . काम का दबाव ऐसा क नस अब तड़क , क अब तड़क . और इस तनाव
से मु के िलए फर कसम- कसम के यावसाियक नु खे, ज हे खर दने के िलये काम
म और अिधक डू बना ज़ र . एक वकट दु ! उ नत जीवन तर के िनवाह क
आकां ा, और उस आकां ा क पूित के िलए पित-प ी दोन का बैल क जोड़ क
मािन द काम म जुटना अप रहाय. इसिलए पहले तो प रवार क वृ थिगत, और जब
लगे क इस बात को टाला नह ं जा सकता, तो आ गए िशशु के िलए दोन म से कसी
के पास भी व त नह ं. कुल िमलाकर एक ऐसे समाज क त वीर जसे दे ख कर दया भी
आए, गु सा भी!

भारत म लोग वदे शी, वशेषत: अमर क माल के िलए लालाियत रहते ह. ले कन
अमर क बाज़ार म घूम कर और वहां िमलने वाले माल क एक पता दे खकर भयंकर
िनराशा होती है . व तुत: अमर का म मानवीय म क बड़ कमी है . इसका एक वक प
उन लोग ने आउट सोिस स के प म खोजा है , ले कन इस अवधारणा के चलन से
पहले वे लोग एक- पी मास ोड शन ारा अपनी इस सम या से िनजात पाने क चे ा
करते रहे ह. भारत म उ पाद म जस तरह का वै व य िमलता है वह अमर का म
क पनातीत है . हमारे यहां तो दे श क बात तो छो ड़ए, एक ह शहर के भी अलग-अलग
े म अलग-अलग तरह क चीज़ िमल जाती ह. इसके वपर त अमर का के एक से
दसरे
ू छोर तक हू -ब-हू एक ह तरह के उ पाद का िमलना वहां के बाज़ार क दयनीय
द र ता का प रचायक है . न केवल उ पाद, ब क खा पदाथ - यंजन तक म यह उबाऊ
एक पता दे खने को िमलती है . वहां तो ख
ं लाओं (Chains) क अवधारणा आम है, और
उनक खािसयत ह यह एक पता है . और इस कारण आप चाहे पूव अमर का म ह या
प मी अमर का म, उ र म ह या द ण म आपको हर जगह मैकडोन स, प ज़ा हट,
फेट बगर,के एफ सी, सबवे, टारब स िमलगे और यह दावा कया जाएगा क उनका वाद
मानक वाद है , और यह दावा एकदम सच होगा. कहना अनाव यक है , इस कारण
मानवीय पश तो लु ह हो जाता है .

एक सवाल मुझे बहत


ु परे शान करता रहा है . इसका कोई उ र म नह ं खोज पाया हंू .
शायद आप कोई मदद कर सक. सवाल यह है क जस दे श के नाग रक इतने अ छे ह,
वह दे श खुद य अ छा नह ं है ? दे श से मेरा आशय उस अमर का से है जसके बारे म,
जसक अंतरा ीय भूिमका और छ व के बारे म कुछ भी कहना अनाव यक है . है न
मु कल गु थी! एक उ र यह हो सकता है क यह दोष तो पूंजीवाद म अंतिन हत है .
मेरा सवाल है , वैसी थित म नाग रक को भी तो पूंजीवाद से भा वत होना चा हए! मुझे
ऐसा महसूस नह ं हआ
ु . आप या सोचते ह?

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24 नव बर 1945, उदयपुर (राज थान).

एम.ए. ह द , पीएच.ड .

36 वष राज थान के विभ न महा व ालय म अ यापन एवं शासन के बाद राज थान
सरकार के कॉलेज िश ा िनदे शालय म संयु िनदे शक के पद से सेवा िनवृ .

अब अपनी मज़ का िलखना-पढ़ना.

सा ह यालोचन म वशेष िच, साथ ह विभ न वषय पर िनयिमत लेखन.

लगभग दस पु तक कािशत.

ह द क सभी मुख प -प काओं म काशन.

आकाशवाणी और दरदशन
ू से भी िनयिमत सारण.

अं ेज़ी से अनेक रचनाओं के ह द अनुवाद.

तीन वदे श या ाएं.

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