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मह भटनागर का क वता सं ह –

नई चेतना

-भा षक क व — ह द और अं ेज़ी।

सन ्१९४१ के लगभग अंत से का य-रचना आर भ। तब क व (प ह


वष य) ' व टो रया कॉलेज, वािलयर' म इं टरमी डएट ( थम वष) का
छा था। स भवतः थम क वता 'सुख-दख
ु ' है ; जो वा षक प का
' व टो रया कॉलेज मेगज़ीन' के कसी अंक म छपी थी। व तुतः थम
कािशत क वता 'हंु कार' है ; जो ' वशाल भारत' (कलक ा) के माच
१९४४ के अंक म कािशत हई।

लगभग छह वष क का य-रचना का प र े य वतं ता-पूव भारत;


शेष वातं यो र।
ह द क त कालीन तीन का य-धाराओं से स पृ — रा ीय का य-
धारा, उ र छायावाद गीित-का य, गितवाद क वता।

समाजािथक-रा ीय-राजनीितक चेतना-स प न रचनाकार।

सन ्१९४६ से गितवाद का या दोलन से स य प से स ब । 'हं स'


(बनारस / इलाहाबाद) म क वताओं का काशन। तदपरा
ु तअ य
जनवाद -वाम प काओं म भी। गितशील ह द क वता के तीय
उ थान के चिचत ह ता र।

सन ्१९४९ से का य-कृ ितय का मशः काशन।

गितशील मानवतावाद क व के प म ित त। समाजािथक यथाथ


के अित र अ य मुख का य- वषय — ेम, कृ ित, जीवन-दशन। दद
क गहन अनुभूितय के समा तर जीवन और जगत के ित
आ थावान क व। अद य जजी वषा एवं आशा- व ास के अ त
ु -
अक प वर के सजक।

का य-िश प के ित वशेष प से जाग क।


छं दब और मु -छं द दोन म का य-सॄ । छं द-मु ग ा मक क वता
अ य प। मु -छं द क रचनाएँ भी मा क छं द से अनुशािसत।

का य-भाषा म त सम श द के अित र त व व दे शज श द एवं


अरबी-फ़ारसी (उद)ू , अं ेज़ी आ द के चिलत श द का चुर योग।

सव ांजल अिभ य । ल णा- यंजना भी द ु ह नह ं। सहज का य


के पुर कता। सीिमत संग-गभ व।

वचार -भाव को धानता। क वता क अ तव तु के ित सजग।

२६ जून १९२६ को ातः ६ बजे झाँसी (उ. .) म, ननसार म, ज म।

ार भक िश ा झाँसी, मुरार ( वािलयर), सबलगढ़ (मुरैना) म।


शासक य व ालय, मुरार ( वािलयर) से मै क (सन ्१९४१), व टो रया
कॉलेज, वािलयर (स ४१-४२) और माधव महा व ालय, उ जैन
(स ्४२-४३) से इं टरमी डएट (सन ्१९४३), व टो रया कॉलेज, वािलयर
से बी. ए. (सन ्१९४५), नागपुर व व ालय से सन ्१९४८ म एम. ए.
( ह द ) और सन ्१९५७ म 'सम यामूलक उप यासकार ेमचंद'
वषय पर पी-एच. ड .

जुलाई १९४५ से अ यापन-काय — उ जैन, दे वास, धार, दितया, इं दौर,


वािलयर, महू, मंदसौर म।
'कमलाराजा क या नातको र महा व ालय, वािलयर (जीवाजी
व व ालय, वािलयर) से १ जुलाई १९८४ को ोफ़ेसर-अ य पद से
सेवािनवृ ।

काय े : च बल-अंचल, मालवा, बुंदेलखंड।

स ित शोध-िनदशक — ह द भाषा एवं सा ह य।

अिधकांश सा ह य 'मह भटनागर-सम ' के छह-खंड म एवं


का य-सृ 'मह भटनागर क क वता-गंगा' के तीन खंड म
कािशत।

स पक :

डा. मह भटनागर

सजना-भवन, ११० बलव तनगर, गांधी रोड, वािलयर — ४७४ ००२ [म.
.]

फ़ोन : ०७५१-४०९२९०८ / मो. ९८ ९३४ ०९७९३

E-Mail : drmahendra02@gmail.com

drmahendrabh@rediffmail.com
*********

'मह भटनागर क क वता-गंगा'

खंड : १

१ तार के गीत

२ वहान

३ अ तराल

४ अिभयान

५ बदलता युग


६ टटती शृंखलाएँ

खंड : २

७ नयी चेतना

८ मधु रमा
९ जजी वषा

१० संतरण

११ संवत

खंड : ३

१२ संक प

१३ जूझते हए

१४ जीने के िलए

१५ आहत युग

१६ अनुभूत- ण

१७ मृ यु-बोध : जीवन-बोध

१८ राग-संवेदन

ितिनिध संकलन

१९ गीित-संगीित [ ितिनिध गेय गीत]

२० मह भटनागर क क वता-या ा [ ितिनिध क वताएँ]


मू यांकन / शोध

[१] मह भटनागर क का य-संवेदना : अ तःअनुशासनीय आकलन

डा. वीर िसंह (जयपुर)

[२] क व मह भटनागर का रचना-कम

डा. करणशंकर साद (दरभंगा)

[३] डा. मह भटनागर क का य-साधना

ममता िम ा ( व.)

[४] मह भटनागर क क वता : परख और पहचान

सं. डा. पा डे य शिशभूषण 'शीतांशु' (अमृतसर)

[५] डा. मह भटनागर क का य-सृ

सं. डा. रामसजन पा डे य (रोहतक)


[६] डा. मह भटनागर का क व य व

सं. डा. र व रं जन (है दराबाद)

[७] सामा जक चेतना के िश पी : क व मह भटनागर

सं. डा. ह रचरण शमा (जयपुर)

[८] क व मह भटनागर का रचना-संसार

सं. डा. वनयमोहन शमा ( व.)

[९] क व मह भटनागर : सृजन और मू यांकन

डा. दगा
ु साद झाला (शाजापुर)

[१०] मह भटनागर क सजनशीलता (शोध / नागपुर व.)

डा. वनीता मानेकर (ितरोड़ा-भंडारा / महारा )

[११] गितवाद क व मह भटनागर : अनुभूित और अिभ य /

(शोध / जीवाजी व., वािलयर)

डा. माधुर शु ला ( व.)


[१२] मह भटनागर के का य का वैचा रक एवं संवेदना मक धरातल

(शोध / स बलपुर व., उड़ सा)

डा. रजत कुमार षड़ं गी (कोरापुट-उड ़सा)

[१३] डा. मह भटनागर : य व और कृ ित व (शोध / कनाटक व.)

डा. मंगलोर अ दलरज़ाक


ु बाबुसाब (गदग-कनाटक)

[१४] डा. मह भटनागर के का य का नव- वछं दतावाद मू यांकन

(शोध / दयालबाग ड ड व., आगरा)

डा. क वता शमा (आगरा)

[१५] डा. मह भटनागर के का य म सां कृ ितक चेतना

(शोध / कानपुर व.)

डा. अलका रानी (क नौज)

[१६] मह भटनागर के का य म युग-बोध

(शोध / लिलतनारायण व., दरभंगा)


डा. मीना गामी (दरभंगा)

********

CRITICAL STUDY OF MAHENDRA BHATNAGAR'S


POETRY

[1]The Poetry of Mahendra Bhatnagar :

Realistic & Visionary Aspects

Ed. Dr. O.P. Budholia

[2]Living Through Challenges :

A Study of Dr.Mahendra Bhatnagar's Poetry

By Dr. B.C. Dwivedy.

[3] Poet Dr. Mahendra Bhatnagar :

His Mind And Art / (In Eng. & French)

Ed. Dr. S.C. Dwivedi & Dr. Shubha Dwivedi

Works :
Forty Poems of Mahendra Bhatnagar
After The Forty Poems

Exuberance and other poems

Dr. Mahendra Bhatnagar's Poetry

Death-Perception : Life-Perception

Poems : For A Better World

Passion and Compassion

Lyric-Lute

A Handful of Light

Dawn to Dusk

Translations :
In French :

A Modern Indian Poet : Dr. Mahendra

Bhatnagar : UN POÈTE INDIEN ET

MODERNE / Tr. Mrs. Purnima Ray

In Tamil : Kaalan Maarum,

Mahendra Bhatnagarin Kavithaigal.

In Telugu : Deepanni Veliginchu.

In Kannad & In Bangla :

Mrityu-Bodh : Jeewan-Bodh.
In Marathi : Samkalp Aaani Anaya Kavita

In Oriya : Kala-Sadhna.

In Malyalam, Gujrati, Manipuri, Urdu.

In Czech, Japanese, Nepali,

******

Links :
HINDI
www.blogbud.com/author 5652

ENGLISH-FRENCH
www.poetrypoem.com/mpb1

ENGLISH
(1) www.poetrypoem.com/mpb2
[Selected Poems 1,2,3]
(2) www.poetrypoem.com/mpb4
[‘Exuberance and other poems’ /

‘Poems : For A Better World /


Passion and Compassion]
(3) www.poetrypoem.com/mpb3
[‘Death-Perception : Life-Perception’ /

‘A Handful Of Light’]
(4) www.poetrypoem.com/mpb
[‘Lyric-Lute’]

(5)www.anindianenglishpoet.blogspot.com
[‘…A Study Of Dr. Mahendra Bhatnagar’s Poetry’]
(6)www.mahendrabhatnagar.blogspot.com
[ Critics & Mahendra Bhatnagar’s Poetry]

तुित : डा. शालीन कुमार िसंह, बदायूँ [उ. .]

नई चेतना

-डॉ. मह भटनागर

क वताएँ
’ 1 बजिलयाँ िगरने नह ं दगे ! ’

’ 2 ललकार ’

’ 3 आजाद का योहार ’

’ 4 अपरा जत ’
’ 5 चेतना ’

’ 6 काटो धान ’

’ 7 रोक न पाओगे ’

’ 8 जागते रहगे ’

’ 9 नया इं सान ’

’ 10 आँधी ’

’ 11 झंझावात ’

’ 12 नव-िनमाण ’

’ 13 ज दगी का कारवाँ ’

’ 14 बढ़ते चलो ’

’ 15 नये इं सान से तट थ-वग ’

’ 16 नयी दशा ’

’ 17 पर परा ’

’ 18 ग त य ’

’ 19 या हआ
ु ’

’ 20 दरू खेत पार ’


’ 21 युग और क व ’

’ 22 व ास ’

’ 23 आ त ’

’ 24 द पक जलाओ ’

’ 25 आभास होता है ’

’ 26 आज दे खा है ’

’ 27 मुझे भरोसा है ’

’ 28 मुख को िछपाती रह ’

’ 29 नया समाज ’

’ 30 युगा तर ’

’ 31 छलना ’

’ 32 मत कहो ’

’ 33 नया युग ’

’ 34 पदचाप ’

’ 35 भोर का आ ान ’

’ 36 िनरापद ’
’ 37 सु खयाँ िनहार लो ’

’ 38 युग-प रवतन ’

’ 39 नयी सं कृ ित ’

’ 40 गंगा बहाओ ’

’ 41 नयी रे खाएँ ’

’ 42 भ व य के िनमाताओं ’

’ 43 मेघ-गीत ’

’ 44 बरगद ’

’ 45 क व ’

-----

(1) बजिलयाँ िगरने नह ं दगे!

कुछ लोग

चाहे ज़ोर से कतना

बजाएँ यु का डं का

पर, हम कभी भी
शांित का झंडा

ज़रा झुकने नह ं दगे !

हम कभी भी

शांित क आवाज़ को

दबने नह ं दगे !

य क हम

इितहास के आर भ से

इं सािनयत म,

शांित म

व ास रखते ह,

गौतम और गांधी को

दय के पास रखते ह !

कसी को भी सताना

पाप सचमुच म समझते ह,

नह ं हम यथ म पथ म

कसी से जा उलझते ह !

हमारे पास केवल


व -मै ी का

पर पर यार का संदेश है ,

हमारा नेह -

पी ड़त व त दिनया
ु के िलए

अवशेष है !

हमारे हाथ -

िगरत को उठाएंगे,

हज़ार

मूक, बंद , त, नत,

भयभीत, घायल औरत को

दानव के ू र पंज से बचाएंगे !

हम नादान ब च क हँ सी

लगती बड़ यार ;

हम लगती

कसान के

गड़ रय के

गल से गीत क क ड़याँ
मनोहार !

खुशी के गीत गाते इन गल म

हम

कराह और आह को

कभी जाने नह ं दगे !

हँ सी पर ख़ून के छ ंटे

कभी पड़ने नह ं दगे !

नये इं सान के मासूम सपन पर

कभी भी बजिलयाँ िगरने नह ं दगे !

1950

(2) ललकार

शैतान के सा ा य म तूफ़ान आया है ,

जो ज़ दगी को मु का पैग़ाम लाया है !

इं सान क तक़द र को बदलो,

भयभीत हर त वीर को बदलो,

हमारे संग ठत बल क यह ललकार है !

मासूम लाश पर खड़ा सा ा य हलता है ,


तम चीर कर जन-श का सूरज िनकलता है ,

च टान जैसे हाथ उठते ह

फ़ौलाद से ढ़ हाथ उठते ह

अमन के श ु से जो छ नते हिथयार ह !

हमारे संग ठत बल क यह ललकार है !

लो क गया र म खर सैलाब का पानी,

अब दरू होगी आदमी क हर परे शानी !

सूखी लताएँ लहलहाती ह,

नव- योित सागर म नहाती ह,

खुशी के मेघ छाये ह, बरसता यार है !

हमारे संग ठत बल क यह ललकार है !

1951

(3) आज़ाद का योहार

ल जा ढकने को

मेर खरगोश सर खी भोली प ी के पास

नह ं ह व ,
क जसका रोना सुनता हँू सव !

घर म, बाहर,

सोते-जगते

मेर आँख के आगे

फर- फर जाते ह

वे दो गंगाजल जैसे िनमल आँसू

जो उस दन तुमने

मैले आँचल से प छ िलए थे !

मेरे दोन छोटे

मूक खलौन -से द ु बल ब चे

जनके तन पर गो त नह ं है ,

जनके मुख पर र नह ं है ,

अभी-अभी लड़कर सोये ह,


रोट के टकड़े पर,

य द व ास नह ं हो तो

अब भी

तुम उनक ल बी िससक सुन सकते हो

जो वे सोते म

रह-रह कर भर लेते ह !
जनको वषा क ठं ड रात म

म उर से िचपका लेता हँू,

तूफ़ान के अंधड़ म

बाह म दबका
ु लेता हँू !

य क, नये युग के सपन क ये त वीर ह !

बंजर धरती पर

अंकुर उगते धीरे -धीरे ह !

इनक र ा को

आज़ाद का योहार मनाता हँू !

ू छ जे पर
अपने िगरते घर के टटे

कज़ा लेकर

आज़ाद के द प जलाता हँू !

अपने सूखे अधर से

आज़ाद के गाने गाता हँू !

य क, मुझे आज़ाद बेहद यार है !

मने अपने हाथ से

इसक सींची फुलवार है !


पर, सावधान ! लोभी िग द !

य द तुमने इसके फल-फूल पर

अपनी गड़ाई,

तो फर

करनी होगी आज़ाद क

फर से और लड़ाई !

1951

(4) अपरा जत

हो नह ं सकती परा जत युग-जवानी !

संग ठत जन-चेतना को,

नव-सृजन क कामना को,

स वहारा-वग क युग -

युग पुरानी साधना को,

आदमी के सुख-सपन को,

शांित के आशा-भवन को,

और ऊषा क ललाई

से भरे जीवन-गगन को,


मेटने वाली सुनी है या कहानी ?

पैर इ पाती कड़े जो

आँिधय से जा लड़े जो,

हल न पाये एक पग भी

पवत से ढ़ खड़े जो,

श ु को ललकारते ह,

जूझते ह, मारते ह,

व केर कत य पर जो

ज़ दगी को वारते ह,

कब िशिथल होती, खर उनक रवानी !

श का आ ान करती,

ाण म उ साह भरती,

सुन जसे दबल


ु मनुज क

शान से छाती उभरती,

जो ितिमर म पथ बताती,

हर दशा म गूँज जाती,

ांित का संदेश नूतन


जा िसतार को सुनाती,

बंद हो सकती नह ं जन- ाण-वाणी !

1951

(5) चेतना

हर दशा म जल उठ वाला नयी,

लािलमा जीवन-जगत पर छा गयी !

है नयी पदचाप से गुं जत मह ,

योित अिभनव हर करण बखरा रह !

िछ न स दय का अंधेरा हो गया,

राह पर जगमग सबेरा है नया !

यह वगत युग का न कोई साज़ है ,

प ह बदला धरा ने आज है !

वग-भेद को िमटाने चेतना

कर रह सामा य क आराधना !
काल बदला और बदली स यता,

दे रह नव फूल सं कृ ित क लता !

फूल वे जनम मधुर सौरभ भरा,

मुसकराती पा ज ह भू-उवरा !

वाथ, शोषण क इमारत ढह रह ,

ू पर सृजन-स र बह रह !
भ न ढह

शीत के लघु-ताप से िसकुड़े हओं


ु ,

पास आता जा रहा ' यूरो िसवो' !

धूप से झुलसे हए
ु 'होर ' कृ षक

आ रह 'जल क हवा' जीवन-जनक !

उर लगाले जीण 'धिनया'-दे ह को

(रोक ले रे ! छलछलाते नेह को !)

आज तो आकाश अपना हो गया,


आदमी का, स य सपना हो गया !

1948

(6) काटो धान

काटो धान, काटो धान,

काटो धान !

सारे खेत

दे खो दरू तक कतने भरे ,

कतने भरे / पूरे भरे !

िघर लहलहाते ह

न फूले रे समाते ह !

हवा म िमल

कुसुम-से खल

उठो, आओ,

चलो, इन जी ण कु टय से

बुलाता है तु ह, साथी !

खुला मैदान !

जब हम-नद का चू पड़ा था जल
अनेक धार म चंचल,

हमालय से

बहायी जो गयी थी धूल

उसम आज खलते रे िमक !

तेरे पसीने से िसँचे

ित पेड़ क हर डाल म

िसत, लाल, पीले, फूल !

जीन के िलए दे ती तु ह

ओ ! आज भू माता

सहज वरदान !

आकाश म जब िघर गये थे

मॉनसूनी घन सघन काले,

दय सूखे हए

तब आश-रस से भर गये थे

झूम मतवाले !

कसी

सु दर, सलोनी, व थ, कोमल, मधु

कशोर के नयन
कुछ मूक भाषा म

नयी आभा सजाए जगमगाए ेत-कजरारे !

हए
ु साकार

भाव से भरे

अिभनव सरल जीवन िलए,

नूतन जगत के गान !

जो सृ के िनमाण हत बोए

तु हार साधना ने बीज थे

वे प ल वत !

सपने पलक क छाँह म

पा चाह

शीतल यो ना क गोद म खेले !

(अर इन डािलय को बाँह म ले ले !)

उठो !

क या-कुमार से अ खल कैलाश के वासी

सुनो, गूँजी नयी झंकार !

ह षत हो उठो !

प रवार सारे गाँव के

दे खो क िच त हो रहे अरमान !

ू दाँत / सूखे केश,


टटे
मुख पर

झु रय क वह सहज मुसकान,

मु दत मु ध

फैला व म सौरभ

महकता नभ,

सजग हो आज

मेर दे श का अिभमान !

1948

(7) रोक न पाओगे

जग म आज सुनायी दे ती आवाज़ नयी,

जसक ित विन भू के कण-कण म गूँज गयी !

समझ गये शो षत-पी ड़त जसका अथ सभी,

अब तो जन-श - वपथ के साधन यथ सभी !

मूक जन को आज िगरा का वरदान िमला,

मजीवी-जन को अपना यारा गान िमला,


युग-युग क अव उपे त नव-राह खुली,

जन-पथ के सब ार खुले, जग-जनता िनकली !

वजयी घोष से फट-फट पड़ती है तुरह ,

काँप रहा है आज गगन, काँपी आज मह !

वशृख
ं ल; वग क िनिमत सार क ड़याँ,

दे श-काल क अब सीमा िमटने क घ ड़याँ !

नक़ली द वार ! नह ं केगी नयी हवा ,

बस, कर दो राह क बचने क है यह दवा !

जजर सं कृ ित के र क भागो ! आग लगी !

इन अंगार से तो लपट क धार जगी !

इसको और दय से िचपटाना घातक है ,

आस , तु हार ह काया क भ क है !

1948

(8) जागते रहगे

आग बन गया
उपे त का वग ;

क ढह रहा वंचना का दग
ु !

प थर के कोयले धधक उठे ,

लपट मशाल बन

हवा के संग

अंधकार पर हार कर रह !

जगमगा उठ

दिमत युग क रात;

पव है 'नुशरू ' का -

मृतक शर र क फोड़

जागता है नींद छोड़ !

जंगल के पेड़

खड़खड़ा उठे !

ये आँिधयाँ ह

जो कभी उड़ नह ं,

ये बजिलयाँ ह

जो कभी िगर नह ं,
क बदिलयाँ गभीर

जो कभी िघर नह ं !

गरज से कड़कड़ा रहा

दं त पीस ु दग- दग त !

संग ठत समूह क दहाड़ से

नये समाज म

तमाम शोषक के कागज़ी पहाड़

राख हो रहे !

क जड़ समेत सब उखड़

हवा के तामसी महल

सहज म ख़ाक हो रहे !

यह आग है क

बफ़ क तह से दब न पायगी,

क जल क धार से

कभी भी बुझ न पायगी !

जब तलक है

अंधकार शेष इस ज़मीन पर

तब तलक
अमीर खटमल -सा

चूसता रहे गा िनधन का र !

हर गली म

भूत क डरावनी हँ सी

िनराट गूँजती रहे गी

तब तलक !

सु

तर क चादर को छोड़,

ांशु भाल,

ा य श ,

ुव तीित ले

उठा रहा हारना का अ !

है असाँच-गव मृत,

असार

अ तमन, वधुर, वप न ;

अब वभी षका- वभावर

वभास से वभीत पंगला !


नवीन योित का

सश कारवाँ चला,

ू -टट
क िगर रहा है टट ू कर

क़दम-क़दम पर अंधकार !

जागते रहगे हम,

क जब तलक

यह -राह- ार

खुल न जायगा,

यह वग-भेद, जाित- े ष

िमट न जायगा,

हमार धमिनय म

ख़ून खौलता रहे गा

तब तलक !

1949

(9) नया इं सान

आज नया इं सान, पड़ चरण क , तोड़ रहा ज़ंजीर !

उबल उठा है व थ युग क ताक़त का उ माद,

जन-जन के बंद जीवन को करने को आज़ाद,


उजड़े व त घर को फर से करना है आबाद,

आगे बढ़ना है स दय का छाया सघन अंधेरा चीर !

हलते महल क द वार से आती आवाज़,

भय से त क मान हो ह िगरने वाली गाज,

िमटनेवाला है अब जग का शोषक-जीण-समाज,

िन य, अब रह न सकगे दिनया
ु म आदमख़ोर

अमीर !

जन-बल के क़दम क आहट से गूँजा संसार,

दबल
ु बन द ु मन का व दहलता है हर बार,

खुलते जाते अव -पंथ के लो सारे ार,

अब धार नह ं बाक़ , खा ज़ंग गयी

सामंती-शमशीर !

स य खर अब स मुख आया, जीत गया व ास,

वांिछत नवयुग पास क लु हआ


ु पछला आभास,

अब रखनी न सुर त मन म कोई खोयी आस,

दिनया
ु के परदे पर, हर मानव क आज नयी तसवीर !
आज नया इं सान, पड़ चरण क , तोड़ रहा ज़ंजीर !

1950

(10) आँधी

बड़ा शोर करती उठ आज आँधी,

ितज-से- ितज तक िघर आज आँधी !

समु दर जसे दे खकर खल खलाया,

िन खल सृ काँपी लय-भय समाया !

पुराने भवन सब िगरे लड़खड़ाकर,

बड़ तेज़ आयीं हवाएँ हहर कर !

दवाकर कसी का िछपा थाम दामन,

दहलता भयावह बना व -आँगन !

उमड़ता नये जोश म व य-द रया,

लहरता नवल होश म व य-द रया !

केगी न आँधी सर खी जवानी,

बना कर रहे गी नयी ह कहानी !


अस भव क ठहरे कावट पुरानी,

िशिथल हो न पायी कभी भी रवानी !

न रोके केगी बड़ श शाली,

न फ क पड़े गी कभी ोह लाली !

क चील उतरती चली आ रह ह,

अंधेर घटाएँ घुमड़ छा रह ह !

मगर खोल सीना अकेला डगर पर

बढ़ा जा रहा जूझता जो िनर तर,

वह य ढ़ श -युग का त ण है ,

बदलना धरा को क जसक लगन है !

वरोधी कावट िमटाता चला जो,

नद शांित क नव बहाता चला जो,

वह ांित आभास- ा सदा से,


वह व -इितहास- ा सदा से,

उसी क सबल मु लंबी भुजाएँ

नये ख़ून से मोड़ दगी हवाएँ !

1951

(11) झंझावात

पूरब म

नयी जन-चेतना का

आज झंझावात आया है !

अिमट व ास ने

इं सान के उर म,

बड़ा मज़बूत

अपना घर बनाया है !

तभी तो

द ु मन के श शाली दग
ु पर

ोिधत हवाएं

दौड़तीं ललकारतीं

जा जूझ टकरायीं,

क जससे दग
ु के
ाचीर, गु बज, कोट

होते ह धराशायी !

उभरती श जनता क

दबाये अब नह ं दबती,

धधकती ोह क वाला

बुझाये अब नह ं बुझती !

अथक संघष चार ओर

नूतन ज़ दगी का है ,

क नूतन ज़ दगी वह जो

िमटाये िमट नह ं सकती !

गगन को घेर कर

िचनगा रयाँ जसक

चमकती और उड़ती ह,

उसी के ताप से

फ़ौलाद क ढ़ शृख
ं लाएँ

मुड़ती ह !

बड़ गहर घटाएँ

आसमान पर घुमड़ती ह !
न सरकेगी कभी च टान

जस पर उठ रह

दभ
ु नव द वार !

हं सक भे ड़य

नंगे लुटेर क

कह ं नीचे दबी है लाश !

होगी सवहारा-वग क

िन य सुर ा;

य क आया आज पूरब म

नयी जन-चेतना का

ती झंझावात !

1950

(12) नव-िनमाण

म िनंरतर राह नव-िनमाण करता चल रहा हँू

और चलता ह रहँू गा !

राह - जस पर कंटक का

जाल, तम का आवरण है ,
राह - जस पर प थर क

रािश, अित दगम


ु वजन है,

राह - जस पर बह रहा है

टायफ़ूनी- वर- भंजन,

राह - जस पर िगर रहा हम

मौत का जस पर िनमं ण,

म उसी पर तो अकेला द प बनकर जल रहा हँू ,

और जलता ह रहँू गा !

आज जड़ता-पाश, जीवन

ब , घायल युग- वहं गम,

फड़फड़ाता पर, वयं

ाचीर म फँस, जानकर म,

मौन मरघट त धता है

वर हआ
ु है आज कुं ठत,

सामने बीहड़ भयातं कत

दशाएँ कुहर गुं ठत,


व के उजड़े चमन म फूल बनकर खल रहा हँू

और खलता ह रहँू गा !

1948

(13) ज़ दगी का कारवाँ

ज़ दगी का कारवाँ कता नह ं, कता नह ं !

ये णक तूफ़ान तो आते गुज़र जाते,

केश केवल कुछ हवा म उड़ बखर जाते !

पर, सतत गितमय क़दम इंसान के कब डगमगाये ?

और ताक़त से इसी ण पैर जनबल ने उठाये !

ज़ दगी का कारवाँ यह

आफ़त के सामने झुकता नह ं, झुकता नह ं !

रह नह ं सकती हमेशा यािमनी काली,

रोज़ फूटे गी नयी आकाश से लाली

दे ख कर जसको, मनुज हर, दौड़ कर वागत करे गा,

पर, ितिमर से डर भयावह ण या साँस भरे गा ?

ज़ दगी का कारवाँ यह

भा य के िनिमत िसतार को कभी तकता नह ं !



मेघ के टकड़े सर खा यह अकेलापन,

है बड़ा इससे कह ं चलता हआ


ु जीवन !

राह चाहे जल- वह ना, वृ -ह ना, रे तमय हो,

राह चाहे य ह ना, घर- वह ना, योित लय हो,

ज़ दगी का कारवाँ यह

हार कर संघष-पथ पर भूल कर थकता नह ं !

जस दय ने साफ़ अपना ल य दे ख िलया

वह तो बहाएगा सदा ह आस का द रया !

लड़खड़ाता चल रहा जो, मौत क तसवीर है वह,

जो का है म य पथ म, रोग-वाहक नीर है वह,

ज़ दगी का कारवाँ यह

िमट िनराशा क नद म डू ब बह सकता नह ं !

1952

(14) बढ़ते चलो

राह पर बढ़ते चलो !


दरू मं ज़ल है तु हार ,

पर, क़दम ह गे न भार ,

आज तक युग क जवानी ने कभी ह मत न हार !

आँिधय से जूझनेवाल !

िनडर हँ स-हँ स खर बढ़ते चलो !

बल अिमट व ास का है ,

बल अतुल इितहास का है ,

बल अथक भावी जगत म फर नये मधुमास का है ,

ओ युवक ! िनज र से नव- ढ़

इमारत व म गढ़ते चलो !

तम बखरता जा रहा है ,

नव सबेरा आ रहा है ,

सृ का कण-कण सृजन का गीत अिभनव गा रहा है ,

इसिलए तुम भी

नये युग क ित ा के िलए लड़ते चलो !

1952

(15) नये इं सान से तट थ-वग


ओ नये इं सान !

तुमसे एक मुझको बात करनी है ;

बात वह ऐसी क जसको

वग के मेरे अनेक

मद, औरत,

वृ , ब चे, नवयुवक

सब चाहते ह आज तुमसे पूछना।

और वह है ज़ दगी क

आज से बेहतर, नयी, खुशहाल

यार ज़ दगी क बात !

जो क उस दन,

याद है मुझको

अधर म क गयी थी,

य क तुम संघष म रत थे !

वरोधी चोट से सारे

तु हारे अंग आहत थे !


तु हारे पास, पर,

उ वल भ व यत ् का बड़ा व ास था,

आदमी क श का इितहास था;

उसक वजय का िच

आँख म उभरता था,

युग का नेह

इस घायल ध र ी पर बखरता था,

तभी तो तुम

दमन के बादल को चीर कर

काली मुसीबत क

भयानक रात का उर भेद कर,

अिभनव करण बनकर

नये इं सान क सं ा

जगत से पा रहे हो !

और उसको तुम

गित पथ पर

सतत ले जा रहे हो !
पास मं ज़ल है ,

उछलता भोर का दल है,

बड़ा नज़द क सा हल है !

भरोसा है मुझे िन य

तु हारे हर इरादे पर,

अकेली बात इतनी है

क तुम कैसी नयी दिनया


ु बनाओगे ?

दय म आज मेरे भी

नयी रं गीन दिनया


ु क

नयी तसवीर है ,

दिन
ु या को बदलने क

स वनी पीर है !

या तुम उसे भी दे ख

मुझको साथ लेकर चल सकोगे ?◌े

य क म अबतक

वलग, िनिल तुमसे

म यवत ,

दरू,

और तट थ था !
1951

(16) नयी दशा

चार ओर है गितरोध !

पथ अव ,

खं डत मा यताएँ ह न,

जजर ढ़य क सामने ाचीन

फैली 'चीन क द वार' !

कैसे चढ़ सकोगे

और कैसे कर सकोगे पार ?

बोलो !

ये पुरातन नीितयाँ, व ास,

मृत औ' संकुिचत दशन पुराना ले,

पुरानी धारणाओं से,

पुरानी क पनाओं से

कभी या जीत पाओगे ?

कभी अपने बनाये ल य को


साकार कर या दे ख पाओगे ?

बदलते व के स मुख,

क अनुसंधान

जब व ान के बढ़ते चले जाते,

नये साधन, कल नूतन

व आ व कार बढ़ ितपल

चुनौती आज

गव नत 'जगत क छत' खड़े पामीर को दे ते,

उठे एवरे ट,

गहन शा त-सागर को,

अनेक ह-िसतार को,

चमकते दरू चंदा को,

नये उ नत वचार के सहारे

जो सतत अिधकार म अपने

सदा करते बढ़े जाते !

हए
ु पूरे

न होनी आज चाह के सभी सपने !


ज़रा उठ खोल तो आँख

नयी फैली दमकती रोशनी के सामने !

लो फर करो उपयोग,

तुम हर व तु का उपभोग !

मनुज हो तुम

िलए बल-बु का भंडार,

मनुजता के सभी अिधकार,

गित का है तु ह वरदान,

ददम
ु श का अिभमान,

तु हारा येय है

तोड़ो पुरानी ज़ दगी के तार,

जनम बज न सकती अब मधुर झंकार !

कहाँ तक कर सकोगे शोध ?

है सब यथ सारा ोध !

जब सब डगमगायी ह द वार

नींव से -

िगर कर रहगी ह ,

क जब ये आँिधयाँ चल द ं ितज से

शी आ िघर कर रहगी ह !
तु ह तो छोड़ना है

आज यह अपन व क

हर वासना का प,

कर दो ब द

तम से त अवनित कूप !

असफल मोह से कर ोह,

िम या व न क माया,

खड़ बन शू य क

िन सार धुँधली ीण-सी छाया

क जसम है न कोई आज आकषण !

िनरथक या ?

अरे घातक !

सजग हो जा

नह ं तो नाश िन त है ,

खड़ा हो जा

सु ढ़ च टान-सा बनकर

नह ं तो धम तेरा रे कलं कत है ,
क बढ़कर रोक ले तूफ़ान

वरना आज

पौ ष धैय वगिलत है !

न हो भयभीत

तेरे सामने हंु कारता है बढ़

ज़माना न य,

भावी व क ले क पना ढ़ भ य !

जनता क खर आवाज़

गूँजी आज,

जो कंिचत नह ं अब चाहती है

'ताजवाल ' का कह ं भी राज !

पी ड़त, त, शो षत, सवहारा क

उमड़ती बाढ़-सी धारा,

लगाकर यह गगन-भेद सबल नारा -

नयी दिनया
ु बनानी है !

न होगा िच ह जसम एक भी

मृत घृ णत पूँजीवाद का,

बरबाद होगा व से
हर प तानाशाह का,

केवल जगत ् नव-सा य-पथ पर

ले सकेगा साँस,

सुख क साँस !

जसम आस

नूतन ज़ दगी क ह भर होगी,

क जसक राह पर चलकर

धरा सूखी हर होगी !

िमटा दे गा उसी पथ का बटोह

द:ु ख के पवत,

वषमता क गहनतम खाइयाँ

सब पाट दे गा

कम का उ साह,

नूतन चेतना क ेरणा से

ये पुराने सब

ू जाएँगे !
क़ले, द वार, दर टट

1949

(17) पर परा
पर परा, पर परा, पर परा !

जकड़ िलया

िमटा दया

िनशान धूल झ क कर

युग चला िलया,

गुलाम हो गये

बना वयं अनेक र ितयाँ

था बनाम ढ़याँ !

नवीन वर नह ं सुना ?

नया व प भी नह ं दखा ?

बदल गया जहान

स य आ गया खरा !

कहाँ गयी

पर परा, पर परा, पर परा ?

अंध मा यता,

कठोर मा यता,

असार मा यता !
अरे बता -

क धम ... धम ... धम ... क पुकार

मच रह ,

यहाँ वहाँ सभी जगह

क मार-धाड़,

हो गया मनुज गँवार,

कौन-सा अमू य धम वह सुना रहा ?

क़ुरान ?

वेद ? उपिनषद ? पुराण ?

बाइ बल ?

सभी बदल चुके !

नवीन थ और एक 'ईश' चा हए,

क जो युगीन जोड़ दे

नया, नया, नया !

व लहलहा उठे

मनुज-महान-धम क

सड़ -गली लता !
सुधार मा यता,

नवीन मा यता,

सश मा यता !

न यथ मोह म पड़ो

न कुछ यहाँ धरा !

बदल पर परा, पर परा, पर परा !

1948

(18) ग त य

यह जीवन का ग त य नह ं !

िन फल य- त कराह का,

इन सूनी-सूनी राह का,

असफल जीवन क आह का,

व न-िनमीिलत, मोह- िसत यह

जा त-उर का म त य नह ं !

वैय क वाथ पर िनिमत ,

आ म-तु के साधन सीिमत,


पथ पािथव सुख पर कर ल त,

जन-मन-राग से दरू कह ं

मानवता का भ वत य नह ं !

बीते युग पर पछताने का,

या याद पुरानी गाने का,

है येय न आज ज़माने का,

युग क वाणी से रह वमुख

एकांत-कला या भ य कह ं ?

1952

(19) या हआ
ु ?

वह िशिथल, अ व थ, ण है शर र,

या हआ
ु पहन िलया नवीन चीर ?

वह थके चरण,

वह दबे नयन,

क या हआ
ु णक सुरा

उतर गयी गले ?

िनिमष नज़र के सामने

अगर यह छा गया चमन !

सपन बहार आ गयी !


समीर है वह गरम-गरम,

मरण-वरण बुख़ार

वह िगर रह

उसी कार

शीश से मनु य के

अशेष र -धार !

झनझना रहे

दय के तार-तार !

1951

(20) दरू खेत पार

शीत क काली भयावह रात !


दरू खेत पार जजर ढह

जीवन त ध,

धुंध भीषण, काँपती ित ह;

जन-मन द ध,

मूक ाण के दमन क बात !


मम पर अंितम वनाशक चोट

घायल त,

ले ितर कृ त ाण, रज म लोट

पीड़ा त

ब , शो षत, र से तन नात !

एक रोदन का क णतम शोर

गौरव न ,

छा रहा वैष य- वष चहँु ओर

सं कृ ित ,

साँस ित कंपन िसहरता गात !


नाशकार गाज िसर पर टट

मानव द न,

स यता का अथ हं सा लूट

ममता ह न,

खो गया तम के वजन म ात !

1951

(21) युग और क व

नाश का दन भरा,

यह हार का
दा र य का

दिभ
ु का

अव पथ का

यु का

िमटता हआ
ु ,

बंधु व से हटता हआ

इितहास है , इितहास है !

सं कृ ित, कला औ' स यता का

सामने मान खड़ा उपहास है !

जब आज दानव कर रहा

शोषण भयंकर

प मानव का बनाये,

और उठती जा रह ह

नेह, ममता क

मनुज-उर-भावनाएँ,

बढ़ रह ह ती गित से

ास पर हर

िचर बुभु त मानव के


द ध-जीवन क

वषैली गैस-सी घातक कराह !

वंस का

िनमम मरण का,

घोर काला

यातना का

िच यह ि यमाण है !

उजड़ा हआ
ु है अ दमन-सा !

िसहरता तीखा मरण का गान है !

आदश सारे िगर रहे ;

मानव बुझा कर

ान का द पक

िन वड़तम-ब दिनया

दे खना बस चाहता है ;

य क उसके पाप अग णत

कौन है जो दे ख पाएगा ?

धरा पर

'शांित, सुख, नवयुग- यव था' के िलए


वह लूट लेगा

व का सव व !

लोभी ! लड़ रहा है ,

कर रहा है व त

कतने लहलहाते खेत,

मधु जीवन !

रह है िमट मनुजता ह वयं

मान क क

'हारा कर ' भगवान ने !

है मंद जीवन-द प क

आभा सुनहली।

युग हआ
ु शा पत कलं कत ;

क तु तुम होना न कंिचत

धैय वगिलत, चरण वज ड़त !

क व उठो !

रचना करो,

तुम एक ऐसे व क

जसम क सुख-दख
ु बँट सक,
िनब ध जीवन क

लह रयाँ बह चल,

िन वासर

नेह से प रपूण रात कट सक,

सब क ,

मा मा क , गर ब क

न हो यवधान कोई भी !

नये युग का नया संदेश दो !

हर आदमी को आदमी का वेश दो !

1947

(22) व ास

बढ़ो व ास ले, अवरोध पथ का दरू होएगा !

तु हार ज़ दगी क आग बन अंगार चमकेगी,

अंधेर सब दशाएँ रोशनी म डू ब दमकगी,

तु हारे द ु मन का गव चकनाचूर होएगा !

सतत गाते रहो वह गीत जसम हो भर आशा,

बताए ल य क ढ़ता तु हार आँख क भाषा,

वरोधी हार कर फर तो, तु हारे पैर धोएगा !


ू जाएँगी,
मुसीबत क िशलाएँ सब चटककर टट

गरजती आँिधयाँ दख
ु क वनत हो धूल खाएँगी,

तु हारे ेरणा-जल से मनुज सुख-बीज बोएगा !

1951

(23) आ त

ज़ दगी के द प जसने ह बुझाये,

और भू के गभ से

उगते हए
ु पौधे िमटाये,

श य- यामल भूिम को बंजर कया जसने,

नवल युग के दय पर मार

पैना गम यह खंजर दया जसने

उसी से कर रह है लेखनी मेर बग़ावत !

क नह ं सकती

क जब तक िगर न जाएगा धरा पर

आततायी म गव नत,

क नह ं सकता कभी वर

जब मुखर होकर

गले से हो गया बाहर,


क नह ं सकता कभी तूफ़ान

जसने योम म ह फड़फड़ाए पर,

क नह ं सकता कभी द रया

क जसने खोल आँख

ख़ूब ली पहचान बहने क डगर !

वह तो फैल उमड़े गा,

क चढ़कर पवत क छाितय पर

कूद उछलेगा !

सभी पथ म अड़ भीत

गरज उ मु तोड़े गा !

मुझे व ास है साथी

तु हारे हाथ

इतने श शाली ह

क ित परा जत हो

अविन पर लोट जाएगा,

तु हार आँख म

उतर बड़ गहर चमकती ती

लाली है

क जससे आज म आ त हँू !
युग का अंधेरा िछ न होएगा,

सभी फर से बुझे द पक

नयी युग-चेतना के नेह को पाकर

लहर कर जल उठगे !

सृ नूतन कोपल से भर

सुखी हो लहलहाएगी !

क मेर मोरनी-सी व क जनता

नये वर-गीत गाएगी !

व खेत म िनडर हो

नाचकर पायल बजाएगी !

1952

(24) द पक जलाओ

आज मेरे नेह से द पक जलाओ !

व कुहरा छ न, धूिमल सब दशाएँ,

चल रह ह घोर ित हवाएँ,

ाण मेरे अंक म, आकर समाओ !


आज नूतन फूटती आओ जवानी,

मु वर म गूँज लो अव वाणी,

यह नवल संदेश युग का, क व, सुनाओ !

िगर रह ह जीण द वार सहज म,


टटती ह शीण मीनार सहज म,

हो नया िनमाण, जजरता हटाओ !

आज मेर बाहओं
ु का बल तु हारा,

आज मेरा शीश - ण अ वचल तु हारा,

त, घायल, सु दिनया
ु को जगाओ !

1950

(25) आभास होता है

आभास होता है

क स दय ब बंधन

आज खुलकर ह रहगे !

इन धुएँ के बादल से

आग क लपट लरज कर

योम को
िनज बाहओं
ु म घेर लगी !

श म -मद

वषैला-नद जलेगा,

हर उपे त भीम गरजेगा

तुमुल संगर धरा पर !

गढ़ दमन के

राह के फैले हए
ु आटे स श

संघष क भीषण हहरती

आँिधय के बीच

उड़ िमट जाएँगे !

व ास होता है

क दौड़ा आ रहा

उ मु युग-खग,

सब पुरातन जाल जजर तोड़कर !

अब तो जलेगा

स य का अंगार !
जसके ह िलए

यह आज तक अ व ांत

लालाियत रहा है

पी ड़त भूले हओं
ु का

जागता संसार !

मोचन शोक,

दख
ु हत तेज,

िगर रह है भंिगमा

माया वभेदन,

द खती अिभनव- करण

1950

(26) आज दे खा है

आज दे खा है

मनुज को ज़ दगी से जूझते,

संघष करते !


वंचना क टटती च टान क आवाज़

कान ने सुनी है ,

और पैर को हआ
ु महसूस

धरती हल रह है !

आज मन भी
दे रहा िन य गवाह

द:ु ख-पूणा-रात काली

अब ितज पर िगर रह है !

भूिम जननी को हआ
ु कुछ भास

उसक आस का संसार

नूतन अंकुर का

उग रहा अंबार !

सूखे वृ के आ पास

बहती वायु कुछ क

कह रह संदेश ऐसा

जो नया,

बलकुल नया है !

सुन जसे खग डाल का

अब च च अपनी खोलने को

हो रहा आतुर,

फु लत,

फड़फड़ाकर कर पर थ कत !

छतनार यह काला धुआँ

अब द खता हलका
नह ं गाढ़ा अंधेरा है

वह कल का !

1951

(27) मुझे भरोसा है

म क़ैद पड़ा हँू आज

अंधेर द वार म;

द वार -

जनम कहते ह

रहती क़ैद हवा है ,

रहता क़ैद काश !

जहाँ क केवल फैला

स नाटे का राज !

पर, म तो अनुभव करता हँू

बेरोक हवा का,

आँख से दे खा करता हँू

ल -ल योितमय- प ड को,

मुझको तो

खूब सुनायी दे ती ह

मेरे साथी मनुज के


चलते, बढ़ते, लड़ते

क़दम क आवाज़ !

मेरे साथी मनुज के

अिभयान के गान क

अिभयान के बाज क

आवाज़ !

मुझे भरोसा है

मेरे साथी आकर

कारा के ताले तोड़गे,

जन- ोह स ा का

ऊँचा गव ला म तक फोड़गे !

इं सान नह ं फर कुचला जाएगा,

इं सान नह ं फर

इ छाओं का खेल बनाया जाएगा !

1951

(28) मुख को िछपाती रह


धुआँ ह धुआँ है ,

नगर आज सारा नहाता हआ


ु है !

अंगीठ जली ह

व चू हे जले ह,

वहग

बाल-ब च से िमलने चले ह !

िनकट खाँसती है

िछपी एक नार

मृदल
ु भ य लगती कभी थी,

बनी थी

कसी क वमल ाण यार !

उसी क शक़ल अब

धुएँ म सराबोर है !

और मुख क ललाई

अंधेर -अंधेर िनगाह म खोयी !

जसे ज़ दगी से
न कोई िशकायत रह अब,

व जसके िलए

है न दिनया

भर व न मधु से

लजाती हयी
ु नत !

अनेक बरस से

धुएँ म नहाती रह है !

क गंगा व यमुना-सा

आँसू का द रया

बहाती रह है !

फटे जीण दामन म

मुख को िछपाती रह है !

मगर अब चमकता है

पूरब से आशा का सूरज,

क आती है गाती करन,

िमटे गी यह िन य ह

दख
ु क िशकन !
1951

(29) नया समाज

करवट बदल रहा समाज,

आज आ रहा है लोकराज !

व त सव जीण-शीण साज़,

धूल चूमते अनेक ताज !

आ रह मनु यता नवीन,

दानवी वृ याँ वलीन !

अंधकार हो रहा है दरू;

खंड-खंड और चूर-चूर !

र मय ने भर दया काश,

ज़ दगी को िमल गयी है आश।

चल पड़ा है कारवाँ स ाण

श वान, संग ठत, महान !


रे त-सा यह उड़ रहा वरोध,

माग हो रहा सरल सुबोध;

बढ़ रहा बल गित- सार,

बजिलय स श चमक अपार !

दे ख काल दब गया वशाल,

आग जल उठ है लाल-लाल !

उठ रहा नया गरज पहाड़,

म य जो वह खा गया पछाड़ !

पस गया गला-सड़ा पुराण,

बन रहा नवीन ाणवान !

गूँजता वहान-न य-गान;

मु औ' वरामह न तान !

1949

(30) युगा तर
आँधी उठ है समु दर कनारे

बढ़ती सतत कुछ न सोचे- वचारे ,

लहर उमड़तीं बना श हारे

र तार यह तो समय क !

मानव िनकलते चले आ रहे ह,

उ म हो गीत नव गा रहे ह,

रं गीन बादल बखर छा रहे ह !

झंकार यह तो समय क !

जजर इमारत िगर डगमगाकर,

आमूल वष-वृ िगरता धरा पर,

बहता पघल पूण ाचीन प थर,

है मार यह तो समय क !

रोड़े बछे थे हज़ार डगर म

नौका कभी भी न डोली भँवर म,

बढ़ती गयी य -झंझा समर म

पतवार यह तो समय क !
इं सान लेता नयी आज करवट,

स मुख नयन के उठा है नया पट,

गूँजी जगत म युगा तर क आहट,

ललकार यह तो समय क !

1950

(31) छलना

आज सपन क

नह ं म बात करता हँू !

चाँद-सी तुमको समझकर

अब न रह-रह कर

वरह म आह भरता हँू !

नह ं है

ण मन के

यार का उ माद बाक़ ,

अब न आँख म सतत

यह झलिमलाती
तु हारे प क झाँक !

क मने आज

जी वत स य क

तसवीर दे खी है ,

जगत क ज़ दगी क

एक याकुल दद क

तसवीर दे खी है !

कसी मासूम क उर-वेदना

बन धार आँसू क

धरा पर िगर रह है ,

और चार ओर है जसके

अंधेरे क घटा,

जा ठ बैठ है

सबेरे क छटा !

उसको मनाने के िलए अब

म हज़ार गीत गाऊँगा,

अंधेरे को हटाने के िलए

नव योित ाण म सजाऊँगा !
न जब तक

सृ के येक उपवन म

बस ती यार छाएगा,

न जब तक

मुसकराहट का नया सा ा य

धरती पर उतर कर जगमगाएगा,

क तब तक

पास आने तक न दँ ग
ू ा

याद जीवन म तु हार !

य क तुम

कत य से संसार का मुख मोड़ दे ती हो !

हज़ार के

सरल शुभ-भावनाओं से भरे उर तोड़ दे ती हो !

1952

(32) मत कहो

आज भय क बात मुझसे मत कहो,


आज बहक बात मुझसे मत कहो !

ाण म तूफ़ान-से अरमान ह,

कंठ म नव-मु के नव-गान ह !

वार तन म व थ यौवन का बहा,

न ह बंधन, सबल उर ने कहा !

है त ण क साधना, गितरोध या ?

है त ण क चेतना, अवरोध या ?

ं भीषण, है चुनौती सामने,

बीज भावी ा त बोती सामने !

ब ितपग पर सम त समाज है;

आग म तपना सभी को आज है !

आज जन-जन को िशिथलता छोड़ना,

है नह ं कत य से मुख मोड़ना !

इस लगन क अ न से जजर जले

र क ित बूँद क सौग ध ले
ाण का उ सग करना है तु ह,

व भर म यार भरना है तु ह !

धम मानव का बसाना है तु ह,

कम जीवन का दखाना है तु ह !

मम ाण का बताना है तु ह,

योित से िनज, तम िमटाना है तु ह !

व नव-सं कृ ित गित पर बढ़ चला,

जीवन िमट समय के संग गला !

काल क गित, भा य का दशन मरण,

आज ह येक वर के नव-चरण !

जीणता पर हँ स रह है न यता,

खल रह ं किलयाँ मर को मधु बता !

वंस के अंितम वजन-पथ पर लहर,

सृ के आर भ के जा त- हर !

जागरण है , जागते ह तुम रहो,


नींद म खोये हए
ु अब मत बहो !

आज भय क बात मुझसे मत कहो,

आज बहक बात मुझसे मत कहो !

1950

(33) नया युग

ओ ! मनुजता क

क ण, िन पंद बुझती योित

मेरे नेह से भर

विलत हो जा !

िन वड़-तम-आवरण सब

व - यापी जागरण म

आ सहज खो जा !

हमालय-सी

भुजाओं म भर है श

जन-जन रोक दगे आँिधय को,

फक दगे दरू

बढ़ती वार क लहर !


नयी वकिसत

युग क साधना क फूटती आभा,

नयी पुल कत

युग क चेतना क जागती आशा !

ू से
दिलत, नत, भ न ढह

उठ है आज

नव-िनमाण क ढ़ ेरणा !

धु ् रव स य

होगी क पना साकार !

अिभनव वेग से

संसार का कण-कण

नया जीवन, नया यौवन, लहू नूतन,

सु ढ़तम श का

संचार पाएगा !

नया युग यह

खर दनकर सर खा ह नह ं,
पर, है पहँु च आगे बड़ इसक

घने फैले हए
ु जंगल

भयानक म 'एवर- ीन',

भूतल ठोस के नीचे,

अतल जल के

जहाँ बस है नह ं र व का

वहाँ तक है

नये युग के वचार का

अथक सं ाम !

कैसे बच सकोगे

ओ पलायन के पुजार !

आज अपनी बु क हर गाँठ को

लो खोल,

बढ़कर आँक लो

नूतन सजग युग का समझकर मोल !

1950

(34) पदचाप

पड़ रहे नूतन क़दम


फ़ौलाद-से ढ़,

और छोट पड़ रह छाया

नये युग आदमी क आज !

धरती सुन रह पदचाप

अिभनव ज़ दगी क !

बज रह झंकार,

मुख रत हो रहा संसार,

नव-नव श का संचार !

प रवतन !

बदलती एक के उपरा त

सु दरतर

जगत ् क ित िनिमष तसवीर,

घटती जा रह है पीर,

जागी आदमी क आज तो

सोयी हई
ु तक़द र !

क गया

मेरे जगर का दद,


बरस का उमड़ता

नैन का यह नीर !

गीले ने क णा-पूण

तुझको दे खते व ास से ढ़तर,

यह आशा लगाये ह

क जब यह उठ रहा परदा पुराना

तब नया ह य आएगा,

क पहले से कह ं खुशहाल

दिनया
ु को दखाएगा !

1949

(35) भोर का आ ान

खुल रह आँख

नयी इस ज़ दगी के भोर म !

उठ रहा

उठते दवाकर संग जन-समुदाय,

भर कर भावना बहजन
ु हताय !

अंतर से िनकलती आ रह ह

व के क याण क
काली अंधेर रात के तार सर खी,

एक के उपरा त अग णत शृख
ं ला-सी

न य-जीवन क सुनहर आब-सी

विगक दआएँ
ु !

दे ख ली है आज

नयन ने नये युग क धधकती आग,

जसक उड़ रह ं िचनगा रयाँ

हर ाम-वन-सागर-नगर के योम म !

उस घास क गंजी सर खा

जो लपट से त धू-धू जल रह है ,

व त होता जा रहा

छल, झूठ, आड बर !

क जसके व पर यह हो रहा है

रोशनी-सा

दौड़ता अिभनव- करण-सा आज म वंतर !

क व ुत वेग भी पीछे
लरज कर रह गया,

लाख हर केनी हवाएँ तक

ठठक कर रह गयीं;

लाख उबलते भूिम के वालामुखी तक

जम गये,

बह न पाया एक पग भी दे खकर लावा !

गगन के फट गये बादल

व खं डत हो गयी सार गरज !

भव का भयानकतम भ व यत ् भी

भरे भय भग गया !

व ास है

यह अब न आएगा कभी,

ऐसा हण फर

स न पाएगा कभी

जन-चेतना के सूय को !

रे आज स दय जनता-कंठ

सहसा खुल गया

संसार के इस शोर म !

खुल रह आँख
नयी◌े इस ज़ दगी के भोर म !

1950

(36) िनरापद

नयी रोशनी है ,

नयी रोशनी है !

िनरापद हआ
ु आज जीवन,

िनराशा पुरावृत वसजन !

वषा दत-युग क िनशा भी गगन से

अंधेरा उठाकर भगी इस जलन से।

महाबल वपुल अब भुजाएँ उठाकर

वरोधी सभी ताक़त को

गरजकर बगड़ ु

ललकारता है !

गुनाह के पवत

पघल कर धँसे जा रहे ह !

(सुमन शु क उपवन म
खलते चले जा रहे ह !)

बदलते जगत पर

पुरातन गिलत नीित

हरिगज़

नह ं थोपनी है !

नयी रोशनी है !

1949

(37) सु खयाँ िनहार लो!

नये वचार लो !

समाज क िगर दशा सुधार लो,

सुधार लो !

का वाह फर बहे ,

स ाण गीित- वर कहे ,

दय अपार नेह-धन

भरे उठ असं य जन,

भात को धरा जगो पुकार लो,


पुकार लो !

वतन सुसंग ठत रहे ,

न एक जन दिमत रहे ,

न भूख- यास शेष हो,

बना नवीन वेश हो,

समय बहाल, सु खयाँ िनहार लो,

िनहार लो !

वभोर हष-धार म,

सफ़ेद लाल यार म,

बहो, बहो, बहो, बहो !

बनी नयी कुट र है , वहार लो,

वहार लो !

1950

(38) युग-प रवतन

नये भात क थम करण

वलोक मुसकरा रहा गगन !


इधर-उधर सभी जगह

नवीन ज़ दगी के फूल खल गये,

िसहर-िसहर क झूम-झूम

एक दसरे
ू को चूम-चूम िमल गये !

धूल बन गया पहाड़ अंधकार का,

ू वेग है ज़मीन पर
अटट

नयी बयार का !

क साथ-साथ उठ रहे चरण,

क साथ-साथ िगर रहे चरण !

नये भात क नयी बहार बीच

जगमगा उठा गगन !

क झलिमला उठा गगन !

उवरा धरा सुहाग पा गयी,

शर र म हर िनखार आ गयी !

िनहार लो उभार प का
पड़ा है िसफ़

रे शमी मह न आवरण

अतेज घूप का !

बजिलय ने कर िलया शयन,

हहरती आँिधयाँ पड़ ं शरण,

वकास का सश का फ़ला नवीन

कर रहा सु ढ़ भवन-सृजन !

बेशरम के खड़े ह राह पर,

क कापु ष के कंठ से

िनकल रहा कराह- वर,

सभीत दबल
ु के बंद ह नयन,

व मोच खा गये चरण !

1950

(39) नयी सं कृ ित

युग-रा

िन य

व के येक नभ से िमट गयी !


अिभनव खर- व णम- करण बन

झलिमलाती आ रह

सं कृ ित नयी !

सामने जसके

वरोधी श याँ तम क बखरती जा रह ं,

पर, ये वरोधी श याँ

कोई थक जजर नह ं,

क तु;

इनसे जूझने का आ गया अवसर !

यह वह है समय

जब बल नया पाता वजय !

हमला ज़ र है ,

क दे श , जाितय , वग सभी क

यह पर पर क

िमटाना आज दरू है !

इसी के ह िलए
ाचीन-नूतन क आवाज़ है ,

ाचीन जो ि यमाण,

जसका आज

वशृख
ं ल हआ
ु सब साज़ है !

जसक रोशनी सार

नये ने छ न ली,

और जसके हाथ से िनकला

सम त समाज है !

बस, पास केवल एक धुँधली याद है,

जसका तड़पता शेष यह उ माद है

'बीते युग म हम सुखी थे;

कंतु अब रथ स यता का

ती गित से बढ़

पतन-पथ पर

जगत का नाश करने हो रहा आतुर !'

हम अब जान लेना है

वनाशी त व घातक ह वह

जो आज यह झूठा ितिमर करते विनिमत,


और र क-द प बनने का

वफल गीदड़ सर खा वाँग भरते ह !

क धोखे से उदर अपना

भरा हर रोज़ करते ह।

भला ऐसे मनुज

या लोक के कुछ काम आते ह ?

नयी हर बात से मुख मोड़ लेते ह

समय के साथ चलना भूल जाते ह !

नज़र से

ट, बेबीलोन के ख डहर गुज़रते ह !

बहाना है न उनको दे खकर आँसू,

न उनक अब शंसा के

हज़ार गीत गाने ह !

नह ं बीते युग के दन बुलाने ह !

नया युग आ रहा है जो

उसी के माग म हमको

बछाने फूल ह कोमल,

उसी के माग को हमको

बनाना है सरल !
जससे नयी सं कृ ित-लता के कुंज म

हम सब खुशी का

गा सक नूतन तराना !

भूलकर दख
ु -दद

जीवन का पुराना !

1950

40) गंगा बहाओ

आज ऊसर भूिम पर गंगा बहाओ !

उ च ढ़ पाषाण िगर-िगर कर चटकते,

रे त के कण न न धरती पर चमकते,

अ न क लहर हवा म बह रह ह;

प घन का शांितमय जग को दखाओ !

त नत मानव क पत पात से झर,

झुक गये सब आततायी के चरण पर,

थूक ठोकर नाश दख


ु िनमम मरण पर;

आ म-धन उ सग क ुव लौ जगाओ !
बह चुक ह ख़ून क न दयाँ, बरानी

भू हई
ु , सत ् क असत ् ने कुछ न मानी,

और फूटा भय- िसत-र म-सबेरा,

सूय पर छाये हए
ु बादल हटाओ !

1950

(41) नयी रे खाएँ

इन धुँधली-धुँधली रे खाओं

पर, फर से िच बनाओ मत !

दिनया
ु पहले से बदल गयी,

आभा फैली है नयी-नयी,

यह प पुराना, नह ं-नह ं !

आँख से ओझल है कल क

सं कृ ित क गंगा का पानी,

ू -टट
टट ू -सी लगती है

गत वैभव क शेष कहानी,

जसम मन से झूठ , क पत

बात को सोच िमलाओ मत !


पहले के बादल बरस चुके,

अब तो खाली सब थके- के,

यह गरज बरसने वाली कब ?

नव-अंकुर फूट रहे रज से

भर कर जीवन क ह रयाली,

िन य है , फूटे गी नभ से

जनयुग के जीवन क लाली,

िन सार, िमटा, जजर, खोया

फर से आज अतीत बुलाओ मत !

1948

(42) भ व य के िनमाताओं!

जन सपन को साकार करोगे तुम

उन पर मुझको व ास बड़ा,

म दे ख रहा हँू

क़दम-क़दम पर आज तु हारे

वागत को युग का इ सान खड़ा !

जसके फ़ौलाद हाथ म


हँ सते फूल क खुशबू वाली माला है,

जसने जीवन क सार

जड़ता और िनराशा का

वारा- यारा कर डाला है !

वह माला वह इनसान

तु हारे उर पर डालेगा;

य क तु हारा व थल

जन-जन क पीड़ा से बो झल है ,

य क तु हारे फ़ौलाद तन का

मख़मल जैसा मन

युग- यापी दन से

हो-हो उठता चंचल है !

तुम ह हो जो

इन फूल क क़ मत समझोगे,

फर सार दिनया
ु म

हँ सते फूल का उपवन

नभ के नीचे लहराएगा !

मानव फूल को यार करे गा,

अपनी ' ा' का शृग


ं ार करे गा,

ब च को चूमेगा,
उनके साथ रोज़

हरे लॉन पर 'घोड़ा-घोड़ा' खेलेगा !

नयन म आँसू तो आएँगे

पर, वे बेहद मीठे ह गे !

मरघट क आग जलेगी य ह

पर, उसम न कसी के

अरमान अधूरे ह गे !

जैसे अब िमलना दलभ


ु है

'ईश' जगत म

वैसे ह तब भी होगा,

पर, हमको-तुमको

(सच मानो !)

उसक इतनी िच ता ना होगी !

उसका और हमारा अ तर

िन य ह िमट जाएगा,

जस दन मानव का सपना

सच हो जाएगा !

1953

(43) मेघ-गीत
उमड़ते-गरजते चले आ रहे घन

िघरा योम सारा क बहता भंजन

अंधेर उभरती अविन पर िनशा-सी

घटाएँ सुहानी उड़ ं दे िनम ण !

क बरसो जलद रे जलन पर िनरं तर

तपी और झुलसी वजन-भूिम दन भर,

करो शा त येक कण आज शीतल

हर हो, भर हो कृ ित न य सु दर !

झड़ पर, झड़ पर, झड़ पर, झड़ हो,

जगत मंच पर सौ य शोभा खड़ हो,

गगन से झरो मेघ ओ! आज रम झम,

बरस लो सतत, मोितय -सी लड़ हो !

हवा के झकोरे उड़ा गंध-पानी

िमटा द सभी उ णता क िनशानी,

नहाती द वार नयी औ' पुरानी

डगर म कह ं ोत चंचल रवानी !


कृ षक ने पसीने बहाये नह ं थे,

नवल बीज भू पर उगाये नह ं थे,

सृजन-पंथ पर हल न आये अभी थे

खले औ' पके फल न खाये कह ं थे !

ग को उठा कर, गगन म अड़ा कर

ती ा तु हार सतत लौ लगा कर

दय से, वण से, नयन से व तन से,

िघरो घन, उड़ो घन घुमड़कर जगत पर !

अजब हो छटा बजिलयाँ चमचमाएँ,

अंधेरा सघन, लु हो सब दशाएँ

भरन पर, भरन पर सुना राग नूतन

नया ेम का मु -संदेश छाये !

वजन शु क आँचल हरा हो, हरा हो,

जवानी भर हो सुहािगन धरा हो,

चपलता बछलती, सरलता शरमती,


नयन नेहमय योित, जीवन भरा हो !

1950

(44) बरगद

त धता सुनसान

पथ वीरान,

सीमाह न नीला योम !

मटमैली धरा पर

वृ बरगद का झुका

मान क है ाचीनता सा ात ् !

िनबल

वृ -सा जजर िशिथल,

उखड़ हई
ु साँस,

जड़ भू पर बछ ह

और िगरने के मरण- ण पर

भयंकर व न ने

कं पत कया झकझोर कर

भय क बना मु ा

खड़ा य कर दया !
उड़कर धूल कहना चाहती है

'ओ गगनचु बी !

िगरो

पूर न आकां ा हई
ु ,

आकर िमलो मुझसे

ववश होकर धराशायी !

न जाना मू य लघुता का

कया उपहास !'

जड़ के पास

खं डत औ' कु पा

जो रँ गा िस दरू से

हनुमान-सा पाषाण

टक कर गोद म बैठा

क जसक अचना करते

मनुज कतने

नमन हो प र मा करते

व आधी रात को आ
ान जसको चाटते !

1959

(43) क व

युग बदलेगा क व के ाण के वर से,

ित विन आएगी उस वर क घर-घर से !

क व का वर सामू हक जनता का वर है ,

उसक वाणी आकषक और िनडर है !

जससे ढ़-रा य पलट जाया करते ह,

शोषक अ यायी भय खाया करते ह !

उसके आवाहन पर, नत शो षत पी ड़त,

नूतन बल धारण कर होते एक त !

जो आकाश हला दे ते हंु कार से

दख
ु -दग
ु ढहा दे ते ती हार से !

क व के पीछे इितहास सदा चलता है ,


वाला म र व से बढ़कर क व जलता है !

क व िनमम युग-संघष म जीता है ,

क व है जो िशव से बढ़कर वष पीता है !

उर-उर म जो भाव-लह रय क धड़कन,

मूक ती ा-रत य भटक गित बन-बन,

नेह भरा जो आँख म माँ क िन छल,

लहराया करता क व के दल म ितपल !

खेत म जो बरहा गाया करता है ,

या क िमलन का गीत सुनाया करता है ,

उसके भीतर िछपा हआ


ु है क व का मन,

क व है जो पाषाण म भरता जीवन!

1953

(समा )
तुित : रचनाकार – http://rachanakar.blogspot.com/