Vous êtes sur la page 1sur 84

ई-बकु

रचनाकार (http://rachanakar.blogspot.com ) तु

आम आदमी और थक वकास

ई-बकु रचनाकार ( http://rachanakar.blogspot.com ) क तु त आम आदमी और आ थक वकास मोद भागव

मोद भागव

ई-बकु रचनाकार ( http://rachanakar.blogspot.com ) क तु त आम आदमी और आ थक वकास मोद भागव

रजनी काशन

आईएसबीएन नं 978.81.88515.06.

सवा धकार @ मोद भागव काशक : रजनी काशन 5/288, गल नं 5, वै ट का ती नगर

-110051

थम सं रण : 2010

मू - 250.00

दां कन : राजेश लेजर स शाहदरा, -110032 मु : बी. वे+. ऑफसेट, शाहदरा, -110032

समपण

अपनी बड़ी बहन

मु नी ( ीमती उषा भागव )

को

िजसने मुझे अंगुल पकड़कर

लखना-पढ़ना सखाया

और

अपने बहनोई

ी ह रगोपाल जी भागव

को

िजनके असीम नेह का

ऋणी ह ू ं...।

- मोद भागव

आम आदमी के बहाने

डॉ․․․․ परशुराम वरह '

भारत जब वतं ह आ, तब आम आदमी को बड़े बाग दखाए गए थे। उसे देश का लक कहा

गया था। क वर दनकर ने कहा था- ‘‘ संहासन खाल करो, जनता आती है।'' संहासन तो खाल ह आ ले कन

उस तक जनता नह पह ंच सक गोरे अं ेज संहासन छोड़ का गए तो जनता के नाम पर काले अं ेज उस पर

का बज हो गए। जनता जहां थी वह ं रह । उसक जो हालत पराधीन भारत थी वा धीन भारत उससे धक

खराब हो गई। आम आदमी दशा सुधारने योजनाय बनाई जाती , काय तय कए जाते , वदेशी

सहायता जाती है और कज लया जाता है, त ु आम आदमी के जीवन ि त म अभी तक कोई सुधार

नह ह आ। उसे आज भी भरपेट भोजन नह मलता, उसके पास मकान नह है, बीमार वह इलाज नह करा

सकता, आज भी उसके चे नर र ह और मजदरू करने के लए मजबूर

आम आदमी ता को लेकर मोद भागव पु क आई है िजसका शीषक है ‘‘आम आदमी

और थक वकास'' या त कहानीकार मोद भागव मलतः कार ह के समाचार जनस ता' से

अनेक वष तक जुड़े रहने के बाद आजकल वे चैनल ‘आजतक' का करते । पु समय-

समय पर लखे गए उनके 45 आलेख संक लत ह

देश के

वकास क नी नधा रण के काम लगे ह ए लोग कस कार एकांगी सोच से

पर राओं को कर वकास को वनाश क ओर ले जा रहे , इसका खुलासा पहले आलेख ‘क ृ से जुड़ा

बाल म मजदरू नह ' कया गया है। देश के थ क वकास म चरखा कोई भू मका नभा सकता है, इस

वषय म लोग ' ने सोचना छोड़ दया है। महा मा गांधी ने चरखा चलाकर और चलवाकर िजस अथ यव था

को था पत करने चे टा क थी, वा धीनता दो लन के दन वह काफ हद तक सफल ह ई थी और खाद

डार ने कपड़ा मल के शो- को कारगर चुनौती थी। खेद का वषय है वा धीन भारत नेता गांधी

को भूल गए और गांधी अथ- नी को भी। अमन मूल के टश अथ- शा ी क एक पु क है ‘ मॉ ल इज

फुल' िजसम लेखक ने माह मा गांधी घरेलू योग और लघु योग वाल अथ- नी त क सराहना नह

, वरन वकासशील को उसे अपनाने सलाह भी है। चरखा उस अथ- नी का मुख अंग है।

समी य पु क का लेख-‘वैि क बाजार ‘चरखा' इस वषय म क ु छ नई जानका रय के साथ यह सूचना भी

देता है चरखे का नया त करो पय का होने लगा है, िजसक हम उपे कर रहे उसे देश अपना

रहे

देश थक के वध पर लेखक ने वचार कया है। इस वधता को रोट को खतरे

डालता वकास, वदेशी पूंजी का कसता शकंजा, थक मंद के लाभ, बाजारवाद डी म रा , फसल के

घटते मू और दम तोड़ता कसान, भूख से भयभीत देश, मुसीबत का मानसून, थ क वकास से जुड़ा पानी,

लोक लुभावन नारा और ता अनाज, थक संकट बढ़ाते डट काड, थक सुधार के दौरान घटा रोजगार,

थक मंद और घटता यो गक उ पा द लेख मुखता से देखा जा सकता है। इस सूची एक लेख

है ‘‘ क सम भारतीय पर रा'' िजसके अंत एफशुभाखर तरह मोद भागव भी महा मा गांधी

थक काय -योजना को रा के वकास म हतकर मानते -‘‘ पा दन क ृ जैसे रक ोत

मजबूती और गांधीवाद थ क के अमल करण म थक सम के पुरातम हताथ । बह सं क समाज

शोषण से मुि और सामािजक समरसता भारत को सम व सुखी बना सकती है।'' क ृ के े म

आनुवं शक फसल ओर बढ़ती ह ई सरकार को खेती, कसान और आम आदमी के लए चातक

करते ह ए लेखक ने यह मांग है क आनुवं शक बीज और य फसल के लए दबाव डालने वाल पर

देश ोह का मुकदमा चलाया जाय।

पु थक वकास के साथ आम आदमी से बि य सम या ओं को भी ववे चत कया

है। इसम मुख सम या है पानी जीवन के लए पानी नतांत आव क है। आदमी भूख सहन कर सकता है,

या नह ं। पीने सम या चतु या है। खेती के लए पानी नवायता को सभी जानते मानसून

धोखा देता है, दयां सूख रह ं ह , तालाब का सं उतना नह हो पा रहा है िजतना होना चा हये। पु चार

आलेख पानी के बारे , िजसम पानी के बारे .वाद सोच से हटकर वचार कया गया है। लेखक

मा ता है पानी उपल ता का धकार आम आदमी को है एवं िजसे नल क ू प ां कहा जा रहा है वह

वा तबाह पूव सूचना है।

पया वरण- दषणू क बड़ी भयावह ि है। योगीकरण और शहर करण के थक वकास के

वारपाल इसके लए वशेष जो िज मे वार इस वषय के लेख पु सं या म सात लेख

दषणू क चचा के साथ उसके कारण और टा चार के कारण वा य क सम या से जुझते आम आदमी

पीड़ा का ववेचन चार लेख पाठक को मलता है। घटती ह ई वन दा, त क वक , ा क

सम या , मानवा धकार और -जीव के संर संबंधी सम या ओं पर वचार करने के साथ लेखक ने एक

मह वप थक सम या को पाठक के वचाराथ कया है-वह है कालेधन सम या

टश राज जब देश का धन वदेश म चला जाता था, तब ‘भारत ददु शा' नाटक भारते

ने बड़ी ता त क थी। अब देश के लोग वदेश धन ले जा रहे यह धन कालाधन होता है।

इसक इतनी बड़ी रा है क य यह भारत सरकार ापत कर सके तो देश वी लै हा इट से

रंगीन बन सकती है।

सारांशतः कह तो आम आदमी के बहाने से मोद भागव ने देश के जन-जीवन अनेक सम या ओं

ओर पाठक का या न खींचने का यास कया है। वषय के अनुसार लेखक ने सांि यक और वशेष के

कथन के माण देकर अपनी बात को भावपूण बनाया है। लेख भाषा सरल- नि त है, िजसम

जना

स ृ

लेखन और कार रपो टंग क तभा को सम मलता है। पु क पठनीय है।

---

वकास' के आडंबर तावेजी पड़ताल

डॉपुनीत क ु मार

वकास' का वह प शा वत एवं सवजन

हताय सु नि तकारक हो सकता

है जो आ थक उपलि धय को सु नि त करने के साथ-साथ सामािजक-सां तक मू का भी संर क हो।

सवीं शता का मानव िजस कार उन चुनौ तय से त है जो वयं मनु य क ायोिजत अ ानता,

लोभ, वाथ एवं वासना वारा हो रह तो सव थम वकास एवं वकास के नाम पर होने वाल

शासक ला घाओं को के कठघरे म ड़ा होना वाभा वक है। इसी प य म यह भी नता

नवाय तीत होता है त के उसी अवतार के ठाप अनु ठान संप कया जाये, जो ये

ि त म म -् शवम- रम वर देने म म हो क यह यथाथ है क तथाक थत वकास क

मया दाह न दौने वतमान

व को उस थान पर पह ंचा दया है, जहां यह नणय कर पाना क ठन तीत होता

है क मानव ने इ सवीं शता तक आते-आते अपना वकास कया है या सवनाश।

अथा त वांछनीय त के

य म उस साम रक रचना क नवायता ासं गक तीत होती है जो आ थ क उपलि धय के साथ-

साथ सामािजक, सां तक और अंततः मानवीय मू के भी संर ण क गारंट देती हो।

वातं यो ार भारतवष तपय ास दय यह एक ासद भी संल न क जानी चा हए क नी - नयंताओं

को जमीनी यथाथ से अन होकर योजनाओं और काय के असफल यावयन का दद कभी नह ं ह आ है।

फलतः असफल योजना पुनः िजस नवीन नयोजन का आधार बनी, उसका सं मत होना अव यंभावी ार

होता रहा है। ट है वतं आया वत - ारदा ' के ांत क ता पी मठ वांछनीय ाण-

ठा कभी नह ं क गयी। प रणाम येक नी - नयंता एवं उनके का दे योगधम होने का संबोधन

करने तक वा वक प से परा मी' रहे। योग के फल होने वाले द भाव के उपचार के

चय ह ठावान नी नधा रक कदा चत लेशमा भी नह ं रहे ह । गोया, वातं यो ार भारतवष पछल

सद के सातव दशक से ह इन वडंबनाओं का सा ी रहा है।

इस ि से मोद भागव समी त पु क ‘आम आदमी और आ थक वकास' सब

ओं का पड़ताल करने का एक सश त व साथक यास है। बीसवीं सद के पांचव दशक से ह योजनाओं,

काय , महो सव , पव , योग और अंततः उदार करण एवं नजीकरण के नाम पर िजस कार आम आदमी

को आ वासन और णमकाल

का झुनझुना थमा कर उसक आकां ाओं को प रवारवाद, , जा ,

भाषावाद एवं वाद क राजनी त का अ बनाया गया, उसी का यह प रणाम ह आ क जनगण और

वशेषकर म यम वग कोऊ न प होये हम का हा ' भावना के त जाने-अंजाने सहमत हो गया है। फलतः

भारतीय राजनी त सि लत सरकार ु ताओं एवं अि थर शासन का लंत उदाहरण बन गया है।

था पत सा यकार एवं व ठ प कार मोद भागव यह पु तक वतं भारतवष के वकास के पंच का

ता वेजी शव- छ ेदन करती है। इस पु तक म वषय पर केि त लगभग पताल

स आलेख ह । इनम

से तीस लेख आम आदमी के न अ क मु से संब , दस लेख पया वरण

संकट क सम या से एवं

पांच आलेख मानव अ धकार और समानता के अ धकार चुनौती से दे , वतमान

मानव

जीवन इन सभी सम याओं से क ं ठत होने क सीमा तक या त है। मोद भागव के ये आलेख पूर

संवेदनशीलता के साथ इन चुनौ तय से मुठभेकरते ह थम आलेख ष से जुड़ा बाल म मजदरू नह '

लेखक ने भारतीय क इस परंपरा, िजसम बा याव था से ह बालक को क ष काय बनाने का

यास ारंभ हो जाता है, का अपे त स मान कये जाने का समथन कया है क एक तो इस म के

मा यम से होने वाल क शलता कसी युवा म वा स बढ़ाने का साधन हो सकती है, दसरे वह

रोजगारमूलक क ष द ता यि त को आ थक वा वलंबन से भी जोड़ती है। लेखक यहां यह सवाल खड़ा करते

क इले नक मा यम रयलट -शोज के वारा िजस कार अ भजा य वग कई-कई घंट का म करा रहा है

या वह बा याव था का हरण नह ं है ?

चरखा आज भी गांधीवाद संवेदनशील भारतीय दय म मबल का एक समथ ोत है। इस त को वैि

बाजार म चरखा' आलेख म लेखक ने ता क ढंग से था पत कया है। इस लेख म ले ख है दरअसल

थक त का अथ हम त के दोहन से मालामाल ह ए अरब-खरबप तय फोबस ' का म छप रह

सू चय से नकालने लगे ह । आ थक त का यह पैमाना पूंजीवाद मान सकता क उपज है, िजसका सीधा

संबंध भोगवाद लोग और उपभोगवाद सं त से जुड़ा ' मोद भागव लेखनी तब और पैनी हो जाती है

जब वह पाते ह रा ता और सं भुता बाजारवाद क ट चढ़ायी जा रह है। बाजारवाद' डी म

रा शीषक से संब आलेख म ने सांसद - वधायक खर द फरो त क तहा सक पताल पूर कार

ता से क है और यह करने म सफल भी ह ए ह क अ धकांश जन- सेवाभाव' को तलांज

देकर लाभ क मान सकता' के दास होना चाहते ह । इसी आलेख म लेखक बाजारवाद क ढ़ती वंशबेल के आधार

पर ह कदा चत पूर ता से यह भ यवाणी करते ह ․․․․․मंहगाई तो अभी और परवान चढ़ेगी'। और इस

अमरबेल चाई को आज हम भयावह प म फल भूत होते देख रहे है।

इस पु तक के कई आलेख लेखक क सा हि क संवेदना प कार य दा व क तट थ एवं त या

वशलेषण के अ ण म अनुभूत ह ई है। सा नमक के नु स और या यालय' आलेख म जन

सामा य क याव यक खा यसाम ी नमक को िजस कार लाभ कमाने मा ि ट से या धय का

हौवा खड़ाकर मंहगा कया जा रहा है, के षड़यं का वै नक ढंग से तो पदा फाश

कया ह है, साथ ह ऐलान

करते ह ․․․․․सरकार क संवेदनाओं का नमक भले ह मर गया हो ले कन आम आदमी क ड़ाई लड़ने

वाले गांधी अभी भी िजंदा ह ' इसी अ याय म ने एक रोचक जानकार भी द है सेलर ' द क

पि त नमक के नमय से ह ई है।

लेखक को प का रता का एक लंबा अनुभव है। उनके इस अनुभव क रप वता तब कट होती है जब वे मानव

धकार का हनन और टा चार' शीषक के आलेख म अनेक त के आधार पर टा चार क सश तता के त

सूचना का अ धकार' जैसे कानून नबलता

को रेखां कत करते ह । इस आलेख म लेखक ने नौकरशाह के

यलपन को बड़े सट क तर के से नशाने पर लया है। लेखक क चैत लेखनी तब और मुखर हो जाती है

जब वे अपने एक आलेख म यह रेखां कत करते ह कसान जीवन के बदले म ु

य को अपनाना उ चत समझ

रहे ह क िजस कार अपना सब क छ दॉव पर लगाकर क षक उपज करता है, उस अनुपात म उसे

समु चत मू य नह मलता है। लेखक ने सभी दल सरकार भू मह न एवं सीमांत कसान वरोधी नी तय

ासं गक आलोचना क है।

रोट को खतरे म डालता आ थक वकास' आलेख म मोद भागव ने आ थक वकास क उस व ि त क

सक से श या क है िजसम आम आदमी, दवासी, छोटे कसान और मजदरू

मानजनक थान पाने म सफल नह ं हो पा रहे ह । होना तो यह चा हए था क आ थ क वकास गर ब क रोजी-

रोट गारंट बनता परंतु वडंबना यह है क तथाक थत आ थक वकास के िजस प को न अ भकरण

वारा सा हत कया जा रहा है वह , जंगल और जमीन को हड़पने का मा म बन रहा है। अतः लेखक

यह लखने से नह ं चूकता है ․․․․․ कसी भी बड़े समाज (क षक, मजदरू, दवासी, लत) रोट को

संकट म डाल द गे तो कानून यव था दर-ू दरू तक दरबीन

से भी दखाई देने वाल नह ं है। ․․․․․दरअसल अब

थक सुर ा और रोट का संकट ामीण अंचल संग ठत उ वाद के प म ता र पाता जा रहा

है।․․․․․गर रोट ये बु नयाद रत , द औ यो गक वकास क रत पूर करने के लए छ नी

जायगी तो उनके सम रोट का संकट मुंह बाए खड़ा होगा। और इस संकट से उबरने का जब कोई समाधान

सामने नह ं होगा तो लाचार जन समूह आ , अराजकता और उ वाद का रा ता नह ं अपनायगे तो या कर गे?'

सलवाद क यह आधारभू म है। पया वरण

दषणू

वतमान

व क सवा धक मुख सम या है। इस पु तक म

कई अ याय इस सम या पर केि त ह त के लए संकट बनता आधु नक वकास' लेख म इस मुख

सम या के समाधान हेतु लेखक ट करते ह ․․․․․अब औ यो गक वकास को सकल घरेलू उ पाद क

क ेल अथवा वा णि क लाभ-हा न के गुणाभाग से परे इस क थत आ थक वकास का मू यां कन जल, जंगल

और जमीन का कतना दोहन कया जा रहा है इस माप से हो

पु तक क भाषा शैल कार य बेवाकपन क सुगंध से ओत- ोत है और अपने वचार को ट करने के लए

लेखक ने सामा बोल-चाल के श का सहारा लया है। अतः उद ,ू अं ेजी और कह -कह ं आंचा लक श का

चुर मा ा म योग ह आ है। पु तक म भाषाई ांजलता के चलते पठनीय रोचकता और वाहमान ह ई है। पु

क छ क मयां भी रेखांकन यो य ह , यथा- रचय कथन क आव यक परंपरा का इस पु तक म पालन नह

कया गया है। कथन को कसी भी पु तक म दश क माना जाना चा हए। इससे पु तक क वषय-

भाव भू म को समझने म सरलता होती है। इस कताब म एक कमी यह भी अखरती है क इसम यु आलेख

वे ह जो पूव न रा य एवं े ीय समाचार प - काओं के छप चुके ह । य द पु तक म ये क आलेख

के साथ उसके छपने क थ एवं प - का का उ लेख कया गया होता तो पाठक को लेख के वषय के साथ

वयं के अ यतन होने अथवा न होने का संदेह न होता। पु आम आदमी और आ थ क वकास' धकांश

आलेख उन नकारा मक नी तय पर केि त ह जो वतमान

भारत के जनगण क नय त बनती जा रह

कदा चत लेखक के अंदर का संवेदनशील प कार इस वचार का समथक है क य द नकारा मक वकास का

हो जाता है तो त क वह राह वयमेव होगी जो समाज के कोने म खडे अं तम मनु तक

यं पह ंचेगी।

वकास' प तीन श एक रचना है, पर त यह अ यंत सारग भत व अथवान

भाव करता है। इस

भाव म ान, नयोजन, तकनीक और यो गक कौशल तथा आ थक एवं मानव संसाधन क रचना

भू मका आ द सभी त व समा हत होते ह वकास' एक ग तशील धारणा भी है, जो क देश व काल सापे है।

वकास' वो आकां ा तथा मा यम है िजसने स यता को आ दम युग से वतमान

काल तक,

ारो ार त के वांछनीय मानक से प चत कराया है। परंतु वकास' को मानवीय पश तभी हो

सकता है जब उसके पटल पर आम आदमी को स मानीय थान त हो। समी त पु आम आदमी और

थक वकास' इस यथाथ से पूणतः चत है। इ सवीं शता जब प का रता पीत होने के आरोप से

अशेष नह ं हो पा रह और सा यकार भी पद और पुर कार त करने क वं ता म सि लत हो चुके

, उस वातावरण म लेखनी क धार से रचना मक वकास के कैनवास से जनगण के जजर हो रहे सरोकार को

वांछनीय रंग देने का जो जो खम भरा काय मोद भागव ने इस पु तक के मा यम से कया है वह नि चत ह

मा साह सक ह नह , शंसनीय भी है। जो खम' इस अथ क स पु तक स ता ठान के ये

पंच का क चा ठा है।

आकाशवाणी के पीछे

साइंस कॉलेज हॉ

डॉपुनीत क मार

शवपुर (म ) पन-473-551

  • 1. ष से जुड़ा बाल म मजदरू नह 9

  • 2. वैि वक बाजार म चरखा 13

वषय-सूची

  • 3. रोट को खतरे म डालता आ थक वकास 17

  • 4. वदेशी पूंजी का कसता शकंजा 20

  • 5. बाजारवाद क मंडी म रा 24

  • 6. थक मंद के लाभ 28

  • 7. फसल के घटते मू य और दम तोड़ता कसान 31

  • 8. नमक म नु स और या यालय 35

  • 9. ाक तक आपदाओं म आदमी 38

  • 10. मानवा धकार का हनन और टा चार 42

  • 11. भूख क मार हलाएं 45

  • 12. बढ़ते तापमान से डूबता कसान 48

  • 13. थक सम भारतीय परंपरा 51

  • 14. भूख से भयभीत देश 55

  • 15. जल समा ध लेता भारतीय उपमहा वीप 59

  • 16. यो गक ां त के पयावरणीय

रणाम 62

  • 17. संह बनाम आ दवासी संघष 65

  • 18. मुसीबत का मानसून 69

  • 19. यापार के लए ए स का हौवा 73

  • 20. संकट बनता इले नक कचरा 76

  • 21. दषणू

से द होती न दयां 78

  • 22. वकासशील देश का क ड़ाघर बनता भारत 82

  • 23. पे लयम पदाथ बने पयावरणीय

संकट 86

  • 24. सेहत के लए संकट बनती दवाएं 89

  • 25. ा म समानता क पहल 92

  • 26. पा म म मानवा धकार ा के औ 95

  • 27. भेद बढ़ाता ा का अथशा 99

  • 28. खेती को खतरे म डालती आनुवं शक फसल 102

  • 29. वदभ राह पर बुंदेलखंड 105

  • 30. पानी क उपल धता का अ धकार 108

  • 31. दय को संकट म डालते पघलते हमनद 111

  • 32. थक वकास से जुड़ा पानी 114

  • 33. वन को संकट म डालते वन कानून 117

  • 34. लोक लुभावन नारा और स ता अनाज 120

  • 35. सुरसामुख बनती भूख 123

  • 37. वदेशी बक काले धन का व क तमान

130

  • 38. त के लए संकट बनता आधु नक वकास 133

  • 39. थक सुधार के दौरान घटा रोजगार 136

  • 40. थक वकास ने बढ़ाया भूख का दायरा 139

  • 41. संकट म है जैव वधता 142

  • 42. तबाह पूव सूचना है नलक प ां 145

  • 43. तक संसाधन घटती उपल ता 150

ाक

  • 44. जैव वधता के वनाश से जुड़ा भोजन का संकट 154

  • 45. थक मंद और घटता औ यो गक उ पा 157

क ृ ष से जुड़ा बाल म मजदरू नह

महा मा गांधी ने म आधा रत ा क वकालत थी ले कन हमारे बाल म अथवा बाल मजदरू के

वतमान

यास और भावी उप म को अ भशाप के दायरे म समेट देने क को शश भर रह गये ह । हाल ह

बचपन क चंता करने वाल सं था रा य बाल अ धकार संर ण आयोग क शांता हा ने खेती और

पशुपालन से जुड़े बालक-बा लकाओं को इनसे वं चत कर देने का शगूफा छोड़ा है। य द क ष और पशुपालन से जुड़े

दैनं दन बाल म को बाल मजदरू के बहाने इन काय से वं चत कया जाता है तो यह कायव ाह दनचया शा मल

म और ान परंपरा से खेलते-खेलते बह त क छ सीख व समझ लेने क वभा वक और यावहा रक जीवन के लए

याओं म बाधक होगी। दरअसल यावहा रक गणव तापूण ा के साथ बचपन बचाने के लए उस

संवेदनशीलता क रत है जो अंतमन

या-भाव उपजाती है। मौजूदा हालात थक सम का दंभ और कानून

के रखवाल वारा ह कानून से , बाल शोषण एवं अ याचार के सबसे बड़े कारण बन रहे ह

आधु नक वकास, पा चा य जीवनशैल , थक सम और पा रवा रक इकाई का वघटन बाल म के ता र और

तीय शोषण का कारण बने ह ये ह । महंगी अं ेजी ा और गर ब का सरकार वा य लाभ से वं चत होते जाने के

हालात से भी बाल मजदरू बढ़ रह है। ऐसे वपर त हालात ामीण वकास व संरचना से जुड़े काय से बालक

को म क कानूनी जद म लाकर बाल सम या को और भयावह ह बनाएंगे? दरअसल बाल म संबंधी जो भी कानून

अब तक सामने आये ह वे गर ब व लाचार के लए संकट और अमल म ईमानदार न बरती जाने के कारण सफेद हाथी

बनी सरकार यव था के लए शोषण व टाचार के कारगर व लाभकार थयार ह सा बत ह ये ह । ये कानून बाल

म क बु नयाद पर क ठाराघात के औजार कभी सा बत नह ं ह ये। इन कानून के संदभ चार- सार से यह

अवधारणा ज वक सत ह ई है क पहले िजस बाल म को हम क या ण का कारक मानते थे उसे अब शोषण का

कारक मानने लगे ह । ले कन श दावल इस वभाजक मान सकता से बाल म क ि तय कोई व

रवतन नह ं आया है।

बाल म उ संबंधी ध सं हताएं बाल म को भेद क ि ट से देखती ह 10 2006 से भावी ह ये

बाल नवारण कानून के ज रये 14 साल से कम उ के ब चे को घरेलू नौकर के प म काम करने के अलावा

ढाव , रे रां, होटल , दकान

, कारखान , थर या कोयला खदान , ईट भ और रेल मक पर रोक लगाई ह ई है।

बावजूद इसके इन सभी सं थान बाल म जार है। हम ा को जाग कता का मूल कारण व आधार बताते ह ,

ले कन बतौर घरेलू नौकर िजतने भी बाल मक ह वे ऐसे ह त घर , िज ने ा से ठा ,

ओहदा और आ थक सम हा सल क है। इस सल सले म वरोधाभास यहां तक है क िजन सरकार धकार और

कमचा रय का दा व बाल मक को बाल म से मुि दलाने का है उनके घर