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(ट प – साम ी, वषय-व तु व भाषा-शैली के कारण यह उप यास ब च व कशोर के िलए अनुशंिसत

नह ं)

रचनाकार संपक:
C/O – ी आर ए िम ,
2284/4, शा ी नगर,
सु तानपुर (उ )
पन 228001
-------------.
आमुख

पर य 1950
सुलतानपुर से उ र इलाहाबाद फैजाबाद रोड पर, जहाँ दसव कलोमीटर का प थर

गड़ा है , वहाँ खड़े होकर प म क तरफ दे ख, तो आधे कलोमीटर क दरू पर रे लवे

लाइन से सटा गांव है च दौली। इसके उ र म अह र और कुिमय का गाँव है ब हरा,

प म म कु हार क एक छोट ब ती है , द ण म कलोमीटर भर क दरू पर

मुसलमान का भी वैसा ह एक छोटा पुरवा है , पूरब म रे लवे लाइन और जंगी सड़क।

गाँव म इस समय पचासी घर ह, जसम तीन घर नाइय का है और चार कहार का।

गाँव के द ण कोने पर चमरटोली है जसम दस घर चमार ह बाक गाँव क आबाद

ा ण क है । यह है मेरा गाँव, इसक चौह और इसके बािस दे । अगर आप मेरे गाँव

को जानते ह तो आप मुझसे ज र पूिछएगा क आपके गाँव म आ खर ऐसा या है जो

आप उस पर पोथा िलखने बैठ गए ह ? आपका कहना सोलह आने सच है । इस गाँव म

न तो अतीत म ऐसा कुछ था और न ह वतमान म कुछ है जस पर म गव से कह

सकूँ क हाँ यह मेरा गाँव है । इस गाँव के खाते म सचमुच कुछ भी नह ं है , फर भी

पता नह ं ु परे शान करता है , जब भी म िलखने के िलए कोई वषय


य यह मुझे बहत

उठाता हँू तो यह कसी न कसी बहाने मेर आंख के सामने आकर खड़ा हो जाता है मेरे

बूढ़े बाप क तरह, मेरे चेहरे पर घृणा से ताकता है और प च से जमीन पर थूक दे ता है !

म झूठ मूठ का तुझसे उ मीद कर बैठा था। अरे , जो आदमी अपना प रचय दे ते समय

अपने ज म थान का जकर आने पर, अपने जले तक का नाम न ले सके वह - - और

उस समय उसका मुँह - - कुछ इस कदर बगड़ उठता है जैसे उसने मेरा चेहरा नह ं कोई

ु चीज चख िलया हो। बाप भी मेरे इसी तरह, जब खीझकर मेरे सामने
िनहायत सड़ हई

आकर खड़े होते थे, तो उनका चेहरा भी इसी तरह बगड़ा हआ


ु होता था। आँख उसी तरह

उनक िसकुड़कर छोट हो जाती, अरे जो श स अपने बाप को बाप कहने म ल जा


महसूस कर उससे . . . . पताजी क बात चाहे जतनी भी तीखी और कड़ु ई य न हो

ले कन यह सच है क म अपने बाप को बाप कहने म अभी भी शम महसूस करता हँू ।

पताजी जब भी गाँव से मेरे पास आते ह, उनक मैली धोती, रे ह म पछार कर धोई हई
ु ,

िसकुड़ मुकड़ कमीज, ला टक क पनह और सारे वजूद म उनके, रचा बसा वह

गवांर और गव पन, बड़ शम लगती है लोग को बताते, आप मेरे पताजी ह। ऐसा नह ं

क इस ल जा और संकोच को उ होने ताड़ िलया हो, इसिलए मुझ पर वे िचढ़े हए


ु ह।

अगर वे मेर इस मानिसकता को ताड़कर, मुझ पर िचढ़े होते तो इसे म झुठला दे ता

और इसे इस कदर झुठला दे ता क वे कायल हो जाते क नह ं, उनका ऐसा सोचना

गलत है , ले कन उ ह समझाने के िलए मेरे पास ऐसा कोई दाँव बचा ह नह ं ह क उ ह

कसी तरह कायल कर सकूँ। वे मेरे बाप नह ं ह, यह बात म ाय: उनके मुंह पर ह

कह चुका हँू । हआ
ु यूँ क उस दन वे पहले-पहल, मुझसे िमलने मेरे पास आए थे। जैसा

बताया वह मटमैली उटं ग धोती, वह कमीज, जसे वे गाँव म प ह दन तक लगातार

बना धोए पहनते रहते ह, मुचड़े कालर, ला टक क पनह । सुबह का समय था ट ट -

पेशाब करने के िलए उ ह ने कान पर जनेऊ चढ़ाया था और कु ली के िलए साफ पानी

न िमलने के कारण जनेऊ अभी भी उनके कान म लपेटा हआ


ु था। िसर पर उ ह ने बोर

रख रखा था जसमे, घर से चलते समय शकरकंद, गुड़ और चबेने बाँध रखे थे। आने

के पहले, उ ह ने मुझे कोई इ ला नह ं कया था इसिलए उ ह लेने म टे शन भी नह ं

जा सका था। अगर उनके आने क मुझे पूव सूचना होती तो म घर पहंु चने के पहले

उनक हिलया
ु को पूरा नह ं तो कुछ हद तक तो बदल ह दे ता।

उस दन िसर पर बोर रखे और दा हने हाथ म झोला लटकाए जब वे

मोह ले के एक लड़के के साथ मेरे डे रे पर पहँु चे थे तो डे रे क सजावट और लान और

नौकर दे खकर फूलकर गदगद हो गए थे, उस दन रा ते क या ा से थ उनके चेहरे


पर जो गव िमि त आभा दप दपा रह थी उसे मने दे खा था और उस समय मेरा मन

उनके ित ा से भर गया था। कतना क झेले ह इस श स ने मेर पढ़ाई के िलए

? उनके िसर से बोर उतार, म उनके दोन पाँव छू चरण रज अपने माथे से लगाया

था। उनके दातून नहाने का इ तजाम करके अपने हाथ भोजन तैयार कया था और उ ह

नहला-धुलाकर अपना अ धी का कुता और धोती, जो म खास-खास मौक पर पहनने के

िलए रखा हुआ था उसे उ ह पहनाया था और उनक हिलया


ु अपना बाप कहने लायक

बदल दया था। ले कन उ ह खला पलाकर हर काम से िनवृ ा होकर ीफकेस लेकर

य ह म द तर के िलए बाहर िनकला था ऊपर त ले से िमसेज साहना टोक बैठ ं थी।

शमा साहब सुबह-सुबह कौन था वह?. . . और उनके चेहरे पर बड़ा ह तीखा सा यंग

ू ? ले कन यंग को
उतर आया था . . .जैसे कहना चाह रह ह कौन था वह काटन

लाइमे स पर पहँु चा दे ने के िलए, उ ह ने श द का इ तेमाल न करके, अपनी मु ा

कुछ इस कदर बना ली थीं क वह श द से भी यादा तीखा हो उठा था। अगर यह

, िमसेज साहना मुझसे, पताजी के बारे म जानने क गरज से पूँछ होती, तो हो

सकता है म उनसे यह कहने क ह मत बटोर भी लेता क वे मेरे पता जी ह, ले कन

उस समय उनके चेहरे पर, जस कदर यंग आ अटका था उसे दे ख म कसी भी तरह,

पता जी को पता जी कहने क ह मत नह ं बटोर सका था, दमाग के क यूटर ने

इस से कट िनकलने का रा ता भी तलाश कया था पर तु कोई उपाय नह ं था,

िमसेज साहना के इस से बच िनकलने का। य क ऊपर के त ले पर िमसेज साहना

क यंग िमि त वह मु ा चमगादड़ क तरह मेरे चेहरे पर अपने डै ने फैला, आ िचपक

थी और बना मुझसे अपने का जवाब िलए वह वहाँ से हटने का नाम ह नह ं ले

रह थी। वो! वो! सुबह जो आए थे. . . वे . . . मेरे अपने दरू के र तेदार ह, गाँव से

आए ह। बड़ा खुश हआ
ु था म अपनी कट बु पर य क ऐसा कट िनकलने पर म
पता जी को िसफ पता जी कहने से नह ं बचा था, ब क अभी तक जो म लोग से,

अपने िनख ट गवई होने क बात छुपा, बनारस का वािस दा कहकर उनम एक तरह का

िस का जमा चुका था, उसक पोल खुलने से भी बच गया था। म अपनी बु पर

पुल कत होता िमसेज साहना को संतु करके चलने को हआ


ु था, तो दे खता हँू पताजी

कमरे से बाहर िनकल बरामदे म खड़े ह।

सकपका उठा था म पताजी को बरामदे म खड़ा दे ख। उनका चेहरा उस

समय उतरा हआ
ु था और वे मुझे बड़ अजीब से दे खरहे थे। इतने दन म म

ए जी यू टब पो ट पर बैठ, अ छे ए जी यू टब को अपने मातहत को यादा से यादा

ए ै ट करने और अपने से बड़ को खुश करके उ ह संतु रखने का गुर सीखने के

साथ-साथ इतना भी सीख चुका था क कसी बकट वपर त थित को साम, दाम, दं ड

वभेद क नीित अपना, थित को अपने प म मोड़ा कैसे जा सकता है । पता जी को

सामने खड़ा दे खकर म णभर के िलए ज र गड़बड़ाया था ले कन तुरंत ह स भाल

िलया था अपने को। समझा लूँगा पता जी को. . . जानते ह बाऊजी बड़ा झूठ बोलना

पड़ता है , इतने ऊँचे पो ट पर बैठकर। बाऊजी इतने म ह गदग हो उठगे, जानता हँू

उनक कमजोर ? कसी माँ को खुश करने के िलए जस तरह उसके ब चे क तार फ

कर दे ना भर ह काफ है उसी तरह पता जी को खुश करने िलए इतना भर ह काफ

होगा, और म पता जी क तरफ से िन ंत हो द तर चला गया था।

ले कन जैसा मने सोचा था उस तरह कुछ भी नह ं हआ


ु था। शाम को

द तर से लौटकर जब म घर पहँु चा था तो पताजी घर पर नह ं थे. . पताजी वापस

गाँव लौट गए थे, जाते समय रसोइए से कहकर गए थे क मेरे गांव के एक दसरे

आदमी भी शहर म रहते ह म उ ह ं के पास आया था और वह ं जा रहा हँू । साहब के

पूछने पर बता दे ना क उनसे िमलकर म गाड़ पकड़ू ं गा और आज ह वापस गांव चला



जाऊंगा . . . .। और मेरे िलए वे एक कागज के टकड़े पर बड़ा छोटा सा संदेश िलख,

मेज पर दबा दए थे। एक ज र बात भूल गया था, गांव लौटना ज र था इसिलए जा

रहा हँू , परे शान मत होना तु हारा . ... नीचे उ ह ने कुछ नह ं िलखा था. ... रसोइये से


संदेश पा और मेज पर दबाकर रखे कागज के टकड़े पर उनका छोड़ा संदेश पढ़, म

एकदम हत भ रह गया था। इतने दन ए जी यू टव पो ट पर रह कर जो भी दांव

चला था कभी खाली नह ं गया था ले कन उस दन म जस बात को मामूली बात समझ,

उसे कनगुर का खेल समझ बैठा था उसी से इस कदर पट जाऊँगा कभी सोचा भी नह ं

था।

सच कहना है आपका कुछ भी नह ं है मेरे गांव म। पताजी के िनहायत

घ टया वजूद क तरह ऐसा घ टया वजूद क म उ ह अपना बाप कहने क ह मत नह ं

जुटा पाऊँ। फर य आप िलखने बैठे ह उस गांव पर, है आपका? आपके इस

का मेरे पास कोई जवाब नह ं है । य क अगर म यह कहँू क मुझे अपने गांव क उस

ु , पला और बढ़ा उससे मेरा लगाव है इसिलए म अपने गांव


माट से जसमे म पैदा हआ

के बारे म िलखने बैठा हँू तो यह एक िनहायत झूठ क बात होगी य क मुझे अपने

गांव से कोई लगाव है ऐसा मुझे कभी लगा ह नह ं। उ टे जब भी कभी गांव जाता हँू ,

तो दो दन म ह मन ऊब उठता है , मन होता है भाग चलूं यहाँ से। य क जब म

अपने घर म होता हँू , जसम म पैदा हआ


ु , तो घर के भीतर और बाहर म खय क

िभनिभनाहट, खाने बै ठए, एक हाथ से म खयाँ हड़ाते र हए जरा सा हाथ का नह ं क

म खय क झुंड क झुंड भोजन पर आ मण कर दे ती है , जहाँ भी बै ठए म खय क

झुंड िभनिभनाती रहे गी, गम के दन म उमस और लू, लगता है दम घुटा जा रहा है ,

बरसात म चार तरफ क चड़ और गंदगी, न दन म चैन न रात म। ब तरे म जाइए

तो म छर का आ मण, गम ऊपर से। बचाव के िलए सार रात बैठ पं खयाँ डु लाकर
म छर क फौज और उमस से लड़ते र हए। लगाव के िलए जो एक बात सबसे

आव यक है वह है ेम और आ मीयता जसके बूते हर तरह क मुसीबत झेल ली जाती

ह ले कन यहाँ ेम और आ मीयता नाम क चीज, कह ं एक कतरा भी नह ं िमलेगी, न

घर के भीतर और न ह बाहर। घर म सभी अपने ह एकदम सगे भाई-भतीजे, बहुएं

ले कन कोई भर मुँह कसी से बोलता नह ं। व े ष, ईषा, डाह और जलन लोहे क द वार

बन खड़ हो गई ह आपसी र त के बीच। य आपसी र ते इतने कटु हो गए ह क

अपने सगे आपस म एक दसरे


ू का चेहरा दे खने से परहे ज करने लग? घर-घर दे खए

कारण वह एक - उसने उसका इतना दबा िलया, उसने इतनी बेइमानी कर ली। सोचा हँू

बहत
ु सोचा हँू या कारण है गांव म या इस बैमन यता का? जबाब जो सामने आता

है वह जंचता नह ं। जबाब है अभाव, आिथक पछड़ापन। ले कन या यह पछड़ापन

पहले नह ं था? था और द र ता के तर तक यह या था ले कन उस समय तो यह

गांव ऐसा नह ं था क यहाँ दो दन म ह दम घुटने लगे। फर या है जो मुझे इस गांव

के बारे म िलखने पर मजबूर कया है? शायद पताजी का घृणा से बगड़ गया उनका

वह चेहरा और जमीन पर उनका वह प च से थूकना क उनके मुंह म कोई बड़ भयानक

बदबूदार चीज घुस गई हो, और उनके वे श द, हँु ह जो आदमी अपने बाप को बाप न

कह सके उससे .......... हो सकता है ......कारण यह हो, या हो सकता है क जो

रका नशन मुझे बाहर अपने काय े म िमला हआ


ु था, वह रका नशन म अपने

गांव से और अपने बाप से भी चाहता था ले कन उन लोग से रका नशन िमलने क

बजाय, मुझे ताड़ना और द ु कार िमला, जसके कारण मेरे भीतर वष से दबा पड़ा वह

प ाताप, वह िचढ़ मुझे इस गांव के बारे म िलखने पर मजबूर कया है । या है इस

िलखने के पीछे म खुद भी नह ं जानता ले कन इतना म ज र जानता हँू क इस गांव के


बारे म इतना कुछ जानता हँू क इस पर एक पोथा िलख दँ ू और शायद इसीिलए म इस

पर िलख रहा हँू ।

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ु दे ख िलया है , उसने भी मुझे दे खा है ।


जूधन को मने दरू से ह आते हए

मुझे दे खकर उसक ाकृ ितक चाल म कुछ लंगड़ाहट सी आ गई है , लगता है जैसे उसके

पांव जमीन पर िघसट-िघसट जा रहे ह। नंग खुरदरे पांव, सी कया टॉंगे, पंडिलय पर

बरगद क बरौ हय सी फैली नसे, मैली चीकट धोती और दे ह पर खाक कमीज, उसक

सी कया शर र से एकदम बेमल


े उसके टखन तक झूल रह ह। जूधन से जब भी िमला हँू

उसे इसी प म दे खा हँू, कह ं कोई प रवतन नह ं है । वह खाक क कमीज, टखन तक

लपेट धोती, सी कया शर र, अगर कह ं कोई प रवतन हआ


ु है तो जूधन के चेहरे पर

और शर र पर। जूधन को दे ख नह ं लगता उसक उ पचास के इद िगद होगी। लगता है

जूधन स र पार कर चुका है । ले कन जूधन मुझसे या तो एकाध साल बड़ा होगा या

छोटा इससे यादा नह ं।

पायलागी भइया .... बरामदे क सी ढ़य के पास पहँु च, जूधन अपने दोन

हाथ िसर पर बांध, झुककर मुझे पैलगी कया है और अपना िसर झुकाए, उसी मु ा म

मेरे आशीवाद के इं तजार म खड़ा हो गया है । आओ हो जूधन ठे केदार ....... आओ,

आओ कैसे हो? मेर टर पा, जूधन अपनी शर र उसी तरह झुकाए, सी ढ़याँ चढ़ मेरे

पास आया है अपने दोन हाथ से मेरे दोन पांव पकड़ जमीन पर बैठ गया है । कैसे हो

भइया .........? जूधन क िसफ आवाज म ह नह ं, उसके हाव भाव म भी आ मीयता

के साथ साथ हमेशा क तरह वैसी ह दयनीयता िलपट हई


ु है । पहले जब भी घर आता

था, जूधन इसी तरह मेरे पांव पकड़ बैठ जाता था मेर खैर पूछता था, कुछ नयी पुरानी

बात होती थीं और इ ह ं बात के म म वह मुझसे अपनी फट खाक क कमीज या


धोती दखा मुझसे एक उतारन के िलए िनहोरा कर बैठता। उन दन जूधन के वे सारे

हाव भाव मेरे िलए कोई मायने नह ं रखते थे। न उसक वह आ मीयता और न ह

उसक वह दयनीयता। जूधन और म बचपन म एक साथ भसे चराया हँू , कब ड , झाबर

और सुर खेला हँू जैसी बात भी मुझे उ े िलत नह ं करती थीं। उस समय जूधन मेर

नजर म िसफ एक जाचक हआ


ु करता था जसे दे ख म पहले ह समझ जाया करता था

क जूधन अभी अपने िसर पर अपने दोन हाथ बांध, झुककर मुझे पैलगी करे गा, उसी

तरह झुके झुके मेरे पास आएगा, मेरे दोन पांव पकड़ जमीन पर बैठ जाएगा, धीरे -धीरे

मेरे पांव दबाते दबाते मेर हाल पूछेगा, प ी के बारे म पूछेगा, एक-एक ब चे के बारे म

अलग-अलग पूछेगा, म उसे सबक हाल बताऊँगा ले कन मेरे मन म एक बात जो सबसे

आगे रहे गी वह यह क जूधन के सारे हाव-भाव, दयनीयता और आ मीयता उसक इतनी

पूछ पेख मुझसे एक उतरन ा करने के िलए है । जूधन के इस हाव भाव पर म शायद

दो चार दफा ह पसीझा हँू बाक म, उसे मने कोई न कोई बहाने करके टरका दया हँू

....... नह ं है जूधन ...... कोई पुराना नह ं है दरअसल' आजकल के कपड़े ज द बूढ़े ह

नह ं होते न ...। हाँ वो तो है भइया ...बूढ़े होगे कैसे भइया ...एक एक कुत म एक एक

गोई बैल तक क क मत जो लगती है ....। ले कन आज जूधन को दे खकर मेरे भीतर,

उसके ित अजीब क आ मीयता उभर आयी है , भस के बीच गोदाह दोन हाथ म

पकड़, मुंह से खड़ु ताल, मृदंग और मजीरे क ताल िनकाल अपनी शर र को लहरा कर

ठु मके दे ता जूधन ....... हाँ हाँ तो सुनो ...........भाइय ......आज क ताजा खबर ....मेरे

बख रहा (मािलक) को हमार माल कन ने खला दया बड़ा ........ बड़ा था सड़ा, खाकर

मािलक बैठे चौपाल म और लगे करने वाँय वाँय ऊपर से और नीचे से वॉय वॉय

........गदन हवा म तान आगे पीछे झटके दे ता और नीचे चूतड़ को दा हने हाथ से ऊपर

को खींच नौटं क के वांग क नकल करता जूधन .......।


जूधना आ ऽ ऽ

हाँ मािलक ...... हाथ जोड़ कर बैठ गया है जूधन मेरे पैर के पास .......

म अगोछे को बरकर कोड़े बना, अपनी गदन ऐंठ जूधन को िनगलती नजर से दे ख रहा

हँू ......

कल मेरे खेत म पुर लगा था, तू नह ं आया .....?

नह ं आया मािलक ... आ नह ं पाया माई बाप ....।

य ऽ ऽ ऽ ..... मेरे चेहरे क नसे तन गई ह आँख मेर टे ढ़ हो गई ह....

माई बाप खाल उधेड़ ली जए ले कन जूधन वह बात जुबान पर नह ं लाएगा ......

तुझे अपनी जान क परवाह नह ं है या मरदद


ू ?
है माई बाप ..........

बाल ब च क परवाह नह ं है ?
है माई बाप

तो ओ ऽ ऽ फर बोलता य नह ं। क ड़ा हवा म फटकार अपना दा हना पांव जूधन के

कंधे पर रख, उसे जोर से ध का दया हँू ...... जूधन जमीन पर दोतीन दफा प टा

खाकर, उठा है और पुन: आकर मेरे पैर से िलपट गया है ;

मािलक, माई बाप, अगर वह बात म अपनी जुबान पर ला दँ ू तो फर मािलक मेर

खलड़ उधेड़ उसम भु स भरवा दगे .........

नह ं भरवाऊँगा तू बोल ... एक दम िनडर होकर बोल

माई बाप ... मार दगे मुझे ... जूधन िगडिगड़ा रहा है मेरे पांव पकड़ .....

नह ं मा ं गा, बोल, कहता हँू ...

तो सुिनए मािलक . . . बख रहा क माल कन है न उनके ट ंट म खुजली हो रह थी,

वह ं खुजलवा रह थी मुझसे

आँ ऽ ऽ य जोर क हँु कार भरा हँू म


इसी बीच जूधन मेरा पांव छोड़ खड़ा हो गया है और अपनी कमर पर दोनो हाथ बांध,

मेरे आगे झुक आया है . .. ोध म भरा म अपने हाथ का कोड़ा हवा म लहराया हँू ,

कोड़ा हवा म लहरते ह जूधन क शर र कपकपाई है और म भरपूर कोड़ा जूधन क

पीठपर दे मारा हँू सड़ाक .. .. सड़ाक .. सड़ाक .. ... ... ...

चमरौट के वहाड़ चमार, जब नाच म क रं गा बनकर उतरते थे तो वे, पीठ पर कोड़वाई

(कोड़े ) रोपने के िलए चमड़ा लगा जा कट नह ं पहनते थे। खुली पीठ पर ह वे कोड़वाई

रोपते थे। जूधन, वहाड़ क नकल करन के िलए, अपनी दे ह के कपड़े उतार दे ता था

ले कन म अगोछे को इतने कड़े से बरता था क जब वह जूधन क पीठ पर पड़ता तो

वह ितलिमला उठता था और इसी ितलिमलाहट म मुझसे वह कभी कभी लड़ बैठता था।

इतने जोर से हम य मारा ...... उस समय मेरे और जूधन के बीच एक नए क म

का सं ाम िछड़ जाता। चरवाह म दो गुट हो जाता। कुछ जूधन का प ले लेते कुछ

मेरा, बदला सघा रहे ह उस दन का, भला बताइए कोड़वाई के िलए कोई इतने जोर से

अंगोछा बरता है ...........?

अरे कोड़वाई कोई फूल क मार थोड़ो है ........ नह ं सह सकता तो बड़ा वहाड़ बनने

य चला है ?

दो गुट . एक जूधन क तरफ उसे हर तरह से मुझसे िभड़ा दे ने पर उता

दसरा
ू मेरे प म, मुझे कसी तरह न झुकने दे ने के िलए उता

उ ह मजा लेना है पहले उस क रं गई म फर मेरे और जूधन के बीच के झगड़े म .......।

यह वह जूधन है ..... मुझसे मेरे कोड़े छ न पड़ जाता मेरे पीछे ...... अतीत के कइय

य मेर आँख के सामने चलिच क तरह घूम रहे ह। पता नह ं जूधन क भी वे सब

य, बात अभी तक याद ह या नह ं? नह ं याद होगी उसे वे बात, आज पतीस चालीस

साल गुजर चुके ह उन बात को बीते, नह ं याद होगा जूधन को ........

जूधन तु ह वे पुरानी बात याद ह ....... जब हम छोटे थे ........?


याद है भइया

सुनकर मुझे खुशी हई


ु है क मुझे ह नह ं जूधन को भी वे पुरानी बात याद ह .....

अ छ तरह याद ह भइया, जूधन थोड़ दे र के िलए ककर शायद अपनी या ा त को

वतमान से खींचकर अतीत म ले गया है, अतीत म पहँु चते ह जूधन के चेहरे पर बड़

यार सी खुिशयाली खेल गई है ...खूब अ छ तरह याद है भइया ! रात म सी ढयाँ

लगाकर हम लोग पछवाड़े के रा ते नाच दे खने िनकल जाया करते थे और सबेरे वापस

आकर कब सो जाते कसी को पता भी नह ं चलता था। ले कन एक दफा हम लोग क

चोर पकड़ भी गई थी शायद तुम उसे भूल गए हो? नह ं भूला नह ं हँू भइया रात म

जब हम लोग लौटे थे तो बड़े मािलक ने पछवाड़े से सीढ़ हटवा दया था ..... बड़ मार

पड़ थी भइया उस दन .....

याद है न तु ह वह?

अ छ तरह याद है भइया .......

तुम वहाड़ क रगा बना करते थे वह भी याद होगा तु ह ?


याद है भइया ............ खूब याद है ...........

म तु ह बोलवाई मारता था याद है न ....?

हाँ याद है म खुली पीठ पर बोलवाई रोपता था ...... ले कन आप अंगोछे को इस तरह

बर दे ते थे क बोलवाई चाबुक क तरह पीठ पर लगती थी।

तब तो तु ह यह भी याद होगा क तुम मुझसे बदला लेने के िलए घंट मेरे पीछे पड़े

रहते थे ....

हं हं हां याद है भइया ! ले कन वह छोटॅ इयाँ क बात है छोटॅ इयाँ कतनी खराब चीज

होती है भइया

और उस दन तुमने मुझे पेड़ पर छक िलया था और डाली पकड़कर इतनी जोर

से झकझोर दया था क म जमीन पर आ िगरा था, याद है न


हाँ भइया याद य नह ं रहे गा भला, इस बात पर हालां क जूधन पहले क तरह

चहकने क कोिशश कया था, ले कन उसक आवाज ने उसका साथ नह ं दया, णभर

पहले जो उसका चेहरा खला हआ


ु था वह भी, इस बात के उठते ह एकदम उतर सा

गया था।

दे खो उस दन मुझे यहाँ चोट लगी थी, लरकइयाँ क वह चोट जूधन को दखाने

के िलए म अपनी कुत क बाँह ऊपर उठाता हँू तो जूधन मेरे और कर ब सरक आया है

और मेर बांह म लगी चोट के उस थान को सहलाने लग गया है । यह है वह जगह न

भइया?

हाँ ! यह है वह जगह लगता है तु ह भूल गया?

नह ं भूला नह ं हँू भइया, मुझे याद था और इस हाथ म लगी थी

नह ं नह ं इसी हाथ म लगी थी और यह है वह जगह

भला बताइये याद य नह ं रहे गी भइया छोटके मािलक उस दन इतने जोर से

बगड़े थे क अगर मुझे पाते तो मेर जान ह ले लेते। मािलक क तरह मेरे बाबा भी

लाठ िलए मुझे दन भर तलाशते रहे थे, अगर उस दन म उ ह िमल गया होता तो वे

मेरा हाथ गोड़ तोड़कर रख ह दे ते, वह तो कुशल था भइया क उस दन म िमला ह

नह ं

उस दन तुम ड ड़यवा वाले आम पर छुप गए थे न ?


हाँ भइया वह ं छुपा था

तु ह डर नह ं लगी , वहाँ ?

वैसी हालात म डर, भइया तब तो फकर थी क अगर कसी ने मुझे दे ख िलया

तो फर मेर जान क खैर नह ं

तुम तीन दन तक वह ं उसी पेड़ पर छुपे रहे थे न ?


हाँ भइया तीन दन तक,

बना खाए पए ?
हाँ भइया बना खाए पए

तीन दन तक न, हाँ भइया तीन दन तक

मुझे चोट लगने के बाद जूधन अपनी गाय और बिछया छोड़ जो भागा था तो

उस दन से तीन दन तक उसका कह ं पता नह ं चला था। सारे गांव म हहन खहन पड़

गया था, ज र कह ं तारा इनारा ले िलया उसने या जाकर रे ल के नीचे कट मरा, पहले

तो जूधन के बाबा और मेरे क का जूधन को उसक बदसलूक का दं ड दे ने के िलए

उसक तलाश म घूमते रहे थे, ले कन जब दन और रात खोजने के प ात ् भी जूधन

नह ं िमला तो लोग िचंितत ह गए, ज र कह ं उसने कूद कादकर आ मह या कर िलया

है । लोग जूधन क लाश क तलाश म हर संभा वत जगह कँआ, तालाब छान मारे थे,

ले कन जूधन का कह ं पता नह ं चला था और इधर जूधन ड ड़यवां के बड़के और घने

आम के पेड़ के बीच, एक डाली पकड़े मार क डर से दबका


ु बैठा रहा था तीन दन तक

ले कन जब तीन दन के बाद उससे भूख यास बदा त नह ं हई


ु तो वह लगा था जोर

जोर से रोने और उसका रोना तब शु हआ


ु था जब व हरा के भागवत, अपनी भेड़े

चराते-चराते, ड ड़यवा पर पहँु चे थे। भागवत को दे ख जूधन बड़े जोर से रोने लगा था।

पहले तो आम के झुरमुट से रोने क आवाज सुन भागवत घबराए थे कह ं वर ह बाबा तो

नह ं ह यह जो मुझे अकेला पाकर डरवाने क कोिशश कर रहे ह? ले कन जब रोना

लगातार वैसे ह चलता रहा, तब वे ह मत करके आम के पेड़ के नीचे आ पाए .....

नह ं बर ह बाबा नह ं हो सकते ये, भागवत डरते कांपते पेड़ के नीचे जाकर दे खते ह तो

जूधन आम क डाली से िचपका जोर जोर से रो रहा है

कौन है रे .......?
म हँू , जूधन........... बाबा..... रोते रोते जूधन ने जबाब दया था

जूधन, कौन जूधन रे .....?

फक र का बेटा............. चमरौट ....

फटाक याल आया था भागवत को ........ जूधन के गुम होने क खबर गांव म

ह नह ं अगल बगल के गांव म भी फैल चुक थी,

फक र का बेटा-अरे तू, वहाँ या कर रहा है पूत.....?

जबाव म जूधन का रोना और तेज हो गया था .......

भागवत जूधन को चुप रहने क हदायत दे कर पेड़ पर चढ़े थे और उसे ऊपर से

उतार कर नीचे लाए थे। तीन दन का भूखा यासा जूधन ल त, चलने क ताकत नह ं

थी, भागवत उसे घोड़इयाँ लाद कर घर लाए थे।

यह तो थी बचपन क कुछ याद, जस पर म और जूधन, थोड़ दे र तक बात

करते रहे थे। ले कन बचपन पार कर जब हम दोन जवानी म पहँु च,े तो म अपनी

गृह थी म रम गया था और जूधन अपनी गृह थी म।

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नीम के पेड़ के नीचे काली सहाय के गड़ासे क पहली चोट पर ह लेब ड़हा

बाबा क आँख खुल गई थी। एक तो पक उ दसरे


ू काितक क िभरह , कम ह नींद

आती थी उ ह रात म कइय दफा उठ-उठ कर सुकवा का आकाश म चढ़ना दे खते रहते

थे। डर थी कह ं, नींद पड़ गई तो जुधना हल नाधने म िभंसार कर दे गा।


ठ क ठ क ठकर ठ क ठ क ठकर ठ क ठकर ठ क

मुंह पर से रजाई हटा, पूरब के आकाश क तरफ अपनी नजर पौड़ा सुकवे

क खोज करने लगे थे लेव ड़हा, इस ससुरे को रातभर नींद नह ं आती.... पता नह ं

कसके िलए इतना मरता है । पूरब के आकाश म सुकवा कह ं नजर नह ं आया था उ ह,

और न ह कसी तरफ से कोई और ह आवाज सुनाई पड़ थी। इसिलए उ ह रात का

अ दाजा नह ं लगा था ले कन इतना वे समझ गए थे क रात अभी काफ बाक है और

शायद अभी दसरा


ू पहर ह चल रहा होगा, य क रात का तीसरा पहर शु होते ह गांव

म काफ हलचल शु हो जाती है और प न से बैल को टटकोरने, डॉटने क कइय

आवाज आने लगती ह। उस समय तक शुकवा भी पेड़ क ऊँचाई से ऊपर िनकल दगर

दगर चमकने लगता है ।

ठकर ठकर ठ क ठ क .............. काली सहाय के गड़ासे क ठकर ठकर

व मृत कर, शुकवे के उगने तक एक नींद मार लेने के िलए उ ह ने रजाई पुन: अपने

मुंह तक खींच िलया था...... और आँख मूंद, सोने क कोिशश करने लगे थे, ले कन

गड़ासे क लगातार ठकर ठकर से नींद फर उनके कर ब नह ं फटक थी। काली को एक

भ सी गाली िनकाल लेब ड़हा बाबा रजाई से िनकल, चारपाई पर बैठ गए थे। पेशाब भी

उ ह लगी थी, ले कन इतने जोर से नह ं क ब तरे म लेटा ह न जा सके। चलो एक

काम यह िनपटा िलया जाय नह ं तो नींद के बीच ह इस ठं ड म उठकर भागना पड़ता

है । जनेऊ कान पर चढ़ा, धोती क लॉग से कान और िसर को लपेटते हए


ु वे ओसारे से

िलकल कर बाहर आए थे और आकाश को पूरब से प म तक, एक िसरे से दसरे


ू िसरे

तक दे ख गए थे। चॉद प म म बैठने जा रहा था ओर उसक चमक एक दम मंद पड़

गई थी। गला साफ करने के िलए, एक जोर क खंखार लगा, गले का बलगम जमीन

पर फक, पेशाब करने के िलए कुंएं क जगत के पीछे स रया के पास िनकल गए थे।
पेशाब से िनपट कर वे स रया के पास आए थे, मक रया और िभखार दोन आँख

झपकाते बैठे जुगाली कर रहे थे। बाबा के पैर क आहट पा वे दोन आँख खोल, एक

दफा उ ह दे ख अपने कान हला दए थे। दोन बैल को दे ख, बाबा का मन खुिशयाली से

भर गया था। गांव भर म इस गोई का जोड़ नह ं है , जैसा चाह जोतो, जतनी दे र तक,

चाहे ल ढ़या म नाधो या पुर म, कह ं जरा सा मिलन नह ं होते और मिलन ह भी तो

कैसे, पचास पेड़ का महआ


ु और बीघे भर का चना और चोकर चूनी इ ह ं दो बैल , एक

गाय और एक भस के िलए रजव कर दे ते ह बाबा। एक पसंगा न तो बचते ह और न

डयोढ़ योहर दे ते ह कसी को।

बैल, बाबा को दे ख न तो हंु कारे थे और न ह उठकर खड़े ह हए


ु थे,

इसिलए बाबा समझ गए थे क पेट उनका भरा हआ


ु है और थके होने के कारण वे उ ह

दे ख, बस कान भर ह हला दए थे, नह ं तो दसरे


ू दन , बाबा को दे खते ह वे झट

उठकर खड़े हो जाते और जब तक बाबा उ ह कुछ खाने को नह ं डाल दे ते या उ ह

सहला प छ नह ं दे ते वे अपना दोनो कान उठाए बाबा को ताक रहे होते। आराम कर रहे

हो? ठ क है आराम कर लो। दलराती


ु नजर से बैल को सहला बाबा स रया के पास से

चलकर नीम के पेड़ के नीचे आकर खड़े हो गए थे।

काली का गड़ासा अभी भी ठकर ठकर बज रहा था। ससुर कह ं का, दांत

पीस, बाबा आवाज क तरफ मुंह करके बड़-बड़बड़ाए थे। रात भर सोने नह ं दे ता रा स

क औलाद और वे काली को क स, ओसारे क तरफ बढ़ना चाहते थे ले कन एक तो

गड़ासे क ठकर ठकर और दसरे


ू दल के अ दर चौबीस घंटे दकती प ट दार , बदा त

नह ं हआ
ु था, बाबा से.........

अरे काली .....? उ ह ने काली को हांक लगाया था


हाँ, दादा ....... गड़ासा चलाना रोक काली तुरंत बाबा को टे र दया था, जैसे वह

बाबा को टे र दे ने के िलए ह तैयार बैठा हो.......

करे तुझे ............... नींद नह ं आती, भर रात ठकर ठकर लगाए रखता है ?

हा हा हा कहाँ बाबा, दरअसल कल सुलतानपुर चले गए थे, इसिलए बैल के िलए

कोयर भूंसे का जुगाड़ नह ं बैठा सका था।

बाबा को जबाब दे ने के पहले हँ सा था काली, जल जलकर मरो बु ढे । नह ं

बदा त होता तो छाती पर िसल बाँध कुंए म छलांग लगा दो, बाबा को जबाब दे ने के

बाद बुदबुदाया था वह। ब तरे से िनकल काली जब बाहर ओसारे म आया था तो नींद

से उसक दे ह बेकाबू थी ले कन डर थी उसे, क अगर कह ं वह बैल के िलए कोयर का

इ तजाम कए बगैर, फर ब तरे पर चला गया और उसक आँख न खुली तो बैल भूखे

ह हल म चले जाएग और बना खाए पए बैल को हल म जुतने से, जो ाप उसे

लगेगा वह तो लगेगा ह ऊपर से बैजू बौ, उसे दन भर छे दती रहे गी। काली जब नेसुहे

पर ल ठा लेकर बैठा था तो उसक आँखे कड़ु आ रह थी, गंडासा चलाने क उसक एक

दम इ छा नह ं हो रह थी, बेमन से वह ल ठे पर गंडासा चला रहा था। ले कन बाबा से

टे र िमलते ह उसक सार नींद और सु ती गायब हो गई थी।

काली थोड़ दे र तक गंडासा रोक, बाबा क तरफ कान पारे बैठा रहा था,

कुछ और बूढ़े के मुंह से सुनने क उ सुकता म, ले कन बाबा क तरफ से कोई टे र न पा

वह पुन: अपना गड़ासा चलाना शु कर दया था ठ क ठकर ठ क। नीम के पेड़ से

चलकर बाबा अपने ब तरे पर आकर लेट गए थे, जबाब दे ने के पहले, काली जो उनपर

हा हा करके हँ सा था वह तो बाबा को साल ह रहा था उससे यादा, काली क ओछ

धृ ता उ ह परे शान कए हए
ु थी। काली के प रवार म काली ह ऐसी कमजोर गोट था
जसे बाबा अपने मन मुता बक खेल सकते थे और इस खेल से वे, एक ह तीर म दो

िशकार करने क योजना रखते थे। पहला तो वे काली के प रवार म सध मार, उस

प रवार को ह िछ न िभ न कर दे ना चाहते थे, दसरे


ू काली को अपनी तरफ िमला,

उनके ठ क छाती के ऊपर अपनी क ल गाड़, उसपर दाल दलने क उनक योजना थी।

ले कन काली था क कसी तरह बाबा के चंगुल म आना ह नह ं चाहता था। ठ क है

नह ं आए चंगुल म ससुरा, तब भी या बगड़ता है । बाबा को उ ह इस बात से काफ

संतोष था क, जहां एक तरफ काली के प रवार म आपसी व ह और घर के भीतर

औरत म कांव कचर लगा रहता है वह ं बाबा के प रवार म बड़े से लेकर ब च तक म

भयानक अनुशासन था और मजाल नह ं था, जो घर के भीतर बाबा क राय के बगैर

एक प ा भी हल जाय। काली के प रवार म, जहाँ साल के छ: मह ने बना बाजार का

मुंह दे खे चू हा गरम नह ं होता था वह ं बाबा के यहाँ इतना अनाज होता है क साल भर

कचर के खाया भी जाता है और बैल और गाय को भी खलाया जाता है । कलक े से

मनीआडर जस मह ने नह ं पहँु चता, काली अपनी तसली िलए बाबा के दरवाजे न

पहंु चता हो, यह बात द गर है ले कन गांव म और बाहर बाजार म , कस बिनया के यहाँ

कतना बकाया रहता है बाबा को पैसे धेले तक क जानकार है । माघ पूस म काली के

घर म ब च तक को सकरकंद और छ मी (मटरफली) के िसवा रोट का दशन नह ं होता

यह बात भी बाबा को पता थी और काली माघ पूस म, एक खुराक खाने के िलए, बना

योता के लोटा उठाए कहाँ कहाँ घूमता फरता है और कइय दफा कुदआ
ु पहंु चने पर

लोग पांत से उसे उसका हाथ पकड़ बाहर कर दये ह, यह बात िसफ बाबा को ह नह ं,

सारे गांव को पता है , तो ऐसे म काली या काली के प रवार म ऐसा कुछ नह ं था

जसपर बाबा को उससे जलन हो, बाबा को द:ु ख इस बात का था क इतना सब होते

हए
ु भी काली उनसे चबा चबा कर बात करता है और मौका पाते ह वह उन पर वाक
हार कर ह दे ता है । बाबा क यह िचढ़ इसिलए भी और बढ़ जाती थी क उनक , िसफ

गांव म ह नह ं पव त म भी लोग इ जत करते थे अगर कोई इ जत नह ं करता था तो

वह था काली और उसका प रवार।

रजाई के नीचे मँह तोपे पड़े बाबा काली क हं सी, जो उनक दे ह म प ी

ु थी, उससे िनजात पाने क जुगत म िभड़े हए


सी उछल उ ह परे शान कए हए ु थे क

इसी बीच प न से बैल के टटकोरने क आवाज बाबा के कान म पड़ थी। मुंह से रजाई

सरका, एक दफा पूरब के आकाश म सुकवे को तलाश गए थे वे। सुकवे का अभी भी

कह ं अता पता नह ं था फर भी बाबा को जूधन पर गु सा चढ़ने लगा था। इस ससुरे को

जब तक गोहराओ नह ं, बहरने
ु का नाम ह नह ं लेता, कल भी आधा पहर रात बीतते न

बीतते हर हगा लेकर पहँु च गया था।

कारे मेहरा िभर सोवे के दे र होित रहे .......जौन एतना ज द हर छोड़

दे हे ....अभी शाम ह बाबा जूधन पर बगड़े थे, प न म अभी चार तरफ हरवाह चल

रह थी, ले कन जूधन हल छोड़ दया था .... बाबा काली के बारे म सोचना छोड, अब

जूधन के बारे म स चने लग गए थे और जैसे जैसे जूधन के आने म दे र हो रह थी

बाबा का दमाग गरम होता चला जा रहा था।

शुकवा पूरब के आकाश म आम के पेड़ के प लूसी पर उठ आया था

ले कन जूधन अभी तक नह ं पहंु चा था। प न म अब चार तरफ टटकोर मच गई थी

घर क औरत बाहर भीतर होने लगी थीं। कइय घर म जांत भी चलने लग गया था,

मूसल के चलने क धमक भी कह ं कह ं से आने लग गई थी। फर भी जूधन अभी तक

नह ं पहँु चा था। बाबा का दमाग लगातार गरम होता जा रहा था और होते होते जब वह

एक दम उबाल पर आ गया था तो वे शर र से रजाई फक, दे ह पर धोती लपेट स रया

के पास आए थे ले कन स रया के पास आते ह उनका सारा ोध ठं डा पड़ गया था।

जुधना के आने का समय हो गया, ले कन उ ह ने अभी तक बैल को कोयर नह ं दया


था। अब उ ह जुधना के न आने का नह ं अपने ब तर म पड़े रहने पर खुद पर गु सा

आने लगा था। ज द द उ ह ने बैल को कोयर डाल हं डया म िभगोया महआ


ु और

खर क सानी चला, स रया के पास ह खड़े हो गए थे और बैल को, चभर चभर खाते

सुनते रहे ।

बैल जब पूर तरह खाकर म त हो गए तो बाबा का दमाग फर गरम

होने लगा था, शुकवा अब काफ ऊपर आ गया था, रात का चौथा पहर भी काफ बीत

चुका था गांव और प न मे चार तरफ गहमा गहमी शु हो गई थी फर भी जूधन अभी

तक नह ं पहँु चा था। बाबा स रया के पछवाड़े , उँ चासे पर खड़े हो जुधना को आवाज

लगाए थे......चमरौट क तरफ मुंह करके

जुधना रे ए ऽ ऽ ऽ .......................

ए ऽ ऽ ऽ जुधना ऽ ऽ ऽ ............थोड़ दे र खड़े ओनाते रहे थे बाबा, ले कन

चमरौट क तरफ से कोई टे र न पाकर वे अपना गलाफाड़, कुछ इस तरह जुधना को

गोहराए थे क जैसे जूधन को खरदास रहे ह , क य द इसके बाद भी वह नह ं पहँु चा या

कोई जवाब नह ं दया तो उसक खैर नह ं। ले कन बाबा क इस आवाज पर चमरौट से

फक र क आवाज सुनाई पड़ थी।

प न म टटकोर सुनते ह फक र क भी आँख खुल गई थी। जूधन के

बाप फक र , सार ज दगी बाबा क हलवाह म लगे रहे , ले कन अब वे साठ पार कर

चुके ह दे ह उनक अभी भी द ु त है ले कन आँख से पायमाल ह। आँख म मोितया ब द

हो गया है , कुछ सूझता नह ं रात म तो एकदम नह ं। दन म धूिमल धूिमल कुछ रा ता

पैड़ा सूझता है तो बस इतने भर के िलए क लाठ के सहारे झाड़ा पेसाब के िलए खेत

तक चले जाँए। फक र क आँख ठ क हो सकती है ,सुना है फक र ने ले कन सीतापुर

जाना पड़े गा। कहाँ है सीतापुर नह ं जानते फक र । सुना है िसफ, जानते भी होते तब भी

सीतापुर जाना और वहाँ आँख खोलवाने के िलए अ पताल म भत होना और डा टर क


फ स और दवा और दसरे
ू खच, बाप रे बाप कतना लगेगा, शायद इतना क जतना

फक र ने सुना तो होगा ले कन दे खा नह ं ह होगा। ऐसे म अंधे होकर शेष ज दगी काट

दे ना अब उनक मजबूर बन गई थी। गांव म यह मजबूर िसफ फक र क ह नह ं

कुंभरटोली से लेकर चमरटोली, बभनटोली और जहाँ जस गांव क दे खए वह ं लोग के

ु थी। भा य का दोष, कोई बहत


साथ जुड़ हई ु बड़ा पाप कया था, उस जनम म, तभी

यह दन दे खने को िमला है क सार दे ह द ु त रहते आदमी अंधा होकर दसरे


ू क दाया

पर िनभर हो उठता है । अंधे होने पर िन पाय लोग, अपने भा य को ठ क बैठ जाते ह।

खैर फक र क आँख जब धोखा दे गई तो उ ह ने बाबा से हाथ जोड़ िलया था, दादा

अब मेरा दाना पानी ठ गया इस घर से जब तक दाना पानी था, कौरा चलता रहा था

इस घर से, अब भगवान ने उसे ख म कर दया। नह ं तो दादा अभी इन हाथ म बल

क कमी नह ं है । फक र अपने दोन बाजुओं को एक दसरे


ू हाथ से सहला अपना दोन ◌े

हाथ टखन पर बांध जैसा पहले बैठा हुआ था बैठ, अपना िसर बाह म घुसेड़ िलया था।

फक र का गला ं ध चुका था, वह पूका फाड़ रो न पड़े इसे रोकने के िलए अपनी आँख

और मुंह बुर तरह अपने टे हु ने पर रगड़ने लगा था। ले कन उसका रोना का नह ं था,

वह ई ऽ ऽ करके रोने लगा था।

बाबा को फक र का रोना अ छा नह ं लगा था, उनके दमाग म इस

समय फक र के ऊपर बकाया पांच सौ पए, जो फक र ने बाबा से कइय मौके पर

िलया था और अभी तक भर नह ं पाया था, उसक िचंता उ ह सताए हए


ु थी य क

फक र म अब अपना तो कोई दम था नह ं जुधना भी अभी इतना कमजोर था क वह

हल संभालने लायक नह ं था। ऐसे म वह पया आएगा कहाँ से, फक र क हवा से ..?

रोओ नह ं फक र यह सब भगवान क पीड़ा है । कोई बहत


ु बड़ा पाप हो गया होगा

तुमसे उस जनम म जसे अब भोगना पड़ रहा है ।


हाँ बाबा पाप ह हआ
ु था नह ं तो आँधर य कर दे ते भगवान और फक र बांह

म अपना िसर घुसेड़े जो अभी तक क ं क करके रो रहा था अपना िसर ऊपर उठा अपनी

दोन आँख गमछे से प छ बाबा के चेहरे पर अपनी िनर ह नजर पसार दया था। फक र

बाबा के इसी मूड के इ तजार म था, उसे तलाश थी क बाबा जस दन थोड़ा मुलायम

रहे , वह उनसे जुधना को अपने यहाँ रखने के िलए, उनसे हाथ पांव जोड़े गा, य क

अब यह बात तय हो गई थी क आँख क पायमालगी के कारण, अब उससे काम होना

असंभव होता जा रहा है । य द बाबा जुधना को अपने यहाँ रख लेते ह तो वह शांत से

बैठ कौर आधा कौर जो िमलेगा खाकर अपनी शेष ज दगी काट दे गा। पांच सौ पया

जो उसके िसर पर बाबा क बकाया थी उसे भरने क नौबत से वह बचेगा, वह तो बचेगा

ह , जुधना जो अभी तक फुट फैर कह ं कह ं पाव आध सेर कमाकर लाता है , उसे थाई

काम िमल जाएगा और इस सब से बड़ा जस बात के बार म फक र आ त होना

चाहते थे वह यह क अब उसक शेष ज दगी िसफ दसर


ू क दया माया पर िनभर थी।


झाड़ा पेशाब से लेकर पेट के िलए टकड़े क यव था तक के िलए। झाड़ा पेशाब के िलए

फक र आ त था, जब तक जूधन क मां है कोई परवाह नह ं है ले कन पेट के िलए

अब उसे दसरे
ू क ह दाया पर िनभर रहना है और वह दसरा
ू और कोई नह ं िसफ जूधन

ह हो सकता है । य क जूधन अपनी दे ह का जाया है और आदमी बुढ़ौती के इ ह ं दन

के िलए बेटे क कामना करता है भगवान से। बाबा के यहाँ जूधन य द काम पकड़ लेता

है तो फक र हर तरह से आ त हो जाएगा। य क बाबा के यहाँ रहने से एक तो वे

पुराने मिलकार ह दसरे


ू उ ह चमरौट ह नह ं गांव के लोग भी डरते ह और िलहाज भी

करते ह। जुधना य द बाबा के यहाँ काम नह ं पकड़ता है और कह ं दसरे


ू घर काम लेता

है और कल को जब उसक मेहरा आ गई और जैसा आज कल के जमाने म मेहरा

आते ह बेट क बु औरत के टे ट म कैद हो जाती है वैसा ह कह ं जुधना क भी हो

गई, तब तो उ ह ज दगी भर घुट घुट कर मरना होगा। ले कन य द वह बाबा के यहाँ


रहता है तो, जुधना य द कुछ गलत सलत करता है तो वह बाबा से कहकर उसे दो

लाठ दलवा कर, उसे रा ते पर ले आ लेगा। फक र के मन म यह जोड़ तोड़ था और

वह इसी के िलए बाबा से अनुकूल समय क तलाश म था।

उस दन बाबा को मुलायम और स दय दे ख फक र आगे बढ़ बाबा के पांव पकड़

िलया था।

दादा ज दगी भर म आपके यहाँ कौरा खा, अपना पेट भरता रहा, अब म आँधर

हो गया दादा अब म यह दवार


ु नह ं छोड़ू ं गा।

तो तु ह कौन छुड़ा रहा है फक र , ले कन तुम आँधर हो चुके हो ......... कर

सकते हो कुछ यहाँ ......? अभी ह तुमसे ढ़े र काम नह ं होता, जुधना है क सब खेये

जा रहे हो ....... तु हार आँख भी दन ब दन धोखा दे ती जा रह है ...... ऐसे म ......

वह तो है दादा ....... दादा एक ठो वनती आपसे करता हँू दादा .....

बोलो जो कहना हो .........

दादा जुधना को अपने यहाँ रख ली जए ..

जुधना को .......?

यह कैसे हो सकता है , अभी न तो उसक उमर है और न ह कद ह कुछ उसका

है , ऐसे म उसे रख कर दध
ू पलाना है या ?

नह ं दादा, म फक र आपको व ास दलाता हँू क आप पीछे न कभी गांव म

उ नीस रहे न आगे कभी र हएगा। म इसक ज मेदार लेता हँू , जस दन आपको लगे

क आप उ नीस हो रहे ह उस दन चूतड़ पर लात मार, वलगा द जएगा दादा...........

........... थोड़ दे र तक चुप रहे थे बाबा, पांच सौ पया उनक फक र के यहाँ

ु थी, फक र को हटा दे ने पर, जसक योजना उ ह ने बना िलया था, उससे


फँसी हई

पांच सौ पए वसूल लेने क कोई तरक ब न सूझने से वे इस पर कोई अमल नह ं कर


पा रहे थे, फक र के आ ासन पर वे थोड़ दे र तक सोचते रहे थे और इस बात से जब

आ त हो गए थे क जूधन और फक र और फक र क जनानी िमलकर सब काम

अभी भी स भाल ह रहे ह, आगे भी स भाल लगे और जस दन काम नह ं स भलेगा,

चूतड़ पर लात मार कर वलगा दे ने म कै िमनट लगेगा। राजी हो गए थे बाबा जुधना

को हलवाह रखने म और जुधना अपने कद से यादा काम करके दादा को संतु भी कर

िलया था। ले कन फक र क सार योजना धर क धर रह गई थी। जुधना का गौना

कराकर जब उसक औरत घर लाए थे फक र , तो उसक औरत ने जस तरह सारा काम

अपने कंधे पर संभाल झपट झपट कर काम करती थी और अपने काम और यवहार से

फक र और सास को मु ध कर ली थी, उस पर फक र और उसक जनानी का बमन

टोली और बखर म कहते, मुंह नह ं थकता था क बहू बहत


ु कतबी है । अंधे ससुर को

खला पला कर हु का िचलम दे , जब तक सास का पांव मींज नह ं लेती लाख कहो

सोने नह ं जाएगी। ताई लड़क पैदा चमार के घर ज र हई


ु है ले कन गुन उसने आप

जैसे बड़क के ह पाए ह ..... अरे तो पाएगी य नह ं ताई उसक बखर (नैहर के

मािलक का घर) दे खए तो दमाग खुश हो जाता है । दो हल क सीर,-दरवाज पर चार

नाहर बैल, तीन भसे, दो गाय, अषाढ़ बरसता है तब तक उनके यहाँ दौनी ह चलती

रहती है ।

दे खा है तुमने ....... उसक बखर ?


दे खा है ताई ............ मेरे नैहर से एक कोस पड़ता है ।

ले कन साल बीतते न बीतते, फक र के घर म तना-तनी शु हो गई थी, और

इस तना तनी का कारण, जैसा चमरौट के सब घर म होता है वह जूधन के यहाँ भी

हआ
ु था। फक र और उसक प ी क कमाई अब ख म हो चुक थी िनभर थे वे िसफ

जूधन क कमाई पर। जूधन और उसक जनानी, भर मूड़ कमा भी रहे थे और बूढ़ा बूढ़
का सारा भार भी संभाल िलए थे ले कन जूधन क जनानी के इतना सब करने के

बावजूद, सास ससुर और पतोहू के बीच व ह क तीन जड़े थीं। पहला यह क जूधन

जो भी कमाकर लाता था फक र और उसक जनानी प रवार के मािलक मु तयार होने

के कारण उसपर अपना हक समझते थे। वे चाहते थे क उनका घर म एक मािलक क

तरह दबदबा रहे , जो वे हक


ु ु म द बेटा और पतोहँू मान, बेटा और पतोहू से सेवा करवाना

तो उनका अिधकार है । ले कन फक र पित प ी यह नह ं समझते थे क जब आदमी

तन मन और धन से कमजोर हो जाता है तो वह मािलक नह ं रह जाता । दसर


ू पर

आि त उसक दाया माया पर ह उसे िनभर रहना पड़ता है और ऐसी थित म अगर

वह कसी भी तरह अपना अिधकार जमाए या हक


ु ु म दे ना शु करे चाहे वह मां बाप हो

या और कसी पद पर, तो उसे कोई मानता नह ं और अगर वह उसे मनवाने के िलए

जोर जबद ती करे तो इसका द ु प रणाम भी भोगना पड़ता है । यह कृ ित है । दसर


ू बात

पित प ी का आपस म एक दसरे


ू के ित लगाव होता है , आकषण होता है , प ी के

िलए पित उसका अपना होता है । ऐसे म एक हद तक तो वह अपने अिधकार को छोड़

सकती है , ले कन य द उसे यह अहसास दलाया जाए क वह इस घर म त दासी है ,

उसका कसी चीज पर कोई हक नह ं है , पित पर तो कतई नह ं य क पित उसका,

कसी का बेटा शु म भी है और अंत म भी है तो ऐसी थित म कोई ी इस बात को

ु , दोन जुधना पर
बदा त करे गी ह नह ं। यह बात फक र दं प ◌ा के साथ भी हआ

अपना एकािधकार जताते। जो म कहँू क उठ तो उठे और बैठ तो बैठे य क वे जुधना

के माता पता थे और जुधना उनक मु ठ म रहे । माता पता क आ ा माने ऐसा होना

उनका दसरा
ू ज मिस अिधकार था, यह ं शु हई
ु आपस म तना तनी। जुधना क

जनानी कह, इतना तो म जान दे कर इनक सेवा क ं और ए लोग है क मुझे कोई

इ जत ह नह ं दे ते न कोई शंसा न अिधकार, जैसे मुझे याह कर नह ं खर द कर लाए

ह । उधर जुधना क मां अपने बेटे पर पूरा अिधकार जताती नौ मह ने पेट म रखा, गुह
मूत साफ कया खला पलाकर बड़ा कया और यह दसरे
ू घर क ल ड रानी बनकर बैठना

चाहती है । इधर जुधना क प ी न अपना मोचा सं भाला, उधर जुधना क मां ने,

......... भाकस बढ़ा, पहले दोन म , मां ने दे खा बहू कुलैन जा रह है बेटा मेरा,

उसपर यह राज करना चाहती है , जुधना पर उसे पूरा भरोसा था। मां बाप को तज वह

उस कुितया के च कर म नह ं पड़े गा, एक तो मां बाप का ओहदा, दसरे


ू समाज उनके

पूर तरह प म, जुधना को लगी भरने जुधना क मां, एक तो दन भर क थकान

भूख और यास, ऊपर से घर पहँु चते ह माँ ... क िशकायत, जुधना भकभका कर पीट

दे ता प ी को। प ी रमनी मार खाती जुधना से, िचिचयाती गािलयाँ दे ती... जुधना और

भड़कता, भौसड़ जुबान लड़ाती है और फर पीटता, झोट पकड़कर पटक दे ता ..... तेर

जुबान ब द नह ं हई
ु तो जीभ खींच तेर हथेली पर रख दँ ग
ू ा।

कहँू गी और लाख बार कहँू गी, मार, मार तू जतना जी चाहे । ज दया जाती रमनी

.... तू इस बु ढ़या क बात पर मेरा हाथ गोड़ तोड़।

चमरौट म शोर मचता, सार चमरौट इक ठा हो जाती,। फक र क जनानी,

भीतर टपरे म, फक र बाहर बंसखट पर बैठे, आँख मूंदे बड़बड़ाते रहते, गजब का

जमाना आ गया है भगवान। हम लोग का एक जमाना था क औरत बुजर क ह मत

ह नह ं थी जो सास ससुर के सामने जुबान खोल दे । अगर जरा सा कभी जुबान खुल भी

जाती तो या तो उसका हाथ गोड़ तोड़ बैठा दया जाता था या चूतड़ पर चार डं डा लगा

उसे ब हया दया जाता था। चमैन क कमी थोड़ौ है ......? फक र अगर आँख से

पायमाल नह ं होते तो वह एक दन भी इस चुड़ैल को अपने यहाँ नह ं रखते। ले कन

अगर उसे िनकाल दए या वह खुद कह ं भाग गई तो डर था फक र को, क कौन

उनक दे ख भाल करे गा, बेटे के िलए दसर


ू चमैन कह ं गढ़कर रख थोड़ो द गई है क

गए और उठा लाए। उसके िलए सौ जुगत िभड़ानी पड़ती है तब कह ं चमैन िमलती है


और िमलने के बाद भी लाख लफड़ा, भात भुरा दो तब कह ं जाकर बरादर म प का

होना होगा। इसी सब डर के त फक र खुद इस पर अमल करने म अ म थे और

जुधना तो अभी ब चा था। वह ऊँच नीच बहत


ु यादा नह ं समझता था। ान उसे िसफ

इतना भर था क वह एक मद है , और जनानी को क जे म करके रखना उसका कत य

है और जनानी को क जे म करके कैसे रखना होता है वह उसे पैदा होते ह घु ठ म

पला द गई थी। डं डा हमेशा नरे ट पर हरेु रहो दे खो गुर गुर करके कांपेगी साली। जहाँ

जरा सा दा हने बांए हले, लाल कर दो पीठ बीच बीच म, बस टकुए क तरह सीधी

रहे गी। जुधना बाबा के यहाँ हलवाह संभाल िलया था। संभाल िलया था उसने मां बाप

को। पित के कत य के ित भी वह पूर तरह सजग था क जरा सा रमनी से तल

वतल हआ
ु नह ं क वह पल पड़ता था रमनी पर घस पटनी लेकर, ले कन न तो जुधना

को, और न ह फक र को और न ह जुधना क मां को इस बात क जानकार थी क

जनानी जनानी ज र है भेड़ बकर नह ं। मार क डर और उसे बदा त करने क भी एक

सीमा होती है । जब सार सीमाएँ लांघ जाती ह तो जनानी म आदमी के वरोध करने,

फर व ोह करने, फर पलट वार करने के नैसिगक चेतना बल प म फूट पड़ती ह

फर उस समय वह सार मयादाएँ लांघ जाती ह, वह हआ


ु रमनी के साथ। सास के दन

रात क चख चख और बना नागा के रोज रोज पित से मार सहते सहते बदा त क

सीमा लांध गयी रमनी तो लट खोल बैठ गई थी एक दन वह डयोढ़ पर। अब आज

फैसला हो ह जाना चा हए, बहत


ु बदा त कर िलया मने। यह रोज रोज क ह डयाँ

तोड़वाना बदा त नह ं होता। रमनी पित से फैसला कर लेने के िलए अपना लूगा ल र ले

डयोढ़ पकड़ बैठ गई थी। आज उसे एक ह फैसला करना होगा वह मुझे रखेगा या नह ं।

....... फक र बहू के इस ख से ख न थे। ख नता उ ह बहू के ित प ी के यवहार

से भी था और वे बीच बीच म इसके िलए प ी को एकाध डं डा दे भी दया करते थे।

सारे झगड़े क जड़ यह बुजर है , दन भर बहू के पीछे पड़ रहती है और जुधना जब


दन भर डह बजर कर आता है तो लगती है भोसड़ उससे बहू क िशकायत करने। रमनी

का ख दे ख, आज भी फक र दो तीन घूंसे प ी को जड़ दए थे, और तभी से बसखट

पर बैठे बैठे प ी को भ भ गािलयाँ बक रहे थे। इधर प ी अपनी चोट सहलाती पानी

पी पी, फक र को गािलयाँ दे कोस रह थी। यह सब सऊर था तभी न भगवान ने

आँधर कर दया रे द हजरे , अरे तेरे मुंह म क ड़े पड़, हाँथ पांव म कोढ़ फूटे और सड़

सड़कर िगरे तब मेरा कलेजा ठं डा हो।

चुप करगी भोसड़ क उठू ं ...... फक र दांत पीस प ी को खरदासते ..........

अब क उठू ं गा तो तेरा हाथ गोड़ तोड़े बना नह ं लौटंू गा .....

आ तोड़ द हजरे , दे खती हँू कैसे तोड़ता है तू.....

आँख से पायमाल फक र , प ी क ककशता दे ख ख टया से उठने क आगे

ह मत नह ं कर पाए, वैसे अगर प ी को चुप करने तक यह बात सीिमत होती तब तो

फक र म अभी तक इतनी ह मत थी और ताकत भी थी क वे अंधा होने के बावजूद

प ी का हाथ गोड़ तोड़ उसे ज दगी भर के िलए बैठा सकते थे, ले कन डर थी उ ह तो

जुधना से। जुधना पर महतार का यादा भाव है । वह उसक ह बात मानता है । गु से

म आकर कह ं हाथकड़े से उठ गया और कह ं फूट फाट गया तो जुधना उसे बदा त नह ं

कर पाएगा और वह उस पर पलट वार कर सकता है । इससे भी बड़ जो दसर


ू डर थी

फक र को वह यह क इस अंधेपन म हम िनभर अगर रहना है तो इ ह ं लोग पर फर

इनसे राढ़ करके या चल पाएगा अपना? यह सब आगा पीछा सोच फक र जहर का

घूंट पी, बंसखट पर बैठे िसफ बड़बडाते रहे ते थे और जब बात बदा त से बाहर हो जाती

थी तो प ी पर एकाध दफा हाथ चला अपने मन का बोझ ह का कर िलया करते।

सुबह से ह हं गामा मचा हआ


ु था, फक र के घर म। घर के भीतर बैठ

थी फक र क जनानी, डयोढ़ पर रमनी और बाहर बंसखट पर फक र । दोपहर जब हल


छोड़ जुधना घर पहँु चा था, तो घर क हालत दे ख जल भुन राख हो गया था। सुबह से

घर म चू हा नह ं जला था, जुधना मािलक के घर से चना और महआ


ु का जो खरिमटाव

िमला था वह खाया था, इसके अलावा घर म कसी ने दातून तक नह ं कया था।

जुधना को जोर क भूख लगी थी, ले कन डयोढ़ पर रमनी, कुढ़ जैसा मुंह लटकाए तथा

भीतर मां को बड़र बड़र करती दे ख जुधना का दमाग सनका था। वह सीधा रसोई क

तरफ गया था, रसोई एमदम ठं ड पड़ हई


ु थी, हं डया, कड़ाह सब कोर क कोर ,

समझते दे र नह ं लगी थी उस, मन म आया था गड़ासा उठाए और बालता चला जाए

एक तरफ से। आज म बािलय डालता हँू सबको एक तरफ से। ई साली रोज रोज क

िचक िचक ख म तो हो जायगी, गड़ासे या कु हाड़ क खोज म जुधना तनतनाया टटरे

म घुसा था तो सब क जान चूनी पर जा लगी थी। कसी को यह उ मीद नह ं थी क

जुधना इतना खूंखार हो उठे गा न फक र को न उसक मां को और नह ं रमनी को ले कन

जुधना का धीरज सचमुच जवाब दे गया था, दन भर डह बजरकर जब वह शाम को

लौटता है तो कोई दन ऐसा न गुजरता जब उसे शा त से शाम क रोट िमल जाती।

उसे दे खते ह माँ अपनी बांससी तड़कती फटह आवाज म एक ह रौ म रमनी से लेकर

उसके बाप तक योतना शु कर दे ती। सुबह से शाम तक जुबान से िनकली एक एक

बात, उसका मुंह बचकाना, सास को दे ख जमीन पर प च से थूकना, बड़बड़ाना और

चमरौट म कससे िमली, उसक िशकायत का पटारा खोल बैठ जाती। जुधना सुनता

और बगड़कर भूत हो जाता यह ह मत इस चमैन क । माँ क िशकायत करती है , मुंह

बचकाती है और उसे दे ख इसे उबकाई आती है ........? धुन दे ता घपा घप रमनी को

जुधना और उसका प रणाम होता क रमनी उसके सामने पानी दाना सरका बगिलया


जाती। दन भर क हाड़तोड़ मेहनत से टटते िचटखते दे ह क पोर पोर, रात म जनानी

ू ा मांगते ले कन जुधना के हाथ से मार खाई रमनी, भाकस से भर


के हाथ सेवा सु ष
कभी जुधना क दे ह को हाथ न लगाती। गोदर ले वह, अलग जमीन पर पड़ जाती।

कभी कभी जुधना उसका हाथ पकड़ उसे अपनी ख टया पर सोने का आ ह करता तो वह

उसे झटक दे ती। खबरदार, अगर दे ह छुआ तो जा उसी माई को लेकर सो जसके चढ़ाने

से तूने मेर दे ह भुरकुस कर दया ......। कभी कभी जुधना प ी के साथ जबरद ती पर

भी उता हो जाता ले कन औरत जब तक राजी न हो, मद नाक रगड़ता रहे कर या

सकता है ? और यह सब एक दन क बात नह ं थी रोज ह ऐसा होता था...... ऊब चुका

था जुधना इस रोज रोज क कचर कचर से इसिलए उस दन वह, इस रोज रोज के टं टे

को ख म कर दे ने पर ह उता हो उठा था।

जुधना को बगड़ा दे ख फक र अपनी लाठ टटोलते बंसखट से उठे थे और

आस न वप से बचने के िलए, अगल बगल के लोग को गोहराना शु कर दए थे।

फक र क जनानी टटरे से िनकल भागी थी और बगल के घर म जा घुसी थी, अरे

बचाओ रे जुधना पगला गया है । फक र , प ी पर बड़बड़ा रहे थे ले बुजर रोज रोज क

खचर खचर का नतीजा भोग .........भागी नह ं थी तो बस रमनी। वह डयोढ़ पर जमी

बैठ रह थी, इस कदर उसका जी ऊब चुका था रोज रोज क चख चख से क, उसने

तय कर िलया था क ठ क है काट ह दे वह आज मुझ,े ई रोज रोज क कच कच

बदा त नह ं होती। ले कन जुधना कुछ करता इसके पहले ह अगल बगल के लोग दौड़कर

उसे पकड़ िलए थे।

चमरौट का ह ला सुन गांव वाले भी पहँु च गए थे, जब तक अगल बगल

या वभनटोली से ठाकुर नह ं पहँु चे थे तब तक तो जुधना क मां सॉस रोके खामोश रह

थी, ले कन ह ला गु ला सुन जब अगल बगल और गांव के लोग आ जुटे थे तो वह

लगी थी छाितयाँ पीट कारन करके रोने, दे ख लो ठाकुर मेरे बेटवा को इसी कलमुंह ने

बबाद कया है , सब इसी रांड का गुन है नह ं तो हमारा इतना भोला भाला वेटवा क
ु जुबान तक न कहे ले कन इस गुहखानी ने बेटे को इस तरह भड़का
कसी को कटक

दया क वह गड़ासा लेकर उठ खड़ा हआ


ु है मां बाप का मूड़ काटने। ऐसा नह ं क

फक र के घर क तकरार अगल बगल के लोग को न पता हो, सबको पता थी

बमनटोली म भी लोग को पता था क फक र क जनानी बड ना कस औरत है । फक र

बेचारा तो आँख से आँधर होकर बैठ गया है , अपना हाथ गोड़ ले। वह बुजर है जो दन

रात घर म लूक ख से रखती है । इसीिलए जब गांव वाले फक र के दरवाजे पर जुटे थे

तो फक र एक कनारे हाथ बांध खड़ा हो गया था, ठाकुर अगर इसम मेर कोई गलती

हो तो मुझे बैठा कर सौ जूते मा रए ......।

तो दोष कसका है , य रोज रोज हाँव हाँव होता है तु हारे यहाँ।

फक र क जनानी जो अभी तक छाितयाँ पीट पीट रोए जा रह थी, झपटकर

ठाकुर के सामने पहंु च गई थी, ठाकुर लोग वह चुड़ैल है इस सबक जड़ म। जो तीन

पाव डह बजरकर जुधना कमाकर लाता है जूड़े रोवॉ यह कसी को खाने नह ं

दे ती................

कारे जुधना यह सच है

सभी कुछ सच है भइया , न ई बुजर कम है भइया, दांत कटकटाता हआ


ु जुधना

आगे बढ़ रमनी को एक लात धर दया था और न वह ं। लंका म कोई उ चास हाथ से

कम नह ं है इसीिलए आज मैने ठान ह िलया था क बाल दँ ू सबको एक तरफ से, बस

यह टं टा ह ख म हो जाए।

ले कन साले तूने कभी सोचा है क तुझे भी फॉसी लग जाएगी ऐसा करने से ?


फॉसी नह ं लगती भइया उसी गंडासे से म अपनी भी गटई रे त लेता

जुधना क बात सुनकर एक त लोग थित क गंभीरता को समझ खुद गंभीर

हो गए थे और सबको डाट डपट कर सुलह से रहने क हदायत दे चले गए थे। हालां क

वे जानते थे क फक र क जनानी बड़ ना कस औरत है और घर म सारा वष उसी का


बोया हआ
ु है ले कन चूं क हर दज से ऊपर मां बाप का दजा था और मां बाप के खलाफ

गुण दोष के आधार पर कोई िनणय नह ं दया जा सकता था इसिलए सार डाट डपट

जुधना और रमनी को सुना, सब अपने अपने घर चले गए थे। अगर ठाकुर लोग उसी

समय गुण दोष के आधार पर एकाध डं डा फक र क जनाना को दे दए होते तो हो

सकता है क आगे यह टं टा ख म भी हो जाता ले कन मां बाप के खलाफ कसी क भी

कुछ कहने क ह मत नह ं थी इसिलए झगड़ा वैसी क वैसी ह रह गई थी और वह

दसरे
ू दन ह पुन: भड़क उठ थी।

ले कन दसरे
ू दन जुधना इस झगड़े पर एक दसरा
ू ह ख अ तयार

कया था ...... बाबा सारे झगड़े क जड़ यह जनानी ह है । फक र क बगल वह

बंसरखट पर बैठ गया था, बचपन से आज तक जतने भी दांव पच उसने सीख रखे थे,

जनानी को बस म करने के सारे गुर, उसने इ तेमाल करके दे ख िलया था ले कन कोई

गुर इसम काम नह ं आया था। राढ़ और चख चख दन व दन बढ़ता ह गया था। रमनी

के हाथ गोड़ तोड़ वह उसे अपंग तो नह ं कया था ले कन इतनी मार वह उसे मार चुका

था क कोई दसरा
ू अब तक नह ं मारा होगा। इस मार का नतीजा यह क दन भर डह

बजर कर आओ तो जो कुछ जुरता जुहाता है घास भूसे क तरह आगे फक दया जाता है


दन भर क मेहनत के बाद दे ह क ह ड टटती रहती है कोई छूने वाला नह ं

है ............जनानी घर म है ले कन संयोग हए
ु मह न बीत गए। फर ऐसी जनानी के

या मतलब इस साली को खदे ड़ ह दया जाए तभी शांत होगा यह बखेड़ा।

जुधना आज तक फक र क बगल ख टया पर नह ं बैठा था ले कन आज

वह न िसफ उनक बगल बैठा था ब क उनसे लड़के क तरह नह ं ब क पट दार क

तरह बात कर रहा था। बाबा मैने तय कर िलया है क इस बुजर को खदे ड़ ह दे ता

हँू ......

झटका सा लगा था फक र को जुधना का िनणय सुन ....... हालां क वे भी घरक

इस रोज रोज क खचर पचर से ु ध थे और इसे शा त करने का कोई जुगत सोच रहे

थे। ले कन उनका अंधापन उ ह कसी भी िनणय पर पहँु चने म उ ह बांध रखा था। फर
भी जुधना इस तरह उनक बगल बैठ उनके अिधकार े को इस तरह चुनौती दे बैठेगा

वे कभी सोचे भी नह ं थे य क एक तो जैसा फक र सोचते थे, जुधना तो अभी िनरा

ब चा है और उसे इन सब गंभीर बात का वैसा ान ह नह ं है दसरे


ू क ऐसी बात पर

िनणय लेना और काया वत करना िसफ मां बाप के ह काय े म आता है ।

य कह ं तू पागल तो नह ं हो गया है , जो तू बहू को खदे ड़ने क बात सोचने

लग गया.... हालां क फक र को जुधना का बताव अ छा नह ं लगा था। उसके इस

िनणय से उ ह झटका लगने के साथ साथ उनक दे ह म लौर सी उठ थी मन म आया

था जुधना क गदन पकड़े और मरोड़ द सु ग क गदन क तरह ले कन असहाय थे

फक र इसिलए जुधना क हर वेअदबी जहर क तरह घूंट गए थे। जो थित फक र क

इस समय थी उसम उ ह यह सब बदा त ह करना था, ले कन बहू को खदे ड़ दे ने के

जुधना के पागलपूण िनणय पर फक र अपने को आपे म नह ं रख सके थे।

हाँ पागल ह हो गया हँू ..... जब तक यह बुजर इस घर म रहे गी यहाँ शांित कभी

नह ं आएगी।

तू अभी ब चा है , बाबू तुझम अभी सब कुछ समझने क बु नह ं है ,

जुधना क ढ़ता दे ख फक र अपने को काफ संजीदा कर िलए थे।

अरे यह झगड़ा लड़ाई कस घर म नह ं होती। फर बयहती


ु औरत कह ं िनकाली

जाती है रे ........?

ऐसी ना कस औरत िनकाल दे ना ह अ छा है , चाहे वयहती


ु हो या उढ़र कर आई

हो।

तो दसर
ू जनानी कहाँ िमलेगी.......?

मुझे ज रत नह ं है दसर
ू औरत क .......

तो वना औरत के रहे गा, तुझे दाना पानी कौन दे गा ?


हाँ म बना औरत के ह रहँू गा। अभी तो है औरत, िमल रहा है न ब ढ़या से

दाना पानी......।

जो कुछ है भूज भौर कर दे तो रह है ......

ले कन म इसे अब एक दन भी इस घर म नह ं रहने दँ ग
ू ा.........

तो जा िनकाल तू उसे घर से, म अभी जाकर कुंए म कूद अपनी जान दे दे ता हँू ।

अरे इस ऍधरे का दमाग फर गया है । इतनी दे र तक फक र क जनानी, टटरे

के भीतर फक र और बेटे क बात सुन रह थी और रमनी डयोढ़ के पास ठमक खड़

थी। जुधना क मां बहू से इस कदर िचढ़ हई


ु थी क उसे घर से ब हया दे ने का मन

तक बना ली थी, हालां क कट म उसने, अपने मन क बात कसी से नह ं कहा था

ले कन जब वह उसके मन क बात बेटा करने लगा था और फक र उसके सामने गाड़

के आगे काठ बनकर खड़े हो गए थे तो यह बात उससे बदा त नह ं हआ


ु था और वह

टटरे के भीतर से करकराती बाहर िनकली थी।

ई बुजर जब तक घर म कोई असगुन नह ं कर दे गी तब तक शा त नह ं होगी,

फक र जो तनतनाए हए
ु अपनी लाठ संभाल ख टया से उठ कुंआ म कूदने के िलए उ त

थे प ी क करकराहट सुन वे हवा म अपनी लाठ भांजते प ी क तरफ दौड़े थे, घर म

सारे झगड़े क जड़ यह सुअर क ब ची है , इसका जब तक हाथ गोड़ तोड़ बैठा नह ं

दया जाएगा तब तक यह बुजर चुप ह नह ं होगी। फक र प ी क तरफ जस तरह

दौड़े थे य द वह भाग कर टटरे के भीतर नह ं घुस जाती तो फक र क लाठ उस पर

पड़ ह जाती ले कन बचा ली थी फक र क जनानी अपने को। इसके बाद जुधना फक र

क लाठ छ न उ ह ख टया पर बैठा दया था।

फक र थोड़ दे र तक हाँफते ख टया पर बैठे रहे थे, ऐसा कर बाबू घर म जो भी

हं डया कुं डया है उसम से जो तेर इ छा हो लेकर अलग होजा, फक र का दमाग इस

कच कच से िनजात पाने का उपाय बड़ तेजी से ढंू ढ रहा था। ऐसा नह ं क यह उपाय


उनके दमाग म इसके पहले कभी आया ह नह ं था आया था ले कन एक तो जुधना क

क ची उ , दसरे
ू अपना अंधापन फक र इस योजना पर अमल ह नह ं कर सकते थे।

बहू को ब हया दे ना भी इस सम या का एक वक प था, ले कन एक तो ऐसा करने पर

जुधना के िलए दसर


ू चमैन िमलेगी क नह ं और िमलेगी तो कब तक, मान िलया दसर

चमैन िमल ह गई तो उसके साथ यह बखेड़ा होगा क नह ं इसक कोई गारं ट नह ं थी,

इसिलये फक र के िलए जुधना को अलग कर दे ने के िसवा दसरा


ू कोई वक प नह ं

सूझा था।

हालां क फक र क इस योजना पर तुरंत कोई अमल नह ं हआ


ु था कारण क

जुधना क मां लट खोल फक र का वरोध करने म जुट गई थी, ले कन फक र ने एक

ऐसा सुझाव दया था जस पर रमनी तो सोचती ह सोचती थी, जुधना भी वह चाहता

था। ले कन इस वषय म मुंह खोलने क उसक ह मत नह ं होती थी तो इसिलए क

दिनया
ु उसे या कहे गी। कतने दवा
ु तबीज म नत मनौती के बाद फक र क एक

औलाद ब सा था भगवान ने और वह औलाद आज जब उसे मां बाप क सेवा करने क

ज रत पड़ तो वह जनानी का मुंह दे खते ह कृ त न हो गया। फक र को कइय ब चे

पैदा हए
ु थे ले कन पैदा होने के छ: मह ने साल भर के भीतर सभी मर जाया करते थे।

जुधना िसफ बचा था उनम से। ले कन जब फक र ने खुद उसे अपने से अलग हो लेने

क राह श त कर दए थे तो जुधना को उन लोग से अलग होने म दे र नह ं लगी थी।

प ह दन के भीतर ह वह टटरे के बगल दसरा


ू टटरा डाल हं डया कुचुर ले अलग हो

गया था, फक र से। और जब बेटा बाप से अलग हो लेता है तो कहावत है बांटा पु

पड़ोसी बाउन, बंट जाने पर लड़का लड़का नह ं पड़ोसी हो जाता है । जस तरह इतने दन

तक रमनी के साथ उसक सास ने यवहार कया था रमनी का िचत तो उससे पहले ह

फट गया था अलग हो जाने के बाद दोन म भैसन बैर बढ़ गया था और दोन क

आपसी तना तनी का असर फक र पर भी पड़ा था, अब वे पूर तरह जनानी क कमाई
पर िनभर थे, न जुधना उ ह पूछता था और न उसक जनानी ले कन लड़का चाहे अपने

से कतना भी अलग हो जाए आ खरकार वह अपना है अपने खून का जाया कैसे उसे

अपने दल और दमाग से अलग कया जा सकता है ?


वैसे फक र क आँख रात जब प न से बैल क टटकोर सुनाई पड़ती है तभी

खुल जाती है । ले कन पड़े रहते ह ख टया पर या कर उठकर। दे ह म ताकत पूर है

ले कन आँख ह हर िलया है भगवान ने। अगर भगवान ने आँख न छ न िलया होता तो

अभी तक मािलक के दरवाजे हा जर हो चुका होता और हल बैल लेकर खेत म भी पहँु च

चुका होता ........ ख टया पर पड़े पड़े फक र नई पुरानी ढ़े र सार बात सोचते उसी म

खो जाते, पहाड़ सा दन और पहाड़ सी रात एक शर र से स म आदमी को ख टया पर

पड़े पड़े काटना हो तो िसफ याद के सहारे वह उसे नह ं काट सकता............... नह ं

कटता था फक र से भी ले कन मजबूर थे वे ......।

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वैसे आँख फक र क बड़ दे र से खुल गई थी, ले कन ग दर से मुंह तोप वे

ख टया पर पड़े रहे थे। इस िनयाई रात म वे उठ कर ह या करगे। अगल बगल के

घर से लोग लोटा िलए खेत क तरफ िनकले थे तभी उनके मन म आया था जाकर

जुधना को उठा द। ले कन जुधना आजकल कृ त न जो हआ


ु है वह तो हआ
ु ह है उ ं ड

भी काफ हो चुका है । अगर कोई बात उसके मन क न हो तो वह घुघुवा कर चढ़ बैठता

है , इसिलए फक र सबेरे सबेरे कसी अ य थित क आशंका से जुधना को नह ं उठाए

थे ले कन बाबा क गोहार सुन वे और आगे ख टया पर नह ं रह सके थे। िसरहाने से

लाठ उठा ठु कुर ठु कुर टटोलते जुधना के टटरे के पास खड़े हो जुधना को आवाज लगाए

थे ........ करे जुधना रे जुधना....... जुधना रे ........।

फक र क आवाज सुन जुधना क तो नह ं रमनी क आँख खुल गई थी, उसने

ख टया से उतर जुधना का कहना


ु पकड़ उसे जोर से झकझोरा था।
जा रहा है दादा ऽ ऽ ऽ .. जुधना क कोई टे र न पा फक र बखर क तरफ मुंह

करके बाबा को आ त कए थे। जुधना जा रहा है , ले कन जुधना क तरफ से कोई टे र

न पा वे बड़ बड़ाने लग गए थे, भला बताइये राम क मरजी सार चमरौट दतून कु ला

करके ठाकुर के दरवाजे पहँु च गई है और एक को ढ़या यह है क अभी तक इसक आँख

ह नह ं खुली ...... बख रहा इसको कबसे आवाज दे रहे ह ले कन इसको कोई फकर ह

नह ं है ........ पड़े गी साले क गांड पर दो घस पटनी तब पता चलेगी, उसके बना इसको

ान नह ं होगा।

फक र को पता चल गया था क रमनी ने जुधना को उठा दया है तो वे

बड़बड़ाते हए
ु अपने टटरे को लौट आए थे.............।

बाबा के दरवाजे पर जुधना जब पहंु चा था तो सुकवा ल गी भर ऊपर चढ़ आया

था। सुबह होने म अब यादा दे र नह ं थी गांव के सभी हलवाहे हल लेकर खेत को जा

चुके थे, गांव म कइय घर म जॉत का घु र घु र चलना और मूसल क ध म ध म

सुनाई पड़ रह थी। बाबा का दमाग एकदम गरम था और वे एकदम आपे म नह ं थे।

बाबा के ोध से घर के लोग तो प रिचत थे ह जस तरह वे बड़र बड़र कर रहे थे

औरत को डर था, बाबा कह ं एकाध लाठ जुधना को धर न द क ज दगी भर के िलए

वह अंग भंग होकर बैठ जाए। इसिलए औरत ने अइया को बाबा के बगड़े होने क खबर

पहँु चा, उ ह बाबा को स भालने के िलए उठा, बाहर भेज दया था। एक तो जुधना का

बाबा ारा अंग भंग कर दे ने का डर दसरे


ू उसक नाजुक उ , तीसरे फक र क ज दगी

भर तीमारदार , जुधना के ित औरत म नरम दली थी।

अइया, घर के भीतर से िनकल, ओसारे म आ बाबा के पास खड़ हो गई थीं,

या हआ
ु जो सबेरे सबेरे दमाग खराब कए बैठे हो.......?

दे खो न अभी तक सारे गांव के हलवाहे व वा दो व वा जोत चुके ह गे और एक

यह सुसरा अभी तक पहँु चा ह नह ं अइया के पहँु चते ह बाबा थोड़ा नरम पड़ गए थे।
अरे ब चा है अभी, फर कल एक पहर रात गए तक तो हल नाधे रहा था, आँख

लग गई होगी बेचारे क , आ रहा होगा।


नह ं ई ससुरा रोज ह दे र से आता है जब तक इसका हाथ गोड़ एक दफा टट

नह ं जाएगा यह सुधरे गा नह ं।

इस बीच जुधना पहँु च गया था, हालां क अइया ने बाबा को काफ हद तक ठं डा

कर दया था, ले कन उनका दमाग अभी भी गरम था, य रे बड़ नींद लगती है

तुझे.... जुधना को दे ख बाबा दहाड़ते हए


ु बाहर िनकले थे......।

जुधना कुछ बोला नह ं था हल और जुवाठ उठा, स रया के पास ले जाकर रखा

था और बैल को खोलने के िलए आगे बढ़ा था क बाबा उसके गाल पर तड़ाक तड़ाक

तीन चार झापड़ धर दए थे। जस तरह वे गु साए हए


ु थे उसम वे जुधना को कुछ भी

कर सकते थे, ले कन अइया के समझाने से वे उसे तीन चार झापड़ लगा कर ह ब द

हो गए थे, साला औरत के टांग के बीच घुसरा पड़ा रहता है आँख ह नह ं खुलती

इसक ........।

अ छा बस हो गया काफ मार दया उसे, अब छोड़ द जए अइया ने आगे बढ़

बाबा के हाथ पकड़ िलए थे। उ ह ाय: घसीटते हए


ु ओसारे तक खींच लाई थी। ई

दा हजार काटे को जरा सा होश नह ं है मार के िलए इसक दे ह करकती रहती है , ई नह ं

क उठकर सबेरे आ जाय, भला बताइये सारे गांव का हल कब का चला गया ले कन ई

हे गला ............ इसे ह डयाँ तोड़वाने क साध लगी रहती है । ओसारे म खड़ अइया,

जुधना को आगे के िलए खरदास रह थीं, जुधना बैल को जुवाठ पहना, हल कांधे पर

िलया था और बैल को हाँक दया था। दे र से आने का उसे प ाताप ज र था ले कन

जस तरह लोहे क राड क तरह बाबा क उं गिलयां उसके गाल पर जल रह थीं उसके

कारण वह भीतर ह भीतर ोिधत था।


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ु ु , पूस माघ का ठं ड जो बाचै सो पेलै डं ड, शायर ने यह


अ ाहन का हरहरा

कहावत इसिलए नह ं कहा था क अगहन पूस माघ म इतनी ठं ड पड़ती है क लोग मर

जाते ह, नह ं ठं ड से बचने के िलए गांव म पेड़ क प याँ सूखी लकड़ खर कतावर

इतनी चुर मा ा म होती है क लोग ठं ड से बचने क यव था कर लेते ह, शायर ने

यह कहावत इसिलए कहा है क अगहन का हर


ु हरा
ु शु होते होते गृह थ के घर अनाज

ख म हो चुका होता है , खेत म काम नह ं होता चैती फसल क बुवाई हो चुक होती है ,

इसिलए खाने के िलए खेत म भी कुछ नह ं होता .... इसिलए यह तीन मह ने गांव के

िलए बड़े क ठनाई के होते ह।

कथर म मुंह तोप िलया था वसराम ने। सुकवा अभी फुनगी तक नह ं पहंु चा था

उठकर या क ं गा इस िनयाई रात म, ठं ड भी काफ है हाड़ हला दे ने वाली ठं ड, बखर

म तो अभी काम है दो बीधे खेत सींचना बाक है , ले कन दो दो सवांग ह घर म, इतना

इतना हँू ड़ बकाया रहता है उनके पास, क कसी दसरे


ू आदमी के िगनने क ज रत ह

नह ं पड़ती ..... चार दन से बैठक म थे वसराम। आज पांचवा दन होगा। घर म एक

छटांक भी दाना नह ं है दन भर घर पर ह रहते ह, बैठे, इस उ मीद म क शायद पुर

गरा के िलए कोई िगनने पहँु च जाए ... अगर आदमी घर पर नह ं रहा तो लोग दसरे
ू को

िगन लेते ह। हालां क िसंचाई पताई अब ओर मेड़ पर है फर भी अभी तक सभी कुओं

पर कुछ न कुछ िसंचाई पड़ ह है । उ मीद म वसराम घर पर बैठे रहते ह मेहरा

उनक सुबह होते ह प न क तरफ िनकल जाती है सकरकंद औड़ारने कल दन भर

भंहछने के बाद तीन चार कलो सकरकंद िमली थी। सकरकंद या कहगे उसे क हए

सूता सुतर िमली थी। िमले भी कैसे, सुबह दे खए औ ड़हार क झुंड क झुंड झौली िलए

ू पड़ते ह खेत पर, कहाँ कहाँ से पहंु च जाते ह लोग, एक एक मेड़ तीन तीन चार
टट
चार दफा औड़ारते ह। उसम फर सकरकंद रह जाती है कह ं .....? कल पेट नह ं भरा

था बसराम का और न ह ं प ी का, झगड़ पड़े थे ब चे हमको कम िमला हमको कम,

जड़ दए थे बसराम एक झापड़ झमनी के गालपर सुअर क ब ची .......... पेट म

महामाई का कोप ओिलयाया हआ


ु है .. झमनी का आँसुओं से भरा चेहरा अभी भी उनक

आँख के सामने टं गा हआ
ु था... अगर इतनी ह भूख लगती है तो कसी राजा दइयु के

यहाँ पैदा होना था। चमार के घर म ु , मारा भी था बसराम ने झमनी को


य पैदा हई

और जो कुछ मुंह म आया था बके भी थे। इतनी बड़ हो गई जरा सा धीरज नह ं है क

छोटे भाई बहन को खाने दे , मारने के िलए मार भी दये थे वसराम झमनी को और

बहुत कुछ बक भी दए थे ले कन तभी से उनका मन खराब हो गया है । य मारा

ब ची को य ? करवट बदल िलए थे वसराम आज भी कोई उ मीद नह ं है अगर काम

िमलना होता तो कल ह िगन िलया गया होता..... तो .......तो या कया जाए बखर

....... जाऊँ पसेर दो पसेर चनी बजड़ा िमल जाए हो सकता है ।

ु थी, नींद आज उसे


सुनती है रे . प ी नीचे पुवाल म ब च से िलपट पड़ हई

भी नह ं आई थी, नह ं बीच म थोड़ दे र के िलए झपक आई थी ले कन थोड़ दे र म ह

आँख खुल गई थी। कल तो उसे कुछ भी खाने को नह ं िमला था, जो भी सूता सुतर था

ब च को खला द थी, बाक वसराम के सामने धर दया था।

हाँ......, पित के बुलाने पर वह पुवाल पर उठकर बैठ गई थी और हाथ से टटोल

वसराम क दे ह सहलाने लगी थी। या हआ


ु नींद नह ं आ रह है , सो जाइए ... उसे

लगा था बसराम उसे अपनी ख टया पर बुलाना चाहते ह।

मैने कहा कल मने झमनी को बड़े जोर से मार दया था, बसराम करवट बदल

प ी क तरफ घूम गए थे।

हाँ .....इस तरह नह ं मारना चा हए था ..... अभी सोते म भी सुसुक रह है ।


या क ं गु सा लग जाती है ,

खैर छो ड़ए उस बात को इतना पछता य रहे ह।

थोड़ दे र तक दोन के बीच चु पी अंटक रह थी,

कल तूने दनभर कुछ नह ं खाया,

छो ड़ए मेर , कौन मुझे हल म चलना है,

फर भी भूख तो लगती ह है न

आपका भी तो पेट नह ं भरा था कल

भरा तो था ...... म तो भर पेट खाया था कल

भर पेट खाया था......हँु ह इतने दन से खला रह हँू , या मुझे नह ं पता।

पगली कह ं क ..... बसराम ख टया पर उठकर बैठ गए थे और प ी क बात

हॅ सकर उड़ा दे ने का यास कए थे.......।

अब इस तरह काम नह ं चलेगा, बखर जाना ह पड़े गा,

बखर म या िमलेगा.... पहले वे लोग अपना पेट भर ल तब न हम लोग क

खोज खबर लगे

य सकरकंद तो है खेत म

दस व वा ....... उसम अभी तीन मह ने गुजारना है ..........

फर भी मांगने पर शायद दस पाँच सेर िमल ह जाए

मुझे तो भरोसा नह ं है

और नह ं तो महआ
ु ह मांग लगे...

जैसा स चो ......

बसराम पुन: अपनी गोदर दे ह पर लपेट लेट गए थे, उनके दमाग से लगा था

मनोबोझ उतर गया है । गोदर मुंह तक लपेट वे सोने का यास करने लगे थे ले कन

इसी बीच नीम के पेड़ के नीचे कौड़ा लहका था और उसक रोशनी टटरे क सी कय से

छनकर भीतर उजाला कर गई थी...


भइया िमरदं गी .......

हाँ भइया

जलाय दय कौड़ा भइया .....

हाँ भइया चले आऔ ........ बड़ ठं ड है .....

बसराम गोदर लपेटे ख टया से उतरे थे और ट टया हटा बाहर आ गए थे......

राम राम भइया .....

राम राम, राम राम भइया आओ चले आओ इधर, पतई बसराम के बैठने के

िलए बगल पड़ ट झाड़ कौड़ के पास रख दये, बहत


ु ठं ढ पड़ गई भइया। बसराम टे

पर बैठ ठं डा पड़ा अपना पांव कौड़े क आग म सकने लगे थे....... नह ं बदा त हआ


भइया ..... कौड़े क आग पूर तरह लहक रह थी फर भी पतई उस पर कताउर का एक

मूठा डाल दए थे, नह ं बदा त हआ


ु था भइया, लगता है अबक साल जाड़ कुछ यादा

ह पड़ रह है .....

हाँ भइया ....... ठं ड तो वैसे पहले भी पड़ती थी ले कन इतनी नह ं

आज कह ं िगनाए नह ं ह का भइया....

या िगनेगा कोई भइया इस मर भुख मह ने म

सुने पुरई बाबा घर बनाने वाले ह

हाँ बनाएँगे, नह ं बनाएँगे तो रहगे कहाँ बरसात तो कसी तरह काट दए टाट

योना टॉगकर जाड़ा कैसे कटे गा।

घर शु होगा तो हो सकता है हम लोग को भी काम िमले

अपनी चमरौट क बात होती तो थोड़ा बहत


ु आसरा भी था ठ का डड़वा वाल ने

िलया है

ठ का हो भी गया?

ऊ तो बोउनी ख म होते ह , ई तो काम अभी शु नह ं कए क िसंचाई अभी

बाक है ।
डड़वा वाल ने ठ का िलया है तब तो हम लोग को उसम हरकने भी नह ं दगे,

गुंजाइश नह ं है ।

अपने ई कबव◌ू् कैसे चूक गए

नह ं पटा होगा अब दन भर हाड़ तोड़ने के बाद अगर इक नी भी ह से म न

आवे तो फर उस ठे के का या

डड़वा वाल को पोसाई पड़ जाता है ?

अरे वे तो दो पैसा िमल जाए बस उतने पर ह खुश

सारे पव त को बगाड़ कर धर दया है ।

तब कोई उपाय नह ं है कह ं,?

अभी तो कह ं द खता नह ं भइया, आगे उसक मज , दे ना होगा तो कह ं न कह ं

जुगाड़ बैठा ह दे गा, काट दे गा मरभुखी नह ं तो........

आज कह ं िगनाए नह ं हो?

कहाँ तीन दन हो गए खाली बैठे

ले कन दखाई नह ं दए भइया

उड़ गए थे उ र, खेड़ , शायद कह ं काम धाम िमल जाए

नह ं लगा जुगाड ?

जुगाड़ या लगेगा भइया एक बुलावे दस दस आवे, प हले वहाँ वाले खायगे तब

न दसरे
ू को मौका लगेगा .......

मेर भी बैठक पांच दन से चल रह है

कोई उपाय नह ं है

सुने कंकराह से कांकर िनकालने का काम चल रहा है

था काम ज र वहाँ, हाँ भइया आपने अ छा याल दलाया

अगर होगा तो मुझे भी बताना दोन िमलकर खोदगे


ठ क है भइया, पतई को कंकराह क बात एकदम भूल ह गई थी। भूल या गई

थी अभी तक वे दा हने बांएँ काम क तलाश म घूम रहे थे, फर कंकराह पर एक तो

काम िमलता नह ं और अगर लाख िम नत आरजू करने के बाद काम िमल भी गया तो

दनभर म ट क ड़ते रहो िमलने को होगा तो कभी कभी एक ह जगह मन कंकड़ िमल

जाएगा नह ं तो दनभर खोदने पर भी मन भर कंकड़ नह ं िमलेगा।

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बसराम को जो डर था वह हुआ। बखर से उ ह खाली हाथ ह लौटना पड़ा था।

दस व वा गंजी थी उसम से छ: सात व वा ख म ह हो चुक है , तीन चार व वा जो

अभी बाक है उसम आधा अगहन पूस और आधा माध काटना है । आधे माघ के पहले

छ मी तैयार होने क उ मीद नह ं है और जब तक छ मी तैयार नह ं होती खाने का कोई

जुगाड़ बैठने को नह ं है और फर खची भर प रवार भी तो है घर म। महआ


ु भी बख रहा

ने नह दया था कहते ह काितक क जोताई म बैल एकदम उखड़ गए ह, उनको खला

रहा हँू , झूठ, बैल को महआ


ु खलाते होते तो उनक ह डय पर मांस अभी तक चढ़

आया होता....... या म जानता नह ं, लाटा (बर और महआ


ु िमलाकर) बना बनाकर

कुल घर खा रहे ह। कहते ह महआ


ु बैल को खलाना है , बसराम को हालॉ क बखर से

कुछ िमलने क उ मीद नह ं थी, फर भी बख रहा के इनकार से उसका मन खराब हो

गया था। कैसी बखर है ई द ु दन पर पसेर दसेर महवा


ु तक िमलने क गुंजाइश नह ं

होती, बसराम इस बखर से खुश नह ं थे कइय दफा सोचा था छोड़कर दसर


ू बखर

पकड़ ल ले कन एक तो कोई दसर


ू अ छ बखर िमलती नह ं और अगर िमलती भी है

तो पया बीच म आ जाती है । अब डे ढ़ सौ पए कौन एक झ टहा हलवाहे के िलए

फकता है , पछली दफा कंगल दादा के दरवाजे बख रहा दोन भाई लाठ लेकर आ चढ़े

थे।
दादा ई बड़ा खराब हो रहा है आप बुजु ग ह बड़े ह, आपसे म लाठ नह ं

चलाऊँगा ले कन होऊ सार बसरमवा, अगर कह ं मेरे पेड़ और बाग और खेत के मेड़ पर

ू ा। दादा आप उसको आइएगा बचाने,


दखाई पड़ गया तो म उसका हाथ गोड़ तोड़ दँ ग

दहाड़ गए थे दोन भाई कंगल दादा के दरवाजे और कंगल दादा क िस ट प ट गुम

हो गई थी। वैसे बख रहा घर से चाहे जो कमजोर ह , अपने हड़तोड़ ह, हल छोड़ बाक

सभी काम अपने दोन भाई कर लेते ह और जहाँ यादा आदिमय क ज रत पड़ती है

हंू ड़ भॉड़ से काम िनकाल ले जाते ह। आिथक तंगी के अलावा बाक सभी चीज म आगे

ह, सायर मायर इतना है क बैसाख से जो आम टटना


ू शु होता है बाग से, तो भादौ


तक टटता ह रहता है और पेड़ के नीचे चले जाओ तो भर पेट खाओ भी और भर

अग छा घर को भी ले जाओ। कसी को मना नह ं करते पेड़ पालौ इतने ह क लकड़

डगर के िलए भी साल भर बना उनके बाग म गए काम नह ं चलने को ऐसे म इस

बखर को छोड़ दसर


ू बखर पकड़ने म न तो बसराम क भलाई ह थी और न ह उसक

ह मत ह क बखर छोड़ दसर


ू बखर थाम ले .....

बखर से लौट बसराम सीधा बबात के यहाँ चले गए थे.... बबात नाम नह ं है

उनका नाम है, अमृतनाथ ले कन बोलते समय वे तुतलाते ह एक, दसरे


ू कोई बात शु

करने के पहले ''बात यह है क'' कहना उनका त कया कलाम है । बना इसके वे कोई

बात शु ह नह ं कर सकते जैसे उनको कहना हआ


ु कल हलवाहे के घर म शाद थी

इसिलए वह काम पर नह ं आया, तो इसी बात को इस तरह कहगे ब...ब...बात यह है

क कल हलवाहे के घर म शाद थी, इ......इ....ससिलए वह काम पर नह ं आया,

इसीिलए उनका नाम गांव म बबात पड़ गया और गांव म अगर एक दफा कसी का नाम

पड़ गया तो पड़ गया। मां बाप ने जो भी नाम दया हो लोग उस नाम को भूल जाते ह

इस नए नाम के आगे।
बबात का घर गांव म ऐसा घर था जनके यहाँ डयोढ़ योहर चलता था। इसी

अगहन पूस और माघ माह के िलए वे अनाज टाक करके रखते थे। आओ और डयोढ़े

पर ले जाओ, हालां क गांव म बबात सब से िघनौने आदमी थे, इसिलए नह ं क उनम

कोई शार रक दोष था ब क इसिलए क एक तो वे डयोढ़े पर जो अनाज दे ते थे दे ते

समय ऐसी डं ड मारते थे क सेर का तीन पाव ह लेने वाले को िमले, दसरे
ू लेने के

समय डयोढ़े म छटांक भर क भी मुर वत करना तो दरू इस तरह डं ड झुलाकर तौलते

थे क सेर के बदले सवा सेर वसूल लेते थे। खैर यह अवगुण जो उनम था वह तो था ह

सबसे बड़ा अवगुण जो उनम था वह था क वे कछ छुट थे। जहाँ कसी के घर म कोई

सुंदर बहू बेट दखाई पड़ चाहे वह जात क चमैन ह य न हो उनक लार टपक पड़ती

थी। अपने इन अवगुण के िलए वे गांव जवार म बुर तरह बदनाम थे यहाँ तक क

लोग उनसे घृणा तक करते थे। उनके यहाँ जाना कतई पसंद नह ं करते थे, ले कन

द ु दन म लोग को उनके यहाँ पहँु चने के िसवा दसरा


ू कोई उपाय भी नह ं था।

बसराम पछले दो दन से बबात के घर जाने के नाम पर नह ं नह ं कर रहे थे।

ले कन ऐसी थित आ गई थी क बना उनके घर गए िन तार ह नह ं था; मजबूर

होकर जाना पड़ा था बसराम को बबात के घर। या बात है बसराम ........ बबात अपने

दरवाजे पर ह िमल गए थे कोई काम धाम नह ं था उ ह यूं ह दरवाजे पर ख टया पर

पड़े धूप सक रहे थे।

पांय लागी भइया ........... बसराम बबात को दे खते ह दरू से ह झुककर पैलगी

कए थे गांव जवार म बबात से लोग चाहे जतनी घृणा करते ह ले कन यादातर लोग

उनसे डरते भी थे, खास कर कमजोर तबके के लोग चाहे उसम बमनटोली के ा ण हो

या चमरौट के चमार, कोहरइया के कु हार ह या ब हरा के भांट सब जानते थे बबात

चाहे कतना िनकृ आदमी य न हो ले कन द ु दन पड़ने पर वह एक घर है जहाँ हर

कोई मदद के िलए भागता है वह मदद चाहे पए पैसे के िलए हो या अनाज पानी के

िलए। वसूलने के िलए बबात जोड़ घटाव नाप तौल म उलट-पलट करके डयोढे क जगह
चाहे दना
ू ह य न वसूलता हो पए चव नी क जगह छ: आने सूद जोड़ दे ता हो

ले कन िमलता है तो उसी एक दरवाजे और बबात लोग क इस मजबूर से पूर तरह

वा कफ थे, अगर कसी क तरफ उसक व हो गई तो वह उसे भोगा भी दे ता है ।

इसीिलए बसराम का जब बबात से आमना सामना हआ


ु था तो बसराम पूर तरह झुक

कर बबात को पैलगी कए थे।

या कुछ काम है ? बबात बसराम को ऊपर से नीचे तक एक दफा तौल ख टया

पर पालथी मार बैठ गए थे।

हाँ भइया

या......

आठ दन से कोई काम नह ं िमला

मेरे पास तो कोई काम नह ं है

वह तो कहाँ से होगा भइया िसंचाई-पताई सब ख म हो गई है ।

हाँ वह तो जानते ह हो ..... तो ?

पसेर भर अगर जौ चना कुछ िमल जाता तो, बसराम वनती करने के िलए

अमृतनाथ के सामने अपने दोन हाथ जोड़ दए थे..........

या घर म खाने को कुछ भी नह ं है ?
नह ं है भइया ......

हँू पछला कुछ बकाया तो नह ं है .....?

नह ं भइया चैत म सब पहँु चा दया था....... कताब िनकाल दे ख ली जए प का

हो जाएगा।

जब कह रहे हो तो नह ं ह होगा, तुम तो ईमानदार आदमी हो। ईमानदार बवात

का एक और काफ यादा यव त श द था जसे वे अपने उस दे नदार के ित यवहार

करते थे जसने कसी बात पर कभी उजुर न कया हो और कसी ने अगर कभी उनक

बात पर उजुर कर दया हो तो वे उसे बेईमान धूत क ण


े ी म रख दया करते थे।
ु ु म के बाहर कभी जा सकते ह? बसराम अपने
नह ं भइया हम लोग आपके हक

दोन हाथ जो अभी तक नीचे िगरा िलये थे वे उ ह पुन: अपने सीने पर जोड़ िलए थे।

हम लोग तो मत कहो बसराम, चमरौट म प टवा


ु को दे खे हो न .........


अब भइया प टआ क बात मुझसे य कहते ह, बड़ बखर है उसक आप बड़े

बड़े बख रहा लोग के बीच क बात है यह ............।

ले कन राजा छुए रानी बना जो घूम रहा है वह .........

अब उसके बारे म, भइया ....... ऐ हाँ ... बसराम कहना चाहते थे बड़े बख रहा

का आदमी है वह आप भी बड़े ह ह इसम म या बोलूँ। ले कन इतना सब उनम बोलने

क ह मत नह ं थी इसिलए वे दोन हाथ बांध ऐ हाँ करके अपनी थित को कट कर

दए थे।

हाँ तो एक बात गांठ बांध यो बसराम, वे सरऊ जस तरह राजा छुए रानी बने

घूम रहे ह, जस दन अमृतनाथ के च कर म फंस गए, उस दन सार ऐंठ झाड़कर

रख दँ ग
ू ा।

नह ं करना चा हए ऐसा। ठाकुर ठाकुर अपनी जगह चमार अपनी जगह..............

तू सरऊ काहे ऐंठते हो ..... ठाकुर के बल पर, आज ऊ ठाकुर है तो कूद रहे हो

कल ऊ गांड पर लात मार खेद दए तो ......? अपनी औकात नह ं न भूलना चा हए।

हालां क बसराम प टू के बारे म और उसे लगाकर उनके ठाकुर के बारे म कुछ भी नह ं

कहना चाहते थे य क वे जानते थे क बबात अगर सेर है तो प टू का ठाकुर सवा सेर

है ऐसे म ठाकुर ठाकुर क लड़ाई म गेहूं के साथ घुन वह नह ं होना चाहते थे। वे जानते

थे क बवात अपने चाहे जतना तबा रखते ह ले कन प टू के ठाकुर, परताप पं डत से

वे कभी बराबर नह ं कर सकते। तीन तीन जवान, परदे श म नौकर करते ह परताप

पं डत के, दो घोड़ाघर, बेटे घर पर ह नाती पोते, मजाल ह जो कोई टे ढ़ होकर िनवह


जाए। वसराम जानते थे क बबात पीछे पीछे चाहे जतना वरोध कर, परताप पं डत के

सामने आँख उठा बोलने क ह मत नह ं है उनक , बोलते ह जुबान खींच हाथ पर रख

दगे वे लोग, सब कुछ जानते थे बसराम, फर भी बबात को खुश करने के िलए उस

समय उनके मन क बात करना आव यक था। इसिलए उ ह ने प टू को औकात म रहने

क बात बोल गए थे और बवात बसराम के मुंह से इतनी बात सुनना भी चाहते थे

य क यह उनके अ क तु करती थी, अहम जो परताप पं डत के आगे कुं ठत और

परा त था, कोई मतलब नह ं था उनके अहम का ले कन अहम कभी परा त होना नह ं

जानता वह कसी न कसी प म अपना बच व ऊपर ह रखना चाहता है । बवात के

अहम क भी वह बात थी वे सामने वाले से कहलवाकर तु हो लेना चाहते थे क वे

कसी से कम नह ं ह और इस समय बसराम चाहे जतना यह जानते ह क परताप

पं डत के सामने बवात क कोई औकात नह ं है न धन और न ह जन से ह फर भी

चूं क उ ह इस समय, इस सबसे कोई मतलब नह ं था। उनके सामने पृ वी का सबसे

भयानक क , ुधा अपना भ ा चेहरा िलए खड़ थी कल वे इसी के चलते झमनी को

तड़ाक से एक झापड़ धर दए थे उसके गाल पर और झमनी का वह मजबूर चेहरा उनक

आंख के सामने टं गा हआ
ु था। इसिलए उ ह अभी अपना काम पूरा करना था, बवात के

घर से पसेर दसेर अनाज खींचकर िनकाल लेना और यह अनाज बना उसके अहम को

तु कए नह ं िनकल सकता बसराम जानते थे, इसिलए इतना जानते हए


ु भी क

परताप पं डत के सामने बवात क कोई औकात नह ं है और जो तबा परताप पं डत का

है उसम उनक हे ठ बितयाना बसराम जैसे आदमी के िलए संभव भी नह ं है, फर भी

बसराम प टू के बारे म वह सब बोल गए थे जसे बवात सुनना चाहते थे।

ई..... ई यह ......... बवात बसराम क बात पर फूलकर कु पा हो गए थे,

बसराम प टू को ग रया कर न िसफ बवात के अहम क तु कए थे ब क उनके मन

क असली बात कह दए थे।


तो कौन चीज लेवे रे अभी

भइया जो कुछ भी दे द जए

है तो सभी कुछ घर म कहौ तो गेहूँ तौलवा दँ ू

अरे नह ं सरकार वसराम अपने दोन हाथ जोड़ ाय: जमीन पर माथा टे क दए

थे, सरकार गेहूँ ऊसब आप बड़े बड़े का भोजन है सरकार

गेहूँ खाकर कै दन ज दा रहँू गा सरकार, वह भी उधार लेकर

नह ं बसराम ..... अरे गेहूँ भी तो आदिमये न खाता है ......

खाता होगा भइया ले कन बसराम के नसीब म होता तो वह चमार के घर नह ं

पैदा होता। हम चमार न ह भइया गेहूँ मुझे पचवै नह ं करे गा............

का बात करते हो बसराम

ठ क कहते ह भइया ..... अरे गेहूँ ससुरा म कोई दम है भइया अभी पचीस रोट

दबा दो एक घंटा म दे खो फर वह क वह भूख और वह ं मड़ु वा मकई चनबेर (चना

जौ) क रोट हो भइया तीन यह मोट मोट दबाय दो गरजते रहो दनभर

अ छा ठ क है जो तु हार मज ..... बोलो या तौलवा द

भइया एक पसेर बेरा िमल जाए तो ...

ब स .....

हाँ भइया फर ज रत पड़े गी तो ई बखर कह ं गई थोड़ो है

अरे माई ऽ ऽ........ रे माई ....

का हआ
ु ........

हे ई दे ख बसरमवा आया है एक पसेर बेरा चा हए इसे .......

ठ क है भेज दो .............।

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पूस और माघ मह ना कसी तरह कट गया था, चमरौट । का कसी ने कह ं ठ का

म माट ढोकर पेट पाला था तो कोई सकरकंद औड़ार कर, कोई चने और सरस का
साग खाकर मरभुख मह ना काटा था तो कोई अमृतनाथ के यहाँ से योहर लाकर। कटा

सबका फागुन आया तो बखर से िमले खेत म चना और मटर जो सबसे पहले होने वाले

अ न थे वे तैयार हो गए थे। फागुन कट गया कसी तरह खींच तान करके चैत आया तो

फर चमरौट म जैसे नए खून का संचार हो गया था। चार तरफ फसल पकने लगी थी

कसी- कसी के यहाँ चना और मटर कट कर दौनी शु हो गई थी, चमरौट से

बमनटोली तक जहाँ माघी ठं ड और भूख से हर कसी के चेहरे पर मुदनी छाई रहती थी,

चैत आधा आते आते हर कोई तन कर चलने लगा था। बमनटोली के बामन भी और

चमर टोली के चमार भी...... खेत म फसल पकने के साथ साथ महआ
ु क भीनी सुवास

और आम के बौर क गमक चार तरफ अजीब सी म ती भर गया था। लोग भूल गए थे

ठं ड और भूख व हर कोई य त हो गया था फसल क कटाई म। आधा बैसाख आते

आते कइय गृह थ के यहाँ दौनी ख म हो गई थी और जनके यहाँ बाक था वे भी ओर

मेड़ पर थे। घर म अ न, आम के पेड़ म बजनी होते टकोल महवा


ु के कूंच से झॉकती

कोइया पगलाई नीम क पात पात, फूल से भरे जंगल म करवंद कटाय और बरकटे

अपने फूल झाड़ फल से लद गए थे। फर ऐसे मौसम म आदमी य न पगलाए चार

तरफ एक पागलपन और य तता, चमरौट से लेकर बमनटोली तक जधर दे खो गौना

और याह, ठाकुर के घर म याह दौड़ धूप शु .......... लड़क का याह यादा उ साह

नह ं, दन रात दौड़ो खटो और बस खटते रहो खाने का मौज नह ं, इ जत क बात जो

होती है शरम के मारे कहा भी नह ं जाता भइया भूख लगी है जरा इधर भी याल क रये

....... बड़ ददशा
ु होती है , लड़क क शाद म। दन रात जब तक तीन दन तक बरात

टक रहती है बस खटते रहो खटते रहो कसी को खाने पीने क फकर नह ं रहती.....

शायर ने कहा है भीड़ भड़ का म ढोर और ब चे लतम वा हो जाते ह। ब चे दन भर

भूख से ट ट ट करते रहते ह माँ को फुसत ह नह ं होती वह उसे छाती से लगा दस

िमनट के िलए बैठ जाए या क उसे दाल भात सान दो कौर उसके मुंह म रख दे । उसी
तरह से ढोर बना दाना पानी खूंट से बंधे आते जाते लोग को दे खते रहगे कोई मेर

तरफ भी तो दे खो, ले कन इस भीड़ म जसको दे खो उसी पर भूत सवार है बरात को

अभी पानी नह ं पहँु चा खाना क दे र हो रह है सब दौड़ रहे ह, नाच रहे ह चकरिघ नी

क तरह आदे श दे रहे ह बमक बरस रहे ह मनई लोग को इसम य नह ं जोड़ा शायर

ने, कौन पूछता है उ ह तु हारे मुंह म पानी गया, सुबह से क नह ं। ले कन बखर म

वह जब लड़के क शाद होती है मौज रहती है मनइय क , नाऊ कहार, ठाकुर लोग क

ु ा म लगे रहते ह मनई लोग को कोई काम ह नह ं, बरात जाने के समय,


सेवा सु ष

सर समान इक ठाकर बांध बूंध ल ढ़या पर लाद दो और बरात पहचने


ु पर वहाँ उसे उतार

जा जम ितरपाल तान दो, बस काम खतम उसके बाद कोई काम नह ं, दे ह म तेल

मािलस करो, ठाकुर के साथ बैठ, जो वे खाते ह वह खाओ शु दे शी घी क पूड़ ,

स जी, चीनी चटनी फर गेहूँ क रोट अरहर क दाल महकौवा चावल, खाओ खूब खाओ

कोई रोक नह ं न कोई शरम। लड़क वाले को अपनी नाक, इ जत रखना है कह ं कोई

कोताह , कोई कमी न रह जाए नह ं तो नाक कट जाएगी। बाराती मार पीट कर लगे।

.......... वाह ............ या मजा आती है ....... या खाना, तीन दन तक रस चबैना

चीनी का रस और लाई और गुड़ ...........।

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चमरौट म भी कइय घर म पयाला पया जा चुका है । जस घर म पयाला

पया गया है उसके बारे म शाम चमरौट वाले जब इक ठा होते ह तो कस तरह से

इं तजाम हो, लोग एक एक चीज का याद कर करके िगनाते ह। जुगाड़ अपना करना है

बेटे क शाद हो तो उसम नाच बाजे का इं तजाम होना ज र है ..... नाच बाजे के िलए

न तो कसी को कह ं साई के िलए दौड़ना है न कसी तरह क िच ता करनी है । चमरौट

म सार चीज तैयार ह। साज समान से लेकर नाच पाट सब बजाने वाल म बसराम
िमरदं गी है िमरदं ग बजाते ह, बसराम को गांव म लोग बमन टोली म बसराम या

बसरमवा कह कर पुकारते ह और चमरौट म िमरदं गी ..... राम फेर िचक रहा के नाम

से जाने जाते ह िचकारा बजाते ह वे टोली म । बहाड क रं गई करते ह इसिलए उनका

नाम क रं गा है गुज रया जो बनते ह उनका कोई नाम नह ं दया जाता। मद को

गुज रया नाम दे ना ठ क नह ं होता इसिलए उसे लोग कोई नाम नह ं दे ते।

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बैशाख क दनभर हाव हाव चलता लू........... लोग मतुवाए घूम रहे ह चार

तरफ शाद गौना का मौसम, कह ं कसी के खुद के घर म शाद है , तो कसी र तेदार

म, कसी के टोले म शाद पड़ है तो कसी के हतनात म ........ जधर दे खो शाद

और गौना लोग य त ह पगलाए दौड़ रहे ह। बैशाख शु होते ह मह न से रखे िमरदं ग

ु ु
और िचकार और टनटिनया ओर िसंघी और कोड़वाई क घूल झाड़ उसक ढ़ ली ढ़ाली

गांठ कस कर टनटना कर िलया जाता है , मह न से ब से म पड़ा कुता और धोती

िनकल आयी है बाहर। और चमरौधा जो मह न से कसी कोने म पड़ा अपनी भाग को रो

रहा होता है बैसाख आने के साथ उसके दन बहर


ु आए ह साफ सफाई करके कड़ु आ तेल

पला नरम कर िलया जाता है उसे ..... जस तरह चमरौट से लेकर बमनटोली तक और

नाऊ कहार से लेकर परजा परजौट के दन बहर


ु आते ह बैसाख शु होते ह उसी तरह

इस चमरौधे के भी दन बहर
ु आते ह तेल पलाया जाता है उसे और धूप म रख सका

जाता है जससे पांव म रहकर वह इ जत अफजाई करे सो तो करे ह नरम भी रहे

ता क पांव को काटे नह ं ...... सबके दन बहरते


ु ह एक दन, चमरौधे के भी दन बहर

आते ह बैसाख से अषाढ़ तक। लोग मतुवाए, खुली दे ह गंद धोती जसे वे घर पर

पहनते ह उसे पहन धराऊँ धोती कुता, झोले म डाल, एक लाठ कांधे पर और लाठ म

फॅसा झोला पीठ पर लटकता हआ


ु और लाठ के ठ क ऊपर िसरे पर जोड़ चमरौधे का।

पहनकर उसे लोग ग त य तक नह ं जाते य क कभी जूता पहना नह ं इसिलए पहनने


क आदत नह ं है अगर उसे पहनकर चला जाए तो उस फुत से चला नह ं जा सकता

जतनी चलने क ज रत होती है -चार कोस पांच कोस ........ दस से प ह कोस पैदल

चल, शाम तक अंट जाना है , दरवाजे तक उसम चमरौधा पहन आधी दरू भी नह ं तय

कर सकते। दसरे
ू साल भर कोई जूता पांव म डाला नह ं दस पांच कोस चलने के िलए

एकाएक अगर जूता डाल िलया जाए तो उससे सारा गोड़ िछनगा उठता है ए बड़ा बड़ा

फफोला ..... धराऊँ कुता धोती भी नह ं पहनते लोग .... रा ते क धूल ध कड़, मेहमानी

पहँु चते तक सब माट गदा से भर जाएगा, इसिलए चलते समय धोती ओर कुता जो

खास ऐसे मौक के िलए, बर बरात, नात बात के यहाँ आने जाने के िलए लोग रख छोड़े

रखते ह धराऊँ , उसे काज परोजन पड़ने पर ब से से िनकालते ह चूं क वह धराऊँ है ,

इसिलए नया है और साफ है , ब से से िनकाल झोले म रख लेते ह, लाठ कांधे पर रख

झोला उसी म टॉग कंधे पर डाल लेते ह और चमरौधा लाठ के िसरे पर टांग आराम से

गंत य के िलए चल पड़ते ह, नजद क फलाग पाँव भर पहले कसी पेड़ के नीचे बैठ झोले

से धराऊँ धोती और कुता िनकाल पहनगे चमरौध पांव म डाल र तेदार के घर पहँु च

जाएंगे।

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हमेशा ह पड़ है इस साल भी पड़ ह शा दयाँ और गौना। चमरटोली म भी और

बभनौट म भी। कबव और पतई क लड़क क शाद इसी बैशाख म पड़ है और बांसू के

लड़के क शाद जेठ म ... धनी नाऊ और दतई कहार के भी घर शाद पड़ है , गौना

अबक कम है बैशाख म। जो था वह अगहन और फागुन म िनबट गया है । बमनटोली म

अभी तक तीन शा दयाँ तय हो चुक ह। शाद चाहे लड़के क हो या लड़क क लोग के

िसर पर भूत तो सवार ह हो जाता है और यह भूत उसी पर ह नह ं सवार होता जसके

घर म शाद है अगल बगल रा ह परोस हत िमत सभी पर यह भूत सवार हो जाता है ,

इ जत का सवाल है '' जहाँ तक हो सके तन मन धन से मदद करना है और यह तन


मन धन क मदद गांव दे श हत नात सभी के यहाँ य तता करती चली जाती है शाद

है उसम नेवता पहँु चना है । नेवता इतने पसैर आटा और चावल ओर दाल और पया

और कपड़ा। अपने यहाँ जब शाद पड़ थी तो कसने कतना दया था याददा त से उलट

पलट बाहर कर िलया जाता है , हाँ कम से कम उतना तो दे ना पद ह है अगर उतना न

दे ने क कूबत हो तो अपने औकात भर तो दे ना ह चा हए।

एक जोड़ धेती, गम छा, गुड़, चावल, आटा, पया घर-घर जॉत घराघरा रहे ह

दन म दोपहर म

या काक या बात है ........ कोई शाद वाद पड़ है ?

तौ रे ...... सकून क ननद क शाद है ..... सतमी को ......

तभी तो म कह ं काक दखाई नह ं पड़ । कह ं कुछ ........

अरे नह ं रे ......... सोचा इसको सब द ु त कर लूँ .....

ु दे र है रे काक ,
ले कन सतमी तो अभी बहत

दे र तो है ले कन अकेला जीव, पहले से नह ं तैयार रहने से नह ं सपर सकते न,

अभी दे ख गांव म ह कतनी शा दयॉ पड़ ह, तीन चमरौट म एक एक कहार और

नाइय म और तीन बमनौट म ऊसब भी तो सब अपने को ह भोगना पड़े गा ना.....

हाँ ऊ तो है काक ...........।

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तीन तीन शा दयाँ एक ह दन एक चमरौट म, दसर


ू धनी नाऊ के यहाँ और

तीसर बमनटोली म । लोग को ता जुब है तीन शा दयाँ एक ह दन पर कैसे पड़ गई।

बमनटोली म अगर साद है तो नाऊ और कहार को फुसत कहाँ िमलेगी, चमरौट का तो

चलो चल जाएगा उनका इधर से कोई बहत


ु खास मतलब नह ं है ले कन नाऊ कहार

का? ऐसा नह ं था क तीन शा दय के तय होने म कह ं कोई गलतफहमी थी दन

तार ख के बारे म। इसिलए तीन शा दयां एक ह दन पड़ गई, गांव म इस तरह क


गलतफहमी कभी नह ं होती, जहाँ कसी के भी घर कोई भीड़ पड़ सारा गांव जान जाता

है । इसिलए गांव म एक ह दन तीन तीन शा दयां। धनी नाऊ दौड़े आए थे, शाद क

तार ख तय करते समय, राम लखने के पास....... दादा वे लोग नह ं मान रहे ह। हाथ

जोड़ खड़े हो गए थे धनी नाऊ .....कहते ह उनके ठाकुर के यहाँ कइय शा दयॉ पड़ ह,

यह एक तार ख खाली है अगर मानदार हो तो उसी पर प का करो अ यथा हम मजबूर

ह।

थोड़ दे र के िलए सोच म पड़ गए थे रामलखन चौहजा भइया के लड़क क

शाद । मान िलया चौहजा भइया, धनी नाऊ के ठाकुर नह ं ह, फर भी धनी नाऊ क यह

धृ ता वे बदा त नह ं करगे। सरवा तुझे पता नह ं था लड़क क शाद तय हो गई है ,

और इसके आगे वे यह नह ं सोचगे क यह इ जत का मौका है और उसके भी दरवाजे

ु ह। बस सनक गए तो कर दे गे रं ड भंड , रोप दगे रन। इधर


चार ठो नात बात आए हए

इस गर ब का या दोष, अब उसके ठाकुर ह नह ं मानते ..... अ छा घर वर िमला है

लड़क क बात है । ना हो गया तो फर इस धूप लौ म त ले िघसते रहो ......। अगर

यह बात उनसे कहा जाए तो तुनुगकर टे ढ़े हो जाएँगे ...

ऊ ससुरा के ठाकुर बहत


ु बड़े ह और हम लोग मंगता है रे धिनयवा।
नह ं समझगे हम लोग लड़क वाले ह यहाँ अपनी हे कड़ नह ं चलेगी। धनी नाऊ

भी चौहजा के िमजाज से भली तरह प रिचत थे और वे जानते थे क उनके सामने कुछ

भी रो िघिघया लो जो बात उनके दमाग म बैठ गई उसके आगे सार आरजू िम नत

बेकार, इसिलए जब तार ख तय करने क बात आई थी और वह तार ख दन, चुनने के

अलावा उनके पास कोई वक प नह ं बचा था तो वे भागे भागे रामलखन के पास पहँु चे

थे। जानते थे गांव म वह एक आदमी है जो चौहजा बाबा को समझा सकते ह। इतना ह

नह ं वे दसरे
ू क मजबूर लाचार द:ु ख दद समझते भी ह ..... घर के भी मजबूत ह

इसिलए उनक लोग मानते भी ह।


दादा , आपक नितनी क शाद के िलए घर तो एक िमला है,

कहाँ हो ?

बघराजपुर म,

तब या है , ठ क कर यो

अब ठ क या कर ल दादा...... घनी नाऊ अपने दोन हाथ, एक दसरे


ू से मलने

लगे थे, उ ह जहाँ एक तरफ भरोसा था क राम लखन दादा इसम ज र मदद करे ग,े

वह ं उ ह इस बात का भी डर था क चौहजा बाबा के नाम पर वे बगिलया न जाएँ। य

क चौहजा बाबा ऐसे आदमी थे जो कसी को अपने आगे लगाते नह ं थे। इसिलए उनके

सामने राम लखन से प कहने क धनी नाऊ क ह मत नह ं पड़ रह थी, इसिलए वे

आगे क बात रोक अपने दोन हाथ एक दसरे


ू से रगड़ने लगे थे।

या हआ
ु कोई अचन है ?

है अचन दादा, अचन थोड़ नह ं बहत


ु बड़ अचन है ,

या ........

दादा उसी दन चौहजा दादा के लड़क क भी शाद पड़ है ,

उसी दन ?
हाँ दादा

तो तुमने तार ख दन तय कर दया है .....? सुनकर च क उठे थे रामलखन।

यह या कर दया तूने, इस तरह के प भाव उनके चेहरे पर आ उतरा था

नह ं तय नह ं कया हँू दादा।

तो, दसर
ू कोई तार ख दे ख लो, गांव म चार शा दयाँ पड़ ह।
एक चौहजा बाबा के एक दतई कहाँर और दो शा दयाँ चमरौट म। जानता हँू

दादा, म उ ह बताया भी ठाकुर के यहाँ शा दयाँ पड़ ह,

तो .........?

उनके भी ठाकुर म शा दयाँ ह और वह तार ख छोड़ और कसी तार ख पर उन

लोग को फुसत ह नह ं है , कहते ह वह तार ख मंजूर हो तो ठ क है नह ं तो दसरा


कोई घर दे खो.....

खैर एक बात तो अ छा कए अभी शाद तय नह ं कए हो,

नह ं कया हँू दादा, कर भी कैसे सकता हँू या म चौहजा बाबा को जानता

नह ं........ दोन हाथ जोड़ अपना चेहरा रोप दए थे धनी नाऊ।

अ छा एक बात करो, रामलखन थोड़ दे र सोच बचार कर कुछ न कुछ यास

करने के जुगाड़ म जुट गए थे, ऐसा करो तुम दे ख कर आओ चौहजा भइया घर पर ह

ह ?
हाँ घर पर ह ह दादा...... दरवाजे पर ह बैठे हए
ु ह

दे खकर आए हो या ?

नह ं दादा, आते समय दे खा था दरवाजे पर ह बैठे हए


ु थे

अ छा ठ क है चलो मेरे साथ

म भी चलूँ दादा,..? धनी नाऊ क ह मत नह ं पड़ रह थी क वे चौहजा के

सामने उप थत हो। फर भी रामलखन के कहने पर बड़ा डरते-डरते वे चौहजा के पास

पहँु चे थे।

काहो राम लखन का बात है .......?

दादा बस आपके पास ह आया हँू


का बात है .....? चौहजा खुद चाहे जतने अ खड़ िमजाज के ह ले कन राम

लखन क वे काफ इ जत करते थे और उनका अ खड़पन ऐसा भी नह ं था क वे कसी

को पहचानते ह नह ं, ओसारे म ख टया पर बैठे हए


ु थे चौहजा ...... रामलखन के िलए

ख टया के एक छोर पर बैठने क जगह बना वे उनका चेहरा पढ़ने लगे थे......... बैठो

........ का बात है ?

धनी नाऊ अभी तक बाहर ह खड़े थे ख भे क ओट म .....

अरे वहाँ छुपा य खड़ा है आ इधर दादा के सामने

कौन है .....?

धिनयवा है

या कुछ खास बात है का ?


हाँ खास ह सम झए दादा

या बात है रे धिनयवा ?
धनी नाऊ अपने दोन हाथ सीने पर बांध बाबा क ख टया के गोड़वार आ खड़े हो

गए थे.... दादा आपक नितिनया क शाद ..........

ई तो खुशी क बात है तय कर िलया ........?

हं ह....... न न ............ दादा ......

ु नह ं बन रहा था, न हाँ न ना


बात ऐसी है दादा .... धनी नाऊ से कुछ कहते हए

...... उसक जुबान तालू म फंसी हई


ु सी लग रह थी। इसी बीच राम लखन उसक बात

का सू अपने हाथ ले िलए थे

बात ऐसी है दादा क बघराजपुर म इसने अपनी लड़ कया क बात चलाया है , वे

लोग राजी भी ह ले कन श दया क तार ख लेकर कुछ अरचन है

तार ख को लेकर या अचन है भई ....?

श दया उसी दन पड़ रह है जस दन िशव दल


ु रया क शाद है .........
सुनकर चौहजा थोड़ दे र के िलए चुप लगा गए थे।

तो ..... या दसर
ू और कोई तार ख नह ं है ........ अरे भर बैसाख जेठ, अषाढ़

शा दऐ शाद का मुहू रत तो है इस साल

सार तार खे थहा िलया है उसने दर असल सभी तार ख पर उनके ठाकुर म कोई

न कोई शाद पड़ है .......

हम
ु .............ऽ ऽ ....

तो या चाहते हो ........?

अब दादा अगर लड़के क शाद होती तो म कतई राजी नह ं होता पड़ गई बात

लड़क क , धनी सवेरे से ह मेरे हाथ पांव पकड़ रहा है चलके दादा से कह द जए

ले कन ए कै तार ख पर ... ई कैसे .........?

अब वे साले कहते ह अगर वह तार ख मंजूर हो तो ठ क है नह ं तो दसरा


ू घर

दे खो

ऐसा ......? सुनकर दादा के दे ह म लौर सी उठ थी, अगर दसरे


ू कसी गांव क

बात होती तो वे तुर त लाठ कांध पर रखते और पहँु च जाते उस गांव ले कन बात थी

बघराजपुर वाल क ........ वे भी कम अ खड़ नह ं है बाबा भली भॉित जानते थे

बधराजपुर वाल को इसिलए उ ह अपना ोध दबा जाने के िसवा दसरा


ू कोई वक प

नह ं था। दादा अब यह लड़क क बात है अगर यह बात लड़के क होती तो हम लोग

बता दे ते बधराजपुर वाल को क हम कौन ह।

बाबा, एक दफा गोड़वार हाथ बांधे खड़े धनी नाऊ को ऊपर से नीचे तक दे ख गए

थे, हालां क धनी नाऊ का चेहरा पूर तरह दयनीय था, और वह डर और िलहाज के

बोझ तले दबा हआ


ु जा रहा था। ले कन उसने चौहजा को भा वत नह ं कया था, चूं क

यह लड़क क शाद क बात थी और रामलखन उसक िसफा रस लेकर पहँु चे थे इसिलए

बाबा मान गए थे।


ठ क है , लड़क क बात है इसम म कह ह या सकता हँू

धनी नाऊ बाबा के हामी भरते ह खुशी से सराबोर हो गए थे, वे दौड़कर बाबा के

पांव पकड़ िलए थे, बस दादा अब म बैतरनी पार हो गया-आपने आशीवाद दे दया म

बैतरनी पार हो गया दादा।

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गांव म तीन तीन शा दयाँ, एक चमरौट म पतई चमार के यहाँ, एक धनी नाऊ

के यहाँ और एक बमनटोली म चौहजा के यहाँ। सुबह से ह चार तरफ भागम भाग गांव

म सभी लोग म गहन य तता, तीन शा दयाँ लड़ कय क है इ जत क बात है , गांव

क इ जत क बात। बड़े बुजुग ने लोग को बांट दया है तुम और तुम बाबा के यहाँ

डटे रहोगे और तुम धनी नाऊ के यहाँ...... इस भीड़ म याल रखना पतई चमार भूल न

जाए ... पतई चमार को सुबह ह बुला बोल दया गया था कसी चीज क ज रत पड़े ,

झट गांव म खबर दे ना ......

ठ क है दादा। मद और औरत सभी सुबह से ह य त ह ....

लड़ कय क शाद है .....पौपुजी करना है तीन तीन लड़ कय क .....

सुबह से ह िनराजल उपवास , लड़ कय का पांव पूजने से सीधा वग िमलता है

और उसम भी चमार और नाऊ क लड़क का।

बैशाख का झॉव झॉव करता लू ...... घंटे भर हलक के नीचे पानी न जाए तो

हलक सूखकर काटा हो जाती है ले कन लड़ कय के पांव पूजने का फल, ज दगी म

सात चमार क लड़क का पाव पूज लो तो सीधा बैकुंठ िमलता है , कसको िमलेगा यह

सौभा य अपनी ज दगी म क सात चमार क याओं के पौपुजी का सौभा य िमले।

इसीिलए लोग िगनती म सभी जाितय क लड़ कय को िगनने क छूट ले िलए ह। अगर

गांव म िसफ बामन क या क बात होती तो बहत


ु से लोग पौपुजी का बखेड़ा नह ं करते

ले कन चमार और नाऊ क लड़क के पौपुजी का झोली म आया फल कैसे बहा द।


इसिलए गांव म यादातर औरत मद िनराजल उपवास पर ह आज। यहाँ तक क दस

बारह बरस क लड़ कयाँ भी ....।

गांव म हर ओर भागमभाग। जा जम लाओ ख टया बटोरो कड़ाह का इं तजाम

करो। सुबह से ह दौड़ धूप औरत सुबह तीसरा पहर बीतते न बीतते िन यकम से िनपट

जॉत काड़ से फुसत ले खाना पीना रॉध कर रख द ह। तीन तीन शा दयाँ ह गांव म

सबके दरवाजे सपरना है इ जत का सवाल है ...। ल गा भर सूरज चढ़ा काक कड़ाह चढ़

रहा है , लोग बुलाने पहँु च गए चलो काक चौका बेलन लेकर

अगर घर म फालतू है तो दे दो म िलए चलता हँू

काक थार परात कठौता बा ट ख टया, दर गलैचा, जो है घर म दै दे व....।

का दे ई भइया त कया घर पर है ह नह ं परात और कठौता है लै जाव दर एक है

कोहकट पड़ है , मर मरजाद के मौके पर ले जाना ठ क होगा?

अरे दे न काक जो अपने है वह न बछाने को दगे, फर वह कौन साले राजा

दयू ह। घर म अपने तो वे भी उसी ग दर पर सोते ह, जस पर हम सोते ह यहाँ आकर

चाहे जो नखरा पादे । ले कन अपने घर पर तो सब उसी फट रजाई म गोड़ डाल सोते

ह गे....

दे दाद ज द दे .....

अरे सब मत ले जा रे .... अभी चौहजा के घर से कोई नह ं आया,

उनके यहाँ से लोग आह रहे ह गे, इ जत का मामला है लड़क क शाद है

वह तो है दाद फर जो दे दो वह ले जाऊँ......

दे ना ओना कुछ नह ं है रे , इसम से दे ख ले घर म कुल इतना सामान है जो तेरे

ज रत क हो ले जा।

ठ क है दाद

अरे दाद , ब ची, हे ब ची, काहे नाक कटवाने पर जुट हो


दई
ु दफा बुलावा भेजा अभी तक यह ं बैठ हो

काक क बै चली गई वहाँ नह ं पहँु ची अभी तक ?

अरे वे तो पहँु च गई तू यहाँ बैठे या कर रह है ?


म धनी नाऊ के यहाँ जा रह हँू .....

हो, हाँ अ छा ठ क है जा, ले कन जैसे वहाँ से फुसत िमले इधरै चली आना ई

सरऊ धनी भी पगला गया ए कै तार ख पर ...........।

ओसारे म मद क पांत बैठ है , थाली परात कठौते म आटा ले लोई तैयार करने

म। दरवाजे और आंगन म जा जम बछा प ल पर औरत का समूह सभी उ क औरत,

बूढ़ , जवान, लड़ कयां सब अपने अपने घर से चौका बेलना लेकर आई ह। जनके पास

चौका बेलना नह ं है वे चकई काटने म जुट ह। कोने म .... सुर त जगह म कड़ाह

चढ़ा हआ
ु है और उसम ट ना दो ट ना घी खाप दया गया है । मद म हं सी मजाक हो हो

हा हा चल रहा है बाहर ओसारे म। दरवाजे म और आंगन म औरत पू ड़याँ बेल रह ह,

और गीत भजन पुरवी नटका उलार ब ना गाने म जुट हई


ु ह। बगल का गांव कोहरइया

कोहाँर का गांव बमन टोली म कोई भीड़ पड़े वे न पहँु च .... कोहाइन अपना एक अलग

झुंड बना बैठ गई ह और चुन चुनकर कहरवा लहरा रह ं ह।

एक फूल फूलै आसमानी अब ह मोर बार जवानी

ू दगा दै गै बालम...
झुलनी टट

सरौता कहाँ भूिल आए यारे ननदोइया,

इधर बमन टोली क बामन पीछे नह ं रहना चाहती ब ना छे ड़ रह ह, कोहाइन

को दबाने के िलए

बमनटोली के गीत म ब ना म नटका म उलार म शालीनता है , राग है लै है ,

ले कन वह तेजी और काट नह ं है क कोहाइन को दबा ले जांए


ले कन कोहाइन के कहरवा म और उनक ऊँची आवाज और गीत के भाव म जो

ल ठमार भाव है वह बभनौट क औरत को चुप कर दे ता है , कहँ रवा........

रे िलयान बैर जह जया न बैर , उहै सवितया, बैर ना पया का दे शवा दे शवा

भरमावे उहै सवितया बैर ना..........

सुनने म जुट जाती ह बमनटोली क औरत कहरवा, य ? नह ं पता है उ ह।

शायद इसिलए क उसम लहर है आकषण है या क जो शायर ने कहरवाँ म कहा है वह

उनके जीवन का एक ह सा है और उसे सुन वे ण भर के िलए भूल गई ह क उ ह

बनरा गाना है .....

तुमका बुलाए सबेरे आया बनरा ...

बनरा हो आया आधी रात .............

कोहाइन क और बभनौट क औरत के हाथ सरक रहे ह पू डयाँ सरर सरर

िलकल रह ं ह लगातार । गीत क लहर गूँज रह ह चार ओर सारा गांव अ दोर हो गया

है , दौड़ भाग और य तता के बीच ब ना और कहरवां भजन, बाहर गांव के या भीतर

चार तरफ घी क मह मह सुबास और कहरवा भजन ब ना लहर उठ रह ह औरत के

पतल सुर ले ल ठमार आवाज क । चमरौट म पतई के घर अभी दे र है कोई काम नह ं

है । जब तक बरात नह ं आती तब तक कोई ज द नह ं है , न य तता बरात दरवाजे पर

आ जाएगी दे ख िलया जाएगा कतने लोग ह तब हं डा कड़ाह चढ़े गी, रोट और दाल और

भात।

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चौहजा और धनी नाऊ के बराती पहँु च चुके ह, दोन बरात सूबेदार के पुरवा बाग

म ु ह। बजिनया पहँु च चुके ह दो दफा उ ह ने अपना बाजा बजा भी दया है ,


क हई

स दे श पहँु चाने के िलए गांव वाल को क हम पहँुच चुके ह, और अपने प के लोग

को सूिचत करने के िलए क बरात यहाँ पड़ाव डाले हए


ु है । जो कोई भूला भटका हो वह
इधर इस जगह पहँु च जाए .... बाजे क आवाज सुन औरत म अफरा तफर मच गई है ।

मद दन भर क मेहनत धूल ध कड़ तथा गम यास से िनजात पाने के िलए डोलची

गगरा ले कुंए पर पहँु च गए ह। नहा धोकर धराऊँ कपड़े पहन बरात क अगवानी के िलए

पहँु चना है । लोग म िचढ़ है , एक ह दन तीन तीन बरात धनी नाऊ क बरात का नउवा

झाकड़ और चौहजा बाबा के यहाँ रं ड क नाच और हाथी और घोड़ा और अं ेजी बाजे क

वर लहर , कोई भी रस छोड़ना नह ं चाहता, ले कन दोन जगह, उ ड़लते इस रस को,

एक ह समय कैसे िलया जाए, इसिलए उनम िचढ़ है ई ससुरे धनीवा को और कोई

तार ख ह नह ं िमली, औरत बूढ़ जवान लड़ कयाँ सबको ललक है बरात दे खने क

ले कन सब के भाग म बरात दे खना है कहाँ, नई दो चार साल के भीतर आई बहओं


ु को

बाहर िनकलने क इजाजत कहाँ है । उ ह तो बस सुनकर ह संतोष कर लेना है द ू हा

कैसा है , बरात कैसी है बाजा गाजा हाथी घोड़े सबके बारे म िसफ सुन सुनकर रस

आन द लेना है ...... ज हे मौके पर पहँु च इन रसो का आन द, बहार िमलने को है वे

ु ह। भर आँख काजल, भर मांग िस दरू, नई धराऊँ साड़ और कुता


सजने म जुट हई

और चु नी और लंहगा, कोहरौट क औरत लहं गा लहराकर पहँु चती ह।

गोधूली हो चली है बारात ार पर आ लगी है , चौहजा क बारात म पांच घोड़े

और तीन हाथी आई है , अ ेजी बाजा और बाई जी क नाच। सब बारात लगने के पहले

तैयार हो दरवाजे क तरफ बढ़ रहे ह। छोटे छोटे ब चे पहले से ह बारात क सार खबर

गांव म बांट आए ह, दरवाजे पर औरत घूंघट के नीचे भाग का ह सा हाथ क दोन

उं गिलय म फंसा मोटा सा छे द बना ली ह घूंघट म और ज रत के अनुसार उसे जस

तरफ चाहती ह, घुमा घुमाकर दरबीन


ू का काम ले रह ह। बूढ़ औरत जनके जेठ जेठौत

सास ससुर होने का अंदेशा नह ं है बारात म वे अपना मुंह खोले बारात का आन द ले

रह ह और लड़ कयाँ? याह लड़ कयाँ? पंजे पर उचक उचक कर सार चीज दे ख लेना


चाहती ह, बारात नजद क आ रह है औरत गीत गाना शु कर द ह अगवानी का गीत

ऐसा गीत जो सुनकर बाराितय के कान के क ड़े झड़ जॉए.....

बराती ए कौ मने कै नाह ं

ब ह रे बरितयन कै कुची कुची ऍ खया

वे तौ अहै कुच कुचवा के .....

बराती ए कौ मने कै नाह ं

अरे घो ड़या लयाए पर मुतनी या द ा घो ड़या लयाए पर मुतनी

छूट है औरत को वागत करने के िलए

बराती हािथय पर लदे हए


ु ह ाय: सभी जवान कसम के बराती मूछ ऐंठते हए

हाथी के हौदे और ग े पर

बरात के अगवानी के िलए चौहजा प डत पीली धोती पहने और उसी क आधी

लांग दे ह म लपेटे बरात क अगवानी के िलए आगे बढ़ते ह, पीछे पीछे गांव के लोग

अगल बगल के लोग सुभावन (शुभागमन) के िलए वागत के िलए चौहजा के साथ

बरात के वागत के िलए आगे पहँु चते ह। दो पए का चॉद का िस का हाथ म रखते ह

चौहजा लड़के के बाबा के हाथ, जो बारात वाल को लीड कर रहे ह। बाबा दो पए का

िस का दे ख जल भुन उठते ह, उ ह उ मीद थी अगवानी, णामी म उ ह दस पए से

कम या दया जाएगा, ले कन दो पए ? जस तरह चौहजा खुद दबंग और टनगहा ह

उसी तरह लड़के के बाबा भी। दो पए हाथ म आया िस का, वे जेब क तरफ ले जाते

जाते क गए थे ......

का हो चौहजा ई या दे रहे हो, अरे तुमको अगर अपनी इ जत क फकर नह ं

थी तो मेर इ जत का तो थोड़ा याल रखते......

अभी तीन दन तक दे ना ह..... पं डत उ दत नारायण.....

वह तो मेरा हक है , मुझे िमलना ह है ले कन यह दो पए ई या है ।


महराज कह ं कभी नह ं होगी जो िमलता है रखते जाइए।

ऐसे ह िमलेगा और उसे ह म रखता जाऊँ........?

दादा काह अगवानी के समय िचकिचक कर रहे ह सोलह आना और दे द जए

सोलह आने नह ं कम से कम दस पया ....... जो पद है

अरे नह ं महराज , आ खर हमारा आपका र ता हो चुका है , अब तो मुझे

ज दगी भर दे ना ह है

बहस ल बी खंचती दे ख बाजे वाले चुप हो गए ह, घोड़े और हाथी अपनी अपनी

जगह खड़े हो गए ह। ले कन औरत? उ ह ने दरू से ह दे ख िलया ह, क अगवानी म ह

कुछ गमागम बहस हो रह है फर भी उ ह इससे या मतलब मद लोग का िसरदद है

यह, मुझे तो अपना अगवानी का गीत गाते जाना है । मामला सलट गया है दोन तरफ

के लोग एक दसरे
ू को तौल िलए, बना मले और ऐंठे चौहजा पं डत क टट से कुछ

िनकाल पाना मु कल ह।

साला बड़ा अ ड़यल है बना िलए मानेगा नह ं

दोन प ने बीच म पड़कर मामला सलटा दया उ दत नारायण पं डत क मांग

थी दस पया, चौहजा प डत दो पये दे रहे थे, आ खर पांच पये पर रजामंद हए


ु ,
पं डत उ दत नारायण और लेने के बाद बारात दरवाजे पर लगाने के िलए राजी हए

ारपूजन ..... औरत का कान के क ड़े झाड़ने वाले ल ठमार गीत और जौ और अ त

और महआ
ु और ढाक के प से बनाया बीड़ा, अगवानी म बरसा रह ं ह बाराितय पर।

हाथी पर बैठे बाराती पाई और पैसा इक नी दव


ु नी और बतासा और धान का लावा

लुटाना शु कर दए ह। छोटे छोटे ब चे और चमरौट क औरत और कोहाइन और

कहाइन सब जुट गए ह पैसा और बतासा लूटने म। बाजे वाले घ मड़-घ मड़ बाजा

बजाने म जुटे हए
ु ह। भ गाड़ा और थािलय जैसा झाँझ अ ेजी बाजा ह न.................

एक कनारे बाई जी और उनके समाजी तबला और सारं गी और मजीरे क ताल पर कुछ


गा रह ं ह या गा रह ह कुछ भी नह ं सुनाई पड़ रहा है लोग को उनके गीत से मतलब

भी नह ं है वे दे ख रहे ह बाई जी कैसी ह, सु दर है क नह ं...... य क चौहजा प डत

ने जब शाद तय कया था तो उ दत नारायन, बारात के बारे म बातचीत होते समय

पूछे थे चौहजा से ..... बारात म नौटं क लाया जाए दज पुर क नौटं क कर िलया जाए

......

नाह ं हो उ दत नारायन, हे ई नौटं क मुझे पसंद नह ं है । यह मत सोचना क म

खलाने क डर के मारे ऐसा कह रहा हँू अरे भगवान क दया से उसक तरफ मुझे कोई

िच ता नह ं है ।

वह तो या कहने वाली बात है चौहजा..... या म जानता नह ं। साली नौटं क

दे खने म अ छ तो लगती ह है और जब दज पुर वाल क बात है तो वह अ छ भी

होनी चा हए। ऐसा इसिलए कहता हँू क जब हम लोग नौटं क दे खते थे तो उसके ट कर

क नाच और गाना और बाजा और नाटक ई सुलतानपुर जला या दई


ु चार जला म

नह ं था ........

नह ं थी दादा ठ क कहते ह बनारस के पहले दज पुर वाल का ट कर लेने वाला

नह ं था, बगल बैठे भभूती नाऊ चौहजा क बात का समथन कए थे।

ले कन अब कैसी है सब कुछ उसम, म तो इधर कतने दन से नाच दे खा ह

नह ं.....

नह ं दादा अब आपके जमाने क दज पुर कहाँ रह गई अरे अब तो सब साले िसफ

पैसा खोजते ह, अब तो बस नाम ह नाम बाक रह गया है दादा...... दज पुर का। अब

पहले वाले न वे लोग रहे और न वे नाचने वाले न गाने वाले, और न वे मसखरे ह क

जो हं साते हं साते पेट फुला दे ग, बराती प का कोई।


दरअसल दज पुर वाल म भी तीन डे रा हो गया है , एक डे रा वह जो मसखर

करता था िशव ललवा, उसने अपना एक डे रा फोड़ िलया, दसरा


ू उसम सदा ज जो

बनता था, उसने और तीसरा जो असली मािलक था। ए पटकमट .......

तो उ दत नारायन... दज पुर वाली चाहे हो चाहे बनारस क । बरात म साली

नौटं क मुझे पसंद ह नह ं है । इसम दिनया


ु भर के चमार िसयार इक ठे होते ह, वे साले

पादगे और तुम बैठे सूंघते रहो, दसर


ू बात यह क कतने जाित कुजाित ऊपर त ता पर

चढ़ हमार खोपड़ पर गोड़ पटकगे और तुम उनके पाँव क धूल चाटते रहो।

दज पुर क बात वह ं कट गई थी, ठ क है रं ड क ह नाच आएगी।

हाँ इ जत क चीज है तो वह है भले आदिमय के बीच रं ड क ह नाच ठ क

लगती है ।

सुन रखा था गांव वाल ने क चौहजा प डत के यहाँ बनारस से रं ड आ रह है ,

और उसके साथ म भडु आ भी है ... गांव म ह नह ं अव त पव त सभी जगह यह खबर

फैल गई थी रं ड के साथ भंडुवा..... रं ड क नाच तो कसी के िलए नई नह ं थी, ले कन

भंडुवा या होता है वह न कोई जानता था और न कसी ने कभी दे खा ह था। सुना

ज र था बीबी के साथ भंडुवा, एक दसरे


ू को गाली दे ने म भी अरे भंड़ुवे सुने थे लोग

गािलयां भी दए थे ले कन भंडुवा या है नह ं जानते थे न दे खे थे....... खबर थी चौहजा

पं डत क बारात म बनारस से बाई जी आ रह ह और उनके साथ भंडुवा भी होगा

ले कन दरवाजे पर लोग िसफ बीबी को मींउँ मींउँ करती दे ख िनराश थे.... आया है ?

अगर आया होता तो ऐसा कहाँ था क वह ारपूजा पर नह ं आता, कइय रकम क

अफवाह कइय कनफुस कयाँ, भीड़ टट


ू पड़ रह थी कहाँ है भंडुवा।

ारपूजा ख म होकर बरात जनवासे म चली गई। बीबी अपने समा जय के साथ

सजधजकर बीच बरात गलीचे पर आ बैठ ह। नाऊ थािलय म बराितय के पांव धो रहे
ह अगड़े पछड़े बराती पहँु च रहे ह, लड़क प के लोग बारात के साथ साथ जनवासे

तक गए ह और एक तरफ आसन लेकर बैठ गए ह, पं डत क कटबैठ , सं कृ त म

कट बैठ दे खने के िलए। पं डत उ दत नारायन खुद सं कृ त के अ छे जानकार ह परं तु

इ जत क बात है , इसिलए वे अपने साथ एक पुरो हत के अलावा दसरे


ू पं डत, जो

काशी से आचाय ह उ ह साथ लाए ह। मूठ भर क चु टया िग ठा लगी, झकझक खाद

क धोती, घु प सफेद खाद का कुता चेहरे पर सचमुच पां ड य झलक रहा है उनके

........

लड़क प वाले पहले ह सुन चुके थे बाद ववाद के िलए पं डत उ दत नारायण

काशी के आचाय लाए हए


ु ह। अब आचाय क ट कर लड़क प क तरफ कोई दखाई

नह ं पड़ रहा था जो उनका ट कर ले..... इसिलए लोग बाबा ी नाथ को पकड़ लाए।

बाबा ी नाथ बनारस तो नह ं पढ़े ह ले कन सं कृ त का उ ह अ छा ान ह, पढ़े कम

कढ़े यादा ह, लड़क क पौपुजी के िलए सुबह से िनराजल उपवासे पं डत ीनाथ

अपनी कोठली बंद कए पड़े थे बुलाने पर अपना साफा िसर म लपेट गांठ तक झूलता

कुता और झकझक धोती डाल पहँु च गए थे जनवासे ...... और बैठते ह सं कृ त म ऐसा

दाग दए थे क आचाय को कोई जवाब ह नह ं सूझ रहा था.... वे उनके को दो

तीन दफा प करने को भी कहा जसे पं डत ीनाथ ने प भी कया ले कन उसका

जबाब नह ं सूझा था आचाय जी को , आचाय जी क हार पर छ छा लेदर करने के िलए

लड़क प वाले हथोड़ पीट हो हो करके हु रया िलए थे, पद तो यह था पं डत ीनाथ

भी आचाय के का उ र दे ते ले कन जैसे लोग हु रयाना शु कये प डत ीनाथ उठे

और पं डत उ दत नारायण को हाथ जोड़ णाम कर सं कृ त म मा याचना कए और

बारात के िलए इं तजाम एवं गांव म अ य दो बारात म पहंु चने क आव यकता को

सं कृ त म िनवेदन कर जनवासे से िनकल आए।


पं डत उ दत नारायण को उ मीद नह ं थी क आचाय परा त हो जाएंगे। वे

आचाय के परा त होने से काफ ु ध थे, दसरे


ू पं डत ीनाथ क व ता का भाव सारे

बराितय पर पड़ चुका था, तीसरे उ ह बाराितय का इ तजाम और गांव म और तीन

बारात का इं तजाम दे खना था, इसिलए उ ह आगे आचाय के का उ र दे ने के िलए

कोई दबाव भी नह ं दया...... पं डत ी नाथ चलाक लगा ले गए थे, क या प के

पुरो हत प डत ी नाथ के उठते ह शाखो चार करने लगे थे और प डताई का मामला

यह ं समा हो गया। पं डताई समा होते ह बीबी अपने समा जय के साथ उठ खड़ हई


थी और अपनी सुर ली राग म चार तरफ घूम घूम शुभ सूचक गीत गा रह थीं।

अगवानी म आए लोग ज ह इ तजाम दे खना था धनी नाऊ क बारात म पहँु चना

था वे लोग पं डत ीनाथ के साथ उठकर चले गए थे ले कन भीड़ अभी भी जनवासे म

ु थी, बीबी के ठु मके और गत और ताल पर िथरकने का करतब दे खने के िलए


जमी हई

जुटे हए
ु थे....... बीबी पूरे घेरे को घूम द ू हे के सामने आई थी तो तबलची तबले पर

चोट दया था और बीबी के पांव िथरकने लगे थे, धीन धीन तक तक धीन धीन... बीबी

अपना आचल कमर म लपेट घुंघ ओं को ताल क कुछ इस तरह साज से जोड़ िथरकने

लगी थी क पूर बारात म स नाटा छा गया था। ठु मके और घूमर और कमर का

लचकाव और घुंघ ओं क छ मक छ मक वाह या समा बाँधा था उसने लोग मं मु ध

बैठे बीबी के रबड़ से लोच खाती दे ह को और तबले और सारं गी और मजीरे और घुघ ओं

क छ मक छ म म भूल गए थे। बीबी नाचते नाचते जब थक गई तो उनका नाचना

ब द हो गया था, बाराितय और घराितय क वाह वाह से माहौल गूंज उठा था। वाह

बाई जी वाह कमाल कर दया आपने तो। कुछ लोग बाई जी को पए दो पए के

िस के, नोट, भेट चढ़ाए। बीबी अभी बैठ अपने चेहरे का वेद सुखवा रह थी क भंडुवा

जो समा जए के साथ बैठा था गोलाकार टोपी, झक सफेद मलमल का कुता और ऊपर से


िसतारे टं क सदर और चौकुठ छपी लुंगी पहने बैठा था भ भ भ भ करते बीबी क बगल

आकर बैठ गया था।

भ भ भ ..... दोन गाल को फुला वह कुछ इस तरह भ भ भ क आवाज

िनकालने लगा क लोग का यान तुरंत उसक तरफ चला गया। ह था से हथवड़,

ु के नीचे, बायाँ हाथ रख, दा हने हाथ क हथेली बांध, उसने बाएं
दा हने हाथ के केहने

हाथ पर अपना दा हना हाथ खड़ा कर दया था। ह था से हथवड़, उसे चार तरफ घुमा

कर दखाया था, ह था से हथवड़ बोलो चलेगा? बीबी क तरफ हाथ रोक पूछा था उसने,

बोलो चलेगा? बीबी झप गई थी और लजाई भी थी, लोग हो हो करके हं स दए थे।

ु कुछ दे खा सुना था, अभी तक ले कन बीबी के साथ कसी मद का इतना खुला


बहत

मजाक.... बड़ा आन द आया था लोग को।

भु भु भु ............ भु............ उ उ ........ बु बु उ वा .... आ...... ख सी क

तरह बक रय के साथ केिलरत, मुंह से कुछ इस तरह क आवाज िनकाला था जैसे

सचमुच वह ख सी है और सामने बैठ बीबी बकर हो, उसने अपने हाथ बीबी क दे ह पर

तो नह ं ले कन बगल इस तरह घुमाया था जैसे सचमुच वह उनके नजद क पहंु च गया

हो........ बीबी इस दफा भी बुर तरह झप गई थी और लोग को इतना आन द आया

था क वे फर हो होकर हँ सने लगे थे।

उसके बाद उसने और दो चार भ े मजाक कया था बीबी को लपेटते हए


ु जससे

लोग को तो मजा आया था ले कन उसम बैठे कुछ बड़े बुजुग ने इस पर आप क थी,

इस पर वह भंडुवा उन लोग से हाथ जोड़ दया था अब ऐसा नह ं करे गा वह............।

----------------------------------
धनी नाऊ के दरवाजे भी बारात लगी थी। गांव के औरत मद चौहजा का ारपूजा

समा कर धनी नाऊ के दरवाजे पहँु च गए थे, बारात उसक इसी कारण दरवाजे पर कुछ

दे र से लगी थी। बारात लगी थी ले कन उसम अं ज


े ी बाजा नह ं था हु ा बाजा था।
खइया के आड़े आड़े बरात पाट के दो चार छोकरे , हाथ म हाथ बांधे और पांव म पांव

फंसा घुलटिनयाफर खा रहे थे। एक झुकता दसरा


ू उसक पीठ पर फर मार दे ता, नउवा

झाकड़, यह था, नउवा झाकड़ और इस तरह क तीन चार कला बा जयाँ कए थे, वे

लोग। औरत यहाँ भी वह कान झाड़ने वाले गीत गा रह थीं जसम नाउन और गांव क

ा ण औरत शािमल थीं।

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पतई चमार के यहाँ बरात आ गई थी ले कन अभी तक वे लोग बाग म ह बैठे

हए
ु थे। बोतल म िम ट का तेल डाल मशाल जला और तीन लड़के गुज रया एक जोकर

सज रहा था, मृदंग और झांझ और िसंह और खड़ताल नगाड़ा नगरची सब एक कोने म

रखा हआ
ु था। एक तो बारात वाले अभी तक सब पहँु चे नह ं थे, दसरे
ू गांव म दसर
ू दो

बरात के कारण यहाँ चमरौट क दो चार बूढ़ औरत को छोड़ उ ह कोई दे खने वाला ह

नह ं था, इसिलए वे काफ सु ती से तैयार कर रहे थे।

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धनी नाऊ के यहाँ क बरात क अगवानी और ारपूजा ख म होने के बाद

चमरौट के ब चे और औरत और बमनटोली के कुछ ब चे बाग म आ जम थे, इतनी

दे र म सभी बराती पहँु च चुके थे और पतई को अ दाजा लग गया था क कतने लोग

के भोजन क यव था करना है , लोग जो गांव क तीन बरात दे ख चुके थे उनके िलए

ु अ छ लगी थी, द ू हा वैसे खास बखान करने लायक


चौहजा क बारात काफ सजी हई

नह ं था फर भी लड़क क तुलना म ठ क ह था। उ 11 वष, कुछ औरत ने जोड़

को सराहा, कुछ ने मुंह बचकाया लड़का कुछ सांवला है , लड़क के जोड़ का नह ं है ,

धनी नाऊ के यहाँ लड़के क उ भी नौ दस साल से ऊपर नह ं रह होगी, ले कन लड़का

सु दर था, गोरा, लड़क क तुलना म बहत


ु अ छा, पतई चमार के यहाँ लोग को द ू हे
म कोई िच नह ं थी फर भी द ू हा तो द ू हा ह होता है । पतई चमार के यहाँ का हो या

धनी नाऊ के यहाँ का या क चौहजा के यहाँ का औरत म दे खने क सबसे बड़ ज ासा

होती है सो उ ह ने पतई चमार के भी द ू हे को दे खा जो अभी भी मां का दध


ू पीता था

और मां क गोद छूटते ह हन हनाकर रोता था नंगई करता था। दे ह एकदम धनुष क

तरह टे ढ़ करके एकदम से भ भ करके रोना शु कर दे ता था, चूं क वह अभी बना मां

के अकेले नह ं रह सकता था और अभी भी मां का दध


ू छूटा नह ं था इसिलए मां उसके

साथ ह बारात म आयी थी। लड़के क थित दे ख लोग ने सुझाव दया था क लड़क

को ह उसके ससुराल ले जाकर वह ं शाद कर दया जाए हालां क लड़क अभी मां का

ू नह ं पीती थी उसे बना मां के ले भी जाया जा सकता था, ले कन लड़के प


दध वाले

लड़क वाल को बुलाने के िलए तैयार नह ं हए


ु इसिलए लड़के प वाले ह बारात लेकर

लड़क के यहाँ पहँु चे थे, यहाँ भी औरत ने बीड़ा मारा था गािलय से बाराितय का

वागत क थीं।

चौहजा के यहाँ बाराितय म एक तरह का आ ोश था, हाथी के िलए पांच पांच

पसेर आटा। घोड़ के िलए बीस सेर चना इसी को लेकर तकरार हो गई थी। महराज

हािथय के िलए तो ठ क है पांच पसेर आटा, ले कन घोड़ को बीस सेर चना। इनको

घोड़े मत सम झए ए सब जान ह हमार , हम नह ं खाएंगे ले कन इनको बीस सेर चना

दे गे ह ।

झूठ .... यह तो इ जत लेने जैसी बात है महराज।

आप हम लोग पर तोहमत लगा रहे ह, लगता है चना हम लोग आज यह ं पर

दे ख रहे ह। ले कन बीस सेर चना पौवा भर मास नह ं ह घोड़ क दे ह पर ए बीस सेर

चना खाने वाले जानवर ह?

महराज दे ना है तो द जए नह ं तो म चला,

चलो चाहे बैठो, बीस सेर चना आज बीस कल और बीस परस पांच घोडे ?
तो नह ं था दम तो बुलाए ह य ? पहले ह बोल दे ते मेर औकात नह ं है ,

लड़के प के कसी मात वर बीच म कूदा था

औकात क बात मत करो महराज, अपने कद म रहो कद के आगे............

मार साले को हम कद म रहने क धमक दे ता है ।

हे महराज मने आपका पांव पूजा है िसर नह ं, अरे रमसुखा, ला लाठ तो, साल

क खोपड़ रं ग दँ ,ू

ऐसी कस साले म ह मत है जो खोपड़ रं गने क बात कर रहा है रे .....?

पकड़ साले को

आ तो आगे आ न, एक एक को ढे र नह ं कर दया तो ....

मार साले को

दोन तरफ से ला ठयाँ िनकल गई। लठै त, अ छ ला ठयाँ भॉजने वाले िसर म

फटा बांध ला ठयाँ ले मैदान म आ डटे थे। बारात प म ऐसा नह ं था क लठै त नह ं

थे, ले कन उनके पास ला ठयाँ नह ं थी, जो दो चार ला ठयाँ थी भी, वह घराती प क

तुलना म बहत
ु कम थीं। फर भी जतनी थी लोग अपने बचाव म उठा िलए थे। ला ठय

क सभा दे ख गाली गलौज और और तू तू मै म और ला ठय क फटकार दे ख बरात

वाले अपने बचाव म जुट गए थे, नाच ब द हो गई थी, खबर गांव म पहँु च गई थी,

लाठ चल गई तीन चार आदिमय क खोपड़ रं ग गई कुछ बेहोश िगरे ह, खबर सुन

जसके जो हाथ म जो आया था लेकर बारात क तरफ दौड़ा था, ले कन जैसा लोग ने

सुना था वैसा कुछ नह ं था। मौके पर कुछ बड़े बुजुग बीच म पड़ गए थे, और मामला

रफा दफा हो गया था। घोड़ को दो सेर चना, हािथय को पांच पसेर आटा तय हो गया

था, पीलवान और साईस इतने पर ह संतु हो िलए थे।

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औरत सबसे पहले पतई चमार के यहाँ पहँु ची थीं, पौपुजी करने और मद भी

यास से उनक खोप ड़याँ चटक रह ं थी। पतई चमार के यहाँ पानी नह ं पीना था चमार

के यहाँ पानी नह ं पया जा सकता था, इसिलए पतई चमार के यहाँ पन पयाव का कोई

बंध नह ं था हो भी नह ं सकता था, उतनी औकात नह ं थी पतई चमार क क खांड

का रस और आलू और गंजी और क हड़ा उबलवा कर रख। औरत और मद पांवपूज सीधा

धनी नाऊ के यहाँ पहँु चे थे। धनी नाऊ के यहाँ भी पन पयाव का कोई खास इ तजाम

नह ं था, फर भी उसने गुड़ क भेली फोड़ रख दया था। औरत लड़के लड़क का पांव

पूज चौहजा के यहाँ पहँु च गई थीं। यहाँ भीड़ थी पौपुज का, तगड़ा जमावड़ा, तीन चार

गांव के औरत मद। प डत पहले लड़क के मां बाप दादा दाद से पांव पुजवा भीड़ ख म

करने से पहले तीन तीन चार चार जोड़े (पित प ी) को एक साथ पौपुजी करवा के

िनपटाना शु कर दए, फर भी पौपुजी होते होते रात का तीसरा पहर आ पहँु चा, बराती

हालां क शाम को गुड़ और चबैना चबा चुके थे फर भी भूख तो लगी ह थी। ब चे

यादा परे शान थे, उनके िलए शाम को पूड़ स जी भेजवा दया था चौहजा ने। और

उ ह ने छककर खाया भी था ले कन इतनी रात गए उ ह फर भूख लग गई थी, कुछ

ब चे सो गए थे।

लोग बारात म िभड़े थे। बड़े बुजुग गांव क औरत पौपुजी और याह म िभड़ थी।

राम िनहोर जगदे व के लड़के क आँख कड़ु वा रह थी। उसे बारात म अब मजा भी नह ं

आ रह थी चौहजा के यहाँ से िनकल घर के िलए चल पड़ा था।

ए भइया......... ऽ ऽ ऽ ऽ

कौन है रे ? पीछे से कसी लड़क ने आवाज दया था, राम िनहोर को

भाग कहाँ रहे हो ?

या ह......? राम िनहोर क गया था


म भी घर जाऊँगी.........रामरितया थी, पहचान िलया था राम िनहोर ने ।

रामरितया ..... शाद हो चुक थी रमरितया क । शाद रामिनहोर क भी हो चुक

थी, ले कन गौना अभी दोन का नह ं हआ


ु था। राम िनहोर क मस भीगने लगी थीं और

उ क रं गीनी उसके दमाग म घुमड़ती भी थी। ऐसा नह ं क लड़ कय के स पक म

राम िनहोर आता ह नह ं था। फर फरवार (खिलहान) क रखवाली, आम के बगीचे म

रात म आम टोहते समय और कोई भीड़ परोजन पड़ने पर वह लड़ कय के काफ कर ब

आ जाता था। यहाँ तक क वह ऐसे काम म अपने को िभड़ाता था क जहाँ लड़ कयां

यादा ह , ले कन उसक ह मत नह ं पड़ती जो कभी कसी लड़क को कुछ कह दे या

उसका हाथ पकड़ ले। ले कन रामिनहोर गोरा, छरहर दे ह, दे खने म खूबसूरत, रमरितया,

िनयदर , मीता और सुरजी जैसी चार पांच लड कयाँ रामिनहोर क हम उ थीं, छाितयाँ

उनक िनकल आई थीं, शा दयाँ उनक हो चुक थीं, गौना नह ं गया था। राम िनहोर को

दे खती थी तो गाने गाती थीं। फर फरवार म लुकािछपी खेलती थीं, कोई काम पड़े , राम

िनहोर को बुला काम करवा लेती थीं और रामिनहोर उनके काम खुशी खुशी कर भी दया

करता था। बचपन म जब रामिनहोर छोटा था रमरितया को घर के पछवाड़े उसक धोती

उठा बो बो कया भी था, दो चार दफे। ले कन दन म वह पितया या िनयदर या सुरजी

जब कभी उसके सामने अकेली पड़ती ह तो उनसे रामिनहोर क आँख िमला बात करने

क ह मत नह ं पड़ती, अकेले म आमना सामना होते ह उसके कंठ सूखने लगते ह और

कलेजा धड़ धड़ धड़कने लगता है हालां क लड़ कय के साथ वह खेलता है और जाने

अनजाने उनक छाितयाँ छू दे ता है ले कन यह सब कुछ इस तरह वह करता है जैसे वैसा

उसने जान बूझकर नह ं कया हो, लड़ कयाँ कभी कभी उसके साथ छे ड़खानी कर दे ती ह,

उसे ठु नके मार भागती ह तो वह उ ह पीट दे ता है ।

तुमने मुझे मारा-जाकर म घर पर अपनी माँ को बताती हँू


जा बता न या मुझे तेर माँ क डर है ?

तो तूने मुझे इतनी जोर से य मारा?

मा ँ गा.... अगर तू मुझे मारे गी तो ू ा?


या म तुझे छोड़ दँ ग

तूने इतना जोर से य मारा मेर ह डयाँ दद कर रह ं ह......

मा ं गा, तूने मुझे मारा तो या मुझे चोट नह ं लगी थी?

रितया जोर से रामिनहोर क तरफ झपट आ रह थी। रितया को आता दे ख

रामिनहोर का दमाग सनसना उठा था। जहाँ रामिनहोर खड़ा था, गली थी। स मी का

चॉद प म म बैठने जा रहा था और गली म अंधेरा भर गया था। रामिनहोर का कलेजा

धड़कने लगा था और दे ह म उसके खून तेजी से दौड़ने लगा था, बड़ा अ छा मौका है

सोचा था रामिनहोर ने , आज तक वह रितया, पितया या िनयदर या दसर


ू लड़ कय

से अकेले म िमलने क सोचता था। अकेले म कभी कभार िमलने का उसे मौका िमला

था ले कन इस तरह का एका त उसे इसके पहले नह ं िमला था और अगर एका त उसे

िमला भी था तो वह उनसे जो कहना चाहता था वह कह नह ं सका था......। रामिनहोर

क उ ेजना बढ़ती जा रह थी, रितया भागकर रामिनहोर के पास आकर खड़ हो गई

थी।

या है रे ..... रितया को पास खड़ पा, रामिनहोर के मन म आया था क उसे

पकड़ अपने से सटा ले, ले कन उसक ह मत नह ं पड़ थी।

कहाँ जा रहे हो ?

घर जा रहा हँू और कहाँ जाऊँगा ?

म भी घर जाऊँगी अकेले मुझे डर लगती है , रितया के भी मन म आया था क

वह रामिनहोर से सट जाए इस तरह के एका त से उसका भी दमाग सनसना रहा था,

ले कन उसे डर थी रामिनहोर कह ं उसे यह न समझ ले क यह लड़क खराब है , दसरे



उसे रामिनहोर से झड़के जाने का भी डर था। तो जब तक वह अपनी तरफ से कोई

पहल न करे रितया क ह मत आगे बढ़ने क नह ं पड़ रह थी, रितया एक तो झपट

कर इतनी दरू आई थी, दसरे


ू कसी मद से एका त म इतने कर ब पहँु चने का यह

उसका पहला मौका था, इसिलए उसक सांस तेज चल रह थीं।

डर लगती है तो तू आई ह य ? रामिनहोर अपनी दे ह और दमाग क सनसनी

पर काबू करने का यास कर रहा था और वह सोच भी रहा था क रितया का हाथ या

दे ह या छाितयाँ पकड़ ले ले कन उसे इस बात का डर था क कह ं ऐसा करने से रितया

ह ला न मचा दे या जा कर अपने घर म, अपनी माँ से कह दे इसिलए वह ऐसा कुछ

भी करने क ह मत नह ं जुटा पा रहा था।

इतनी दे र म उसने दे खा था गली म और कोई बढ़ता चला आ रहा है ? अ छा

चल ज द दे ख कोई आ रहा है । हम दोन को अकेले गली म खड़ा दे ख कुछ बुरा

सोचेगा। रामिनहोर रितया से एका त म जो करना या कहना चाह रहा था वह तो नह ं

कह सका था, उसी बात को उसने रितया से इस तरह कहा था क रितया उसका आशय

समझ जाए। वह आगे रितया से कहना चाहता था क चलो यहाँ से भाग कर एका त म

कह ं छुप जाएँ, जससे आने वाला उ ह दे ख न पाए ले कन आगे रितया से यह बात

कहने क रामिनहोर क ह मत नह ं पड़ थी। रितया एक दफा गली के छोर पर आने

वाले को दे ख खल खलाकर हं स पड़ थी ......

तू हं स रह है ?

तू डर गया न ?

य , कोई तुझे मेरे साथ इस तरह अकेले अंधेरे म खड़ दे ख बुरा नह ं सोचेगा,

पूछेगा नह ं यहाँ अंधेरे म अकेले तुम दोन या कर रहे हो?

राम िनहोर अपनी तरफ से प रितया क राय लेना चाह रहा था।
नह ं कहे गा....... रिधया है वह

तो या रिधया हम दोन को इस तरह खड़ा दे ख तेरे और मेरे घर म िशकायत

नह ं कर दे गी?

नह ं करे गी

तू जानती है ?

हाँ जानती हँू ... राम िनहोर को अपनी बात का कोई संकेत नह ं िमला था, ले कन

रिधया उ ह इस तरह अकेले गली म अंधेरे म खड़ा दे ख, गांव म ह ला नह ं मचाएगी

या घर म िशकायत नह ं कर दे गी, रितया क इस बात पर व ास नह ं हआ


ु था

रामिनहोर को। दसरे


ू रिधया का इस तरह एका त म टपक पड़ना उसे अ छा नह ं लगा

था। आज तक लड़ कय के इतना नजद क रहने पर उनसे अपने मन क कोई बात नह ं

कर सका था रामिनहोर, तो उसका एक कारण यह भी था क लड़ कयां जब भी उसे

िमली ह, दो तीन एक साथ अगर और नह ं तो कोई ब चा उनके साथ ज र था, ऐसे म

कसी से ऐसी बात कया कैसे जा सकता था?

रिधया ..... इतनी दे र म वहाँ आ पहंु ची थी.....

आ गई ?
हाँ.....

चल .....?

चल ले कन ए तो हम लोग से बात ह नह ं करते

यह तो म भी दे खती हँू पता नह ं हम लोग से य िचढ़ते ह ए ?

रिधया को दे ख रामिनहोर के मन म जो एक तरह का भय समा गया था, दोन

क बात सुन उसक वह डर ख म हो गई थी और उसका दमाग फर सनसना उठा था,

ले कन बीच म रिधया का आ टपकना...


अरे िचढ़ता नह ं हँू म। मुझे डर लगती ह कह ं बुरा न मान जाओ तुम लोग।

दोन क बाते सुनकर रामिनहोर म काफ कुछ कहने क ह मत आ गई थी। हालॉ क

वह जान गया था क इन दोन से मुझे कोई डर नह ं है , ले कन आगे क बात पर भी वे

दोन राजी ह क नह ं .. जानना चाहता था रामिनहोर।

इसी बात से तो हम लोग को डर था कह ं तुम बुरा न मान जाओ

अरे नह ं म य बुरा मानने लगा, मुझे तुम दोन बड़ अ छ लगती हो ....।

झूठ ..... तु ह पितया अ छ लगती ह।

पितया .......? वह कैसे ?

तभी तो तुम उससे यादा बोलते हो और हम लोग से बात भी नह ं करते ,


बोलने पर मार भी बैठते हो।

गलत ....

गलत नह ं सह ..... एक दम सह है ....।

वह मुझे साग ख ट कर खलाती है उसके यहाँ जो अ छा खाना बना हो मुझे

पहँु चा जाती है , इसीिलए या ?


नह ं और भी बहत
ु कुछ है

अ छा एक बात करो, यहाँ से चलो हम लोग बाग म चले चलते ह, यहाँ कोई

आ जाएगा, रिधया ने सुझाव दया था।

ठ क .... रितया ने समथन कया था।

तीन रात के अंधेरे म बाग म आ पहँु चे थे

रामिनहोर का दमाग सनासना रहा था.... उसे इस बात क सपन म भी उ मीद

नह ं थी क रिधया और रितया खुद उसे एका त बाग म ले जाएंगी। कभी नह ं सोचा था

उसने .... तीन बाग म पहँु च एक खाई के पास आ गए थे, हालां क रामिनहोर के भीतर

अब कसी तरह का डर नह ं रह गया था, फर भी उसक ह मत नह ं पड़ रह थी क


वह रितया या रिधया को कुछ करे । फर भी रामिनहोर डरते-डरते रिधया के कंधे पर हाथ

रख दया था। रिधया ने इसका कोई वरोध नह ं कया था, रामिनहोर क दह म

सनसनी उठ थी, वह अपना हाथ रिधया के कंधे से सरकाता नीचे ले गया था और

रिधया क छाती पकड़ िलया था। रिधया ने फर भी कोई वरोध नह ं कया था। राम

िनहोर का डर अब पूर तरह ख म हो गई थी, अब उसने रिधया को अपनी दे ह से सटा

िलया था और उसक छाितयाँ दबाने लगा था, रितया जो इतनी दे र तक रामिनहोर से

थोड़ा अलग खड़ थी उसक दे ह से सट गई थी। रामिनहोर क दे ह म खून बड़े जोर से

दौड़ने लगा था उसने रितया को भी अपने बाए हाथ से अपनी दे ह से सटा उसक छाितयाँ

दबाने लगा था थोड़ दे र तक यह म चलने के बाद रामिनहोर से बदा त नह ं हआ


ु था,

वह रिधया क छाितयाँ छोड़ अपने हाथ नीचे उसके पेट के नीचे से सरकाता उसक धोबी

ऊपर उठाया था ले कन रिधया िछटककर अलग खड़ हो गई थी।

य या हआ
ु ?
नह ं वह नह ं ।

नह ं वह छोड़ और सब कुछ कर सकते हो। रितया ने रिधया का समथन कया

था।

सब कुछ, वह छोड़? रामिनहोर क समझ म ह नह ं आया था क वे दोन

''वह'' करने के िलए तैयार य नह ं ह, दसरे


ू इसके अलावा और कुछ या कया जाता

है रामिनहोर कुछ जानता भी नह ं था।

ले कन य ? जा हर था रामिनहोर को उन दोन का वह करना मना करना

अ छा नह ं लगा था।

नह ं, तूने ल खया को दे खा नह ं ... या? हम लोग को जंदा नह ं रहने दे ना

चाहते हो या?
रामिनहोर डर गया था, चरन दादा क बेट ल खया........ शाद हो चुक थी,

ले कन गौना जाने के पहले ह उसका पेट फूल गया था ... चार तरफ हहोर मच गया

था। ल खया क असली माँ मर चुक थी। जब वह छोट ह थी। मैभा माँ थी वह टाड़ना

करती थी ल खया क । घर का जतना काम था वह सब ल खया के ज मे जो था वह

तो था ह , भस चराना, बैल को कोयर पानी दे खना, हलवाहे के साथ खेत से चर

काटकर लाना, सकरं कद खोदना सारा काम ल खया के गले बंधा था। हलवाहे के साथ

खेत जाने और चर लेहड़रा काटने के म म वह कमजोर पड़ गई थी और उसका पेट

फूल गया था। जब गांव म इस बात का पता चला था, हलवाहा रातोरात भाग िलया था,

नह ं तो गांव वाले उसक जान ख म कर दे ते ले कन ल खया कहाँ भागती....... या

ददशा
ु हई
ु थी ल खया क । गांव के सभी लोग ने दे खा था और उस घटना के बाद गांव

क लड़ कय पर बंधेज बढ़ गया था.... ल खया को जो दे खता खासकर औरत उसे भ

गािलयाँ दे ती और जो मुंह म आता वह कह दे ती। ल खया इसके पहले सार टाड़ना सहने

के बावजूद हं सती और खल खलाती रहती, उस घटना के बाद उसका चेहरा प थर का हो

गया था। सारे वषैले वा वाण वह सहती और बुकुर बुकुर सबका मुंह िनहारती। ल खया

के पता बंबई म रहते थे, खबर तो जंगल क आग क तरह चार तरफ फैली थी, यह

खबर उ ह भी िमली थी और वे सुनते ह सीधा घर पहँु चे थे। बंबई से चलते समय ह

उ ह ने योजना बना िलया था, योजना तो उनक यह थी क पहँु चते ह वे ल खया क

गदन गड़ासे से रे त दगे, ले कन लोग ने उ ह समझाया था, जो कुछ होना था जग

हं साई तो हो चुक है , उस कुल छनी ने जमीन पर पांव रखते ह मां को खा िलया था

और अब उसने ऐसा कया क गांव के लोग को बाहर मुंह दखाने लायक नह ं रखा

उसने अपने कम से और उसके इस कुकम का तो दं ड यह होना चा हए क, गड़ासा

िलया जाय और उसक छोट छोट बोट काट चील कौओं को खला दया जाए, तब भी

उसके इस कुकम का दं ड पूरा न हो। ले कन लोग ने उ ह आगाह कया था। गांव पव त


म अगर कोई इस बात को पुिलस म पहँु चा दया या पुिलस वाले तो कु े होते ह, अगर

सू◌ॅधते सूधंते पहँु च गए तो तय है फॉसी लग जाएगी। इसीिलए ऐसा कुछ करो क सांप

ू ।
भी मर जाए और लाठ भी न टटे

नह ं भइया अब यह दाग लेकर म ज दगी भर लोग के सामने खड़ा कैसे हँू गा,

इससे अ छा तो फॉसी लग जाए तो वह अ छा है .....

अरे नह ं हो, चरन ऐसे कह ं पागल हआ


ु जाता है अगर तु ह फॉसी लग गई तो

ई जो चार ठो तु हारे बाल ब चे ह ई गली-गली कौरा नह ं मांगेगे? इसिलए दमाग

थोड़ा संतु करके काम करो हाँ.......।

ठ क ह अगर आप लोग कहते ह तो म अपने को सं भालने क कोिशश क ं गा

ले कन हो भइया, अगर वह मेर नजर के सामने पड़ गई तो या म बदा त कर

पाऊँगा?

बदा त होगा, सब कुछ बदा त होगा, तु ह यह नह ं भूलना है क तु हारे चार

ठो बाल ब चे ह, इसिलए इस तरह पगलाया नह ं जाता। अरे साली इ ज जये नह ं रह

तो जीकर कोई फायदा नह ं है भइया,

चरन जवान जहान लड़का मर जाता है तो या आदमी बदा त नह ं करता।

लड़का मरने पर कोई कुंआ म थोड़ कूद जाता है या गले म र सी बांध फॉसी थोड़ो लगा

लेता है , आ खर बदा त करता है न सब।

मेरे सभी ब चे मर जाते घर म आग लगकर वाहा हो जाती तो उसे बदा त कर

लेता, ले कन ई बात कैसे बदा त होगी।

चरन का चेहरा प थर क तरह स त हो गया था और उसी स त चेहरे के साथ

वे बंबई से घर पहंु चे थे, ल खया ने जो कांड कया था सबको पता थी चरन इसे बदा त

नह ं पाएँगे और इसी झ क म वे कुछ भी कर बैठगे, इसीिलए घरवाल ने ल खया को


डे हर (िम ट क बड़ नाद) म छुपा दया था, जब उ ह पता चली थी क चरन बंबई से

टे शन पर उतरे ह तभी।

चरन बंबई से िसफ एक झोला और पा कट म भाड़ा कराया के अलावा कुछ भी

लेकर नह ं चले थे, गाड़ से उतर वे लंबी डगे भरते घर पहँु चे थे। घर वाल को और गांव

म उनके पहँु चने क खबर उनके गांव पहँु चने के पहले ह पहँु च चुक थी, इसिलए चरन

क प ी डर से थर थर कांपती कोठली म जा छुपी थी, खबर सुनते ह उसने गांव वाल

का िनहोरा कर आई थी क वे लोग तैयार रहे सबको बचाने के िलए नह ं तो वे ऐसे

बगडै ल जीव ह क पूरे प रवार को ह बाल दगे। इसिलए गांव के कुछ लोग तो तमाशा

दे खने के िलए आ जुटे थे और कुछ लोग पूरे प रवार को कटता हआ


ु दे खना चाहते थे

खासकर ल खया क मैभा माँ को य क गांव वाल को ल खया से यादा उसक मैभा

मां पर िचढ़ थी।

ल खया ने जो कुछ कया है वह तो िनिध न काम कया ह है , ई भोसड़ औरत,

या इसक आँख नह ं थी क जो दे खती क जवान जहान लड़क , उसे हम हलवाहे के

साथ चर काटने और गंजी खोदने और सानी पानी करने भेज रह ह। कुछ लोग जो राम

चरन के गु से से प रिचत थे वे थित को संभालने के उ े य से भी इसके दरवाजे आ

पहँु चे थे।

चरन घर पहँु चते ह हाथ का टं गा झोला ओसारे म पड़ ख टया पर फका था और

दांत कट कटाते हए
ु ल खया को तलाशने घर म घुस गया था। कहाँ है वह कुल छनी ला

गड़ासा ला............बाल दे ता हँू अभी उसे। चरन के नथुने फूले हए


ु थे उसके िसर पर

खून सवार था, वह िच ला रहा था. ला गंडासा... कहाँ है गड़ासा उसक सांसे जोर से

चल रह ं थी। गंड़ासा खोज रहा था चरन, जहाँ गंड़ासा रखा जाता था वहाँ वह नह ं था,

न हं िसया थी सामने कोई दख भी नह ं रहा था उसे, न ल खया न उसक मां। गंडासा

तो उसे नह ं िमला था य क हं िसया गंडासा, छूर च कू, लाठ डं डा जो कुछ भी घर


म था सब चुराकर पछवाड़े रख दया था ल खया क मां ने, इसिलए चरन के हाथ ऐसी

कोई चीज नह ं लगी थी। ले कन खोजने के म म कोठली म ब च के साथ दबक


ु बैठ

ल खया क मां िमल गई थी चरन को। ल खया क मां को दे खते ह चरन का खून खौल

उठा था। आगे झपट उसने उसका झ टा पकड़ा था और उसे घरर घरर घसीटता दवारे

लाकर पटक दया था। चरन बुर तरह हाँफ रहा था, ल खया क मां क छाती पर पांव

दाब वह गंडासा मांग रहा था, अरे कोई गंडासा ला ना। यह भ सड़ सभी पाप क जड़ है

पहले म इसे ह ख म क ं गा...... गांव के लोग जो इतनी दे र तमाशा दे खने जुटे थे चरन

का गु सा दे ख थर थरा उठे थे। यह तो सह म ल खया क मां क जान ले लेने पर

उता है , लोग दौड़ कर चरन को हथुवा ल खया◌ा क मां से अलग कए थे...... य

पगला गए हो या?

या कर रहे हो चरन सोचो अगर इस ोध म तुम कुछ उ टा सीधा कर बैठे तो

, तु ह जो फॉसी लगेगी वह तो लगेगी ह इन छोट-छोटे ब च का या होगा? ब चे

इतनी दे र म कोठली से िनकल बाहर आ गए थे और भ भ करके रोने लगे थे। हो जाए

फॉसी इसक परवाह नह ं है मुझे। इस भ सड़ के साथ म ब च को भी ख म कर दँ ग


ू ा

और खुद को भी गड़ासे से रे त लूंगा। लोग चरन को पकड़ रखे थे और चरन उन लोग

क पकड़ से अपने को छुड़ाने के िलए कूद रहा था, यह िसलिसला कुछ दे र तक चला था

आ खर चरन ने ल खया और उसक मां और ब च और खुद को बाल दे ने का िनणय

बदल िलया था। लोग उसे पकड़ एका त म ले गए थे। कुछ, उसके कान म फुसके थे।

चरन को उन लोग ने जो सलाह दया था वह ठ क जंचा था...... गांव वाले चरन को

पानी दाना लाकर दए थे, ले कन चरन ने उसे छुवा तक नह ं था, गांव वाले उसे बार-

बार समझा कर उसे शांत कए थे और इक ठ भीड़ को तमाशा दे खने जुटने के िलए

फटकारे थे और सीधा अपने अपने घर जा बैठने क हदायत दए थे। सब कुछ शा त हो


गया था एक दम शा त चरन भी एक दम शा त हो गया था जैसे घर म कुछ हआ
ु ह

न हो ..........।

रात, आधी रात, जब गांव म चार तरफ चु न मु न हआ


ु था, चरन अपनी

ख टया से उठा था। शाम वह दखाने के िलए जो कुछ मन म आया था थोड़ा मोड़ा खा

िलया था और दो रात, गाड़ म जगा होने के कारण◌ा


् थकावट का बहाना कर दरवाजे म

ख टया बछा सो गया था। प ी को भी उसने हदायत दे दया था उसे ड टब न करे

और ब च तथा ल खया को खाना पीना खला ज द सुला दे .....। ल खया को डे हर से

िनकाल उसक मां उसे खाना खला सो जाने क हदायत दे द थी। ल खया खाना या

खाती, मुंह जुठार बड़े भाई क ख टया पर गठर मोठर बन, जाकर सो रह थी। रात,

आधी रात चरन अपनी ख टया से उठा था ब चे सो गए थे ले कन उसक प ी को नींद

नह ं आई थी। ल खया क भी ऑख म नींद नह ं थी ले कन वह मुदा बनी भाई से

िचपक ख टया पर पड़ हई
ु थी। दन का य उसक ऑख के सामने घूम रहा था।

चरन ख टया से उतर दबे पांव ल खया क ख टया के पास पहँु चा था, ल खया दे ख रह

थी। दे ख या रह थी, सुन रह थी, रात के स नाटे म बापू ख टया से उतर धीरे धीरे

चलते दबे पांव चलकर उसक ख टया के पास आकर खड़े हो गए ह।

ल खया .............. बापू ने उसका नाम लेकर उसे बुलाया था

ऊँ ऽ ऽ ऽ बापू को अपनी ख टया के पास खड़ा जान ल खया क दे ह सु न सी

पड़ गई थी डर से ...........।

इसके बाद चरन ने आगे कुछ नह ं पूछा था, अंधेरे म ख टया पर टटोल ल खया

को गदन से पकड़ नीचे जमीन पर पटक दया था उसे और उसक छाती पर बैठ अपने

दोन हाथ से ल खया का टे टु वा दाब दया था। ल खया एक दफा अपने टे टु वे पर कसे

बापू के लौह पंज से छुटकारा पाने के िलए ऊँह ऊँह करके अपने दोन हाथ से टे टु वा

छुड़ाने का असफल यास क थी, ले कन उसके टे टु ए पर बापू का लौह पंज इस तरह


जकड़ा हआ
ु था क वह उसे छुड़ा नह ं पाई थी, थोड़ दे र तक हाथ पांव छटपटाया था

उसका और वह शा त हो गई थी।

सुबह गांव म ह ला मचा था ल खया ने नद म कूद अपनी जान दे द है ,

ल खया क बात सुनते ह रामिनहोर क दे ह म अनाम भय सा याप गया था,

उसक दे ह थरथराने लग गई थी......... उसने रिधया और रितया को छोड़ दया था।

उसक सार उ ेजना एकायक शा त हो गई थी। जैसे उफनते दध


ू पर पानी डाल दया

गया हो।

चलो अब घर चलते ह

य ..... अभी तो हम लोग आए ह ह

नह ं अब मुझे यहाँ नह ं कना है

य ..... तु हे डर लग रह ह

हाँ वह ं समझो अब म यहाँ जरा भी नह ं क सकता और रामिनहोर तेज डग

भरता अपने घर चला आया था। रामिनहोर के पीछे पीछे रिधया और रितया दोन घर आ

गई थी।

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गांव म चौहजा के घर म शाद ख म हो गई थी और बराती खाना पीना ख म

करके जनवासे म आ बैठे थे और बाई जी क नाच दे खने म मशगूल थे। धनी नाऊ के

यहाँ भी बाराितय का खाना ख म हो गया था और जनवासे म बराती हड़ुु क और झॉझ

बजा कोई पूव टड़ रखे थे........ चौहजा के घर से घराती खाना पीना िनपटा कुछ लोग

धनी नाऊ के जनवासे जा पहँु चे थे और कुछ लोग चौहजा क बारात म बाई जी क नाच

दे खने .... ले कन धनी नाऊ क बरात म अभी गाना शु ह हआ


ु था क कसी ने उजुर

कर दया था...... बरादर वाल आप लोग से मेर एक उजुर ह... उजुर पड़ते ह गाना

बजाना ब द हो गया था... एक आदमी जनवासे के बीच जा जम पर अपने दोन हाथ

सीने से बांधे खड़ा था।


पंचो अगर आप लोग क इजाजत हो तो मेर एक उजुर है पेश क ँ ।

हाँ हाँ पेश करो .... चौधर ..... पचीस गांव के चौधर भभूती नाऊ बारात म

मौजूद थे, खाना पीना ख म करके वे जा जम के एक कनारे िसर के नीचे अपना झोला

दाब आराम कर रहे थे, उजुर क पुकार पड़ते ह वे उठकर बैठ गए थे....

क हए आपक जो उजुर है पेश क रए

पंच मेर बेट .... दे वरा गांव म याह थी बीमार म भगवान ने उसे हर िलया

... उजुरदार का गला बेट के हरे जाने क बात पर भार हो उठा था, खंखारने के बहाने

उसने शा त होने का यास कया था। उजुरदार क उजुर पड़ते ह जो लोग लेटकर

आराम कर रहे थे सब उठकर बैठ गए थे।

पंच मेर बेट का गहना जेवर सब अभी तक दे वरा वाल के पास पड़ा हआ
ु है मै

दो दफा उनके यहाँ गया था और उनसे उसे लौटाने क फ रयाद कया ले कन वे लोग

अभी तक उसे नह ं लौटाए

लौटाए य नह ं .... इस बात का खुलासा तो होना चा हए। जा जम पर बैठा एक

अधेड़ उ का आदमी उजुरदार से कया था, हालॉ क यह चौधर को करना

चा हए था ले कन चौधर क तरफ से कोई आने के पहले ह वह पूछ बैठा था,

और अपने तथा जो बीच म बना चौधर क इजाजत के पॅ◌ूछ बैठा था दोन के

समथन के िलए वह बगल बैठे आदमी क जॉघ पर हाथ रख उसका समथन मांगा था।

ऐ हाँ... आ खर जब तक इस बात क जानकार नह ं होगी क दे वरा वाले जेवर

लौटा य नह ं रहे ह, तब तक पंच कोई फैसला कैसे दे गा .....?

य भइया ठ क है ना ......?

हाँ वह तो है ...... बगल वाले आदमी ने उसक बात का समथन कया था।

उजुरदार थेड़ दे र तक हाथ बांधे खड़ा चौधर क तरफ दे खा था..... िनणय लेने के िलए

चूं क चौधर को भी इस सवाल का जबाब चा हए था इसिलए उ होन भी उजुरदार से

कारण जानना चाहा था।


पंच म खुद या इसका कारण बताऊँ, दे वरा वाले खुद यहाँ मौजूद ह, उ ह ं से

पूंछ िलया जाय।

लोग बारात म चार तरफ दे वरा वाले को तलाशती नजर से खोजने लगे थे।

कहाँ ह दे वरा वाले भाई, जो बात है साफ साफ बरादर के सामने क हए ...। इस

दफा फर वह आदमी चौधर के बोलने के पहले बोल उठा था ...। उस आदमी क बात

पर, बारात के बीच से उसी तरह क , अधेड़ उ का एक आदमी उठा था और अपने

दोन हाथ जोड़ खड़ा हो गया था।

पंच इनक बेट एक दफा जब नैहर गई थी तो एक झॉझ और एक हँ सुली वह ं

छोड़ आई थी वह इ ह ं लोग के पास है , पंच इसी जेवर को वापस करने क बात कर

रहे ह ए........।

य ई बात सह है ? इस दफा चौधर ने कया था, य क पहले वाले

आदमी को आगे न तो करने का अिधकार था और न ह ं इस पचीदे मामले पर कुछ

सोचने या िनणय दे ने क उसम मता ह थी, इसिलए वह चुप ह बैठा रहा।

नह ं पंच लड़क जो गहना जेवर लेकर आई थी, मेरे यहाँ से जाते समय उसे

पहनकर गई थी......। सार बारात म जो थोड़ दे र पहले सुगबुगाहट सी होना शु हो गई

थी अब पुन: स नाटा छा गया था, य क लोग जतना इस मामले को आसान समझे

थे वह उतना आसान नह ं था। अब सबका यान चौधर पर के त हो गया था। चौधर

इस पचीदे मामले को तय करने के िलए या करता है ......। चौधर मामले क

पचीदगी समझ इसके सुलझाने क दशा म वचार करने के िलए अपना माथा पकड़ कुछ

सोचने म जुट गया था।

मामला बड़ा पचीदा है यह तो एक दसरे


ू को बेईमान कह रहे ह

लोग ने चौधर क बात का समथन कया था और आपस म खुसुर फुसुर करना

शु कर दए थे।
कसी के पास इसे सा बत करने का कोई सबूत है .. थोड़ दे र चुप रहने के बाद

चौधर ने अगला कया था।?

है सबूत पंचो उजुरदार फर अपना दोन हाथ सीने से बांध िलया था। पंच वे

दोन गहने इ ह ने अपनी बेट को दे दया है .....

झूठ एकदम झूठ, पंच ऐ झूठ मूठ का मुझे चोर बना रहे ह, म अपनी बेट को

हं सुली और झॉझ खुद गढ़ाकर दया हँू ......

हँू म ् म ् .... चौधर ने गहर हंु कार भरा था .....

आपने कस सोनार से गढ़वाया है हं सुली और झॉझ

ु ू सोनार से पंच उजुरदार ने जबाब दया था


बाबूगंज बजार के टनक

और आपने ?

भरथीपुर ब बू सोनार से पंच ?

कतना पया आपको लगा था ?


चार पए बारह आने

और आपको....?

वैसे मुझे ठ क याद नह ं है ले कन ........

ले कन या ? जो आदमी गहना जेवर म खचा करता है वह उसे याद तो रहता

ह है ..... फर भी मान िलया क कुछ भूल हो भी सकती है , तो वह अठ नी चव नी

क हद से हद

पंच उसके साथ मने और जेवर भी बनवाए थे इसिलए मुझे झॉझ और हं सुली म

अलग से कतना लगा याल नह ं है ...।

या या बनावाए थे इतना तो याल है

हाँ याल य नह ं है , झॉझ ल छा, हं सुली और करधन बनवाया था पंच ।

सबका वजन कतना था और उसम खच कतना पड़ा


टे ड़ा था झॉझ और हं सुली उस आदमी ने बनवाया ह नह ं था वह उसी

उजुरदार ने बनवाया था जसे उसने अपने बेट के गौने म दे दया था। इसिलए वह

इसका सह जबाब नह ं दे पाने के कारण चुप हो गया था

य कुछ याल नह ं आ रहा है .........?

पंच .... मुझे इसका सचमुच याल नह ं आ रहा है ......

जा जम पर बैठे लोग म फर खुसुर फुसुर शु हो गई थी, कुछ लोग उसक

चालाक पकड़ उसे दोषी सा बत कर रहे थे और कुछ लोग उसे वजन और दाम न बता

पाने के िलए उसे मादान कए दे रहे थे।

अरे कुछ अंदाज बताइए अगर ठ क ठ क आने पाई न बता पा रहे ह तो

दे खो जो सह बात है उसे बरादर के सामने कबूल लो ............

म इसम झूठ नह ं बोल रहा हँू पंच ..... मुझे ठ क इसके बारे म याद नह ं

ह..............।

चौधर क बगल बैठा एक दसरा


ू आदमी कुछ खीजता हआ
ु बोला था,

दे खो अभी पंच इस पर कोई फैसला नह ं दे रहा है अगर उनका जेवर तु हारे यहाँ

पड़ा है तो उसे लौटा दो ले जाकर उनके घर नह ं तो पंच तुम पर जो वा जब होगा

जुमाना करे गा......चौधर ने अपना फैसला दया था और बरात म हड़क


ु और झॉझ फर

बजने लगी थी।

इधर पतई के यहाँ बरात खाना पीना ख म करके जनवासे म आ गए थे और

िसंधी और खड़ताल और मृदंग पर थाप पड़ने लगी थी। बरात प से ऐसी कोई नाच का

इं तजाम नह ं था, इसिलए चमरटोली क नाच पाट खुद नाचने के िलए सज गई थी।

सबसे पहले उ ह ने दे वी को खुश करने के िलए भजन गाया था इसके बाद बहाड़

क रं गा खुली दह मुंह म सफेद पोत और कमर म घं टय का प टा पहन और उसके

नीचे टे हु न तक गरारा पहन अंधेरे क तरफ से नाच म आ कट हए


ु थे।

सुनो सुनो भाई .........


हाँ सुन रहा हँू बोलो या कहना है बहाड़ क आवाज पर फेरई हाथ म बोलवाई

ले उसके साथ साथ चलने लगे थे। बहाड़ गोलाई म बैठे लोग के बीच घूम घूमकर

सबका यान अपनी तरफ आकृ करने के बाद .... गोले के बीच आ गया था, सुन

सुनो सब कोई सुनो आज मने अपनी चमैनी का ट ंट पकड़ा था।

हो..ऽ...ऽ......वा..ऽ........वा..ऽ....... ट ट
ं का नाम सुनते ह फेरई ने जोर क

आवाज लगाया था, तु ह पता नह ं साले यहाँ इतने भले लोग बैठे ह, उसम तु ह घर

क ऐसी खराब बात करना चा हए ऽ ऽ ऽ और चा हए को ल बा खींचने के बाद फेरई ने

हाथ क बोलवाई हवा म फटकारा था इस पर बहाड़ आगे झुककर अपनी कमर पर

दान हाथ बांध कमर को इस तरह हलाया था क उसक कमर म बंधी घं टयां एक साथ

झनझना उठ थीं और फेरई ने अपनी पूर ताकत से बहाड़ क पीठ पर बेलवाई सटकार

दया था जससे फटाक क बड़े जोर क आवाज हई


ु थी और इस आवाज के साथ सभी

बाजे गड़ गड़ाकर झाम कए थे और चुप हो गए थे।

नह ं कहना चा हए यह बात, बहाड़ फर गोल गोल घूमने लगा था

नह ं कहना चा हए

तब या कहना चा हए ?
अरे भले आदिमय के बीच अ छ अ छ बात करना चा हए

अ छ बात ?
हाँ अ छ बात

तो ठ क है अ छ बात ह कहता हँू

कहो

कहँू ?
हाँ कहो

कह रहा हँू जरा यान दे कर सुनना

सुन रहा हँू ......... कहो......


घूमते घूमते वहाड़ एक जगह के थे और अपने चूतड़ को एक तरफ टढ़ा करके

जोर से वाँ क आवाज कए थे

हो वा ऽ ऽ ऽ ऽ ...... फेरई ने फर जोर क आवाज लगाया था, बहाड़ ने फर

अपनी कमर पर दोन हाथ रख जोर से हलाया था बाजे झन झनाए थे और एक जोर

क बोलवाई उसक पीठ पर पड़ थी।

इसके बाद बरसाती बादशाह पोषाक पहन अंधेरे से नाच म आ कट हए


ु थे।

मशालची जो बोतल से रोशनी दखाता इतनी दे र बहाड़ के पास पास घूम रहा था तुरंत

बादशाह के सामने चेहरे पर रोशनी दखाने लगा था। बादशाह बड़ा ऐंठ ए◌े◌ंठकर चल

रहा था और चार तरफ मुआयना कर रहा था।

म ी ई ई ... थोड़ दे र मुआयन करने के बाद उसने जोर से मं ी को आवाज

लगाया था। अंधेरे क तरफ से दौड़कर कबव◌ू् राजा के सामने हाथ जोड़े खड़ा हो गया

था। कवव◌ू् िसर पर पगड़ बांधे रखा था कंधे से नीचे, पांव तक सफेद लबादा डाल रखा

था और मुंह पर उसने भी सफेद पोत रखा था।

हुकुम सरकार ..........

इधर मुझे कोई नाचने वाली नह ं दख रह है

अभी बुलाता हँू सरकार........

करे बरसितया......

हाँ काका...... जनवासे के बाहर रामसुख तीन चार आदिमय के साथ ख टया पर

बैठे नाच दे ख रहे थे... बरसाती क यह नाच वे कइयो दफा दे ख चुके थे इसिलए उ ह

फर वह नाटक अ छा नह ं लग रहा था और वे बरसाती को बीच म ह ट क दए थे।

राम सुख के ट कते ह राजा बना बरसाती खीस िनपोर अपने दोन हाथ बांध रामसुख क

तरफ मुंह करके खड़ा हो गया था ...... नाच क गई थी। रामसुख क बात सुनने के

इं तजार म

अरे ससुरा, वह बस एक ह नाटक तूने सीखा है रे भड़ु वा ?


नह ं काका और भी है
तो फर और य नह ं करता, बस जहाँ दे खो वह एक ठो रे तते रहते हो

ठ क है काका ..... दसरा


ू करता हँू ......... बरसाती रामसुख से अपने दोन हाथ

जोड़ माफ मांगा था, उसके बाद अंधेरे क तरफ जा अपनी पोशाक बदलने लगा था। इस

बीच गुज रया बना बलून छ मक छ मक बाज क ताल पर झ मक झ मक घुंघ

झमकाते गोले के बीच नाचने लगा था। अ छा नाचता था बलून, लय और ताल और

राग और कमर म लोच कमिसन उ गुज रया खूब खलता था।

दसरे
ू दन शाम तक पतई और धनी नाऊ क बारात खाना पीना खलाकर बदा

हो गई थी, ले कन चौहजा क बारात के बदा होने का कोई कारण ह नह ं था। भले

आदिमय क बारात तीसरे दन ह बदा होती ह दसरे


ू दन बारात बदा हई
ु नह ं क वह

इितहास बन जाता है और इसके पीछे कारण होता है या तो लड़क वाले, बाराितय और

लड़के वाल क मांग और आव भगत उनक अपे ानुसार नह ं कर सके, लेन दे न म

तकरार हई
ु और लड़के वाले रिसया कर बारात दसरे
ू दन लेकर लौट गए या लड़के वाल

ने माँग , लेन दे न, खाना पीना जैसी बात को लेकर लड़क वाल पर यादती कए और

लड़क वाल ने बाराितय को अ छत दखा दया ( वदाई का आदे श) ले कन जहाँ बारात

दसरे
ू दन बदा हई
ु तो वह लड़क और लड़के दोन प क तौह न थी।

चौहजा के यहाँ ऐसा नह ं क हर चीज ठ क ठाक चल रहा हो। शाम बाराती जब

पहँु चे थे तो उ ह पन पयाव म खांड का सरबत घोरवा दया था चौहजा ने, जब क

बाराितय को उ मीद थी क पन पयाव म चीनी का रस िमलेगा। खांड का सबत तो हम

रोज ह पीते ह, ऐसे मोक पर उनक अपे ा थी चीनी का सबत िमलेगा। य क जस

ताम झाम के साथ लड़के वाले बारात लेकर आ रहे थे और जो लड़के वाल का टै डड

था उसम उ ह खांड का रस पन पयाव म पाने क उ मीद नह ं थी ले कन जब पानी पीते

समय िम ट के कु हड़ म खांड का रस उड़े ला जाने लगा तो उ ह ने नाक भ िसकोड़ना

शु कर दया था। रात खान पर घी क पूड़ के बारे म भी वशेष ने राय द थी क


पूड़ शु द घी क नह ं है । इसम घासलेट िमला हआ
ु है , हाथी घोड़ के राशन को लेकर

जो थोड़ तकरार हो चुक थी वह तो हई


ु ह थी शाम को सबसे यादा कु जो समधी के

मन म पल रहा था वह यह क शाम अगवानी के समय चौहजा िसफ दो पए पकड़ाकर

हाथ झाड़ िलए थे। पौपुजी पर भी यादा पया िमलने क उ मीद थी ले कन उसम भी

जो पया पड़ थी चौहजा ने दबा िलया है । रात खवाई के समय समधी को िसफ ब ीस

आने िमले इसिलए िसफ लड़के के बाप के ह मन म नह ं बाराितय म भी यह बात घर

कर गई थी क जब तक ठ क ऐंठा नह ं जाएगा चौहजा से रस िनकाल पाना टे ढ़ खीर

है , यह सोच बाराती और लड़के के बाप चौहजा से खार खाए बैठे थै और वे इस तलाश

म थे क कब मौका िमले और कब ए◌े◌ंठ दया जाए। बारात म ऐसे मौके खोजने नह ं

होते पग पग पर वे मौके खड़े रहते ह, सुबह हई


ु लोग दातून कु ला से िनवृ हो बैठे थे

दाना चबैना क आस म ले कन लड़क वाल क तरफ से आधा पहर दन चढ़े तक कोई

दखाई ह नह ं पड़ा था। समधी के नान के िलए तेल और धोती अभी तक नह ं पहँु ची

थी एक तो समधी के मन म पहले से गु बस थी दसरे


ू यह दे र , लोग ऐंठने लगे थे चूड़

लड़के के बाप क ।

आधा पहर दन बीतने पर लड़क बाल क तरफ से लाई और गुड़ दो दौर भरकर

बारात म आई, तो लड़के के बाप कूदने लगे थे, भला बताइए यह खरिमटाव भेज रहे ह,

इतना दन चढ़े , लो चमार खरिमटाव कर लो (हलवाह को सुबह नौ बजे खरिमटाव

दया जाता था उसी सस म इसे खरिमटाव कहते थे) इतनी दे र म हम लोग दाना पानी

करके अपने काम म िभड़ जाते ह और यहाँ वह दाना पानी अब पहँु च रहा है और तेल

पानी का कोई पता ह नह ं है अभी। अब जो लोग बना नहाए धोए और पूजा पाठ के

बगैर मुंह म दाना नह ं लेते वे बैठ रहे दोपहर तक। नह ं महाराज ..... लड़क वाल क

तरफ से एक आदमी जो आदिमय के साथ आया था, दाना पानी का बंध दे खने, उसने

अपने दोन हाथ बांध िलए थे, नह ं महराज.... बस अभी आपके नहाने धोने का भी
इं तजाम हो जाता है , उ ह ने साथ आए आदिमय म से एक को तेल और लड़के के बाप

के िलए धोती, दौड़कर ले आने के िलए आदे श दया था.....। ऐसा है दादा क आप लोग

क सेवा करते और ववाह का लोकाचारा करते सबेर हो गया था, जब कौवा बोलने लगा

था तो घर क औरत ने खाना खाया है और वे बेचा रयाँ अभी खा पीकर फुसत भी नह ं

पाई थीं क उ ह रस िसखरन (दह रस) तैयार करने म िभड़ा दया गया...... तो महराज

थोड़ा तल वचल तो होता ह है । यह बात स य थी य क औरत कसी भी बारात म

तीन दन तक न तो ठ क से खाना पाती ह न सोना न बैठना। घराती मद क भी वह

हाल होती है ले कन उनक कह कह ं थोड़ गुजाइश िमल जाती है कमर सीधी करने क

ले कन औरत, वे बेचा रयां तीन चार दन पेराई रहती ह काम म, िसर उठाने क फुसत

नह ं िमलती उ ह, खाना तैयार करते, पानी दाना का बंध और बाराितय के ठसके और

लोकाचार म उ ह एक पल क फुसत नह ं िमलती।

ले कन महराज यह कोई समय है तेल भेजने का बोिलए पहर भर दन बीतने को

आया और अभी तक-एक बाराती तमतमाया आगे आया था, झगड़ा करने के मूड म

..........।

नह ं भइया बस अभी आ गया .... इतनी दे र जो धराती समधी को समझाने जुटा

हआ
ु था वह अब इस बराती क तरफ मुड़ा था, ले कन उसका तमतमाया चेहरा दे ख

उसने साथ आए एक आदमी को और दौड़ाया था। दौड़कर दे खो तो, इतनी दे र हो गया

आ खर वह कर या रहा है ?

दसरा
ू आदमी बड़े जोर से घर क तरफ दौड़ा था और थोड़ दरू दौड़ने के बाद

तेज कदम से चलने लगा था, बस अभी आ गया ददई वह दे खो। गांव क तरफ से नाऊ

हाथ म कुछ िलए आ रहा था पर नाऊ ह था, वह उसे यहाँ से ठ क से पहचाना नह ं जा

सकता था। ले कन उस आदमी को आ त करने के िलए वह गांव क तरफ से आते

उस आदमी को गु साई नजर से दे खने लगा था य क वह आदमी बड़ सु त चाल से


चलता चला आ रहा था जब क घराितय म हर समय एकदम इस तरह क चु ती होना

चा हए जैसे उनम करं ट लगा हआ


ु है ।

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रस चबैना ख म करके बाराती बीबी जी को नाचने का आदे श दए थे। बीबी भी

उस समय तक रस चबैना करके फुसत पा चुक थी और हलके े स म बराितय के बीच

आ जमी थीं। नाच गाना चलने लगा था कुछ बराती नाच गाने म य त हो गए थे कुछ

नहाने धोने चले गए थे। दोपहर खचड़ का समय आया था। गांव क औरत सज बजकर

चौहजा के घर आ डट थीं, लड़का और उसक भयवाद के लोग खचड़ खाने उठे थे

औरत गािलयाँ गाना शु क थीं।

खच ड़हार के सामने घी चुपड़ रोट दाल भात, स जी सब कुछ परसा गया

खाओ भइया खाओ

उकड़ू मुकड़ू पीढ़े पर िसर जमीन क तरफ गोदे बैठा था दस यारह साल का

द ू हा.... खाने के िनवेदन पर अपना िसर और नीचे गोद िलया था

या हआ
ु ब चा, शु करो ...... योता पड़ रहा था गांव जवार का

चौहजा अंग छे का झोला बना उसम जो कुछ योता आता था रखते जा रहे थे।

लड़के को खलाने का िनवेदन कया जा रहा था और बीच बीच म उसके सामने सोलह

ब ीस आने डाल भी दया करता था।

दलहा
ु खचड़ न खाए मोहर बना ...... औरते गीत गा रह थीं

उसके सामने हं डा लाकर रखा गया था, हाथ म अंगूठ पहना द गई थी, जतना

भी लेन दे न तय था चौहजा सब कुछ लाकर द ू हे के सामने रख दए थे, फर भी द ू हा

खाना नह ं शु कया था

बुलाओ भाई समधी को ....... य नह ं खा रहे हो भइया ..... लोग एक एक कर

द ू हे के सामने बैठ उसे मनाए थे ले कन द ू हा खाना नह ं शु कया था। समधी बारात

से आए थे।
समधी ने आकर द ू हे के सामने पड़ पया सामान आ द का मुआयना कया था

, खाओ बेटा ु ?
या हआ

महराज जो कुछ श थी सब कुछ दे दया..... अब इ ह खाने को बोिलए

या दे दए ..... इसी को दे ना कहते ह, चौहजा-समधी के बाप, चौहजा पर उखड़

गए थे

य जो हमारा लेन दे न तय हआ
ु था सब कुछ तो दे दया महराज हं डा,

अंगूठ ......

यह तय था ......?

तॅय तो यह था महराज

तो या यह तु हार श है ?

बस महराज जो श थी दे दया..... अब इ ह खाने को कह

चौहजा अपनी श के बारे म मुझे बता रहे हो?

बस महाराज जो श थी आपके आने के पहले ह दे दया

चौहजा ... सोने का कंठा और िसकड़ और भस, दध


ू खाने को ......

महराज भस अपने एक ह है ब च के दध
ू खाने के िलए

दसर
ू ले लेना ू खाने को नह ं दोगे?
या मुझे दध

ठ क है महराज अगर आपक यह जद है तो ले जाइए भस

और कंठा और िसकड़ (जंजीर)

बस महराज अब इ जत मत ली जए, भस दे दया आपको

भस तो मेर है ह िसकड़ और कंठा दे द जए, लड़के को, खाना शु करवा दे ते

महाराज इ जत न ली जए....... जो श थी दे दया

तो लड़का खचड़ नह ं खाएगा


गांव के दसरे
ू लोग समधी को राजी करने के िलए वनती अरदास करने लगे थे

ले कन समधी ठ गया था और दरवाजे से चलकर जनवासे म आ गया था। लोग समधी

को मनाने के िलए जनवासे पहँु चे थे। होते हवाते चौहजा लड़के को िसकड़ दे ने के िलए

ु थे, ले कन गौने म ..... ले कन लड़के का बाप िसकड़ और कंठा दोन पर अड़ा


राजी हए

हआ
ु था, जसे दे पाना चौहजा के बस क बात नह ं थी, य क चौहजा क यह अकेली

लड़क नह ं थी उनक खुद क अभी दो लड़ कयाँ शाद करने को थीं और भाइय क

लड़ कयाँ िमलाकर घर म कुल सात लड़ कयाँ थीं। तो अगर एक लड़क को इतना दया

जाए तो दसर
ू लड़ कय म भी उतना ह दे ना पड़े गा जो चौहजा जैसे गृह थ के िलए

संभव नह ं था। मान मनौवल से कोई नतीजा िनकलता न दे ख चौहजा उखड़ गए थे.......

अरे रमलखना ई हमर इ जितए लेने पर उता ह ला साल को अ छत दखा नह ं

खलाना है मुझे खचड़ ।

ऐ चौहजा जब पु ठे म ताकत नह ं थी तो य चले आए थे संब ध कराने मेरे

यहाँ

हे महराज तु हार कतनी ताकत है वह मुझसे छुपी नह ं ह

अगहन पूस म बाजार का मुंह न दे खो तो उपवासे मर जाओ, चमैनी के आगे

ढ ढ़ा न छुपाओ पं डत शेष नारायन

चौहजा क यह बात समधी को बुर तरह चुभी थी

ऐ लड़क चलो उठो....... खचड़ नह ं खना है उठो....

खच ड़हार समधी के आदे श पर अपना खाना छोड़ उठ गए थे...

घराितय क तरफ से लोग समधी को मनाने का यास और तेज कर दए थे

..... होते हवाते समधी मान गया था, दे खा था उसने अब इसके आगे ऐंठने म कोई रस

िनकलना नह ं है । दसरे
ू यादा जद कया तो बरात क बदाई हो जाएगी इ जत क

बात है घर पहँु च या मुंह दखाया जाएगा.., इसिलए उसने लड़के को खचड़ जीम लेने

का आदे श दया था।


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जेठ और अषाढ़ तक गांव के लोग शाद ु थे, दशहरा


याह गौने म मतुवाए हए

इसी बीच पड़ा था और कुछ दन म अषाढ़ का दबंगरा भी, हलवाह को बुला खाना

खलाया गया था दशहरा के दन, मतलब साल भर तु ह मेरे यहाँ हलवाह करना है ....

च दर के घर हलवाहा पहल ह जबाब दे दया था और तीन चार घर म हलवाहे छुड़वा

दए गए थे। कुछ हलवाहे जो अभी तक बैठे हए


ु थे दसरा
ू घर थाम िलए थे ले कन च दर

के घर कोई हलवाहा जाने को राजी नह ं था कारण था च दर जो दन रात हलवाहे को

खटाते थे वह तो खटाते ह थे मजूर दे ते समय वे इस कदर डं ड मारते थे क सेर क

जगह तीन पाव ह तौल म उतरता था.......अनाज। इसक लेकर वे गांव भर म बदनाम

थे इसिलए जो हलवाहे खाली भी रहते थे वे ज द च दर के यहाँ हलवा◌ाह थामने पर

राजी नह ं होते थे। च दर के यहाँ प टू पछले साल हलवाह पकड़ा था और साल भर म

ह वह ऊब गया था और दशहरे के दन खाना लेने नह ं पहँु चा था वह। हालां क च दर

को इस बात क भनक पहले ह िमल चुक थी ले कन जब तक हलवाहा खुद अपने मुंह

से बकरे नह ं तब तक सुनी सुनाई बात पर यान दे ना बेवकूफ है , ले कन जब प टू

दशहरा के दन च दर के यहाँ नह ं पहँु चा था तो च दर बगड़ कर भूत हो गए थे।

ु , तुझे ससुरे गांव म रहना है क नह ं, दसरे


करे प टआ ू दन च दर लाठ कंधे

पर रख प टू के दरवाजे जा डटे थे।

भइया मुझसे हलवाह नह ं हो सकेगी अब... दे ह साथ नह ं दे ती साठ म वेश कर

चुके प टू वैसे दे ह से कमजोर नह ं थे क हलवाह न कर सक ले कन चूं क उ ह च दर

के यहाँ हलवाह नह ं करना था, इसिलए यह एक बहाना था करने को।

ससुरे मेरा पैसा तो पहले वापस कर उसके बाद म दे खता हँू क तेर दे ह कैसे

साथ नह ं दे ती

दे दं ग
ू ा महराज

दे या दे गा जब तू मेरे यहाँ हलवाह नह ं करे गा तो मेरा पैसा ला अभी दे


अभी पैसा नह ं है भइया ले कन म पैसा लेकर भाग थोड़ो जाऊँगा, आपका पैसा

वसूल हो जाएगा। प टू कसी दसर


ू बखर म हलवाह थामने क बात भी चला चुका था

और उनसे च दर के पैसे वसूल करने क बात भी चला चुका था, ले कन नई बखर

वाल के पास इस समय पैसे नह ं थे इसिलए बात आगे नह ं बढ़ सक थी।

ठ क है कल तक मेरे पैसे वसूल हो जाने चा हए अब मै तुझे हलवाह तो रखूँगा

नह दे खता हँू गाँव म दसरा


ू कोई तुझ हलवाह कौन रखता है और प टू तुम अगर कल

से मेर बाग या खेत मड़ पर दखाई पड़े तो म तु हारा हाँथ गोड़ तोड़ बैठा दँ ग
ू ा।

अपनी ऐ बक रयाँ और गाय भी घर म बांध रखना अगर इ ह ने एक भी फ लूसी


कह ं मेरे खेत म छू ली तो समझ लो तु हारा हाथ गोड़ टटा।

च दर प टू के दरवाजे लाठ फटकार अपने घर चले आए थे

च दर ने जस तरह प टू को धमकाया था उसके जीवन को हण लग गया था।

वह भागा भागा गांव म पहँु चा था, भइया पचास पए मुझे चा हए नह ं तो मेरे

ठाकुर मेरे हाथ ग ड़ तोड़ दगे.....। कल से उ ह ने अपने खेत बधार म िनकलने को भी

मना कर दया है ....... ऐसा नह ं क प टू पर कसी को रहम नह ं आई थी, प टू के

साथ गांव के कइय लोग को रहम थी ले कन पए दे ने क बात पर कोई तैयार नह ं

हआ
ु था

बात यह नह ं थी क प टू को दे ने के िलए गांव म पचास पए कसी के पास

थी ह नह ं ले कन दे ने के िलए लोग के पचास या सौ पए थी, दो सौ भी थी ले कन

एक तो अगर प टू को कसी को अपने यहाँ हलवाह पर रखना है तभी वह उसे पचास

सौ पया िनकाल कर दे गा नह ं तो प टू जैसे सूखी चमड़ वाले आदमी पर लोग सौ

पचास पए य फेकगे, दसरे


ू च दर के यहाँ महज हलवाह छुड़ाने के नाम पर कोई उसे

पए य दे गा और वह भी पए दे कर च दर से खामखाह बैर य मोल लेगा। प टू

पए के जुगाड़ म गांव म जहाँ भी िमलने क उ मीद थी सभी दरवाज पर नाक रगड़

आया था ले कन कोई भी उसे पया दे ने पर राजी नह ं हआ


ु था। इधर च दर दसरे
ू दन
प टू और उसके प रवार के लोग क तलाश म लाठ कांधे पर रख चमरौट के बाहर

ताक लगाए घूमने लगा था, शाम होते होते वह मौका च दर को िमल ह गया था। प टू

को उ मीद थी क शाम तक नई बखर से पए का जुगाड़ हो जाएगा और उसे लाकर

वह च दर को लौटा दे गा। दसरा


ू याल यह था प टू का क अगर कह ं पए का जुगाड़

न हो सका तो वह शाम को च दर के सामने हाथ गोड़ जोड़ हलवाह पकड़ लेगा, च दर

ने पए लौटाने के िलए दन भर क मोहलत भी दया था प टू को इसिलए उसे इस

बात क जरा भी आशंका नह ं थी क च दर उसके साथ कोई ऊँच नीच कर बैठेगा। प टू

क उ भी बुजुिगयत के खॉचे म पहंु च चुक थी इसिलए उसे इस बात क आशंका कम

थी क च दर जैसा बीस बाइस साल का लड़का उसके साथ कोई दर◌ु


् यवहार करे गा।

इसिलए वह इस तरफ से एकदम गा फल था ले कन च दर था क प टू को चपेट म

लेने क ताक म सुबह से ह लाठ िलए घूम रहा था बना कसी को कुछ बोले।

शाम प टू नए बख रहा से पए का खर फुर करने घर से िनकला था और बाग

के रा ते बमन टोली क तरफ जा रहा था जैसे प टू आम क के लाह (नए पेड़) म

पहंु चा था च दर पीछे से गािलयाँ बकता दौड़कर प टू के पास पहँु च गया था

करे ससुरे तुझे मने कल रोका था न क मेरे खेत बधार, बाग बीरो कह ं पांव नह ं

रखोगे ...

च दर का गु सा दे ख प टू कांप उठा था....., वह वहाँ से जान बचाकर गांव क

तरफ भागना भी चाहता था, ले कन दस प ह कदम दौड़ने तक च दर भे ड़ए क तरह

लपकता प टू के पास आ पहँु चा था और कंधे पर धर लाठ घुमा प टू क पीठ पर

दड़ाम से दे मारा था। प टू बाप बाप िच लाता जमीन पर िगर गया था और िगरे िगरे

ह प टिनया खाता, च दर क दसर


ू लाठ उसक दे ह पर पड़ती उसके पहले ह उसने

च दर का पांव पकड़ िलया था।


नह ं भइया, जान ब सो, भइया म आपके यहाँ ह हलवाह क ं गा, प टू बो बो

करके रो रहा था च दर का पांव पकड़े और च दर था क उसका ोध प टू के पांव

पकड़ने और रोने और िघिघयाने पर और यादा बढ़ता जा रहा था।

बुला साले गांव वाल को कौन है जो तेर जान छुड़ाने आता है , च दर पांव पकड़े

प टू को लाठ से पीटना छोड़ लात से भकर भकर पीटने लगा था

बुला साले अपने बाप को जनको तू कल से ह मेरे खलाफ तैयार कर रहा है ,

दे खता हँू कौन तेर जान छुड़ाता है ,

नह ं भइया, जान छोड़ दो म कसी के यहाँ नह ं गया था, भइया कल से घर म

खाना नह है इसी क तलाश म

फर साले झूठ बोल रहा है ......... बैशाख जेठ म घर म दाना नह ं है ........ तू

मुझे ह पाठ पढ़ा रहा है ।

नह ं भइया, ए भइया....... म पांव पकड़ता हँू , जान ब स दो भइया

प टू का ब ब िच लाना सुन गांव के दो चार आदमी बाग क तरफ दौड़े थे,

च दर का ोध दे ख लोग को आभास हो गया था क वह प टू क जान लेने पर ह

तुल गया है , इसिलए लोग दौड़कर च दर को पकड़ प टू से अलग कर दए थे।

य या तुम इसे जान से ह मार डालोगे?

हाँ आज म इसे जान से ह मारने पर तुला हँू ,

फॉसी लग जाएगी च दर, छोड़ दो उसे

लगने दो फॉसी, ले कन म इसे आज बना ख म कए दम नह ं लूंगा,

अरे तुम पागल हो गए हो या ?

पागल ह हआ
ु हँू , समझो। ई साला कहता है हलवाह नह ं क ं गा, अरे हलवाह

य नह ं करे गा, करे गा नह ं तो जाएगा कहाँ।


इतनी दे र म गांव के कइय लोग वहाँ इक ठा हो गए थे और च दर को पकड़

धकड़ कर प टू से अलग करने म सफल हो गए थे।

जूधन चला गया है जूधन को दे ख ढे र सार बात पुरानी बाते मेरे जेहन म घूम

गई ह, जूधन को एक दफा म भी मारा था तीन चार डं डे, उसक पीठ पर। दर असल

उस समय मुझे भी हलवाहे क ज रत थी जूधन खाली था हलवाह क बात चलाने पर

इनकार कर गया था और उसके इनकार का कारण था मेरे यहाँ यादा खेत नह ं था

इतने कम खेत म कोई हलवाहा हलवाह थामने पर राजी नह ं होता था। जूधन के

इनकार करने पर मेरे अिभमान को ठे स लगी थी मुझे लगा था जूधन मेर कमजोर का

मखौल उड़ा रहा है । इसिलए मने भी जूधन क पीठ पर घपा घप तीन चार गोदाहा जड़

दया था, साले दे खता हँू तु ह अगर तुम मेरे मेड़ खेत पर दखाई पड़े तो तोड़ दँ ग
ू ा

तु हारे हाथ पांव, ले कन कमजोर कमजोर होता है , लेब ड़हा ने जब सुना था क म

जूधन को अपने घर हलवाह के िलए दबाव दे रहा हँू तो वे लाठ लेकर मुझे प न म घेर

िलए थे।

करे कशो रया तैने कल जुधना को मारा था? साले जानता नह ं वह मेरे यहाँ

काम करता है .......?

नह ं काका मुझे नह ं पता थी......

तो ले म तुझे अभी बताता हँू लेब ड़हा लाठ उठाए मेरे नजद क आ पहँु चे थे, वह

तो कुशल क हए क म पहले ह उनका मूड भॉप होिशयार हो गया था और अपनी जान

लेकर भागा था नह ं तो उस दन लेब ड़हा ज र मेरा हाथ पांव तोड़ दे ते।


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परदे शी क मेहर और सेठ क जूितयाँ धरे धरे ह बुढ़ा जाती ह यह कहावत कहाँ

से प और आकार लेकर कहावत बनी, अगर कोई पूछे तो यह बात कहने म जरा सी

भी मुझे हचक नह ं होगी क यह कहावत इसी गांव से ज म िलया है । ऐसी और बहत


सी कहावत ह जनका ज म इ ह ं गांव से हआ


ु है कइय क से कहािनयाँ भी इसी गांव

के गभ से ज म लेकर क से बने, वरह क हक


ू उसास और तड़प इसी गांव म ज म

िलया एक क सा मने बचपन म सुना था, वह थी महोख िच ड़या क और यह क सा

पहले पहल मेर बहन ने मुझे सुनाया था और वह क सा जो मुझे आज तक याद है वह

तो याद ह है आज भी जब म इस महोख िच ड़या को बोलते हए


ु सुनता हँू तो मुझे

लगता है वह महोख िच ड़या कोई िच ड़या नह ं, ब क मेर बहन रो रह है ....... सास

सगवे थोर थोर।

महोख िच ड़या प के नीचे भोजन तलासती रहती है तलासते तलासते जब उसके

मन म आता है जमीन पर या कसी पेड़ क डाल पर बैठ, बड़ दद ली राग म रोती है ,


कु कु क कुरर कुरर कुरर पहले म दसर
ू िच ड़य क बोली क तरह इसक बोली भी

सुना था और इस पर कोई यान नह ं दया था, य क िच ड़य क बोिलयाँ मेरे िलए

कोई अजूबी चीज नह ं थी। जब से पैदा हआ


ु हँू तभी से उनक बोिलयाँ सुन रहा हँू

इसिलए इनक बोिलय पर म कभी कोई यान नह ं दया ले कन उस दन चैत का

मह ना था। आम के पेड़ मोजर से भरे हए


ु थे महआ
ु पूरा भदराया हआ
ु था। मेर और

बहन क डयूट मां ने लगा दया था, सुबह सबेरे जाकर महआ
ु क रखवाली करो,

रखवाली नह ं करने पर महआ


ु दसरे
ू लोग बीन िलया करते थे। इसी आदे श के पालन के

िलए म और मेर बहन सुबह मुंह अंधेरे ह बाग पहँु च जाया करते थे, चूं क महआ
ु पूरे

बेग से टपकता है , जब सूरज क पूर धूप उस पर पड़ती है , इसिलए इतने सबेरे महआ

चुनने का कोई तुक नह ं था। समय काटने के िलए हम दोन पेड़ के नीचे बैठे रहते थे।

उस दन इसी तरह हम दोन महआ


ु के पेड़ के नीचे बैठे हए
ु थे क महोख िच ड़या पेड़ क

डाल से उतर कर हम दोन के सामने थोड़ दरू आ बैठ थी और अपने पंज पर उचक

उचक तथा गदन नीचे झुका कुक कुक क कुररर कुररर कुररर बोलना शु कर द थी।

जानते हो इस िच ड़या का या नाम है ? बहन ने पूछा था मुझसे

हाँ महोख तो है

तब तो तुम यह भी जानते होगे वह या कर रह है

हाँ ....... कुक कुक क कुरर कुरर कुरररर

नह ं ........... तब तुम कुछ भी नह जानते, मेर अ ानता पर मेर बहन हं स द

थी। उसका हं सना मुझे अ छा नह ं लगा था य क वह मेर अ ानता पर हं सी थी।

उसका मेर अ ानता पर हं सने का मतलब था वह मुझसे जीत गई, जब क मेर बहन

उ म मुझसे पांच साल बड़ थी उससे म उ म पांच साल छोटा था ले कन म कभी

उससे परा त होना नह ं चाहता था। यह बात मुझे बदा त ह नह ं थी क म उससे

परा त हो जाऊँ। हम दोन म आपस म झगड़े भी बहत


ु हआ
ु करते थे ले कन पहले तो
वह मुझे परा त कर दया करती थी, वह तब जब म कमजोर था ले कन उस समय भी

म परा त होकर परा त नह ं होता था। उस समय वजय के िलए जो हा त मेरे पास

था वह था मेरा रोना। जहाँ दे खा बहन मुझ पर हावी हो रह है मुझे परा त करके मुझसे

वह चीज हड़प ले रह है जो या तो मेरे ह से क है या क वह चीज उसी के ह से क

है ले कन म उसे हािसल करना चाहता हँू उस समय पहले तो म उससे िभड़ जाया करता

था ले कन चूं क वह उ म मुझसे बड़ थी और शर र से भी वह मुझसे बिल थी

इसिलए म उसे परा त नह ं कर पाता था तो ऐसी थित म म अपना हा त छोड़

दया करता था। रोने का हा त बहन से परा त होता दे ख म जोर से रोना शु कर

दे ता था, मेरा रोना सुन मां तुरंत हम दोन के बीच आ खड़ होती थी।

या हुआ रे ....?

दे ख न मां यह मुझे रो टयाँ नह ं दे रह है ....

म इसे रो टयाँ य दँ ,ू यह मेर है इसने अपना खा िलया अब मेर भी खाना

चाहता है ।

द दे सुरसितया इसे, तेरा छोटा भाई है न

नह ं म नह ं दे ती इसने अपना खा िलया है और मेर भी खाना चाहता है

या तेरे पेट म इतनी महामाई का कोप ओिलयाया हआ


ु है इतनी भूखी है तू जरा

सा तेरे मन म िलहाज नह ं है क छोटा भाई रो रहा है और तू उसे लाकर खुद गबर

गबर खाए जा रह है ?

ले कन इसने अपनी खा िलया है यह मेरे ह से क है

तुझे जरा सा याल नह ं है मां बगड़ उठती। अरे तू यह सहर


ू लेकर अपने

ससुराल जाएगी, तेरा यह सहर


ू रहा तो दसरे
ू दन ह चूतड़ पर डं डा मार तुझे ससुराल

वाले ब हया दगे, कुल छनी कह ं क


हाँ तुम तो यह मुझे हमेशा कहती हो। बहन मां के ोध और उलाहने और आदे श

और सीख के सामने परा त हो जाती और वह रोती हई


ु रो टयाँ मेरे सामने फक दे ती.....

म जीत जाता.... मेरा उ े य होता बहन को परा त करना और परा त करके उसके

ह से क रोट गपक लेना

उस समय म कभी यह नह ं सोचता था क बहन के ह से क रोट म खा लॅ◌ूगा

तो वह भूखी रह जाएगी। म उससे रो टयाँ पा खुश हो लेता दोन बात पर क वजय मेर

हई
ु और दसरे
ू क मुझे बहन के ह से क रो टयाँ भी िमल गई।

जब म छ: सात साल का हो गया और बहन यारह बारह साल क तो मेर दे ह

म उसक दे ह से यादा ताकत आ गई थी और उस समय तक बहन के ह से क

रो टयाँ हड़प लेने के िलए मुझे रोना नह ं पड़ता था। जहाँ मेरे मन म आया, उसके ह से

क रो टयाँ भी मुझे गपक लेना है उससे उसक रो टया छ न लेता....... अब रोने और

खीझने क बार बहन क होती। बहन य द रोती या मां से मेर िशकायत करती तो माँ

का वह पुराना अस ्. अरे वह तेरा छोटा भाई हे तू लड़क जात अगर तुझम इतनी सी

सबर नह ं होगी तो ससुराल म तू एक दन भी टक पाएगी या ......? और बारह तेरह

बरस तक क उ तक पहँु चते पहँु चते बहन ने सबर करना और मां के आदे श उपदे श

को िसर झुका मान लेने का सऊर सीख ली थी। तब वह मुझे अपना छोटा भाई मान, म

उसके ऊपर झपँटू इसके पहले ह मेर तरफ अपने ह से क रो टयाँ बढ़ा दया करती

थी।

ले तू खा ले ....

य तू नह ं खाएगी?

खाऊँगी य नह ं, तुझसे जो बचेगी मै खा लूंगी, तू खा, म उस समय इतना

समझदार नह ं था क बहन को कह दँ ू तू भी खा म भी खाऊँ, म अपने ह से क

रो टयाँ खाने के साथ साथ जब तक पेट नह ं भर जाता था उसके ह से क रो टयाँ भी


खाता और जब खाने से अिन छा हो जाती तो उसके िलए छोड़ दे ता और वह बची

रो टयाँ खा कर संतु हो लेती।

बहन जब तेरह साल क हई


ु थी तो पता जी ने उसक शाद कर दया था और

सोलह साल क उ म उसका गौना हो गया था।

बदा होते समय वह कतना रोई थी, कहाँर जब डोली म बठा उसे ले जाने लगे

थे तो वह बड़े जोर से मां ब पा और मेरा नाम ले लेकर रो रह थी और पालक म लगे

पद से अपना पांव िनकाल कूद पड़ने के िलए आतुर थी.....।

गौना जाने के बाद दो दफा साल साल के अंतराल पर वह मेरे घर आई थी। उस

समय वह एकदम बदल गई थी तीसर दफा जब वह फर मेरे घर आई थी तो वह काफ

कमजोर थी, ससुराल से उसके खबर िमली थी लड़क बीमार है उसे लाकर दवा दा

करवावो खबर सुन मां और पताजी का चेहरा उदास हो उठा था। बेट क बीमार को

लेकर नह ं, अब उसे यहाँ लाना पड़े गा लाकर उसक दवा दा करवाना पड़े गा। कतना

दन उसे यहाँ रखना पड़े गा अभाव और गर बी उसम बेट का बोझ और उसक बीमार ,

बोझ अगर बेट तक ह सीिमत होता तब तो उसको कसी तरह झेल िलया जा सकता

था, इस बीच घर म दो और लड़ कयाँ ज म ले चुक थीं, दो लड़के कुल िमलाकर पांच

ब च का बोझ ऊपर से लड़ कय का शाद याह, घर म खेत के नाम पर पांच बीधा

खेत था उससे साल भर के खाने को कौन कहे तीन मह ने का भी पूरे प रवार का राशन

पूरा नह ं होता था। इस कमी को पूरा करने के िलए पताजी कलक ा भगे थे, कसी सेठ

के यहाँ उ ह दरबानी िमल गई थी। तन वाह सात पए मह ने, इस तन वाह से प रवार

क भुखमर क सम या तो हल हई
ु ले कन दसरे
ू पा रवा रक बोझ, ऊपर से दो और

बे टय का आगमन उनका शाद याह पताजी और मां द ु ंता से िघरे रहते इसी बीच

बहन क बीमार का संदेश, मां ने बहन को ससुराल से बदा करवा िलया था मेरे घर

आई थी बहन, काफ कमजोर दवा दा या होता उसका, गांव म हर आदमी बै होता


है जसने जो बताया खर उखुदवा जड़ बू टयाँ टोना टोटका भूत परे त सब कुछ कया मां

ने य क जब ससुराल वाल ने यह बोझ ऊपर डाल ह दया है तो उसे तो ढोना ह

पड़े गा, गांव म बीमार म उस समय जो कुछ कया जाता था और जतना संभव था सब

कुछ कया गया बहन के िलए, बै हक म उस समय गांव म दरू दरू हआ


ु करते थे

डा टर शहर म, इनके पास पहँु चने के पहले गांठ म पैसा होना ज र होता था जो गांव

म मेरे ह नह ं 99 ितशत लोग के पास नह ं होता था। सब वह करते थे भूत परे त,

जड़ बू टयाँ लह गया तो लह गया नह ं तो संसार से बदाई, बहन को भी तीन चार

मह ने मेरे यहाँ रहने के बाद मां ने बहन क ससुराल म संदेशा दया था, लड़क अ छ

हो गई है उसे ले जा सकते ह, जब क बहन क हालत ठ क नह ं थी ब क और यादा

खराब हो गई थी। बदा करते समय मां ने उसे समझाया था उलाहने दए थे, जाकर वहाँ

खूब कूद कूदकर काम करना अब तुम अ छ हो गई हो, वह तु हारा घर है नैहर क

तरफ लड़ कय को यादा नह ं दे खना चा हए म तुझे बचपन से जानती हँू तू काम से

कतना भागती है । वहाँ तुझे काम करने को पड़ता होगा इसिलए बीमार का छछ द कर

लेती है , इसीिलए लोग ने वहाँ से तुझे खदे ड़ दया .......... मां के उलाहने सुन बहन का

पीला ण चेहरा कस तरह उदास हो उठा था वह चेहरा आज भी मेर ऑख के सामने

ऍटका टं गा हआ
ु है । वह उदास बेबस चेहरा, बहन ने एक दफा उसी उदास चेहरे से मेर

तरफ दे खा था.... भइया.... म जा रह हँू मां ने जो कुछ कहा है मने गांठ बांध िलया है

अब म कभी छछ द करके ब तरे पर नह ं पड़ॅ ◌ूगी। कूद कूदकर काम क ं गी......जाते

समय बहन मेरे पांव पकड़ बड़ दे र तक रोई थी मां को भी पकड़ वह बड़ दे र तक रोई

थी और उस दफा ससुराल जाने के बाद वह फर वापस मेरे घर नह ल ट थी उसक

ससुराल से खबर आई थी क वह मर गई, उस समय बहन के उदास ण और उस

बेबस चेहरे को दे ख मेरे भीतर उसके ित कोई सहानुभूित जगी हो ऐसा कुछ भी नह ं
हआ
ु था य क उस समय म इतना समझदार ह नह ं था ले कन आज जब म बहन के

बारे म िलख रहा हँू तो मुझे मेरे सामने उसका वह उदास और बेबस चेहरा आकर टं ग

गया है और इसी के साथ मुझे उसने उस दन महोख िच ड़या का जो क सा सुनाया था

वह मुझे बड़ बुर तरह याद आ गया है ।

जानते हो यह कौन िच ड़या है ?


हाँ जानता हँू महोख है .........

या बोल रह है यह, तब तो यह भी जानते होगे ........?

इसमे न जानने जैसी या बात है बोल रह है कुक कुक क कुररररर कुररर कुररर

बहन मेर अ ानता पर फक से हं स द थी

तब तुम नह ं जानते हो, यह रो रह है सास सगवे थोर थोर थोर !

चूं क वह िच ड़या भी कुछ दरू बैठ लगातार बोले जा रह थी, मुझे प हो गया

था वह िच ड़या वह बोल रह हे जो बहन ने कहा था।

इसके बाद बहन ने मुझे वह क सा सुनाया था। जानते हो वह क सा ?


नह ं....

क सा इस तरह से है क इसक सास बड़ िन ु र थी। वह इसे दन रात टाड़ना

दया करती थी। घर म इसे खूब खटवाती थी और खाने के नाम पर कभी दो दन तो

कभी तीन दन म दो चार रो टयाँ इसके सामने फक दया करती थी। एक दन या

हआ
ु क इसक सास खेत से साग ख टकर लाई तो साग जब वह ख टकर लाई तो वह

भर कोछ था लाकर दौर म रखी इसे बोली इसे बना, यह बेचार साग बनाई रो टयाँ भी

बनाई जब सब लोग के खाने का समय हआ


ु तो सास रसोई म गई

या करने? मने पूछा था..... उससे ......


वह फर फक से हं स द थी, अरे सास लोग खाना बन जाने के बाद रसोई म

जाकर दे खती ह क सब ठ क है क नह ं , ..... साथ ह वे यह भी दे ख लेती ह क

बहू ने कह ं चुराकर कुछ खा तो नह ं िलया ?

ले कन अगर उसने चुराकर कुछ खा ह िलया तो सास को कैसे पता चलेगा?

चल जाएगा पता, एक तो वह नाप जोखकर बनाने के िलए दे ती ह, तो उसे

अंदाज रहता है क इसम कतनी रो टयाँ बनेगी, दसरे


ू अगर बहू ने रो टयाँ खा िलया तो

उसका मुंह चोरनी जैसा हआ


ु रहे गा सास उसे तुरंत पकड़ लेगी और फर इसक सास तो

बड़ खराब थी वह इसक टाड़ना करने के िलए हमेशा इसके पीछे पड़ रहती थी।

तो उस दन जब सास चना का साग ख टकर लाई और इसने उसे बनाया तो

साग तो साग वह चुरने के बाद थोड़ा सा हो गया, बस अब या था सास को तो बहाना

िमल गया। वह इसे लगी गािलयाँ बकने, गािलयाँ बकते बकते वह बाहर गई। बाहर बेटा

बैठा हआ
ु था, चल दे ख तू अपनी बहू का गुन। एक कोछा साग म ख ट कर लाई थी सब

खाकर उसने ख म कर दया.....इसी तरह क कुल छनी है यह........

मां क बात सुन बेटे को ोध आ गया था उसने उठाया घस पटना और बहू को

इतना मारा इतना मारा इतना मारा क वह मर गई।

मर गई?

हाँ मर गई

इतना मारा क मर गई?

हाँ रे मारते मारते उसने उसे मार ह डाला

अ छा तब ु ?
या हआ
मरने के बाद बहू ने इसी िच ड़या का ज म िलया और जनम लेने के बाद वह

अपना वह पुराना हाल सोच सौच रोती है सास सगवे थोर थोर , सास सगवे थोर

थोर.........।

बहन का सुनाया हआ
ु यह क सा और इसी तरह के कइय क से इसी जमीन से

ज म िलए ह, टाड़ना बेबसी, मजबूर के क से कभी महोख िच ड़या क बोली पर तो

कभी कसी जानवर क । यहाँ तक क चूहा चु हया को मा यम बना कइय क से

कहािनयाँ गांव म चिलत थीं। चिलत क से कहािनय के अलावा भी गांव म औरत

म इतनी घुटन और मजबूर और बेबसी थी क उ ह ने उसे भोगते हए


ु जतना तक

ज दा रह सक ं थी ज दा रह और जब उनसे बदा त नह ं हआ
ु तो वे या तो तारा

इनारा लेकर अपने को ख म कर लीं या फर बहन क तरह रई क बीमार से त हो

अ ठारह साल क उ म ह परलोक िसधार ग ।

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ला म उठाती हँू !◌ं

नह ं तू नह ं म उठाऊँगी तेरे से ठ क से नह ं उठती तू जतनी दफा उठाती है गौर

िगर क िगर रह जाती है ..... इसिलए तू नह ं।

जब बापू आएंगे तभी न गौर उठे गी, उ ह आना ह नह ं है तो गौर उठे गी कैसे ?

अरे कुल छनी तेरे मुंह से यह भाखा िनकल रहा है , बापू आएंगे ह नह ं ?
मां इतनी दे र से बैठ हई
ु थी गौर का उठना दे खने के िलए। ब चे गोबर क गौर

बना मौनी म रख गौर गणेश को सुिमर, मौनी म रखी गोबर क गौर घ प से जमीन

पर औ ंधा दया करते थे य द गौर उठकर ठ क बैठ गई तब तो बापू आएँगे अगर िगर

क िगर रह गई तो बापू के आने म संदेह है । शाम जब खाना पीना ख म हो जाता है

तो ब चे रोज एक दफा इस या को करते ह। बापू को गए हए


ु तीन साल हो गया था

कुछ दन पहले एक आदमी कलक ा से आया था, तु हारे बापू इस साल घर आने क
सोच रहे ह। यह सुनकर पूरे घर म खुिशयाली क लहर दौड़ गई थी, बापू ने आने वाले

के हाथ पुिलंदा भेजा था, जसम सभी ब च के िलए चाहे गंजी या गमछा ह सह एक

एक कपड़ा भेजा था। पांच पए उसके हाथ म भी दए थे, हालां क उ ह ने यह संदेश

नह ं दया था क वे इस साल आ रहे ह ले कन उ ह ने इस बात क चचा चलाया था क

तीन साल घर गए हो गया खेत के मेड़ सब जजर हो गए ह बिगया म पेड़ के थाले

बरसात म बह गए ह। एक दफा घर जाना ज र हो गया है । बापू के आने क खबर

कोई प क नह ं थी ले कन उनक चचा ह आने वाले के िलए संदेश बन गया था और

जब से आने वाले ने यह संदेश उ ह दया◌ा था तभी से दोपहर शाम इस घर म गौर

उठाने क कृ या शु हो गई थी, हालां क औरत को उनके आने क कोई उ मीद नह ं

थी य क घर म न तो कोई शाद पड़ थी न गौना न वष न तेरह फर उनके आने

का कोई कारण ह नह ं द खता । फर भी सभी असंभावनाओं के बावजूद औरत के मन

म आशा जगी थी मन उसका तड़पा था मदानी दे ह क गंध के िलए और ब चे तो

एकदम इस खबर को स चा मान रोज गौर गणेश उठा रहे थे और यह कृ या पछले

तीन मह न से चल रह थी। पहले तो यह कृ या सुबह दोपहर शाम चला करती थी

ले कन जब दो मह ने गुजर गए तो ब च के मन क आशा ीण होने लगी और वे

खुलकर कहने लगे क बापू को आना ह नह ं है ।

ले कन ब च क वह बात प ी को तीर क तरह चुभी थी, ऐसी अशुभ बात उ ह

मुंह से नह ं िनकालना चा हए उ ह कहना चा हए अभी नह ं आएँगे बापू।

ले कन वे कह रहे ह बापू आएँगे ह नह ं ..... मां भड़क उठ थी छोट लड़क क

इस बात पर

अरे कुल छनी तेरे मुंह से यह भाखा िनकलती है , कभी कोई अ छ बात भी

िनकलती है तेरे मुंह से कहती है बापू आएँगे ह नह ं !


यह हरामजाद इसी तरह क खराब बात मुंह से िनकालती है ..... छोटा भाई जो

अभी तक बगल तट थ बैठा गौर उठना दे ख रहा था मां क फटकार पर बहन को पीट

दया था, घपर घपर दो घूंसा.........

ठ क कया और मार दो घूंसे इस कुल छनी को इसके मुंह से कभी कोई अ छ

बात िनकलती ह नह ं। बड़ बहन जो अभी तक गौर उठाने के िलए छोट से भौक

छ नने क कोिशश कर रह थी और छोट ने उसे अभी तक मौका नह ं दया था, वह भी

छोट पर बरस पड़ थी।

दसरा
ू कोई मौका होता तो छोट बड़ से िभड़ जाती ले कन वह गलती कर चुक

थी इसिलए वह बात बदा त कर गई थी और पीठ पर घपाक घपाक बड़े भाई के घूंसो

को पीठ खला सह गई थी और मौनी छोड़ खिसयाई हई


ु अलग बैठ गई थी। छोट के

अलग होते ह बड़ ने आँख मूंद गौरा का सुिमरन कया था, मुंह म कुछ बुदबुदाई थी

और गौर मौनी के ठ क बीच रख दो तीन दफा मौनी हवा म घुमा घ प से मौनी औधा

कर द थी। जै गौरा माई अगर बापू मेरे आ रहे हो तो तू उठकर बैठ जा....... थोड़ दे र

मे मौनी को उसी तरह जमीन पर औधी छोड़ वह फर आँख मूंद गौरा का मरण कया

था। इसके बाद मौनी को बड़े आ ह ते से संभाल ऊपर उठा ली थी, गौर इस दफा उठकर

खड़ हो गई थी। उसे घेरकर बैठे सभी लोग म खुिशयाली क लहर दौड़ गई थी........

दे खा म कहती हँू मुझे उठाने दे ... ले कन यह सुवर अपनी ह जद म रहती है ।

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बापू इस साल तो नह ं ले कन अगले साल आ गए थे। आए थे और घर भर के

िलए कपड़ा लाए थे, प ी के िलए भी, ब चे कपड़ा पा खुिशयाली से उछल पड़े थे।

कपड़ा लेने के पहले सब एक दसरे


ू को दे खे थे उसे या िमला, वैसे जो उ ह अपने को

िमला था वह दसरे
ू ु कम और घ टया लगा था, ले कन
क तुलना म बहत ारं िभक

असंतोष के बाद सब ने उसे वीकार कर िलया था और अपने अपने कपड़े मां को स प


दए थे ले मां इसे ठ क से रख दे जब गांव म शा दयाँ पड़े गी तो म इसे पहनू◌ॅगी,

लड़ कय ने अपने कपड़े माँ को धराऊँ रखने के िलए दे दया था ले कन लड़के उसे

पहनना शु ु थी मां के पास, बापू के पास, मां बापू को


कर दए थे..... िशकायत हई

इस पचड़े म पड़ना नह ं दे ना चाहती थी, कतने दन बाद तो वे आए ह इसिलए उसने

लड़क को पीट पाट दया था। अगर अभी पहन कर गंदा कर लेगा तो गांव म जब बरात

आएगी तो या पहनेगा? ले कन मेरे पास कुछ पहनने को तो है नह ं, लड़क ने मां का

वरोध कया था।

जो है वह पहन... यह धराऊँ है जब शाद याह गांव म पड़े गी तो या यह

चीथड़े पहन कर जाएगा?

नह ं मै तो पहनू◌ॅगा....

दे खो जी संभालो इ ह .... प ी ने पित को दलराती


ु नजर से दे खा था

यह ह न तु हारे ब चे कतने बदमाश हो गए ह ए

बाप का कलेजा ब च क उ ं ख
ृ लता पर ग द हो उठा था

छोटू .... ब चे उसे अभी गंदा मत करो ..... दे दो मां को धराऊँ रख दे गी जब

गांव म कोई शाद याह पड़े गा तब पहनना।

मान गया था छोटू और दसरे


ू ब चे और उ ह ने कपड़े मां को पकड़ा दया था

और खुद खुिशयाली से भरे घर के बाहर दौड़ गए थे। ा कपड़ क खबर हमजोिलय म

बांटने हालां क वे चाहते थे क नए कपड़े पहनकर गांव का एक च कर लगा आएँ दखा

आएँ सबको क दे खो मेरे बापू मेरे िलए नए कपड़े लाए ह , ले कन उनक यह योजना

ु , इसका उ ह रं ज था फर भी कपड़े तो नए िमले ह यह खबर तो वे


कामयाब नह ं हई

दसर
ू को दे ह सकते ह।

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रात दे र तक िमलने वाल का तॉता लगा रहा था। कलक े म जतने लोग रहते

थे सभी के घरवाले आगंतुक से अपने वजन क खबर लेने िच ठयाँ, पया लेने पहँु चे

थे। सब क खबर दे ते पुिल दा बांटते काफ रात गुजर गई थी, खाना खाते रात क गाड़

चली गई थी। रात जब ब तरे म पड़े थे रामसुख तो घर म सभी ब चे सो गए थे, प ी

ने रामसुख क ख टया कर ने से ओसारे म बछा द थी और घर के काम से िनवृ

होकर जब वह रामसुख क ख टया पर आई थी तो रामसुख जगे हए


ु थे।

या हआ
ु इतनी दे र य कर रह हो ?
ब चे अभी तक सोए नह ं थे

सो गए ?
हाँ सब सो गए

ठ क है आओ..... प ी को रामसुख पकड़ ख टया पर िलटा िलए थे और उसके

होठ पर अपना ह ठ रख उसे अपनी शर र से भींच िलए थे, थोड़ दे र तक रामसुख क

दे ह से सट पड़ रह थी प ी, बष बाद उसे मदानी दे ह क बिल ता और गंध पुन: ा

करने का सौभा य िमला था जसे वह पूर तरह अपने तन बदन म आ मसात कर लेना

चाहती थी ले कन इन चार वष म पित क अनुप थित म पा रवा रक तनाव जो उसने

झेले थे और मद के सािन य के िलए जो वह तड़पी थी पित से सटने के ारं िभक कुछ

ण बाद ह वह मान अिभमान उलाहने और िशकायत उसके भीतर भड़फोड़ क तरह

उग आए थे। औरत को इतनी कमजोर नह ं होना चा हए, हालां क औरत मद से हर

हालत म कमजोर होती है ले कन इस मौके पर वह जानती है मद िनहायत कमजोर होता

है जानती है वह मद क कमजोर अगर कह ं वह मद को परा त कर सकती है तो इसी

मौके पर कुछ मनवा सकती है , तो इसी मौके पर ताने उलाहने िशकवा िशकायत कर

सकती है तो इसी मौके पर जानती है वह मद इस मौके पर उसक सब कुछ सुन लेगा

और वह जो कुछ कहना चाहे गी सब कुछ कह भी लेगी मनवालेगी उससे अपनी बात।


इसके आलावे उसके पास और कोई मौका नह ं होता जब वह इस कमां डग पोजीशन म

हो क मद को दबा ले जाए, दसरे


ू मौक पर उसे मद के सामने अपनी औकात समझ

उसी तरह बात करना होगा कोई बात उसके मुंह से इस तरह क न िनकल जाए क मद

उसे झड़क दे या मार बैठे इसिलए शार रक बेबसी होने के बाबजूद तथा कइय बष से

पित क अनुप थित म झेलती झंझट परे शािनय को, जो िशकायत और उलाहन के,

बीज प म उसके भीतर पड़े हए


ु थे जसे वह कभी कभी झुँझला आ◌ौर रोकर खुद से

य करती थी और लाचार म खुद घूंट जाया करती थी, उसे य करने का मौका

उसके हाथ म आ गया था और वह मौका यह था इसिलए वह उसे इस मौके पर

कमजोर पड़कर सहज ह खोना नह ं चाहती थी।

तुमने पार साल ह आने का संदेश भेजवाया था

आना तो था ले कन कैसे आता आने जाने म खच कतना पड़ता है , रामसुख को

इस मौके पर प ी क दसर
ू कोई बात छे ड़ना अ छा नह ं लगा था

तु हार कतनी आशा दे खा था ब च ने

ब च ने या तुमने ?
म य आशा दे खू◌ॅ..... या म जानती नह ं आने जाने म कतना खच लगता है

प ी क बात सुन रामसुख थोड़ दे र के िलए चुप हो गया था उसक उ े जत

त नाई दे ह धीरे धीरे ठं ड़ पड़ने लगी थी, वह प ी से सुनना चाहता था क तु हारे न

आने से म कतना परे शान थी। तुम मुझे छोड़ इतना दन के िलए य चले जाते हो,

बना तु हारे मुझ से रहा नह ं जाता ले कन जबाब म प ी का सीधा कह दे ना क म

य आशा दे खू◌ॅ। रामसुख के भीतर कुछ दसर


ू बात ह खींचकर ला खड़ा कया था प ी

क दे ह छोड़ वह उतान लेट गया था और िसर के नीचे अपना दोन हाथ बांध िलया था।

प ी थोड़ दे र तक रामसुख क दे ह से िचपक पड़ रह थी मदानी दे ह और

उसक बू...... चार साल का ल बा अंतराल आज उसे ा हआ


ु था, चार साल के बाद,
वह उसे आ मसात कर लेना चाह रह थी अपनी दे ह म दल और दमाग म, दे ह के

सािन य स, और इसी समय जो थोड़ा मौका था उसके हाथ, रात दो रात जब तक

रामसुख क दे ह म वार है उ ाप है , जब तक वह औरत के सामने कमजोर है तब तक

वह अपनी सार िसकवा िशकायत खीझ झु◌ॅझलाहट मानिसक बेदना जसे उसने पित क

अनुप थित म पछले चार वष तक भोगा था उसे कह लेना चाहती थी, ले कन रामसुख

क िन यता ओर उसका ठं डापन, प ी थोड़ दे र तक कुछ समझ ह नह ं पाई थी, वह

राम सुख क दे ह से िचपक पड़ रह थी इस अपे ा म क रामसुख पुन: उसे बाह म

लपेट उसके मन म त क और तन बदन को दलमल करके उसे थका उसक दे ह का

सारा उ ाप ठं डाकर दे गा, ले कन रामसुख पुन: वैसा कुछ नह ं कया था।

सुखरमवा काम धाम ठ क कर रहा था?

थोड़ दे र िसर के नीचे हाथ बांधे पड़े रहने के बाद रामसुख ने प ी से कया

था। हालां क प ी क दे ह बांह म लेने के पहले राम सुख के मन म यह बचार कइय

दफा फनफुलाया था क प ी चार बष के अंतराल म पाक साफ रह है या नह ं..... प ी

से आमना सामना होने पर वह कइय कोण से जानने क कोिशश कया था...., खासकर

प ी के चेहरे को खोदकर ले कन प ी के चेहरे से रामसुख अपने मतलब क कोई बात

हािसल नह ं कर सका था प ी का चेहरा िनदाग िन कलंक था। मन नह ं पितयाया था

रामसुख का, नजर क ित रया गांठ का दाम इसी पर भरोसा करना चा हए आँख से

ओझल होते ह ित रया या करे गी कोई नह ं जानता। ित रया च र म ् पु ष य भा यम,

भगवान जब इनके च र को नह ं समझ सका तो आदमी या समझेगा, प ी के चेहरे

से कुछ न हािसल होने पर रामसुख शांत संतु नह ं हआ


ु था। सचमुच ित रया च र बड़ा

अगूढ़ है ...... इस तरह भोली बन गई है जैसे इसे दिनया


ु जहान का कोई ान ह नह ं

है , कइय दफा बात बे बात रामसुख ने यास कया था कह ं से कुछ हािसल हो ले कन


कुछ भी हािसल नह ं हो सका था उसे, जब से वह गाड़ से उतरा था और प ी क दे ह

बांह म आने तक ले कन प ी के एक ह वा य ने जैसे रामसुख के सामने सारा रह य

खोलकर रख दया हो। म य आशा दे खू◌ॅ... कह रह है साली अरे तू य आशा दे खेगी

आशा तो म चार साल तक दे खता रहा था तुझे आशा दे खने क ज रत ह या है तू तो

जब चाहे जसे चाहे अपना यार बना सकती है ! है कोई घर म तुझे दे खने वाला दन म

बात कर िलया रात म ब चे सो गए कवॉड़ खोल अंदर बुला िलया और उड़ा िलया

गुलछर, कोई नह ं िमला तो सुखरमवा तोहई है ....... रामसुख का दमाग झनझना रहा

था, ले कन यह एक ऐसा मसला था जस पर वह अपनी मदानगी से कुछ हािसल नह ं

कर सकता था, मदानगी से हािसल करने का मतलब था प ी से मार पीट, मारपीट का

मतलब ह ला हं गामा, ह ला हं गामा का मतलब गांव गोहार ......... हालां क रामसुख को

ई सब से उतनी डर नह ं थी, अगर वह प ी को पीटता है तो यादा से यादा सोए

ब चे उठकर बैठ जाएँगे, या प ी िच ल प करे गी तो आस पड़ोस के लोग सुनगे, सुनेग

तो सुनेग, कसी ससुरे को इससे या लेना म मार रहा हँू तो अपनी जनानी को।

रामसुख इस तरफ से िन ंत था, मजबूर था तो वह दो बात से पहला क प ी को

मारने के िलए पहले तो कोई कारण मौजूद होना चा हए वैसा कोई कारण रामसुख के

पास नह था और बना कारण के प ी को पीटना एक पागलपन ह है , दसरे


ू मान िलया

कोई कारण खोज खाजकर वह प ी को पीटना भी शु करता है तो उससे वह जो प ी

के भीतर से िनकालना चाहता है वह िनकल ह जाएगा वह आ त नह ं था, य क वह

चीज िनकलवाने के िलए पहले तो उसके सामने वैसा कारण रखना होगा जसका जबाब

वह जो चाहता हो वैसा ह हो। मान भी ल क उसने सीधा एक कारण रख दया प ी के

सामने..... मने सुना है ..... तुम रात म मद को घर म सुलाती हो और इसी बात को

लेकर पीटना शु कर दे प ी को य क प ी को पीटने के िलए यह कारण बहत


ु बड़ा

कारण है ले कन यहाँ भी उसे दो बात से डर थी। पहली तो यह क बना कसी सबूत के


अपने ह हाथ अपने मुंह पर कािलख पोत गांव पव त म नाक कटवाना बड़ बु मानी

नह ं थी, दसरे
ू क अगर वह मारपीट करता भी है तो उससे वह सबकुछ बकुर ह दे गी

इस बात का भरोसा नह ं था, इसिलए रामसुख प ी के साथ दसरे


ू बक प पर उतर

आया था और यह बक प ऐसा था जससे रामसुख को वह सब कुछ हािसल हो सकता

है जो वह चाहता है ।

सुखरमवा काम धाम ठ क कर रहा है ।

हाँ ठ क ह कर रहा है ।

ठ क ह कर रहा है या मतलब!

कर रहा है .......।

म पूछ रहा हँू ठ क कर रहा है तो तुम बता रह हो कर रहा है

कह तो रह हँू ठ क कर रहा है

ठ क कैसे कर रहा है सबेरे कतने बजे आता है ?


काितक म सबेरे सुकवा िनकलने पर आ जाता है

शाम कतनी दे र म हल खोलता है ?


शाम तो सबेरे ह खोल दे ता है अंधेरा होते होते......

हम
ु ..........!

दे खो जी जब तक घर म मद नह ं होते तब तक मनई ठ क काम नह ं करते,

मद से ह ए लोग डरते ह .....!

अ छा लगा था रामसुख को शाम ज द हल छोड़ दया करता था सुखराम .......

और औरत जात को मनई डरते नह ं ह

तुम उसे डांटती नह ं थी, शाम कतनी दे र तक हल जोतता था

प करना चाहा था, रामसुख ने प करना चाहा था रात कतनी दे र गए वह

हल लेकर लौटता है कतनी रात गए इतनी रात गए जब ब चे सो जाते ह या उसके

पहले....!
तुम डांटती नह ं थी, शाम कतनी दे र तक हल जोतता था

अब मनई लोग बना मद के डरते थोड़े ह डांट फटकार करने से भी कुछ हािसल

नह ं होता डांटने से मुंह भौका जैसा ओरमा लेता है बस.......!

हम
ु .....गहर हंु कार भरा था रामसुख ने प ी के जबाब से उसे कुछ हािसल नह ं

हआ
ु था, जो वह प करना चाहता था कुछ भी नह ं ..........।

और अषाढ़ म.....

अषाढ़ म भी वैसा ह करता है ?

सानी पानी कोयर पानी के िलए रात बरात तो कभी कभार कना ह पड़ जाता

रहा होगा उसे...?

हाँ कभी कभी क जाता था, जस दन पानी वानी यादा बरसता रहता था,

जबाब दे ने के बाद प ी को अचानक याल हो आया था ........ अ न पर ा..... अ न

पर ा दे नी होगी उसे, मन म उसके एक अनाम सा भय काली छाया क तरह आ खड़ा

हआ
ु था। समझ ह नह ं पाई थी वह क रामसुख अचानक ठं डा य पड़ गया है अगर

वह इस बात को पहले ह भॉप गई होती तो वह अपने बचाव के िलए अ नपर ा म

खर उतरने के िलए वैसी ह रण◌ानीित


् अपनाती ले कन..... वह समझ ह नह ं पाई थी

क पित का सािन य पाने के पहले उसे एक अ न पर ा भी दे नी है, और जब यह

बात उसक समझ म आई तब तक काफ दे र हो चुक थी, य नह समझ पाई म क

मुझे सबसे पहले अ न पर ा म खर उतरना है पित के सािन य के िलए अपने मन

क भड़ास िनकालने के िलए य इतनी उतावली हो चली थी म क यह बात म भूल ह

गई थी क मुझे पित के सािन य के पहले एक बकट अ न पर ा से गुजरना होगा

जब क इसके पहले जब भी पित परदे श से घर लौटा है उसे उस अ न पर से गुजरना

ह पड़ा है और उस अ न पर ा म वह हमेशा असफल रह है ............. पित ने इतने

घुमावदार थितय का जाल बुना है उसके इद िगद क वह उसम फंस कर रह गई थी।


इस दफा भी वह उस जाल म फंस चुक है ना समझी के कारण उ ेजना और अपने

उतावलेपन के कारण। इसी उतावलेपन के कारण वह पित को अपना एकदम अपना िम

मान बैठ थी जसके साथ वह अपना सारा अतावलापन, उ ेजना, उ ाप, िशकवा,

ु सारे
िशकायत बांट लेना चाहती थी ह क हो लेना चाहती थी। चार बष से भीतर बटरे

आ ोष द:ु ख तकलीफ को पित के सामने उड़े ल ह क हो लेना चाहती थी। हाँ कभी

कभार क जाता था जस दन पानी वानी यादा बरसता था।

यह या कह दया तूने रे .... शर र म उसके, दल और दमाग म ठं डापन रगता

चला गया था

मन तुझे कहा था न क हलवाह को घर म न सुलाया करो

रामसुख यह चाहता था, चाहता था प ी से असली बात उगलवा लेना और उसे

वह उगल द थी

मने तुझसे कहा था घर म हलवाह को मत सुलाया कर इससे बदनामी होती है ,

ले कन तू मानेगी य तेर तो जवानी बलबलाई रहती है ।

प ी क शर र एकदम सु न पड़ गई थी, सीधा आ ेप था यह इसके च र पर

और इस आ ेप क काट उसके पास नह ं था, ऐसा कुछ भी नह ं था कहने को अपनी

सफाई म जसे कहकर वह अपनी पाक जगी सा बत कर दे पित के सामने। ले कन यह

ु सांप क तरह ऐंठ थी अपनी जगह, ले कन कुछ न


आ ेप सुनकर उसक दे ह कुचले हए

कह पाने क मजबूर लाचार और बेबसी, उसके कलेजे म कुछ गरम लोहे क तरह

पधला था, भीतर कह ं बहत


ु भीतर सार पृ वी को ार खार कर दे ने के ताप पर ले कन

बेबसी लाचार और मजबूर ने उसे ठं डा कर दया था और वह पधला चीज, लावा,

पघलता लोहा गरम ऑसुओं के प म उसक आंख से झर झर झरने लगा था।

अब तुमने ित रया च र र खेलना शु कर दया न......... िसस कयाँ सुन राम

सुख का खद खद खदकता दमाग उबल पड़ा था, रामसुख ब तरे पर उठकर बैठ गया
था और प ी क बांह जोर से पकड़, इतने जोर से पकड़ कर मसला था जैसे वह उसक

बांह क ह डयाँ चूर चूर कर दे गा....!

चार साल के बाद तुम घर लौटे हो तो मुझे इसी तरह डाहने..... इस तरह का

कलंक..... जब तु ह लगाते हो तो दसर


ू का मुंह कौन बंद करे गा और यह कलंक लेकर

या म ज दा रह सकू◌ॅगी......इसिलए अब आज म तुमसे फैसला करके रहँू गी...! प ी

के भीतर कह ं गहरे जो उबल रहा था और ठं डा हो ऑसुओं के रा ते नह िनकल सका था

वह सीधा उसक जुबान के रा ते िनकला था .......। जब म कलं कन हँू तो मुझे पृ वी

पर जीने का हक नह ं है , वह उ े जत ख टया से नीचे उतर थी झरोखे पर रखा गड़ासा

ु थी, लो यह गंडासा और बाल दो मुझे ...... ।


उठा....... रामसुख के पास आ खड़ हई

दे खो, मुझे यह ित रया च र र यादा पसंद नह ं है समझी, चलो लेटो आदे श दया था

रामसुख ने प ी को, उसके भीतर प ी के ित जो कलमस भरा हआ


ु था वह पघल

चुका था, यह चाहता था रामसुख।

नह ं लेटती म अगर तुम मुझे बाल नह ं सकते तो म खुद ह जाकर तारा इनारा

ं ी, यह कलंक लेकर म जीना नह ं चाहती।


ले लेती हँू या रे ल के नीचे अपना िसर दे लूग

गंडासा परे फक प ी बाहर जाने के िलए आगे बढ़ थी तो रामसुख उसे पकड़

ख टया पर बैठा िलया था.....!

दे ख म तुझ पर कलंक नह ं लगा रहा, अगर घर म कोई सोता है तो बना मद

का घर सोच, लोग गलत अथ नह ं लगाएँग?


लोग नह ं तु,म.... तुम चार साल के बाद घर लौटते हो तो मुझे डाहने

तुम नह ं चाहते क म ज दा रहँू , तुम मुझे मारना चाहते हो, इसीिलए इतना

कलंक........ प ी का गला ं ध गया था और वह क क ं करके रोने लगी थी

रामसुख प ी को खींच अपनी दे ह से भींच िलया था पगली तू मेर बात को

समझी ह नह ं
म सब समझी हँू, खूब समझी हँू इतने दन साथ रहते हए
ु ......

प ी रामसुख के सीने म मुंह भींच िससक िससक कर रोने लगी थी।

इतने दन साथ रहते हए


ु म सब समझ गई हँू तुम मुझे ज दा नह ं रहने दे ना

चाहते हो।

अरे नह बावर तू मेर बात समझी ह नह

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उरे हया रे ऽ ऽ ऽ............कर ऽ ऽ ऽ. उरे हया ऽ ऽ ऽ.

बली कोहार क प ी महआ


ु के पेड़ के नीचे खड़ हो उरे हया को आवाज दे रह है

गोहरा रह है । उरे हया लड़क है बली कॅहार क । बली कहाँर कह ं बंहंगी लेकर गए हए
ु ह

बड़ लड़क कोइली और छोट उरे हया, खैची म प ा भर ब हरा गई ह भाड़ भूजने। ह ते

म दो दन उनका ब हरा म भाड़ जलता है । मां भी साथ म थी दोपहर को ह दोन

बे टय को ले वह ब हरा चली गई थी शाम उ र वाली गाड़ अदहन दे इया के पहँु चने के

पहले, मां घर आ गई थी घर म दो बैल और एक गाय और उसका ले वा था उनका

इ तजाम करने और ब च के िलए रोट पानी का भी जुगाड़ करने। लड़ कय को खरदास

आई थी अंधेरा पड़ने के पहले घर पहँु च जाना ले कन अदहन दे इया चली जा चुक थी।

घर म जानवर के िलए कोयर पानी का इं तजाम भी हो चुका था तथा रोट पानी बना के

वह ब च को खला चुक थी और ब चे खा पीकर सो भी चुके थे ले कन लड़ कयाँ अभी

तक ब हरा से वापस नह ं लौट थीं। रात दो घर बीत चुक थी गांव म सब अपने अपने

घर म जा चुके थे ले कन अभी तक लड़ कयाँ नह ं लौट थीं मां को िच ता होने लगी

थी। जवान जह न लड़ कयाँ इतनी रात गए तक नह ं लौट ह, इसिलए मां उ ह गोहरा

रह है गोहरा रह है और गािलयाँ बक रह है कह कर आई थी कुल छिनय को अंधेरा

होने के पहले ह घर लौट आना ले कन पहर भर रात बीत गई ले कन अभी तक नह ं

लौट ं

उरे हया रे ए ऽ ऽ ऽ.
काहे नरा फाड़ रह है आ तो रह हँू , प न से उरे हया ने मां को टे र द थी

आ तो तुझे बताती हँू कहा था अंधेरा पड़ने के पहले घर लौट आना अभी कह रह

है िछनार नरा फाड़ रह ं हँू । मां लड़ कय के लौट आने से आ त हो गई थी और यह

झड़क मीठ झड़क उ ह यू◌ॅ ह पला रह थी।

य रे तुझे कहा था अंधेरा पड़ने के पहले लौट आना लड़ कयाँ जब महवा


ु के पेड़

के नीचे पहँु च गई थी तो मां ने फर ह क िछड़क पलाया था लड़ कय को.......

आ तो रह हँू या करती इतने गाहक आ गए थे उ ह छोड़कर चली आती?

तेरे िलए तो जब रात पड़ने लगती है तभी गाहक आते ह बोल य नह ं दया

हम लोग कगे, नह । जानती थी मां गाहक पहं ◌ुच जाने पर उ ह छोड़कर आना संभव

नह ं हे ले कन फर भी वह लड़ कय को बेलगाम नह ं होने दे ना चाहती थी।

तो या म उ ह छोड़कर चली आती?

तेर जुबान बहत


ु कुतु नी क तरह कुतुर कुतुर चलने लगी है दे खती हँू । आने दे

अपने बाप को

ठ क है बता दे ना बाप को, उरे हया हाथ म लटकाई पोटली मां को पकड़ा द थी

पोटली को हाथ म ले उसने उसके आकार और वजन को तौला था खुश हई


ु थी दाना

ठ क ह िमला था। इसका मतलब भीड़ थी, जब ब द होने का समय आएगा तभी लोग

पहँू चगे।

उरे हया घर पहँु च चुक थी।

बली कहाँर क गांव क अ तम सवार यह लड़ कयाँ ह हआ


ु करती ह इसके

बाद गांव म चुनुक मुनुक हो जाता है लोग के यहाँ खाना बनकर तैयार हआ
ु रहता है

कुछ घर म लोग खा पीकर ब तरे पर चले जाते ह और कुछ तो खा रहे होते ह और

कुछ खाने क तैयार कर रहे होते ह, ले कन गांव म उस दन यह अंितम अ याय नह ं

है .............।
----------------------------------
च दर िमिसर के भी घर म खाना तैयार हो चुका है ले कन उनके यहाँ अभी तक

कोई खाना नह ं खाया है । छोट पतोहू कब क खाना तैयार कर चुक है ले कन कसी म

ह मत नह ं है क जाकर दालान म बैठे मद को कोई कह सके क खाना तैयार है

उठकर जीम लो, य क ब चे जनसे यह संदेशा औरत िभजवाया करती थीं वे ऍंधेरा

होते ह खाना खाकर सो चुके थे। अब घर म कोई ऐसा नह ं था जो मद को जाकर कहे ,

उठकर खाना खा ल। अगर कोई दसरा


ू दन होता तो औरत दरवाजे क कुंड खटका कर

मद को यह संदेश पहँु चा भी दे ती ले कन आज सुबह से ह घर म खासकर औरत म

आतंक या था। कारण था सुबह च दर िमिसर काफ गरम हो गए थे। च दर िमिसर

वैसे भी त नाह आदमी ह जरा जरा सी बात पर उनका खून उबल जाया करता है ले कन

सुबह जस बात को लेकर वे बगड़ खड़े हए


ु थे वह कोई छोट बात नह ं थी जसे च दर

िमिसर या कोई भी बदा त नह ं कर सकता था तो च दर िमिसर तो खुद क टाह

आदमी ह वे इस बात को कैसे बदा त कर जाते। और उनके बगड़ उठने क जड़ म थी

उनक मझली बहू......... हालां क मझली बहू क िशकायत उनके कान तक बहत
ु पहले

पहँु च चुक थी क घर म उसके साथ और उसके ब च के साथ याय नह ं कया जाता।

वैसे यह िशकायत घर क दो और बहओं


ु म भी थी ले कन डर के मारे उ होने कभी मुंह

नह ं खोला। मझली बहू थोड़ा तुनुक िमजाज थी। एक तो वह तुनुक िमजाज थी दसरा

उसका खसम परदे श म नौकर करता था। एक तो करै ली दसरे


ू नीम पर चढ़ , उसे इस

बात का कुफर था क मेरा खसम परदे श म कमाता है जो कुछ भी उसे तन वाह िमलती

है आने पाई ले आकर बाप के हाथ म रख दे ता है । वैसे बड़ा लड़का भी च दर िमिसर का

परदे श म ह रहता था और वह भी कमाई का पैसा पैसा बाप को स प दया करता था

ले कन मझली के मन म यह बात ऊपर से और बैठ गई थी क छोटे , अपनी कमाई का

सारा पैसा बाप को नह ं दे ते कुछ न कुछ चुराकर रख िलया करते ह। उसके मन म यह

भी था क च दर िमिसर यह बात जानते ह ले कन जानते हए


ु भी वे छोटे बेटे को कुछ
नह ं कहते ह। इतना ह नह ं, बूढ़ा बूढ़ इतना सब होने और जानने के बावजूद छोटे क

तथा उसके ब च को यादा मानते ह और उसे न तो वे वैसा मानते ह और न ह

इ जत ह दे ते ह। बूढ़ा बूढ़ क यह दोरं गी नीित, पग पग पर उसे दखाई पड़ती थी और

इसको लेकर वह बराबर कुढ़ती रहती थी। इस बात क िशकायत उसने पित से भी कया

था। उसे उ मीद थी पित उसका, बूढ़ा बूढ़ क इस दोरं गी नीित का बरोध करे गा ले कन

उसने वैसा कुछ नह ं कया था उ टे वह प ी पर ह उखड़ गया था।

भौसड़ तू मेरे मां बाप क िशकायत मुझसे कर रह है ? और उसने प ी को तीन

चार झापड़ जड़ दया था। अगर आगे से तेरे मुंह से फर इस तरह क िशकायत सुना तो

ु , तेरा मुंह हमेशा के िलए बंद कर दँ ग


मुंह म लबेदा हर ू ा। हालां क प ी क िशकायत से

मझले के भीतर भी यह बात, फन फुलाई थी क सचमुच उसके ब च के साथ अ याय

हो रहा है । घर म दो आँख करते ह मां बाप उसके ब च के ित, ले कन घु ट म

पलाई गई सीख क मां बाप, दे वता तु य, मां बाप क इ छा के खलाफ ब च को मुंह

नह ं खोलना चा हए अगर वे कुछ अ याय भी करते ह तो उसे बदा त करना चा हए।

दसरे
ू प रवार को स यानास करने क जड़ ह तो पराए घर से आई यह लड़ कयाँ, बहुएँ,

पृ वी को अगर फावड़ा लेकर खोदा जाए तो वह मद के बस का नह ं है ले कन औरत

अगर सूई लेकर घर खोदना शु कर द तो वे उसे खोद डालगी। इसिलए औरत क बात,

िशकायत, मद को सुनना ह नह ं चा हए। जहाँ कोई मद इनक बात पर कान दया

स यानाश हआ
ु उसका घर। इसिलए पित के सामने िशकायत पड़ते ह वह प ी को ठ क

दया था। ले कन प ी भी इतने से हार मानने वाली नह ं थी अगर कसी के मन म यह

बात बैठ गई क उसके साथ दो आँख कया जा रहा है तो फर वह उसे शांत नह ं होने

दे गी या उसने अगर यह ठान िलया क उसे कुछ करना है तो उसे भी रोक पाना मु कल

होगा। मझले और बड़के दोन परदे श से तीन चार साल के बाद, एक साथ लौटे थे तीन
दन पहले। हालां क बड़के क बहू के भीतर कइय और कुफर और िशकायत थीं ले कन

वह उसे अपने अ दर ह दबाए रखती थी। इसके दो कारण थे एक तो वह बड़ थी, बड़

होने के कारण उसका दािय व और यादा बढ़ गया था क वह घर म ऐसी कोई बात न

होने दे जो घर के वघटन का कारण बन, दसरे


ू वह जानती थी क वह पित को कुछ भी

कहे पित उसका उसक बात, िशकायत पर कान दे ने वाला नह ं है । उसक दह म सह

िमलाने के िलए वह उसके सामने कुछ भी कह दे , ले कन उसके नजद क से, जहाँ वह

हटा, बस फर वह माट के महादे व और जब मां बाप के सामने पड़ गए तब तो कुछ

कहना ह नह ं है । मां बाप ने कह दया तुम कुंए म कूद जाओ, बस कूद जाएँग,े पूछेग

नह ं कुएँ म कूदता तो हँू ले कन य ? लाख अ याय हो इनके साथ, ले कन जरा सा

जुबान नह ं खोलगे। मान िलया मां बाप के सामने मुंह खोलने क उनक ह मत नह ं है

ठ क है , ले कन छोटकू ज ह वह ग द म खलाई है हगाई स चाई है वे भी कभी कभार

उस पर हाथ उठा दे त ह, ले कन मजाल है जो छोटकू से पूछे य रे तैने भाभी पर मां

सर खी भाभी पर हाथ य चलाया? अब छोटकू को ह लो उ ह पढ़ाया तो इ ह ने ह ,

दसवॉ बारहवॉ कराया कतनी मुसीबत सहकर, नौकर भी अ छ िमल गई बाबू क

ले कन बुढ़ऊ कभी नह ं उससे पूछने गए, तुम कतना कमाते हो घर म कतना दे ते हो

बाक का पैसा या करते हो? छोटकू जो कमाते ह उसम से कतना पैसा ससुराल को

प ी के नाम मनीआडर करते ह या उसे पता नह ं है , ले कन बूढ़ा बूढ़ कभी एक

आखर पूछे तक नह ं उससे, जब क एक ए ह क परदे श म कमा कमाकर इस भूतखाने

को पाटते रहे सार ज दगी, इसे पाटने म ह खया गई इनक ज दगी। आज तक

क हए जो एक लूगा लाकर दए ह या सोलह आने कभी लाकर हाथ म दए ह लो,

नइहर सासुर जाती हो तु हार भी इ छा होती होगी मेला ठे ला म चार पैसे खचा करने
क , लो इसे खचा कर लेना, उ टे बर बदाई म या नग चार म, नैहर से दो चार पैसा

जो चुराकर रखे रहती हँू , जब ज रत पड़ ब से का ताला खोल बना पूछे िनकाल लेते

ह। इतना तो इतना, घर म कोई काज परोजन शाद याह पड़ा बूढ़ा बूढ़ मझले और

छोटू को कभी नह ं कहगे तु ह इसम पूरा खच स भालना है, बस एक िमल गए बड़कू

शाद म इतनी ितलक तै हआ


ु है और यह सब सामान........ इसका इ तजाम करो। जैसे

इनके पास पेड़ म फर है तोड़कर दे दगे और एक ऐ ह, मां पता ने आदे श दया बस

चाहे दे ह का रोवॉ रोवॉ बेचना पड़े , उसे पूरा करना है । नह ं पूछने जाएँगे बाप से क

मझले और छोटू कतना दे रहे ह और न मझले और छोटू को ह कहगे इतनी पया दो।

मझले तो कुछ हद तक ठ क भी ह, चुराने पचराने के बाद जो कुछ होता है बाप के हाथ

म धर दे ते ह, ले कन छोटकू बड़े लाडले ह न मां बाप के कभी एक आखर कहो जो पूछ

तो ल, क इतना पैसा कमाते हो या करते हो? मने कइय दफा कहा भी, ठ क है

तुम जो करोगे वह तो करोगे ह और जानती हँू क तुम बना कए मानोगे भी नह ,ं

इसके िलए चाहे शर र बंधक रखना पड़े , तु हे , ले कन एक दफा बाप से और भाइय से

पूछ तो सकते हो क भई तुम लोग कतना दे रहे हो? बोलने समझाने पर एक ह

जबाब अब वह छोटा है उससे म या पूछने जाऊँ।

तो इसी तरह सार ज दगी गदह क तरह ढोते रहो।

बड़ा होकर पैदा हआ


ु हँू तो ढोना ह पड़े गा या क ं ।

ले कन छोटकू ने मुझे दो झापड़ मार दया

मार दया तो बदा त करो, छोटा है न, तुम बड़ हो, तु ह इतना सब बड़ होने

के कारण बदा त करना पड़े गा

जानती थी बड़क , उ ह कुछ भी कहने से कोई फायदा नह ं है फर भी वह कहती

थी और बड़कू सुनते भी थे, ले कन बस उसक बात इतने तक ह सीिमत रहती थी और


यह संसार इसी तरह सरकता रहा था। ले कन मझली, मझली से यह बात बदा त नह ं

होती थी घर म दो आँख, बूढ़ा बूढ़ क दोरं गी नीित बदा त नह ं होती थी मझली से

और वह मझले के तीन दन घर पहँु चने के बाद ह , सुबह-सुबह उबल पड़ थी।

हआ
ु यू◌ॅ क रोज क तरह गाय दहा
ु कर दध
ू घर म आया था। ब चे हमेशा क

तरह अपने अपने िगलास ले, आजी को घेर बैठ गए। आजी ने सब का िगलास भर दया

था। छोटू बहू का लड़का िगलास का दध


ू पीकर िगलास पुन: आजी के सामने रख दया

था। उसक दे खा दे खी मझली का भी लड़का अपने ह से का दध


ू पी आजी के सामने

िगलास रख दया, आजी ने छोटे के िगलास म थोड़ा दध


ू डाल उसे ह क झड़क दे उसे

भगा द ं। लड़के को दध
ू चा हए था उसे िमल गया था वह खुशी खुशी िगलास का दध
ू ले

अलग हट गटा गट पी गया। मझली का लड़का अभी बैठा ह था इस उ मीद म क

आजी उसके भी िगलास म दध


ू डालेगी ले कन आजी के साथ भी मजबूर थी अगर इतना

ह दध ू कम पड़ जाता, गोरस
ू पांच छ: ब च के िगलास म और डालती तो मद को दध

िसखरन के िलए और घी िनकालने के िलए भी दध


ू जमाने क ज रत थी इसिलए

मझली के लड़के को डॉट दया था।

अब या बैठे हो, चलो भागो, सारा दध


ू तु ह ं लोग पी लोगे तो मद के सामने

या ध ं गी। मझली अपनी कोठली म गई थी काम के बहाने यह सब दे खने, दे खने और

बूढ़ क इस दोरं गी नीित को मद क आँख म उं गली घुसेड़ उसे दखाने। दे ख लो अपनी

ऑख या होता है इस घर म मझले उस समय ऑगन म ह ख टया पर बैठे चबैना

चबा रहे थे। मझली ने उसे सुना और तमतमाई कोठली से िनकली ब चे क बांह पकड़

उसे पीटती घसीटती कोठली म लेकर चली गई थी।

ठहर तुझे अभी बताती हँू तेरे पेट म महामाई का कोप ओिलयाया हआ
ु है तो

अभी म उसे िनकाल बाहर करती हँू और वह लड़के को घसीटती हई


ु कोठली म ले गई
थी और उसे लगी थी घपर घपर पीटने। मार पड़ते ह लड़का िच लाया था भ भ , बोल

अब फर ऐसा करे गा............?

नह ं अब ऐसा नह ं क ं गा

नह ं तुझे हजार दफा मना कया फर भी तेर आदत नह ं सुधरती।

आजी िसर पर हाथ रख बैठ गई थी, मझली उधर लड़के पर पली पड़ थी

लड़का वॉ वॉ िच ला रहा था मझले मां का दो आँख करना दे ख चुके थे,

ले कन सब कुछ दे ख वे अपना मुंह नीचे घुसेड़ चबैना चबाने म जुटे रहे थे। बूढ़ को

उ मीद थी, मझले प ी क यादती को बदा त नह ं करे ग और उठकर मझली को ठ क

दे गे। उसक तुनुक िमजाजी ठं डा कर दगे ले कन थोड़ दे र तक जब मझले क तरफ से

इस पर कोई ित या नह ं हई
ु तो बूढ़ उखड़ गई थी।

दे ख रहे हो न मझले अपनी बहू को यह है इसक हाल म जानती हँू यह घर का

बना स यानाश कए रहे गी नह ं।

मझले के मन म उठा था मां घर का स यानाश तू कर रह है या मझली? तू

घर म इस तरह दो आँख य करती है ले कन मजबूर थे मझलू। मां के सामने मुंह

खोल वे मां का अपमान नह ं करना चाहते थे। मां के अपमान से यादा उ ह अपने

बदनाम होने क डर थी। अगर वे प ी का प लेकर मां को कुछ कहते ह तो तुरंत

उनके ऊपर ठ पा लग जाएगा यह तो मेहर का गुलाम है । मां बाप से यादा इसे मेहर

यार है यह मेहर के पांव तले रहता है मेहदर है और अगर यह ठ पा उस पर लग

जाता है तो वह िसफ उसक बदनामी ह नह ं है ब क उसके पौ ष को भी एक चुनौती

है । मेहर जो कुछ कहे गी मेउवा बना यह सुनता रहता है , इसम ताकत ह नह ं है क

यह मेहर को बस म करके रखे। कोई पु ष हो सकता है और ढे र सार बाते बदा त कर

जाए ठ क है ले कन अगर बात इसके पौ ष क आ गई तो वह उसे बदा त नह ं कर

सकेगा।
मझली ब चे को लगातार पीटे जा रह थी पटर पटर, लड़का भ भ िच ला रहा

था। बूढ़ के मन म मझली क इस तुनुक िमजाजी को ठं डा करने क बहत


ु दन से

योजना थी और इस योजना को वह काय प नह ं दे पा रह थी तो इसिलए क मझलू

रहते थे परदे श म और बना महावत के हाथी पर अंकुश लगाए कौन? हालां क वह खुद

अपने इतनी कड़ थी क बहँु ए उसके सामने जुबान खोलने क ह मत नह ं कर पाती थी

ले कन य म उसके सामने कोई जुबान न खोल सके वह ठ क है ले कन झनक पटक

कर मझली अपना आ ोश सास के सामने य तो कर ह दया करती थी और इस

गांठ से िनजात पाने के िलए वह समय क ताक म थी, और वह समय आज खुद

मझली ने ह उसे दे दया था।

दे ख रहे हो मझले अपनी बहू क करतूत, भीतर ह भीतर इसक इन करतूत को

म जबसे यह, डोले से उतर है तभी से बदा त कर रह हँू और जल जलकर कोयला हो

रह हँू । इतनी जलन भोगने के बावजूद म घर के भीतर क सार बात जहर क तरह

घ ट लेती हँू , तो इसिलए क म बचाती हँू क अगर यह बात तु हारे बापू के कान म

चली गई या तु ह पता चल गई तो इसक ह डयाँ तोड़कर रख दोगे ले कन अब खुद

तुम इसे अपनी ऑख से दे ख रहे हो न? मने िसफ इतना कया क चु नू के िगलास

म एक घूंट दध
ू डाल दया और इतना करना मेरा बष हो गया। एक तो ब चे का

लगातार पटना और उसका वॉ वॉ िच लाना, मझले के मन म मां क दो रं गी नीित

के ित आ ोश होते हए
ु भी उसका दमाग प ी के ऊपर झ ना गया था। ऊपर से मां

उसक िशकायत जड़ रह थीं और मां क िशकायत पर कोई मद न उठे और प ी को

पीट न दे तो उस पर जो कलंक लगेगा वह उसे धो नह ं सकता, इसिलए मझले को

सुनते सहते जब बदा त नह ं हआ


ु था तो वे भौक का चबैना परे हटा कोठली म घुस

गए थे और प ी क झोट पकड़ उसे जमीन पर पटक लगे थे लात घूसो से उसे पीटने।
साली आज म तेर तुनुक िमजाजी ठं डा ह कए दे ता हँू , मझले प ी को जमीन

पर पटक उसे लात घूसो से पीट रहे थे और वह क क ं क कया रह थी। ब चा जो

अभी तक मां क मार से त ब ब िच ला रहा था वह अब मां को पटता दे ख और

जोर से िच लाने लग गया था। मझले पर खून सवार हो चुका था वे प ी को पीट रहे

थे। ठहर भोसड़ म तेर तुनुक िमजाजी हमशा के िलए ठं डा कर दे ता हँू तू जब तक भरा

पोखन खा नह ं लेगी तेरा िमजाज ठं डा ह नह ं होगा कोठली के भीतर लड़का िच ला रहा

था मझली पित के लात घूसो क मार पर क ं क ं क कया रह थी, बूढ़ आंगन म बैठ

मझले को रोक रह थी छोड़ दे मझले छोड़ दे उसे, या तू उसक जान ले कर ह दम

लेगा।

ब चे जो अभी तक आजी के इद िगद जमे हए


ु थे वे अपना अपना िगलास ले

सहम अपनी कोठिलय म खड़े थे। च दर िमिसर बाहर दालान म बैठे भीतर चलते यु द

को सुन रहे थे और उबल रहे थे। मझली क िशकायत उनके भी कान म पहँु च चुक थी

पहले तो वे मझले के बगड़ उठने पर खुश हए


ु थे ले कन यु द को ल बा खंचता दे ख वे
दालान से उठ ऑगन म आए थे और मझले को डांट बाहर िनकलने का आदे श दए थे।

ु हो गई अब छोड़ दे उसे, छोटा ब चा जो अभी तक भीतर कोठली म


मझले बहत

मां को पटता दे ख त वॉ वॉ िच ला रहा था बाबा क आवाज सुन कोठली से िनकल

बाबा के पास दौड़ा आया था और उनका पांव पकड़ अपना माथा उनक जांघ म घुसेड़

खड़ा हो गया था।

मझले तुमने सुना नह ,ं मुझे आना पड़े गा या, बाप का आदे श पा मझले हाँफते

हए
ु बाहर िनकले थे

साली कुल छनी घर को जब तक उजाड़ नह ं दे गी चैन नह ं लेगी, मझले माथे

ु बाहर िनकल गए थे, और पीछे पीछे


पर चुहचुहा आया पसीना गमछे से प छते हए

च दर िमिसर बाहर िनकल दालान म आ बैठे थे।


सुबह से ह घर म तनाव था घर का एक एक ाणी त था, ब च इसी डर से

शाम ज द खा अपने ब तर म चले गए थे और सो गए थे। बूढ़ च दर िमिसर के डर

ु थी, घर म खाना तैयार हो चुका था, छोटक रसोई बना चु हे


के मारे ऑगन म बैठ हई

के पास ह बैठ थी। बूढ़ को डर था च दर िमिसर के िमजाज से वह प रिचत थी कस

तरफ झुक जाएगा कोई नह ं जानता। अगर उनका गु सा कह ं खुद उस पर झुका तो वे

उसक ह डयाँ तोड़ कर रख दगे। इतनी उमर हो गई घर म नाती पोते बहँु ए आ गई ह,

तो भी या, अगर उनके िसर पर भूत सवार हो गया तो वे कुछ भी नह ं सोचेगे। इसी

डर से बूढ़ ह मत नह ं कर पा रह थी जाकर दालान म मद को कहे खाना तैयार हो

चुका है , उठकर खाना खा लो। जब बूढ म मद के सामने पडने क ह मत नह ं है तो

बहओं
ु क तो सोचना ह नह ं है । डर सहमी अपनी अपनी कोठिलय क डयोढ़ पर बैठ

ु थीं, बड़क और मझली, मझली क दे ह म चोट लगी थी उसक दे ह का पोर पोर


हई

करक रहा था, वह ु थी, इसी ने मुझे बेटे से


त भी थी और सास से िचढ़ भी हई

ु थी, घर म वह
कुटवाया है । छोटक चू हे के पास टे हु न मे िसर घुसेड़े बसूरती बैठ हई

सबसे यादा डर हई
ु थी। च दर िमिसर के गु से से वह प रिचत थी एक दफा ऐसा ह

हआ
ु था उसके साथ दाल म थोड़ा नमक यादा हो गया था बुढ़ऊ उठे थे, खाना खाने।

रोट तोड़ दाल म बोर जैसे मुंह म िलए थे, मुंह का कौर जमीन पर उगल तमतमाए हए

उठे थे और बटलोई क सार गरम दाल उसके ऊपर उड़े ल दए थे, सािलय को दाल म

नमक डालना तक नह ं आता है , लो इसे तु ह ं खाओ और वे गमाए सामने पसा खाना

थाली स हत उठाए थे और ऑगन क तरफ फक दए थे। हालां क दाल तब तक काफ

ठं ड़ हो चुक थी ले कन फर भी वह काफ गरम थी। छोटक दाल क गरमी से छटपटा

कर रह गई थी वह तो कुशल हआ
ु था क वह घूंघट काढ़ रखी थी जससे दाल उसके

चेहरे पर नह ं पड़ थी नह ं तो उसका सारा चेहरा ह झुलस जाता।


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रात पहर भर बीत चुक थी। उरे हया ब हरा से अपनी पाली का भाड़ भूज वापस

घर लौट चुक थी। मद दन भर के काम से घर वापस लौट चुके थे कुछ घर म रात का

खाना खाकर मद अपने व तरे पर जा चुके थे और औरते खाना खा रह ं थी। कुछ घर

म औरत भी खाना खा चुक थीं, ले कन बली कहाँर के घर म अभी खाना बन ह रहा

था। खाना बना रह थी बली कहाँर क छोटक लड़क अन रया बली कहाँर घर म नह ं थे

बंहंगी लेकर कह गए हए
ु थे। घर म मां का शासन था वह लड़ कय पर बगड़ हई
ु थी

और कर करा रह थी कारण लड़ कयाँ ब हरा से आज फर दे र से लौट थीं और मां के

पूछने पर उससे लड़ बैठ थीं। वैसे लड़ कयाँ बाहर ब हरा या सरबिनया जब भार बारने

जाती ह तो अ सर उ ह दे र हो जाया करती है , ले कन उस समय इनके साथ या तो

बली कहाँर खुद रहते है या मां, ले कन आज लड़ कयाँ अकेली थी, जबान जह न अकेली

लड़ कयाँ, इतनी बड प न, उरे हया थोड़ा उ ं ख


ृ ल भी थी, ऐसे म मां को डर थी क

उरे हया कह ं कोई सोहदा न बुला ले प न म या उसक उ ं ख


ृ लता दे ख कोई सोहदा ह

उसके पीछे पड़ जाएगा। य द ऐसा कुछ ऊँच नीच हो गया तो वह या मुंह लेकर इस

दिनया
ु म जी सकेगी? इसिलए उरे हया जब से घर पहँु ची है मां उस पर करकरा रह है

और उरे हया मां के ऊपर बगड़ है । मां का उसपर भरोसा ह नह ं है वह उसपर सीधा

आ ेप लगा रह है तू कतनी छे छड़ है या मुझे बताना पड़े गा, मां का यह आ ेप

उरे हया को बदा त नह ं है । इसिलए मां बेट के बीच जोर जोर से कहा सुनी चल रह है

और बली कहाँर के घर म पूरा हं गामा है ।

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च दर िमिसर के घर अभी कोई खाना नह ं खाया है और मद दालान म और

औरते जगह जगह भय से त बैठ हई


ु ह। यदनाथ
ु के घर म खाना बन चुका था

ले कन मद को खाना खाने के िलए उठाया जाता उसके पहले ह यदनाथ


ु प ी को पीट
दए थे कारण था जदनाथ
ु का लड़का संभू के लड़के को ऐसा ढ ला मारा था क उसका

कपार फट गया था जब संभू क मां लड़के का ओरहन लेकर यदनाथ


ु के घर पर गई थी

तो जदनाथ
ु क प ी ओरहन लेने क बजाय उ टे संभू क मां से लड़ पड़ थी।

तु हारा नाती कतना बदमास है , या यह बात तु ह बताना पड़े गा?

ले कन वह कतना बदमास है यह तो दे ख ह रह हँू तु हारे लड़के ने मेरे नाती

का कपार रं ग दया , कतना तो खून बह रहा है । इसे तुम नह ं दे ख रह हो? बेटा

तु हार गलती कया है ओरहन दे ने आई हँू तुम लड़के को कुछ बोलोगी नह ं, उ टे हमीं

से लड़ने चल पड़ हो वाह रे वाह उ टे चोर कोतवाल को डॉटे ।

तु हारे नाती ने उस दन, जो मेरे बेटे को जमीन पर पटक कर उसक छाती पर

सवार था उस दन म भी ओरहन लेकर तेरे घर गई थी । बोला था तुमने एक आखर

अपने नाती को, तु हारा अपना तु ह बहत


ु पयारा है मेरा घूरे पर पड़ा है न ?

अरे तू डाइन, मेरे नाती का कपार रं गवा दया

रे पूतकाट मुझे डाइन कह रह है पूतखैनी

अरे रांड ठहर तुझे अभी िसखाती हँू

रे भतारकाट तेरे मुंह म क ड़े परे

रे तेरे घर को बर ह उजाड़ द

रे तेरा पूरा घर उजड़ जाए पूत काट भतार काट रं ड ....

लट खोल चुक थी दोन औरत और गला फाड़ एक दसरे


ू को ग रया रह थीं,

पंज पर उचक उचक हाथ झमका झमका तािलयाँ पीट पीट, जबड़े कटकटा, दशक क

भीड़ दोन तरफ इक ठा हो गई थी.. स भू उस समय घर म ह थे, झगड़ा ल बा

खंचता दे ख मां का हाथ पकड़ कर उसे घर क तरफ घसीट ले गए थे, शाम हई


ु थी

जदनाथ
ु घर लौटे थे तो संभू खुद जाकर उ ह बुला लाए थे बेटा उस समय सो चुका था

ले कन उसके माथे म प ट बंधी थी और वह सोते म भी अभी तक िससक रहा था,


यदनाथ
ु ने प ी क िशकायत सुना था ब चे के िसर म खून से तर प ट दे खा था ोध

उनका सातव आसमान पर चढ़ गया था घर लौटकर आए थे प ी से घटना के बारे पूछे

थे और पूछे थे जब लड़का इतना बड़ा कांड कर दया है ढे ला मार उसका माथा रं ग दया

है जरा सा ढ ला अगर नीचे लग जाता तो उसक आँख फोड़ दे ता और वह जीवनभर

काना बना घूमता रहता इतना हआ


ु था और वे तु ह ओरहन दे ने आए थे इस पर लड़के

को दं ड दे ने के बजाए उ ह ं से लड़ गई भौसड़ ... और यदनाथ


ु प ी को तीन चार झापड़

जड़ दए थे।

इसी तरह के छोटे बड़े कारण, मद घर पहँु चे थे िशकायत उनके कान म पड़ थी

कुछ बतमान क कुछ पहले क औरत पट थीं गांव के और कइय घर म । कसी घर

म ब च को छोड़ बाक सभी बड़े उपवास करके सो गए थे कुछ घर म औरत बना खाए

सो गई थीं और कुछ म मद या बूढ़े खाना तज जद म आ गए थे नह ं म खाना नह ं

खाऊँगा। सबके पीछे अपने अपने कारण थे, मान मनौवल बनती अरदास के बाद कुछ

खाना खा िलये थे कुछ उपवासे पड़े रहे थे।

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रात गहरा रह थी गांव म चुनुक मुनुक हो रहा था, दयाल के घर म वैसे कोई

घटना दघटना
ु नह ं घट थी। घर के सभी सद य ब च से ले कर बूढ़ तक खाना खा

अपने अपने ब तर पर जा चुके थे। फागुन का मह ना सद क खुनक अभी भी हवा म

ु थी, इसिलए मद दालान म ख टया डाल ब तरे पर चले गए थे। औरत


कम नह ं हई

घर के भीतर अपनी अपनी कोठिलय म । दयाल िमिसर का मझला बेटा िचंता, बाप क

बगल ख टया डाले था। रोज ह वह बाप के बगल अपनी ख टया पर सोता है । घर के

अ दर गए उसे आठ नौ दन बीत चुका था, आज उसने प ी को इशारा कर दया था

कुंड मत लगाना इसिलए दरवाजे क कुंड नह ं लगी थी और िचंता अभी जगा हआ


ु था।

भीतर कोठली म जगी हई


ु थी उसक प ी। िचंता घर म सबके सो जाने क आशा दे ख

रहा था। बगल ख टया पर दयाल िमिसर सो गए थे दे खा था िचंता ने उनक नाक बजने
लगी थी ले कन कवॉड के पीछे दरवाजे म सोई पितयान (िचंता के बाप क बड़ मां)

अभी तक सोई नह ं थी, बीच बीच म उ ह खॉसी का दौरा पड़ता था और वे खॉव खॉव

खॉसती ख टया पर उठकर बैठ जाती थी....। इस पितयान का भी गांव म दसर


ू कई

औरत क तरह एक इितहास है । नाम इसका सुरजी है । सुरजी जब यारह बरस क हई


थी तो बाप ने, उसक शाद दयाल िमिसर के बड़े पताजी से कर दया था। चौदह बरस

म उनका गौना आना था ले कन गौना आने के पहले ह इनके पित क मृ यु हो गई थी।

हआ
ु यू◌ॅ क उस साल गांव म बड़े जोर क है जा फैली थी और उस है जा क चपेट म

उसका पित भी आ गया था। दन भर उ ट ट ट लगी थी उसे, शाम होते होते गुजर

गया था। यह बात है बैशाख मह ने क शु वात क गौने क ितिथ भी तय हो चुक थी,

बैसाख अंजोरे पाख म ले कन उसके पहले ह पित का दे हा त हो गया था। तब उसके

पित पं ह साल के थे। पहले तो कुछ दन सुरजी अपने बाप के घर म रह थी और यह

तॅय हो गया था क वह अपना रड़ापा बाप के घर म ह काट दे गी ले कन दयाल िमिसर

के बाप कुछ दन भाई क मृ यु से गमगीन रहने के बाद और जब वे समझदार हो गए

थे तो बाप से जद करके भाभी को अपने घर िलवा लाए थे। हालां क सुरजी को ससुराल

लाने के िलए न तो पता राजी थे और न मां ले कन दयाल के पता का भाई से इतना

लगाव था क वे उनक वधवा को नैहर म सड़ने के िलए छोड़ना नह ं चाहते थे। उनका

कहना था -भगवान ने भाई को तो उठा ह िलया उ ह ने मेर दा हनी बांह तो उखाड़

िलया ले कन उ ह ं के वसीले से जो मां सर खी भौजी है उसे म दसर


ू जगह सड़ने के

िलए य छोड़ू ं । दयाल के पताजी का बड़े भाई से जो लगाव था बह तो था ह उ ह एक

बात और ु थी लोग पूछ बैठते थे कभी कभार, तु हार भौजाई


यादा परे शान कए हए

कैसी है और लोग के इस पर उ ह कोई जबाब दे ते नह ं बनता था, इसिलए वे

भौजी को अपने घर िलवा लाए थे और तभी से भाभी उनक इस घर म रह रह ह। काट

दया उसने अपनी ज दगी और अब वह पचह र क उ म पहँु च गई ह, जरा, क जो

आदमी को बुढ़ापे म आ घेरता है घेर रखा था सुरजी को और वे दन रात भगवान से


ाथना कया करती थीं हे भगवान मेरा कागद कहाँ भुलवा रखे हो। या तुझे ल रकाई म

ह वधवा बना, तु हारा मन नह ं भरा? यह कस जनम के पाप का फल भोगवा रहे हो

भगवान, एक तो वृ दाव था ऐसे ह नींद कम आती है ऊपर से हं फनी, जरा सा आँख

ु नह ं क गला सांय सांय करने लगता है और फर खॉसी का दौरा आ पड़ता है ,


बंद हई

ख टया म पड़ पड़ सोचती है सुरजी अइया अपने पैसठ स र वष के रड़ापे का पहाड़

कस तरह घुट घुट कर काटा है उ ह ने भगवान से वनती अरदास करते । हे भगवान

मेरा इस पृ वी पर काम ह या है उठा लो मुझे, बुला लो अपने पास, ले कन अगर

लोग यह मानते ह क सचमुच आदमी का बतमान जीवन, उसके पूव ज म के पु य

और पाप कम पर िनभर है , सुख द:ु ख सब पूव ज म के कम पर िनधा रत होता है तो

कुछ लोग क ज दिगयाँ दे खने से सचमुच यह लगता है क वे लोग पूव ज म म

सचमुच कोई भयानक पाप कर चुके ह जसका फल द ु प रणाम वे ज म ज मांतर भोगते

ह। पैदा होते ह द:ु ख लेश उ ह आ घेरता है ओर वे जब तक ज दा रहते ह तब तक

उसे भोगते ह।

िचंता बड़ दे र तक करवट बदलते रहे थे ख टया पर । आजी के सो जाने का

इं तजार करते, सो गई थी आजी। चारो तरफ चुनुक मुनुक हो गया था तो िचंता बड़े

आ ह ता से उठे थे ख टया से और पांव दबाए दबाए िभड़के दरवाजे को खोल घर के

भीतर दा खल हो गए थे प ी के कोठली का दरवाजा भी खुला हआ


ु था। छोटे भाई क

बहू जो दसरे
ू ओसारे म ख टया डाले सो रह थी उस तरफ गौर कया था िचंता ने, कह ं

वह अभी जगी तो नह ं है । छोटे भाई क बहू रांड हो गई है । गौना आने के साल भर के

भीतर ह । तीन साल पहले कतनी कुल छनी है यह बहू ससुराल आते ह पित को खाकर

बैठ गई। हआ
ु यू◌ॅ था क उसके पित गांव के बलदे व िमिसर क अथ लेकर नद गया

था फुकवाने वहाँ से फं◌ूक ताप कर जब वह वहाँ से लौटा तो उसे जोरो का बुखार हो

गया था और दो दन तक इतना बुखार क दे ह पर अगर चना रख दया जाए तो फूटकर


चबैना बन जाए और दो दन बुखार म तपने के बाद अचानक उसक दे ह ठं ड पड़ गई

थी और उसने अपनी इहलीला समा कर दया था।

कतनी कुल छनी है छोटक बहू, आते ह पित को खाकर बैठ गई। तब से घर

के लोग उसे बड़ घृणा क से दे खते ह। िच ता और उसके बाप और घर के सभी

लोग रा ह परोस, छोटक बदा त करती है सबक जली कट । या करे बदा त करना ह

पड़े गा। जान िनकाल दे ने का कोई उपाय अगर अपने बस म होता तो वह यह दे ह छोड़

कबक इस दिनया
ु से बदा हो लेती ले कन बेबस है । छोटक घर का सारा काम चौका

बतन, जानवर को कोयर पानी, गोबर काढ़ना पाथना, घर म झाड़ू बहा जॉत कांड़

कूटना पीसना सब कुछ उसी के ज मे है उसके। सास ससुर जेठान और ननद क सेवा

करना सुबह गांव के कसी के घर जब जॉत नह ं चल रहा होता छोटक उठकर जॉत

पीसना शु कर दे ती है , कूटने को कुछ रहा तो कूट लेती है और सुबह सबेरे बैल गाय

को सानी पानी भर उ ह नांद म लगा दे ती है । मुंह अंधरे ह जानवर का गोबर काढ़

उपले पाथ दे ती है ऐसा ह आदे श है उसे। सुबह सुबह अगर कसी ने उसका मुंह दे ख

िलया तो वह त हो जाता है । हे भगवान आज दाना भी िमलेगा दनभर या नह ं?

कैसी कुल छनी का मुंह दखा दए सुबह सुबह। इन सब तान उत न और लोग के मुंह

बचकाने से बचने के िलए छोटक मुंह अंधेरे के पहले अपना सारा काम िनपटा लेती है

और बतन लेकर पछवाड़े चली जाती है ले कन फर भी उसे सुनना पड़ता है । छोटक

दन भर क थकान डॉट डपट और तान उत न को सोच रात म रोती हे रोती है दबे

कंठ से क ं क ं करके और उसका यह रोना भी लोग को बदा त नह ं है । िचंता बहू

छोटक के इस रोने से बड़ त है यह चुड़ैल अपने मद को तो खा ह चुक है । इससे

दसरे
ू का सुख भी नह ं दे खा जाता रात जब वे मेर कोठली म आते ह तो यह रॉड़ लगती

है क ं क ं करके रोने। यह मुवा िचरई है खा ह लेगी उसे भी एक दन। भय से त है

िचंता बहू जस रोज उसका मद कोठली म आता है और उसे छोटक का क ं क रोना

सुनाई पड़ जाता है उस दन सुबह होते ह वह छोटक को ले रगड़ती है । करे भतारकाट


रांड, तुझसे अगर मेरा सुख दे खा नह ं जाता तो कह ं तारा इनारा य नह ं ले लेती,

ख म हो जाए यह रोज रोज का टं टा। छा◌े◌ंटक सुनती है सब िसर नीचे झुकाए, बुकुर

बुकुर मुंह ताकती है , बड़ का । कोिशश करती है वह रोए तो इस तरह क कसी को

सुनाई न दे फर भी उसका रोना बड़ को सुनाई पड़ ह जाता है ।

िचंता कोठली म घुसने के पहले एक दफा ओसारे क तरफ, जधर छोटक सोई

हई
ु थी दे खा था। उस तरफ अंधेरा गंसा हआ
ु था और स नाटा था, सो गई है छोटक ,

िच ता को छोटक के जगे होने क उतनी िच ता नह ं थी जतना उसके रोने क ,

इसिलए वे नह ं चाहते थे क जब छोटक जगी हई


ु रहे तो वे कोठली म जॉए। सो गई है

छोटक इ मनान हो लेने के बाद िच ता कोठली म घुस गए थे हालां क िच ता इस बात

से आ व त हो िलए थे कोठली म घुसने के पहले, क छोटक सो गई है ले कन छोटक

सोई नह ं थी, वह अभी जगी हई


ु थी। परं तु वह िच ता के कोठली म आने के ित

एकदम अनिभ थी, वह सोच रह थी आज सुबह से कसने उसके साथ कैसा यवहार

कया कसने उसे ताना दया और कसने उसे दे ख मुंह बचकाया, ऐसा नह ं क यह सब

ु ह, रोज ह होती ह यह सब उसके साथ या यू◌ॅ


बात आज पहली दफा उसके साथ हई

कह क यह सब बाते उसक ज दगी से उसी तरह जुड़ गई ह जैसे उसका हाथ पांव

उसक दे ह से जुड़ हई
ु ह। वह सोचती है अब इसके बारे म सोचना ह बेकार है नह ं

सोचूंगी नह ं सोचूंगी। ले कन दन भर डं हने बजरने के बाद जब वह ब तरे पर जाती है

ओसारे म अपनी झलगी खं टया पर, तो दन भर क एक एक बात घटना दघटना


उसक ऑख के सामने घूमने लग जाता है एक एक बात कटा उसे छे दने लग जाते ह

ु भी, दबाने के बावजूद, उसके भीतर भभका उठता है और वह


और उसके न चाहते हए

रोने लग जाती हे ।

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जब म छोटा था तो एक बात आम थी गांव म चाहे वह चमरटोली म होया नाऊ

कहाँर के यहाँ या बमनटोली म, कइय औरत ऐसी थीं जो हबुवाती थीं। औरत म यह

हबुवाने क वृ इसी गांव म ह नह ं और कइय गांव म मने दे खा है और कह सकता

हँू क उस समय औरत का हबुवाना आम बात थी। उस समय जब औरत हबुवाती थीं

तो कहते ह क उनके ऊपर चुड़ैल या भूत या कोई दे वी दे वता सवार हो जाते थे और जब

उनक सवार उनपर होती थी तो औरते हबुवाना शु कर दे ती थीं।

अभुवाने के समय कोई कोई औरत जमीन पर पालथी मार का बैठ जाती थी और

अपनी लटे खोलकर जमीन पर अपना हाथ पटक पटक कर जोर जोर से िच लाती थी

बोलो काली माई क जै, बोलो हनुमान वामी क जय, बोलो पहलवान बीर बाबा क

जय।

बोलो च दकन क भवानी क जय, बोलो छोटक अइया क जय......, बोलो

पचपे ड़या के बर ह क जै, यह अभुवाना उसका हमेशा नह ं होता था इसका एक खास

दन समय मौका हआ
ु करता था।

जैसे उस घर म कोई शाद याह का मौका है या मंगल, सोमवार का दन है ।

उस दन औरत पूजा पाठ करती थीं दे वी दे वता को मनाती थीं और इसी म म उनके

ऊपर उनका इ सवार हो जाते थे और वह अभुवाना शु कर दे ती थी। अपने इ दे व

का नाम लेकर, जै बोलती थी जमीन पर बैठ अपनी लट खोल, पहले तो उसका शर र

थरथराता था और इसके बाद वह अपने इ क जै बोलती थी और एक खास लय, ताल

म अपने दोन हाथ जमीन पर पटकना शु कर दे ती थी। कोई कोई औरत लट खोल

खड़ हो जाती थी और अपने दोन हाथ हवा म झटकती थी अपने इ क जै बोलती थी

जब कसी औरत पर उसका इ सवार होता था तो गांव म यह खबर तुरंत बड़ तेजी से

फैल जाती थी औरत मद ब चे बूढ़े चाहे वे कसी भी उ के या कसी मानिसकता के ह

कोई उसके बारे म उ टा प टा बोलने क ह मत नह ं करता था। सभी हाथ जोड़ उसको
नमन करते थे, उस समय उस घर म काफ भीड़ लग जाती थी। सभी वग के लोग

पहँु च जाया करते थे उस समय उस घर म। उस समय खास कर वे लोग यादा पहँु चते

थे जसके घर म य द कोई बीमार होता था या कसी के घर म कोई औसेफ घुस गया

था और वह उसे तंग कए हए
ु होता था या कोई अपने लगे सगे का कुशल जानना

चाहता था। घर म पहँु चते ह वे लोग हाथ जोड़कर खड़े हो जाते थे बरम बाबा, बड़क

अइया, हनुमान वामी मेरा लड़का बहत


ु दन से बीमार चल रहा है , चल रहा है बीमार

जानता हँू अ छा हो जाएगा, जा । वह औरत उस ब चे का पीठ ठ क दे ती है और

िनवेदक खुश हो जाता है ।

या बात है महराज? मुझसे कोई खता कसूर हआ


ु है ? पूछता है घर का मु खया

हआ
ु है बहत
ु बड़ खता हई
ु है तुझसे

महराज हम तो अंधे ह नह समझ पाते ह

अंधा कहता है अंधा, हाह ......... हाह...... झनक झनक औरत अपने दोन हाथ

जमीन पर पटक रह होती है या हवा म झटक रह होती है ।

मु खया के पूछने पर दे वता, इ बगड़ खड़ा होता है

कहता है अंधा हँू

अंधा ह तो हँू महराज, अगर अंधा नह ं होता तो समझ नह ं जाता?

ह ह ह ..... कहता है अंधा है

तैने पयर चढ़ाने का मानता माना था?

माना था महराज

तो चढ़ाया उसे .....?

नह ं चढ़ाया महराज ......


य नह ं चढ़ाया...... य नह ं.... चढ़ाया, ◌ेघ ् वह औरत हबुवाना ब द कर

अपनी आँख फाड़ सवाली से करती है य नह ं चढ़ाया ?


सवाली अपने दोन हाथ जोड़ जमीन पर माथा टे क दे ता है

दोहाई महराज खता हो गई, बस अब और खता नह ं होगी

ठ क है ठ क है , जा माफ कया, ले कन अब फर नह ं भूलना

नह ं भूलूंगा महराज

महराज मेर बहू है यह ?


बहू ....... ह हा हा हा ........ मुझे बताना पड़े गा रे ....

नह ं महराज आप तो अंतयामी ह आपतो सब जानते ह

जानता हँू और यह भी जानता हँू क यह संतान का मुंह दे खना चाहती है

हाँ महराज

संतान ऐसे नह ं होती

दोहाई महराज इस बेजुबान क मदद करो ........... महराज

य रे ........ तू संतान चाहती है ?


दोन हाथ बांधे घूंघट काढ़े बैठ बहू िसर हलाती है चा हए महराज

चा हए हा हा हो ....... म भी जानता हँू चा हए, ले कन वह जो बरम , डा कन ,


पशािचनी लेकर तेर कोख पर सवार है वह नह ं होने दे गा........

इसका उपाय महराज

इसका उपाय म या जानू◌ॅ चल हट ऑख से दरू हो हट

औरत तुरंत बहू को ले परे हट जाती है

एक औरत को म बड़े नजद क से जानता हँू , उसके ससुराल से नह ं उसके मायके

से भी। बचपन तो उसका मने नह ं दे खा है ले कन जैसा उसके मां बाप बताते ह औरत

जब छोट थी तो वह बड़ सीधी साधी थी। घर म अगर उसको कसी ने डांट या झड़क


दया तो वह कभी पलट कर जबाब नह ं दे ती थी न लड़ती थी न झगड़ती थी। ित या

म उसक आँख डबडबा आती थीं और वह लगती थी बुलुक बुलुक कर रोने, मां बाप

उसके िचंितत थे उसके इस सिस टबनेस पर, भगवान इसका ससुराल म िनवाह कैसे

होगा, य क ससुराल म तो दन रात सास ननद के डांट डपट , ताने उताने, बहओं
ु पर

पड़ते ह रहते ह और मद जब बगड़ होते ह तो उनका गु सा प ी पर ह झड़ता है अगर

इसका यह हाल है तो यह सासुर म कैसे रहे गी?

उस लड़क का याह हआ
ु जस घर म, उसम सभी बाते वैसी ह थीं जैसा क

गांव के आम घर म हआ
ु करती थीं। सास दरोगा, ससुर कुछ सीधा, ननद को भाभी के

साथ मन मुता बक यवहार करने का जो अिधकार भगवान ने दया था वैसे ह ननद

उसके घर म भी थी। हाँ मद था उसका बड़ा तामसी, उसके ऊपर जब ोध सवार होता

था तो औरत को मारते समय वह यह नह ं सोचता था क उसक मार से औरत मरे गी

या ज दा रहे गी।

ु , उसके बाद
लड़क जब ससुराल आई तो साल भरके बाद उसे एक लड़क पैदा हई

उसे कोई संतान नह ं हआ।


ु ऐसा नह ं क फर उसके पेट म ब चा आया ह नह ं। आया

था दो तीन दफे ले कन हर दफा कभी तीन मह ने तो कभी चार मह ने म गभपात हो

जाता था और दो तीन गभपात के बाद फर उसे गभ भी होना ब द हो गया। कुछ दन

ु तो लोग दे वता प र, मान मनौती


आशा दे खने के बाद जब उसे कोई संतान नह ं हई

शु कर दए थे, गांव िगराम के ओझा गुिनया पकड़े गए। संतान होगी कहाँ से इसे, इस

पर तो सात सात भूत सवार ह बरम, काली, डा कन, पसािचन......... औरत हबुवाना

शु कर द , जब तब, खासकर उस समय जब उसका मद बगड़ा होता..... य रे तू

अपने को बड़ा ताकतवर समझता है समझता है न? तो ठ क है दे खती हँू तुझे कैसे


संतान होती है और तू कैसे सुख से रहता है , न स यानास कर दया तेरा सारा प रवार

तो मेरा भी नाम नह ं........।

महराज ...... म आपके सामने या हँू ? य नाराज ह मुझसे? कौन खता हई


मुझसे महराज? औरत के ऊपर भूत सवार होते ह मद भी ब ली बन जाता और लगता

मीउ मीउ िमिमयाने। उसने औरत को कड़े शीतलन से लेकर हषू बरम जहाँ जस ओझा

गुिनया ने जो बताया दखाया उसे । पूजा पाठ करवाया चढ़ावा चढ़वाया, दान पु न कया

ले कन उस औरत पर भूत सवार ह रहा। कभी मह ना दो मह ना तक शांत रहती उसके

बाद कसी दन अचानक उसके ऊपर भूत सवार हो जाता, वह पालथी मार लट खोल बैठ

जाती जमीन पर आँख काढ़ मद पर दहाड़ती

तू बड़ा शेर बनता है न अपने को

नह ं महराज मेर खता माफ क रए महराज

नह ं म दे खता हँू तू तामसी है तू चाहता है मुझे जला डालना, मार कर गाड़ दे ना,

ले कन तू मुझे गाड़ नह ं सकता, न मार सकता है ,

कौन कहता है महराज म आपको गाड़ना चाहता हँू मारना चाहता हँू

हा हा हा ..... तेरे मारने से म मरने वाला नह ं रे ...... म तुझे ह क चा खा

जाऊँगा और उस समय उस औरत के सामने जो कुछ हाथ म आता उसे लेकर वह मद

ू पड़ती, मद वहाँ से खसक लेता घर के लोग बीच बचाव करते बरम शा त हो


पर टट

जाता .........।

एक दफा जब काफ दन बीत गया तो घर म तय हआ


ु क मद अपनी दसर

शाद करले बात चलते चलते औरत के कान म भी पड़ और सवार हो गया उसके ऊपर

भूत......

तू दसर
ू शाद करना चाहता है न ...........?

नह ं महराज ......
मुझसे छुपाता है ............ झूठ बोलता है ........।

नह ं महराज

फर कहता है नह ं महराज, ठ क है तू कर शाद दसर


ू दे खता हँू तू कैसे संतान

का मुंह दे खता है , न स यानास कर दया तेरा सारा प रवार तो मेरा भी नाम....... बरम

नह ं।

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भइया च दा ऽ ऽ र ...... च दर हया हो ओ ऽ ऽ

आवाज कान म पड़ है और क गया हँू , बड़ा अजीब सा लगा है । इस गांव म

अब मुझे लोग मेरा नाम लेकर नह ं पुकारते, इसिलए नह ं क वे मेरा नाम जानते ह

नह ं, जानते ह, सब कोई मेरा नाम जानते ह ले कन कोई मेरा नाम लेकर अब मुझे नह ं

पुकारता, कारण है क जो लोग मुझे मेरे नाम से पुकारते थे वे अब इस गांव म बचे ह

नह ं ह। उ और पद म मुझसे बड़े बाबा दादा और पता क उ और पद के वे लोग

जो मुझे मेरे नाम से पुकारते थे वे मर चुके ह, कुछ लोग य प क पद म मुझसे बड़े ह

ले कन उ म मुझसे छोटे ह और कुछ लोग य द उ म मुझसे बड़े ह तो वे पद म

मुझसे छोटे ह कोई कोई ऐसा भी है जो उ म भी मुझसे बड़े ह और पद म भी ले कन

वे कभी भी मुझे मेरे नाम से नह ं पुकारते ...... भइया ..... भइया कहकर ह वे मुझे

पुकारते ह इसिलए अपना नाम और वह भी जस नाम से लोग मुझे गांव म पुकारते थे

सुन थोड़ा अटपटा लगा है, मोट मदानी आवाज, लगी थी बड़ पहचानी आवाज है यह

ले कन कौन है यह कसक आवाज है नह ं पकड़ सका था। आवाज कान म पड़ते ह

क गया हँू । आवाज जस तरफ से आई है उस दशा म दे खा हँू । राम कसुन बौ पछवाड़े

का दरवाजा खोल खड़ है कवाड़ पकड़े , छोटक काक राम कसुन, बौ को हम लोग

छोटक काक कहते थे य क राम कसुन अपने भाइय म सबसे छोटे थे और वे हम


लोग के पद म काका लगते थे। पहचान गया था म छोटक काक को आवाज से भी

और चेहरे से भी ......।

वापस मुड़ पड़ा हँू , ओह छोटक काक ........ काक के पास पहँु च उनके दोन

पांव छुवा हँू , बने रहो भइया नाती पोते तु हारे फल फूल पढ़े िलख, सार फुलवार इसी

तरह से फूली रहे ......

हमेशा क तरह काक ने अपनी मदानी आवाज म बड़ा ल बा चौड़ा आिशरवाद

दया है मुझे।

या हआ
ु भइया कुछ नाराज हो लगता है ?
अरे नह ं काक म तेरे से य नाराज होने लगा

तभी तो कहँू , भइया इधर से गुजर रहे ह, मेर तरफ एक दफा आँख उठा ताके

तक नह ं

अरे नह ं काक , ताका था ले कन तेर कोठली ब द थी

ब द कहाँ थी भइया वह तो खुली थी तभी तो मने तु हे दे खा, नह ं तो कैसे

दे खती..........।

काक मुझे छोड़ने वाली नह ं है ........ कसी को भी नह ं छोड़ती वे

सोचा था झूठ बोल काक से बचा लूंगा अपने को ले कन यहाँ बचने क कोई

गुंजाइश नह ं है , काक से कोई झूठ बोल अपने को बचा ले ऐसा संभव भी नह ं है ।

अरे तुम मेर तरफ य दे खोगे, मुझ घूरे पर पड़ बु ढ को .........

अर नह ं काक ऐसा य कहती हो .... झप गया हँू म जो कुछ रहा सहा था

काक ने अपने वभाव के अनु प जड़ दया है इसिलए झपने के िसवा मेरे पास और

कोई उपाय भी नह ं है ......।

कैसी हो काक ?
दे ख लो इसी तरह हँू ..... अमर का चाउर चबाकर आई हँू अभी उसी तरह सांड़

बनी घूम रह हँू ...... ऊपर वाला भी द हजरा भूल गया है मुझे .......।

चली जाओगी काक घबराओ नह ं

या जाऊँगी रे ..... , अरे मेरे सामने जो लोग नंगे होकर खेले वे तक चले गए

और म यह ं बैठ हँू अभी, या जाऊँगी ..... काक क ऑखे गीली हो गई ह और

आवाज उनक भरा उठ है , गीली ऑख को ऑचल से सुखवाया है उ ह ने ....... बड़ा

अजीब का बरोधाभास है काक के च र म, िमलते ह वे इस दबंगई से बोलेगीं,

मुंहफट ऐसी क जुबान पर कोई लगाम नह ं ले कन तुरंत णभर म ह मोम क तरह

पघल बहने लग जाती ह काक ।

कब आए परदे श से? काक के रो पड़ने से माहौल एकदम गंभीर हो उठा था और

इस माहौल को ह का करने के िलए म काक से कुछ पॅ◌ूछने वाला था ले कन या

पूछता उससे, या, कुछ समझ म ह नह ं आया, य क काक क दे ह और उनक यह

कोठली छोड़ इस पृ वी पर उनका कुछ था ह नह ं और वह दोन मेर ऑख के सामने

था।

काक का हाल म पहले ह पूछ चुका था और उनका भरापोखन जबाब भी मुझे

िमल चुका था।

कब आए परदे श से ......? काक ने खुद ह मुझे इस माहौल से उबारा था

आठ नौ दन हो गए काक

आठ नौ दन हो गए और म तु ह आज दे ख रह हँू , काक का वर फर

आ ामक हो उठा था

ऐसा हआ
ु काक आने के बाद सोचा चलकर काक से भट कर लू,ं यहाँ तक आया

भी ले कन तेर कोठली ब द थी

कब आए थे?◌े
चार पांच रोज पहले,

कस समय ?
यह कोई आठ बजे

दन म क रात म ?
दन म सबेरे

फर झूठ बोल रहे हो सबेरे म कह ं जाती नह ं और न दन म भी पड़ रहती हँू

इसी कोठली म और कोठली का दरवाजा इसी तरह खुला रहता है , सारा दन....... अरे

जाऊँगी कहाँ, कसके यहाँ, कौन अपना यहाँ बैठा है जो जाऊँगी उसके यहाँ, वैसे भी

जस रं ड के दरवाजे जाओ दे खकर मुंह बचकाती है इसिलए मने तयकर िलया है नह ं

जाऊँगी कसी के यहाँ। काक के चेहरे पर अनाम सी घृणा उतर आई है ।

ठ क कहती है काक गांव म काक को कोई भी पसंद नह ं करता। अगर कोई

उ ह अपने दरवाजे क तरफ आता दे ख लेता है तो वह उ ह दे खते ह बुदबुदा उठता है ,

आ रह है उड़ं क ... काक को गांव म लोग उड़ं क कहते ह। कब और य काक का नाम

लोगो ने उड़ं क रखा म नह ं जानता हँू ले कन गांव म काक को लोग उड़ं क ह कहते ह।

काक को दे ख, लोग अनाम भय से त हो जाते ह...... बड़ टोनह ं है काक , अगर

कसी हं सते खेलते ब चे को काक दे ख ले तो उस पर ऐसा टोना मारती है क दे खते ह

दे खते ब चा सूख कर कांटा हो जाए, कसी दधा


ु गाय भस पर उनक नजर पड़ जाए

ू सुरक उठता है , अगर कसी क थाली पर काक क नजर पड़ जाए तो


तो उसका दध

खाना बष हो जाए। कहने को लोग यहाँ तक कहते ह क काक अगर कसी हरे पेड़ को

दे ख ल तो वह पेड़ मह ने प ू है , काक पढ़ा हआ


ह दन म सूख जाए ...... मशहर ु

टोना मारती है और उनके टोने से आदमी क जान आफत म पड़ जाती है , यह बात

काक के बषय म कहाँ तक सच है यह तो कह सकना मु कल है ले कन यह बात सच


है क काक को गांव म कोई पसंद नह ं करता और काक के साथ यह सद आज से

नह ं जब से वे डोले से उतर ह उसी दन से उनके साथ जुड़ गया है ।

मुझे याल है जब म छोटा था ले कन इतना छोटा नह ं क म कुछ समझता ह

न होऊँ, काक जब गौना होकर इस घर म आई थीं तो उस दन मां के साथ म भी

ु हन दे खने गया था। गोल मटोल काक , तीखे नाक न स ले कन रं ग उनका सांवला
दल

था। गांव क औरत दे खते ह मुंह बचका द थीं, कोइल आई है घर म, अरे ब हनी

लड़का इतना गोरा गब और एक यह? ई तो पूरे प रवार क नसल ह बदल दे गी और

यह ं से शु हो गई थी काक के साथ ासद । रमेशर िमिसर और उसक प ी ने लड़के

को मना कर दया था खबरदार जो बहू क तरफ आँख भी उठाया। रमेसर िमिसर जधर

से भी गुजरते, का हो रमेसर भइया सुना बहू आपक बड़ सु दर है ? लोग का यंग

बाण सुन रमेसर जल भुनकर राख हो जाते वह हाल थी रमेसर बहू क । द हजरे ने इस

काली कलूट को मेरे गले ह लाकर मढ़ दया, (उस समय गांव म लड़ कयाँ दे खने का

चलन नह ं था) ले कन ठ क है , इस ठ क है के एवज म जो सबसे पहला काम कया

था रमेसर वौ ने, वह यह क, उ ह ने लड़के को खरदास दया था, खबरदार जो बहू क

तरफ आँख उठाकर दे खा तो, इधर घर म लड़के को स त मनाह कर द गई वह बहू क

तरफ आँख उठा कर न दे खे उधर रमेसर दं पती लड़के और बहू पर स त नजर रखने

लगे, कह ं यह चुड़ैल मेरे बेटे को अपने ित रया जाल म फंसा न ले और इसी के साथ

उ ह ने बहू से िनजात पाने का िन य भी कर िलया था। गौने के बाद एक दफा बहू को

जो बदा कया तो दो साल तक उसे बदा करवाने ह नह ं पहं ◌ुचे .... ले कन शाद करके

बहू को यॅ◌ू ह छोड़ दे ना, न तो रमेसर के बस क बात थी और न ह समाज इसक

इजाजत ह दे ता था। दो साल बाद बदा होकर काक फर अपने ससुराल आई। इस दफा
रमेसर बहू ने काक से प कर दया था, तेरे बाप ने हम लोग का मूड़ काटा है तुझे

ू ी, म अपने लड़के क दसर


इस घर म म नह ं रहने दँ ग ू शाद क ं गी।

फैसला सुन काक पर गाज पड़ा था, बाप ने अ छा घर बर दे ख बेट का याह

रमेसर िमिसर के यहाँ कया था, काक सांवली ज र थी ले कन कु प नह ं थी प के

पानी पर, दे ह और चेहरे क गढ़न काफ अ छ थी। बाप ने सोचा था लड़क के िलए

उसका सांवला पन थोड़ा तकलीफ ज र दे गा ले कन जब बाल ब चे हो जाएँगे तो लोग

उसक इ जत करने लगगे और वह घरै ितन हो जाएगी, य क काक कु प नह ं थीं

और उनम खाना पकाने घर संभालने से लेकर मौनी डे लवा बुनने का सारा हनर
ु मौजूद

था ले कन काक के ित बाप का कोई मनसौदा ठ क नह ं बैठा था डोले से उतरने ह

काक एकदम बायकाट कर द गई और कुछ दन इसी तरह बीतने के बाद काक के

ू मंत य रख दया गया था।


सामने दो टक

तेरे बाप ने हम लोग का मूड़ काटा है तुझे म इस घर म नह ं रहने दँ ग


ू ी म

अपने लड़के क दसर


ू शाद क ं गी।

मंत य सुन काक के ऊपर गाज िगरा था, काक दो तीन दन तक सोई नह ं थी

िसफ बुलुक बुलुक रोती थीं खाना पीना छोड़ । म पछले दो दन से दे ख रह ं हँू तू रोती

है ले कन तेरे इस ित रया च र र पर कोई पसीझने वाला नह ं है , रमेशर बहू कू हे पर

हाथ बांध दहाड़ थी काक पर

ले कन माय अगर मुझे इस घर से िनकाल दया गया तो म कहाँ जाऊँगी।

यह बात तू अपने बाप से पूछ, हँु ह, कहती है घर से िनकाल दया गया तो कहाँ

जाऊँगी। तो तुझे अपने घर म रख म लड़के को जंदगी भर रड़ापा खेने को छोड़ दँ ?


ले कन आप ह बताइए म कहाँ जाऊँगी?


अरे या तेरा बाप मर गया है , उसके घर म तेरे िलए एक ख टया क जगह

और एक जून का खाना और एक ब ा कपड़ा नह ं जुहाएगा , या वह इतना दिल र

है ?

ले कन मां उसने तो मुझे इस घर म याह दया उसने तो अपनी तई उ रन हो

िलया मुझसे।

तो तुझे उसके घर म जगह नह ं िमलेगी ....... न?

ले कन म वहाँ जाऊँगी य म यहाँ याह कर आई हँू

अरे कुल छनी तेर इतनी ह मत तू मुझसे चभर चभर बाते कर रह है ?

नह ं मां मुझे बता दो कहाँ जाउ◌ॅ बस

अगर तुझे तेरे बाप के घर म जगह नह ं है तो इस पृ वी पर इतने तारे इनारे ह,

रे ल लाइन ह, मुझे बताना होगा कहाँ जा?

ले कन म तारा इनारा लेकर भूत चुड़ैल नह ं होऊँगी।

तो तू इसी घर म बैठ मेर छाती पर दाल दलेगी न ?

म इस घर म याह कर आई हँू जाऊँगी कहाँ ......? काक म धीरे धीरे ह मत

आ गई थी और वे अड़ गई थीं म तारा इनारा लेकर भूत चुड़ैल नह ं बनू◌ॅगी, म इस घर

म याह कर आई हँू यह ं रहँू गी।

ठ क है तू यह ं रहे गी, जब तू याह कर आई है तो यह ं रहे गी और रमेसर बौ

झनकती पटकती चली गई थी। बीच म बात बचार चला था दोन ाणी म, इसको

कसी तरह खतम करके छुटकारा पा िलया जाय य क इस चुड़ैल को टाड़ना दे मार पीट

कर घर से ब हयाया नह ं जा सकता। प ी का म त य सुन रमेसर िमिसर कांप उठे थे,

नह ं यह पाप मुझसे नह ं होगा अरे ऐसा करने से यह डाइन चुड़ैल होकर पैदा होगी और

सोच या वैसे म तू और तेरा प रवार सुखी रह सकेगा, दसर


ू सबसे बड़ कमजोर जो
रमेशर को परे शान कर गई थी वह यह क यह काम रमेशर को खुद अपने हाथ करना

होगा जसे करने क रमेशर म ह मत ह नह ं थी। तीसर बात जो सोच सोच रमेसर

थरथरा उठता था क अगर कह ं लोग ने यह जान िलया क बहू क ह या रमेसर खुद

ने कया है तो गांव जवार म मु इय क कमी नह ं है जरा सा लुवाठ थाने म ख स दए

तो फॉसी लग जाएगी पूरे प रवार को इसिलए उस इरादे को यह ं छोड़ दया गया था और

तय कया गया था क बहू को घर म ह रहने दया जाए और लड़के क दसर


ू शाद कर

दया जाए।

ऐसा है तैने तय कर िलया है क तू इसी घर म रहे गी? पूछा था, एक दन

रमेसर बौ ने काक से

मां मै इस घर को छोड़ जाऊँगी कहाँ ?

ठ क है तू रहे गी यह ं, ले कन म तुझसे गोबर कढ़वाऊँगी सानी पानी करवाऊँगी

चौका बतन मजवाऊँगी, घर म कोई तेरा छुवा न तो पानी पयेगा न खाना खाएगा।

गोबर कढ़ ..... कुलबधू के िलए सबसे बड़ा दं ड और ऊपर से इसको अछूत करार

दे ना।

काक क ऑख से झर झर ऑसू झड़ने लगे थे और वे िसर झुका इस यव था

को कबूल ली थीं। य क वे जानती थीं क इस घर म वे याह कर आई ह और यह ं

उनका घर है और यह ं से उनक अथ उठना चा हए। दसरे


ू वे उसके आगे अपनी लड़ाई

लड़कर अिधकार नह ं पा सकती थी। इसके िलए न तो य गत प से वे खुद स म

थीं और नह ं समाज उ ह इसक इजाजत दे ता था और नह ं उनके प म उनके िसवा,

ससुरे, मैके म उनके साथ कोई खड़ा होने वाला था। वे तारा इनारा लेकर या रे ल के नीचे

कटकर अपनी जंदगी समा नह ं कर सकती थीं। इसिलए जब ज दा रहना है तो इस

यव था को वीकार करना ह पड़े गा बा य होकर काक ने इस यव था के आगे अपना

िसर झुका िलया था।


यह क ठली जसम काक रहती है और जसका दरवाजा इस गली म खुलता है

पहले यह ऐसा नह ं था। यह कोठली रमेसर िमिसर के घर के दसरे


ू खंधे का एक ह सा

था। काक ने जब यह यव था वीकार कर िलया तो रमेसर िमिसर ने उ ह यह

कोठली रहने के िलए दे दया था। कोठली का अ दर का दरवाजा िम ट भर कर मॅ◌ूद

दया गया था और कवॉड़ उखाड़ इस गली म मोहार खोल उसी म वह दरवाजा लगा

दया गया था। तब से काक इसी कोठली म रहती ह। उ ह मने दे खा है वे सार ज दगी

वह ं गोबर काढ़ना उपले पाथना, गाय बैल को सनी पानी करना घर म झाड़ू प छा करती

रह ह और सहती रह थी पेट क जलन, सास ससुर क टाड़ना, गांव म भी लोग उ ह

दे ख भाग खड़े होते थे, काक ब टोनह ं ह, अगर कह ं उ ह ने खल खलाते ब चे को

दे ख िलया तो वे उसे ऐसा टोना पढ़कर मारती ह क ब चा सूखकर कांटा हो जाए, गाय

भस का थन उनक नजर पड़ते ह सूख जाता है , अगर कसी के खाने पर नजर पड़

जाए तो वह बष हो जाता है यहाँ तक क अगर वे हरे पेड़ को दे ख ल तो वह ह ते

प ह दन म ह सूख जाता है । गांव म ब चे ब चे के जेहन म यह बात बैठ गई थी

क काक पढ़ा हआ
ु टोना मारती है । वैसे काक अपने घर से कम ह िनकलती थी बाहर।

बाहर िनकलने क फुसत ह नह ं थी उ ह। रात तीसरे पहर उठ जो वे काम म जुट तो

रात जब सब सो जाते थे तभी उ ह फुसत िमलती थी। सुबह पसनी कुटनी गाय बैल

को पानी सानी बतन सफाई गोबर काढ़ उपिलया पाथना से लेकर घर का सभी काम

उनके ज मे था ऐसे म उ ह फुसत ह कहाँ थी जो कभी बाहर िनकलतीं ले कन कभी

कभार अगर वे बाहर िनकल भी गई तो लोग उ ह दे ख खसक लेते थे आ गई उडं क़

पता नह ं कस वप म फंसा दे ।

इस यव था के कबूल करने के बाद काक इसी कोठली और घर म कैद हो गई

थी, उ ह उसके बाद न तो कभी मने हं सते दे खा था न रोते, न कसी से बात करते और

न कसी से झगड़ते। यह ं प थर क तरह वेआब चेहरा, म जब कभी परदे श से गांव

जाता था तो काक से ज र िमलता था वैसे मेरे घर वाल को काक से िमलने पर बड़


कड़ आप थी। वह चुड़ैल है मत जाओ उसके पास, ले कन मे◌ै◌ं जाता था जब भी

गांव जाता तो म काक से ज र िमलता था और उ ह दस पांच पए पकड़ा दया

करता था। ले काक कुछ खर द लेना, अरे नह ं भइया ले जा तू अपने ब च के िलए

िमठाई खर द दे ना। तूने दया म पा ली और काक क ऑखे डबडबा आतीं तू आया,

मुझसे भट कया यह या कम है मुझे सब कुछ िमल गया बउवा, तू ह तो एक है जो

काक का याल रखता है नह ं तो इस गांव म। और इसके बाद काक ऑचल से अपना

मुंह तोप हलक हलक रोने लगती।

काक को जब से दे ख रहा हँू उ ह हं सते कभी नह ं दे खा रोते हए


ु भी नह ं इतनी

टॉड़ना हई
ु है काक क ले कन उ ह ने न कभी कसी से कोई िशकायत क और न कभी

रोई हाँ जब म उनसे िमला हँू वे ज र रोई ह।

नह ं नह ं म भूल रहा हं ◌ॅ◌ू, काक को एक दफा म और भी रोते हए


ु दे खा हँू ।

काक का वह रोना मुझे अ छ तरह याद है , बात उस दन क है जब रमेसर िमिसर ने

अपने लड़के क दसर


ू शाद तय कया था। उस दन ितलक थी ितलक के दन गांव

जवार के लोग इक ठा थे और वे भोजन करने के िलए उठने वाले थे उसी समय काक

पता नह ं कहाँ से होती गुजरती बाहर के दरवाजे पर पहँु च गई थी और जैसे ह लोग ने

ा हण को कपड़ा उतार खाने उठने के िलए कहा था काक हलक हलक कर रो पड़

थीं। म उस समय अपने कपड़े काढ़ ा हण को भोजन परोसने के िलए तैयार हो डयोढ़

के पास खड़ा था। कौन रोया? दे खने के िलए अ दर गया तो दे खा काक अपना ऑचल

गोिलया अपने मुंह म ठू ◌ॅस अपनी लाई रोकने पर काबू कर रह थी। लाई सुन रमेसर

िमिसर ऑर उनक बहू दौड़ दरवाज म आई थी ले जा बुजर को बंद कर दे कोठली म

इस शुभ समय पर यह िसया रन फकर दे गी नह ं जानता था नह ं तो इस बुजर का गोड़

हाथ पहले ह तोड़ दे ता क यह यहाँ पहँु चती ह नह ं रमेसर,वौ ने अंगार उगलती नजर
से दे खा था काक को, ज रत नह ं पड़ थी रमेसरवौ को काक पर जोर आजमाइस करने

क । काक खुद ह वहाँ से भाग पछवाड़े क तरफ चली गई थीं।

काक कैसी हो? इसके अलावा उनसे पूछने के िलए मेरे पास कुछ है ह नह ं और

उनक हाल म उनसे पहले ह पूछ चुका हँू और काक ने उसका मुझे जबाब भी पकड़ा

दया है । आगे उनसे म या पॅ◌ूछूं? पूछूं क काक उस दन ितलक पर तुम रोई थी न

जब सभी ा हण जीमने उठ रहे थे याल है न तु हे ? काक को दे ख मेर ऑख के

सामने उस दन क वह घटना प िसनेमा य क तरह घूम गई है , ले कन अपने

इस बेवकूफ भरे पर म खुद ह ल जत हो उठा हँू , बेवकूफ हो तुम ऐसी या

सुखद बात है उस दन क उस घटना म, जसका उ र तुम काक से पूंछना चाहते हो?

म अपनी इस ज ासा, इस को अपने भीतर दबा गया हँू । जानते हो तुम लाचार

या चीज होती है ? मजबूर और लाचार यह वह काक है जो तु हारे सामने खड़ है

और उस दन ितलक के दन जो वे रोई थी तो वे एक लाचार क लड़ाई लड़ रह थी।

उस समय गांव दे श के लोग इक ठा थे, काक के मन म उठा होगा दे खो पंच मेरे ऊपर

य अ याय हो रहा है दे खो, बताना चाह रह ह गी काक जुटे पंच से ले कन एक

लाचार मजबूर अपनी यथा भी कसी के सामने नह ं कह सकता य क लोग उस

लाचार क यथा तक सुनने को तैयार नह ं होते। उस समय काक जब अपनी कोठली से

भाग कर दरवाजे म आई ह गी तो उनके मन म एक लड़ाक औरत ने नािगन क तरह

फन फुलाया होगा और वे भागती दरवाजे तक पहँु च गई ह गी, अरे तू कुल छनी तू

कसके सामने अपनी यथा कहने चली है तेर यह यथा कोई सुनने के िलए तैयार भी◌े

होगा?
नह ं आज म रमेसर िमिसर का पानी, बीच सभा म उता ं गी म पंच के सामने

मुंह खोल खड़ हो पूछू◌ॅगी दे खो पंच या म इतनी कु प हँू क मुझे मेरे ी व

अिधकार से मुझे बंिचत कर दया जाए?

हा हा हा ..... मूख औरत, या गांव दे श के लोग यह नह ं जानते क तेरे ऊपर

रमेसर िमिसर या अ याचार कर रहे ह? खोला है कसी ने आज तक तेरे प म

अपना मुंह? अगर गांव दे श के लोग तेरे प म आज तक मुंह नह ं खोले तो इन

भु खड ा हण से तू य उ मीद कए बैठ है ज ह िसफ एक ह फकर है क मुझे

कतनी ज द खाना िमले और म खा पीकर अपने घर पहुचूं।

उस दन अपनी यथा न कह पाने क मजबूर थी काक म या इसके पहले, उ ह

अपनी मजबूर का इतना गहरा अहसास कभी नह ं हआ


ु था, जतना उस दन हआ
ु था,

या काक के मन म कह ं गहरे , अभी तक यह उ मीद ज दा थी क कसी न कसी

दन लोग का दल पसीज जाएगा और वे मुझे मेरे ी व का अिधकार मुझे स प दगे

और वह उ मीद ा हण के भोजन पर उठने का िनवेदन होते ह इकलौते संतान क

तरह अपना दम तोड़ द थी इसिलए काक उस दन रो पड़ थी। या बात थी उस दन

काक म, यह बात पॅ◌ूछना कतना बेवकूफ भरा होगा काक से। कह ं काक ने इसी मुंह

फटई म उ टे मुझसे पूछ िलया ए बउवा बहत


ु दे खी हँू बडके बडक को। तुम भी

अपने म कम बड़का नह ं हो, पढ़े िलखे हो ऊँचे ओहदे पर हो और जब यह सब तुमम

मौजूद है तो जा हर है तुम मेर तरह मजबूर नह ं हो फर भी बउवा उस दन तो नह

ले कन बाद म तो तुम मेरे प म बोल सकते थे जब तुम अ छ नौकर और पैसे वाले

हो गए थे तब, क काक ने या पाप कया है जो तुम लोग उसके हाथ पांव बांध उ ह

नरक म सड़ने के िलए डाल दए ह ?


यह ह बेवकूफ भरा है या म काक के इस अ यािशत से भयभीत हँू ,

अगर कह ं काक मुझसे इस तरह का कोई पूछ बैठ तो ........? ऐ बउवा तुम लोग

अपने घर के डाइिनंग और ाइं ग म म बैठकर बड़ ल बी लंबी बात करते हो और जब

वह बात तु हारे ब आकर खड़ हो जाती हँू तो तुम उससे बच िनकलने के िलए बड़ा

ू लेते हो या काक के मुंह से वह


सट क सा बहाना ढ़ढ िनकलने के पहले ह तुम

अपनी पा कट म हाथ डालते हो और दस पांच जो हाथ म आया उसे काक क हथेली

पर धर उनका मुंह दबा दे ते हो और बाद म सोचते हो दे खो हम कतने चालाक ह कतने

बड़े जहालत म पड़ने से अपने को बचा िलया ऊपर से इतराते भी हो मने काक अभागी

को दस पए दे दए।

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मेर दो माएँ ह व ास नह ं क रएगा आप न? ले कन यह सच है क मेर दो

माएँ ह एक मां मेर अपनी मां, जसके पेट से म पैदा हआ


ु , मेर मां मुझे ज म दे कर

दस पांच रोज दध
ू पलाई होगी क वह बड़े भयानक प से है जा से त हो गई थी

...... है जा से त होते ह मुझे उसके पास से अलग कर दया गया था य क उस

जानलेवा बीमार म न तो वह मुझे दध


ू पला सकती थी और न ह उसक छाितय म

ू ह था, जो वह मुझे पलाती और न उस समय घर म कोई गाय भस ह लगती थी


दध

ू पला मुझे बचाया जाय, घर क


जसका दध थित इतनी दयनीय थी उस समय क

मेरे िलए दधा


ु गाय, बकर भी खर दने क कूबत नह ं थी पताजी म। सम या खड़ हई

लोग के सामने, कैसे बचाया जाए इस ई के फाहे को। उस समय काक मेर अपनी

काक ने मुझे अपना िलया था । काक को मेरे एक लड़क थी साल डे ढ़ साल क शायद

और काक अभी तक उसे अपना दध


ू पलाती थीं जब मेर मां है जे से त हो गई तो

काक ने मुझे अपना िलया और उन काक क छाितयाँ मै काफ दन तक पीता रहा

था। कतने दन तक यह तो म नह ं कह सकता ले कन आज भी मुझे याद है छाितयाँ


पीने के िलए मुझम और मेर बहन म काफ झगड़ा होता था। नह ं म इसे अपनी मां का

दध ू ी, वह काक क एक छाती अपने मुंह म ले लेती और दसर


ू नह ं पीने दँ ग ू एक हाथ

से तोप लेती। हालां क बहन मेर काफ बड़ हो चुक थी और वह खाना भी खाने लगी

थी, खाना तो तब तक म भी खाने लगा था ले कन छाितयाँ पीने क मुझे एक अमल सी

थी और वह अमल बहन म भी थी ............। अगर म काक क छाितयाँ नह ं पीता तो

हो सकता था क बहन उतनी उ तक काक क छाितयाँ पीना छोड़ दे ती ले कन चूं क

म भी उसक मां क छाितयाँ पीकर उसके नैसिगक अिधकार े म अनािधकार वेश

कर गया था इसिलए उसम और मुझम छाितयाँ पीने को लेकर काफ झगड़ा होता था।

इस झगड़े को बचाने के िलए काक ने एक छाती मुझे दे दया था और दसर


ू बहन को

बहन मान गई थी इस समझौते को, मुझे अपने ह से क काक क छाती आज भी

अ छ तरह याद है ।

वे मेर काक या मां आज नह ं ह, वे मर गई ह। उ ह मरे हए


ु कतने वष गुजर

गए ह यह बात भी म नह ं जानता ले कन वे, बीमार पड़ने और मरने के बीच वे कस

जलन और ासद से गुजर ह यह आज भी मुझे अ छ तरह याद है । हालां क ऐसा नह ं

है क मेर मां एक अकेली औरत थी इस गांव म जो मरने के पहले इस जहालत से

गुजर ह और जस तरह िनगलने के पहले सांप मढक को पहले अपने जबड़ म पकड़ता

है और फर धीरे धीरे उसे िनगलना शु करता है मढक साँप के जबड़ो मे फसा लाचार

िसफ क ंउ क ंउ करता है और उसे इस बात का पूरा अहसास होता है क सांप मुझे

िनगल रहा है अब मेर टॉगे उसके अ दर जा चुक ह अब आधी शर र अब पूर शर र

कुछ नह ं कर पाता मेढक और मौत के मुंह म फंसा बस वह अ तम सांस तक अपने

को िनगलता हआ
ु दे खता रहता है । उसी तरह मां भी बीमार पड़ने के बाद मौत के मुंह म

धीरे धीरे असहाय लाचार सरकती हई


ु दे खती रह थीं आपने को। इस गांव म लोग पहले

इसी तरह मौत के मुंह म समा जाया करते थे, जस तरह मेर मां समाई थी। मौत एक

ऐसी चीज है जसे आदमी सहज वीकार नह ं करता वह उसे िनगल ले इसके पहले वह
उससे अपनी श भर ज र लड़ता है ले कन वह लड़ाई मने इस गांव म कम ह दे खा था

खासकर औरत के मामले म । मद जब बीमार पड़ते थे तो लोग अपनी कूबत भर दौड़

धूप कर जड़ बू टयाँ पला, ओझा गुिनया को दखा उसे बचाने क कोिशश करते थे

ले कन उनक यह लड़ाई बस इतने तक ह सीिमत रहा करती थी। जहाँ कभी पैसे खरचने

क बात आई लोग चुप मार बैठ जाते थे और वह इसिलए नह ं क वे पैसा खरचना ह

नह ं चाहते थे ब क इसिलए क खरचने के िलए उनके पास पैसा होता ह नह ं था।

मां क मौत के बारे म म इसिलए िलख रहा हँू क उसक मौत ने शायद मुझे

बहत
ु यिथत कया था , उस समय जब म उसे मौत के मुंह म सरकते दे खा था तो उस

समय मुझे इस बात का कोई ान ह नह ं था क मौत या चीज होती है और बीमार

और पीड़ा या होती है । य क जब मां मर थी तो मुझे याल है घर म लोग रो रहे

थे और म अ दर उन लोग को जोर जोर से रोता दे खता रहा था .... य रो रहे ह

ु अवसाद वषाद, ज दगी और मौत का कोई


लोग। हालां क उस समय मुझे सुख दख

ान नह ं था ले कन आज जब म उस मां के बारे म सोचता हँू तो मुझे रोना आ जाता

है कभी कभी अकेले म म उसक उस पीड़ा को सोच हलक हलककर रोता हँू ।

हआ
ु यू◌ॅ था क मां को खरबाद क बीमार पकड़ ली थी। खरबाद को डा टर

भाषा म या कहते ह नह ं जानता हँू ले कन मां जब बीमार पड़ थी तो उसका ट ट

पेशाब बंद हो गया था। म मां क बीमार और उसक मौत के बारे म इसिलए नह ं िलख

रहा हँू क उसक बीमार या मौत कोई अजूबा हादसा था। गांव म उन दन इसी तरह

क मौत होती थीं। मां भी उसी तरह मर थी........ म उसक बीमार के बारे म इसिलए

िलख रहा हँू क आपने अगर मेरा गांव नह ं दे खा है तो कम से कम उन दन क लोग

क लाचारगी समझ सक........। हालां क ेमच ने अपनी कहानी कफन म उस समय

गांव क औरत क मौत के बारे म बड़ा यथाथ बयान कया है गभवती औरत कोठली म

पड़ अकेले मौत से लड़ती है और बाहर घर के बाहर औरत का पित और बाप िनसहाय

बैठा रहता है ......... ेमच ने अपनी इस कहानी म हर तर क लाचार चाहे वह औरत

क लाचार हो जो कोठली म पड़ अपने को मौत के मुंह म समाते दे खती रहती है या


उसका पित या ससुर हो जो इतना लाचार और िनसहाय है क औरत क िच लाहट कुहर

पुकार सुन यिथत तक नह ं होता वह इतना लाचार है क उसके अंदर क संवेदन का

थाला बहत
ु पहले ह पट चुका है उधर औरत मर रह होती है इधर बाप बेटे िसफ भौर म

भुनती आलू पर नजर गड़ाए बैठे ह। बाप बेटे को कहता है जा भीतर दे ख बहू क या

हाल है तो बेटा सोचता है बाप मुझे घर के भीतर भेज खुद आलू चट कर जाना चाहता है

और शायद बेटे का यह सोचना गलत भी नह ं था य क बाप के मन म ज र यह बात

रह होगी क बेटा यहाँ से उठकर चला जाए तो सार क सार आलू मेर हो जाए। कफन

कहानी म औरत और बाप बेटे क द र ता, भूख, लाचारगी कतने वा त वक प म

कह ं गई है आप एक दफा उस कहानी को पढ़ तब आपको पता चलेगा म उस कहानी

का जकर यहाँ य कया िसफ उसी बात को आपको समझाने के िलए। मां चार दन

से पछवाड़े वाली कोठली म पड़ थी, उसका ट ट पेशाब एक दम ब द था और पेट

उसका गु बारे क तरह फूल ऊपर को िनकल आया था उसक दे ह से कर ब एक हाथ

ऊपर तक, वह जोर जोर से कराह रह थी कुहर रह थी ऊह आह आय राम हो ऽ ऽ ,

हे बापा...... हे मां ....... हो..... ओ ऽ ऽ, हे बापा ...... हे मां ..... हो.... और इधर

बाहर दालान म पड़ एक ख टया पर पताजी और एक ख टया पर काका जमीन म

लटकाए एक पांव पर दसरा


ू पांव चढ़ाए जॉध पर दोन हाथ रख दोन हथेिलय म गाल

ु थे। दोन क एक ह मु ा, घंट गुजर जाने के बाद


टे क बड़ गहर सोच म बैठे हए

पताजी एकाध दफा काका से पूछ िलया करते थे बैल को पानी पला दए हो क नह ?

मुझे याल है आज भी पताजी और काका क वह मु ा और बीच बीच म उनका यह

, दालान म बैठे रहने के दौरान पताजी ने काका से मां के बारे म एक भी श द नह ं

कहा था और न ह ं काका ने। पताजी के पूछने पर बड़े बेमन से वे उठते थे बैल को

कोयर पानी दे ते थे और वापस आकर दालान म पड़ उसी ख टया पर पांव लटका एक

पांव पर दसरा
ू पांव चढ़ा दोन हथेिलय म चेहरा, गाल टे क बैठ जाते थे। अ दर मां का
पेट फूल गु बारा हो चुका है वे कराह रह ह मेर अपनी मां भीतर काम से फुसत पाती ह

तो मां के पास जा बैठती ह और उनके वखरे बाल सहलाना शु कर दे ती है इसके

अलावे घर म मां को बचाने के िलए न तो कोई अफरा तफर है न कोई दौड़ धूप न

घबराहट न काका म न पताजी म न मां म जैसे सब कोई सार घबराहट परे शािनयाँ डर

और िचंता ताक पर रख िसफ एक बात का इं तजार कर रहे ह क मां को इस तकलीफ

से कब मु िमलती है । ब तरे पर पड़ मां के चेहरे पर भी मने कोई घबराहट या

बेचैनी नह ं दे खा था पीड़ा से उनका चेहरा झवॉ चुका था और उस पीड़ा को झेलने के

िलए वे िसफ भगवान को पुकारती थीं हाय रा आ आ ऽ म.............। वैसे मुझे मां के

पास जाने क मनाह थी जब भी म मां के पास जाता, मेर मां मेर बाह पकड़ मुझे

दसर
ू तरफ घसीट ले जाती और अकेले म ले जाकर मुझे ऑखे तरे र कर घूरती, और

जबड़े कटकटा मुझे खरदासती अगर उधर फर गया तो तेर ह डयाँ तोड़ कर रख दँ ग
ू ी।

इतना खरदासने के बाद भी म मां के पास जाता था। जब दे खता मां रसोई म य त है

तो म मां के पास पहँु च जाता , उस समय मां बड़े यार से मेरे िसर पर हाथ फेर मुझे

पुचकारती चले जाओ जाओ दे खो बाहर काका या कर रहे ह और इसी के साथ उनक

ऑख से भर भराकर ऑसूं बाहने लगते य नह ं जानता म, शायद मुझे उनके पास से

जब मां घसीटकर ले जाती और अकेले म मुझे डांटती तो उनका डाटना वे सुन चुक थीं

और उस समय उनके मन म यह बात हमक


ु कर उनक ऑख के रा ते भर भराकर

िनकल पड़ती क जस ब चे को मैन अपना दध


ू पलाकर पाला मेरे बीमार पडते ह मेरे

पास उसका आना भी पाप हो गया है या वे सोचतीं या यह ह यह ज दगी जसे मौत

के मुंह म धीरे धीरे सरकते िसफ दे खा जा सकता है कया कुछ नह ं जा सकता।

मां मर गई थी चार पांच दनो म। लोग उनक अथ लेकर नद गए थे फू◌ॅक

ताप कर वापस लौटे थे तो काका गले म एक िचरकुट बांध दालान के एक कोने म पैरा

बछा बैठ गए थे, शुध होना है उनका और तेरहवीं, घर म न तो पैसा था और न

अ न, अ न बस उतना ह होता था क पकने के साथ खाना शु हो जाता था और


ला ट जब कटता था तो मह ने दो मह ने के िलए खाने भर के िलए हो जाता था।

ु थी घर म मां क सुध और तेरहवीं का खच कैसे जुगाड़ कया जाए, इस


सम या हई

जुगाड़ के िलए पताजी गांव म कइय दरवाजे खटखटाए थे ले कन कह ं से कोई जुगाड़

नह ं बैठा था अंत म तॅय कया गया था टे सन के ा रका साव के हाथ बीधे भर खेत

रे हन रख दया जाय। खेत रे हन रखा गया और जो पैसा उधार िमला उससे मां का काम

या स मप न हआ।

मुझे याल है पताजी ने एक दफा कहा था मुझसे तु हार काक के मरने पर

खिलयवां वाला एक बीधा खेत टे शन ा रका साव के यहाँ रे हन रखा गया था तुम अब

कमाने लगे हो उसे छुड़वा लो

ठ क है छुड़वा ली जए ....... कतनी पया लगेगी,

प चीस पए

मने पताजी के हाथ म पचास पए दए थे ठ क है जाकर छुड़वा ली जए।

पताजी ा रका साव के यहाँ से वापस लौटे थे तो उनका चेहरा उतरा हआ


ु था

या हआ
ु बड़े उदास है ?◌ं

ारका साव तो मर गए उनके लड़क ने कहा वह खेत तो आपने पताजी के हाथ

पचीस पए म बच दया था, अब ारका साव ज दा होते तो उनसे पूंछता ले कन अब

वे है ह ं नह ं तो या कहँू ।

आपने लड़क से कहा नह ं मने तो रे हन रखा था ब तो नह ं कया था,

कहा था ले कन ये व का कागज मेरे सामने लाकर पटक दए

तब? या? अब जो हो गया हो गया, वापस तो िमलना नह ं ह उसे, बीसो साल

पहले क बात हो गई, पताजी के चेहरे पर न कोई ोध था न आ ोश, बस वह मां

क बीमार के समय क गंभीरता और उदासी इसके अलावे ठगे जाने के बावजूद कह ं

कुछ नह ं था उनके चेहरे पर।


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खटर खटर खटट ... भीतर क कुंड खटक थी, पहर भर रात बीत चुक थी घर

म खाना तैयार था, घर म ऐसा कोई ब चा नह ं था जसे भेज दालान म खबर पहँु चायी

जाती..... बापू खाना तैयार हो चुका है उठकर जीम ली जए। घर म कोई बड़ बूढ़ भी

नह ं थीं जो जाकर दालान म मद को इ ला करती खाना तैयार हो गया है उठकर जीम

ली जए। घर म एक छोटा ब चा था जो इतना छोटा था क जमीन पर धुड़क कर चलता

था दोन हथेिलय और टे हु न पर, बोलना भी नह ं आता था उसे इसिलए दालान म बैठे

मद को कोई संदेश दे ने के िलए भीतर क यह कुंड थी कुंड खटक तो रामधन और

बड़ा बेटा कपड़ा उतार कर घर के अ दर गए थे पंडोहे पर बा ट म पानी और दो लोटा

भर कर धरा हुआ था दोन ने लोटे के पानी से अपना हाथ पैर धोया था और बा ट से

लोटा भर पानी लेकर रसोई म पीढ़े पर जा बैठे थे। छोट बहू रसोई तैयार क थी, बड़

बहू मायके गई थी और छोटा बेटा कसी कामसे दसरे


ू गांव गया हआ
ु था वह अभी तक

नह ं लौटा था। घर म उसके जाने क जानकार छोट बहू को तो थी ले कन यह खबर

वह मद को दे कैसे। बेटे के न लौटने से रामधन िचंितत भी थे और ोिधत भी य क

ू गा।
वह जाने के पहले कसी से बता के नह ं गया था क कहाँ जा रहा हँू कब लौट◌ॅ

रामधन बड़े बेटे के साथ खेत म ईख गोड़ रहे थे, जब वह िनकला था कम से कम उसे

उ ह बता के तो जाना चा हए था , रामधन जब पीढ़े पर बैठे थे तो वे ोिधत थे। छोट

बहू ने थाली म खाना परोस जब उनके सामने सरकाया था तो वे उबल पड़े थे

छोटकू कहाँ गया है कुछ बताकर नह ं गया .........?

बताकर गया था छोटकू बहू को और छोटक जानती भी थी क वे कहाँ गए ह

ले कन वह बताए कैसे क वे कहाँ गए ह अगर उसे रामधन को नह ं म जबाब दे ना होता

तो वह िसर हला कर उ ह बता दे ती, उसे नह ं पता ले कन इस हाँ वाली बात को वह

ससुर को कैसे बताए, मूड़ हला दे ने से ससुर के का जबाब नह ं होता, य क


इसके आगे वे तुरंत करगे कहाँ गया और इस कहाँ गया का जबाब जानते हए
ु भी

बहू नह ं दे सकती थी य क यह बताने के िलए उसे बोलने क आव कता थी जसे वह

ससुर और भसुर के सामने बोल नह ं सकती थी, इसिलए वह रामधन के पूछने पर पहले

क ह तरह ह हाथभर ल बे घूंघट के भीतर चू हे क तरफ मुंह कए बना हले डु ले

बैठ रह थी। रामधन के पूछने पर उसके कोई जबाब न दे ने के पीछे एक मजबूर बहू

क यह तो थी ह क वह ससुर और भसुर के सामने बोल नह सकती थी दसर


ू सबसे

बड़ मजबूर उसक यह भी थी क अगर वह अपनी मूड़ हला उ ह यह इ ला दे भी दे

क जाने के पहले वे उसे बताकर गए ह तो दोन आदमी तुरंत यह बात सोच लेगे क

छोटके मेहदर ह औरत को वह बात बताकर जा सकता है हम नह ं, इसीिलए छोट बहू

रामधन के पॅ◌ूछने पर पूववत बैठ रह थी। रामधन समझ गए थे वह घर म कसी को

बना कुछ बताए चला गया है ।

या जमाना आ गया है आजकल , रामधन सामने परसी थाली म से रोट का


एक टकड़ा तोड़ झुंझलाए मुंह म रख िलए थे या जमाना आ गया है आजकल, इतना

तक िलहाज नह ं है इन लोग म क, जरा सा बताकर जाते। एक जमाना अपना था क

जब तक मां बाप हाँ नह ं कर दे कदम आगे नह ं बढ़ता था और बना बताए तो कह ं

जाने का सवाल ह ं नह ं था। उसी झुझ


ं लाहट म रामधन थाली म परोसी ाय: आधी रोट

खाकर उठ गए थे बगल बैठे बेटे ने बाप को आधा पेट खा, थाली म खाना छोड़ उठते

हए
ु दे ख बड़बड़ाया था , इतना बगड़ा नह ं करते आज तक वह बना आपका हक
ु ु म िलए

कह ं हलता है ?

ु ु म कया है , पहर भर रात बीत गई अभी तक पता नह ं है कहाँ गया,


यह तो हक

ु ु म ह लेता तो बना बताए चला जाता?


अगर हक

बड़कू चुप हो गए थे बाबू जी काफ गु साए हए


ु ह ऐसे म अगर फर कह ं छोटकू

का प िलए तो वे कह ं यह न सोच बैठ क यह लड़का अब मेरा बाप बनने लग गया।


मेरा ह प ला जुबान लड़ाता है मुझसे। दसरे
ू छोटकू बना बताए पूछे चले गए थे यह

गलती तो कया ह है उसने इसिलए वे बाप से आगे कोई तक वतक नह ं कए थे,

अ छा खा ली जए, खाना छोड़कर नह ं उठा जाता, उ ह ने बाप को खाने के िलए

दबाव डाला था ले कन रामधन उनक बात पर कोई यान दए बगैर आधा खाना छोड़

पंडोहे पर चले गए थे और हाथ मुंह धो दालान म जा बैठे थे।

अरे लड़का कुंए क जगत पर चढ़ रहा है छोट बहू काम म य त थी, लड़के को

च टू पकड़ा वह उसे ओसारे म बैठा द थी, ले कन लड़का थोड़ दे र च टू से खेलने के

बाद गुड़कते गुड़कते दालान म आया था और उसी तरह गुड़कते गुड़कते वह घर के बाहर

िनकल गया था। काम क य तता म ह उसे लड़के का याल आया था लड़के को जहाँ

बैठा कर गई थी वह वहाँ उस पर बराबर नजर रख सकती थी ले कन काम म वह इस

तरह य त हई
ु क ब चे का उसे यान ह नह ं रहा। उसे याल था ब चा दरवाजे म

जहाँ बैठाया गया है घुड़केगा भी तो वह ं अगल बगल कह ं रहे गा, वह डयोढ़ फलांग और

बाहर का ऑगन पार कर कुंए क जगत पर जा चढ़े गा यह बात इस घुड़कते ब चे के

बारे म सोच ह नह ं सकती थी, छोटक । इसिलए ब चे के ऊपर उसक नजर ज र थी

ले कन वह कह ं िनकल जाएगा इस तरफ से एकदम िन ंत थी। कुछ दे र बाद जब

छोटक को ब चे का यान आया था तो वह दरवाजे म, जहाँ उसे खेलने के िलए छोड़

गई थी छोटक वहाँ वह नह ं था और न ह उसे उसके गूं गाँ बोलने क कोई आवाज ह

िमली थी। काम छोड़ छोटक दरवाजे म आई थी ब चा वहाँ नह ं था उसका कलेजा ध क

रह गया था, बाहर िनकल उसने ब चे को दालान म तलाशा था ब चा वहाँ भी नह ं था।

दालान से भाग कर वह बाहर क तरफ झॉक थी, ब चा कुए क जगत क सी ढयाँ चढ़

रहा था, छोटक का कलेजा धकर धकर करने लगा था कसको बुलाए कसे पुकारे ब चा

कुंए क जगत पर चढ़ रहा है , अगर उसे पकड़ा न गया तो वह कुएँ म िगर जाएगा,
और अगर वह खुद दौड़कर ब चे को पकड़ती है तो घर से बाहर िनकलना पड़े गा, उसे,

ल मण रे खा, घर क डयोढ़ ल मण रे खा पार करना होगा उसे जस ल मण रे खा को

वह सुबह शाम, बाहर भीतर होने के िलए िसफ अंधेरे म पार कर सकती है । छोटक का

कलेजा मुंह म आ लगा था अगर म दौड़कर बाहर िनकलती हँू और उसी समय कसी ने

मुझे दे ख िलया तो ? या िच लाकर जोर से ह ला मचाती हँू तो भी लोग या सोचेगे।

घर म छोटक के िसवा कोई था नह ं । मद बाहर खेत म काम पर गए थे घर म वह

अकेली थी लड़का दो सी ढ़याँ चढ़ चुका था तीसर पर वह चढ़ने का यास कर रहा था

तीसर पार करते ह कुएँ क जगत और उसके बाद पचास फट गहरा कंआ, धकर धकर

धकर ध क, ध क ध क धकर धकर, छोटक का कलेजा पटक रहा था धकर ध क वह

ु दे ख रह थी कवाड़ के ओट से, न वह बाहर


ब चे को कुएँ क जगत पर चढ़ते हए

िनकलकर ब चे को पकड़ सकती थी न शोर मचा सकती थी न ब चे को पुकार सकती

थी, ध क ध क, धकर धकर कलेजा उसका पटक रहा था । हे भगवान म या क ं

असमथता और मजबूर लाचार , या क ं भगवान मु ना िगरा कुंए म कोई है भी नह ं

इद िगद उसने कवाड़ के बाहर अपना िसर िनकाल बाहर क तरफ दे खा था। एक दफा

मन म आया था उसके, दौड़कर ब चे को उठा ले और वापस घर क तरफ दोड़ जाए

ले कन फर वह क गई थी अगर ऐसा करते उसे कसी ने दे ख िलया तो .......? अगर

कसीने दे ख िलया तो? हे भगवान, हे भगवान म या क ं ऊँ ऊँ या क ं भगवान,

ब चा तीसर सीढ़ चढ़ गया था और कुए क जगत पर चढ़ने का यास करने लगा था।

हे भगवान, ध क ध कर धकर छोटक को लगा था उसका हाथ पांव सु न होने लगा है

और अब वह बेहोश होकर िगर जायेगी, वह ऑख के सामने ब चे को कुंए म िगरते दे ख

रह थी। ब चा कुए क जगत पर चढ़ने का यास कर रहा था, ले कन कुशल हआ


ु था

इसी बीच बाबू लाल उधर से गुजरे थे उनक नजर जगत पर चढ़ने का यास करते ब चे
पर पड़ थी अरे ब चा कुंए पर जा रहा है , दौड़कर उ ह ने ब चे को ग द म उठा िलया

था। कतनी बेहू द है यह औरत ब चे क कोई फकर ह नह ं है अभी तो ब चा कुंए म

िगर जाता, ब चे को उठा उ ह ने चार तरफ दे खा था वहाँ कोई नह ं था उसे िलए वे

रामधन के घर म घुसे थे िच लाते हए


ु अरे बेहू द औरत ब चा कॅ◌ुए म िगर रहा है

ले कन तुझे जरा सा याल ह नह ं छोटक बहू कवाड़े क ओट म खड़ थी बाबूलाल

छोटक के पद म भसुर लगते थे डयोढ़ के भीतर पांव रखते ह उसक नजर औरत पर

पड़ थी औरत दरवाजे के एक कोने म हाथ भर घूंघट ताने दबक


ु खड़ थी। अरे बेहू द

औरत ब चा ऐसे छोड़ा जाता है यह तो कुशल हआ


ु म पहँु च गया नह ं तो यह तो कुएँ म

िगर गया था। छोटक बहू का कलेजा अभी भी धड़क रहा था, बाबूलाल भसुर, उनक

गोद से दौड़कर वह ब चे को ले भी नह ं सकती थी य क भसुर क परछाई तक छूने से

उसे परहे ज करना था, ऐसे म वह उनक गोद म ब चा कैसे पकड़ सकती है ।

बाबू लाल भी भयहू को छू नह ं सकते थे, इसिलए उ ह ने ब चे को जमीन पर

उतार औरत को डांटते बड़बड़ाते बाहर िनकल गए थे।

सोमेश शेखर च